अविराम का ब्लॉग : वर्ष : 2, अंक : 5, जनवरी 2013
सामग्री : इस अंक में डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’, माणिक घोषाल, प्रबोध कुमार गोविल, मन्टू कुमार, रेखा अग्रवाल एवं (डॉ.) मीरा भारद्वाज की काव्य रचनाएँ।
डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’
दो मुक्तक
1.
कल कभी आता नहीं, सच है यही जीवन का प्यारे!
कल करूँगा काम बढ़िया, भ्रम यही मन का है प्यारे!!
कर्म जिसको भा गया हो, वह नहीं रुकता कभी भी,
कर्मशीलों के लिए तो, ‘आज’ जीवन-सच है प्यारे!!
माणिक घोषाल
{वरिष्ठ कवि माणिक घोषाल जी का कविता संग्रह ‘संवेदना के स्वर’ हमें हाल ही में पढ़ने को मिला। संग्रह की भावपूर्ण कविताओं में से प्रस्तुत हैं दो कविताएँ।}
दो कविताएँ
किन्नर-बाला
चैत्र के शुक्ल पक्ष का आगमन।
ऋतु करती नववर्ष अभिनन्दन।
सांगला की बर्फ़ीली टोपी पहने,
सिर पर रखे हुए-
झरनों के झर-झर करते घड़े।
बुरांस के लाल बूटों वाला,
सेब के सफेद फूलों वाला,
महकता हुआ सलवार कुर्ता
धानी रंग च्यूली का दुपट्टा।
दोनों बगल में - संभाले हुए
नदी-नालों के घट।
भर देह में यौवन की ज्वाला
सतलज में छप-छप करती
चली आ रही है-
प्रकृति की किन्नर-बाला।
(सांगला, किन्नौर, हिमाचल प्रदेश में रची कविता)
बसंत आगमन
लो-फिर प्रकृति के द्वार-
दस्तक दे गया वसंत।
रस वर्षा दिक्-दिगंत।
परन्तु तुमको क्या?
कहाँ समय है कि तुम सोचो-
क्यों प्रकृति ने ओढ़ी तरुणाई
कहाँ समय है कि तुम सुनो-
क्यों बागों में कोयल ने कूक मचाई।
कहाँ समय है कि तुम सूंघो-
क्यों उपवन ने दिक्-दिगन्त सुगन्ध फैलाई।
कहाँ समय है कि तुम झूमो-
भोर होते बरसा महुआ, चहुँ ओर मादकता छाई।
कहाँ समय है कि तुम देखो-
क्यों आम बौराया, पत्ती शरमाई।
कहाँ समय है कि तुम बोलो-
‘आओ करे आलिंगन, यह वसंत ऋतु आई’
यह फूलों का फूलना
यह पलाश की लाली
यह सुगंधित मधुकलश
यह फ़िजा मतवाली।
यह वासंती बयार में लचकती हुई डाली-
यह धरा के हाथों में सजी फूलों की थाली।
निश्चय ही वर्ष में एक बार-
सजाती है प्रकृति-नटी
स्वागत के तोरण-द्वार।
मानव मन को झकझोर जाती है।
नस-नस में मधुरस हिलोर जाती है।
परन्तु इस मशीनी युग में-
पर्यावरण के छेड़छाड़ में
जन मानस की रेलमपेल में-
और....
धरा की भीड़-भाड़ में-
तुम्हारे मन में वह मादक अणु कहाँ?
जहाँ मादकता का विस्फोट हो।
तुम मानव नहीं-
केवल एक रोबोट हो।
रोबोट कर्मनिष्ठ तो होता है-
पर उसके पास मन नहीं होता।
गुदगुदी नहीं होती- क्योंकि
तन नहीं होता।
वसंत का क्या-
आदिकाल से अनन्त काल तक
आता-जाता रहेगा और
वासंती पवन आंचल फैलायेगी।
संदेह है तो बस इतना-
कि इस मशीन युगीन मानव को-
प्रकृति की यह मादक रचना-
क्या गुदगुदायेगी?
प्रबोध कुमार गोविल
{वरिष्ठ साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल जी एवं संभावनाशील युवा कवि मन्टूकुमार का संयुक्त कविता संग्रह ‘उगती प्यास दिवंगत पानी’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह से प्रस्तुत हैं दोनों कवियों की दो-दो कविताएँ।}
दो कविताएँ
अब भी उगाते हैं अन्न
कौन कहता है कि
अब नहीं उगाते पौष्टिक अन्न
जिसे खाकर पैदा हों
वास्तविक आदमी
खेत अब भी उगाते हैं अन्न
हां, वह अब पौष्टिक न निकले
तो तहकीकात की जानी चाहिये
उन इल्लियों व कीटों की
नहीं, जो पनप जाते हैं
खेतों में भुरभुरी मिट्टी में
बल्कि उनकी
जो पनप जाते हैं
चमचमाते शहरों की
जगमगाती कोठियों में!
खेत अब भी उगाते हैं अन्न...!
दुखद है पानी का दिवंगत होना...
ताण्डव होता है
विभीषिका का
पड़ जाता है
भीषण अकाल
जब पानी
सूख जाता है
बादलों में
नदियों में
नालों में
नलों में
लेकिन इससे भी
भयावह
ताण्डव,
इससे भी वीभत्स
विभीषिका
खड़ी हो जाती है
द्वार पर
जब
पानी मर जाता है
आंखों में
खून में
रिश्तों में....।
मन्टू कुमार
दो कविताएँ
अम्मा
नजर में रहती हो, पर नजर नहीं आतीं
अम्मा......
कहने को सब साथ हैं अपने पर,
वो अपनापन नहीं झलकता अम्मा...
पहले एक-एक पल में थे कई जीवन
अब जीवन में ढूँढ़ते हैं एक पल, तुम्हारे बिना
अम्मा....
हम खुश रहकर मुस्कराते थे और
तुम हमें खुश देखकर मुस्कराती थीं,
बस अंतर यही था अम्मा....
ख्वाइश भी नहीं है कुछ इस जहाँ से पाने की
तुम्हारा अहसास ही काफी है,
अकेले में रोने के लिए अम्मा...
जहाँ तुम चली गईं, उस जहाँ में
हमं कब बुलाओगी अम्मा....
तुमने दिखाए थे जो सपने
उन सपनों की खातिर,
बस जी रहे हैं, अम्मा...।
चेहरे
चेहरे मिले हैं, हजारों
यूं सफ़र करते-करते, जिंदगी की राहों में
कि
किसी ने ऊपर वाले का दर्जा पा लिया
तो कोई
सामने से गुजर गया और नज़र भी न आया...।
रेखा अग्रवाल
{कवयित्री रेखा अग्रवाल का काव्य संग्रह ‘यादों का सफ़र’ हमें हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसी संग्रह से प्रस्तुत हैं उनकी दो ग़ज़लें।}
दो ग़ज़लें
1.
वो शख़्स मेरे खून का प्यासा भी है बहुत।
जिसको के मैंने टूट के चाहा भी है बहुत।
सिमटा तो बूँद-बूँद में दरया बना रहा,
बनकर फिर आस्मान वो फैला भी है बहुत।
हर इक क़दम पे माँ की दुआ साथ-साथ थी,
और उसपे मेरी जान का सद्क़ा भी है बहुत।
काँटे निकाल देता है काँटा ही पाँव का,
काँटों पे चलके हमने ये देखा भी है बहुत।
अक्सर तो दर्द सीने में जमकर ही रह गया,
लेकिन कभी ये आँख से पिघला भी है बहुत।
तहज़ीब की हदों में जो बँधकर रहा सदा,
उसके लिए तो मामूली ‘रेखा’ भी है बहुत।
2.
ज़मीन अपनी नहीं और न आस्माँ अपना।
मगर मैं छोड़ ही जाऊँगी कुछ निशाँ अपना
करूँ मैं किस तरह शिकवा भला अज़ीजों से,
मैं जिसके साथ रही वो भी था कहाँ अपना।
ख़ुदाया मेरी मुसाफ़त को मंज़िलें देना,
बहुत दिनों से है गुमराह कारवाँ अपना।
मैं अपने आप से करती हूँ इन दिनों बातें,
न हम कलाम न कोई है हमज़ुबाँ अपना।
झुका जहाँ भी अक़ीदत से सर कहीं मेरा,
बना लिया है उसी दर को आस्ताँ अपना।
अजीब फैला है कुहरा सा इन दिनों ‘रेखा’
है आइने में भी चेहरा धुआँ-धुआँ अपना।
डॉ. मीरा भारद्वाज
{कवयित्री डॉ. मीरा भारद्वाज का कविता संग्रह ‘बुलबुला’ हमें हाल ही में पढ़ने को मिला। इन भावपूर्ण कविताओं में से प्रस्तुत हैं दो कविताएँ।}
बेटी
आज अच्छा लगा
बिना आहट
उसका यूँ आना
आकर बाँहे फैलाना
जैसे प्यासे को सागर का मिल जाना।
सिमट गई उसकी बाँहों में
मुझे भी तलाश थी
सशक्त कंधों की।
गहरे भंवर की उलझन
मस्तिष्क की असह्य थकन
घबराता अवसादित मन
टिका दिया उसके कंधों पर।
स्नेहिल बाहुपाश की दृढ़ता
कम्पित हथेलियों का स्पर्श
यकायक परिपक्व हो गया
हो गया नई ऊर्जा का संचरण
बिना कुछ कहे
समझ मेरी उलझन
निःशब्द तसल्ली शान्ति देती
मेरी युवा बेटी
आज माँ के इतना करीब थी।
कितने नासमझ निर्मम हैं वे लोग
जो कर देते भ्रूण-हत्या।
अनकही
सड़क के इस पार
शीत का प्रकोप
कोहरा घना छा गया
बीती रात का दुःख
शिलाखण्ड बना गया।
टकराते थे संवेग
लहरों की भाँति
वक्त बेमौके बाँच गया
भाग्य की पाती।
निर्जीव सुत देह पास पड़ी थी
मन में उद्वेग प्रश्नों की झड़ी थी।
सड़क के उस पार
दो मंजिला अस्पताल
नमूना बेमिसाल।
मेहनत, लगन की हर ईंट गवाह थी
बनी आज पीड़ा अव्यक्त व्यथा थी।
कोने-कोने से परिचित
उद्विग्न था चित्त
मस्तिष्क था भरमाया
जड़ सीढ़ियों से आँख मूँद
कई बार उतर आया।
बिंध गया हृदय, पहुँची ठेस
बनाया अपने हाथों, निषिद्ध प्रवेश।
मौन विडम्बना
जिन्दगी पराजित खड़ी थी,
पिता की पथराई आँखें
शून्य में गड़ी थी।
।।कविता अनवरत।।
डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’
दो मुक्तक
1.
कल कभी आता नहीं, सच है यही जीवन का प्यारे!
कल करूँगा काम बढ़िया, भ्रम यही मन का है प्यारे!!
कर्म जिसको भा गया हो, वह नहीं रुकता कभी भी,
छायाचित्र : उमेश महादोषी |
2.
गम सभी के लें स्वयं हम, बाँट दें हम सुख सभी !
ज़िन्दगी का क्या भरोसा, काम यह कर लें अभी!!
फिर निराशा और चिंता, क्या डरा सकती हैं हमको,
सच्ची ख़ुशी तब ही मिलेगी, प्रण अगर कर लें सभी!!
गम सभी के लें स्वयं हम, बाँट दें हम सुख सभी !
ज़िन्दगी का क्या भरोसा, काम यह कर लें अभी!!
फिर निराशा और चिंता, क्या डरा सकती हैं हमको,
सच्ची ख़ुशी तब ही मिलेगी, प्रण अगर कर लें सभी!!
- 74/3, न्यू नेहरू नगर, रुड़की-247667, जिला-हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
{वरिष्ठ कवि माणिक घोषाल जी का कविता संग्रह ‘संवेदना के स्वर’ हमें हाल ही में पढ़ने को मिला। संग्रह की भावपूर्ण कविताओं में से प्रस्तुत हैं दो कविताएँ।}
दो कविताएँ
किन्नर-बाला
चैत्र के शुक्ल पक्ष का आगमन।
ऋतु करती नववर्ष अभिनन्दन।
सांगला की बर्फ़ीली टोपी पहने,
रेखाचित्र : बी मोहन नेगी |
झरनों के झर-झर करते घड़े।
बुरांस के लाल बूटों वाला,
सेब के सफेद फूलों वाला,
महकता हुआ सलवार कुर्ता
धानी रंग च्यूली का दुपट्टा।
दोनों बगल में - संभाले हुए
नदी-नालों के घट।
भर देह में यौवन की ज्वाला
सतलज में छप-छप करती
चली आ रही है-
प्रकृति की किन्नर-बाला।
(सांगला, किन्नौर, हिमाचल प्रदेश में रची कविता)
बसंत आगमन
लो-फिर प्रकृति के द्वार-
दस्तक दे गया वसंत।
रस वर्षा दिक्-दिगंत।
परन्तु तुमको क्या?
कहाँ समय है कि तुम सोचो-
क्यों प्रकृति ने ओढ़ी तरुणाई
रेखाचित्र : मनीषा सक्सेना |
क्यों बागों में कोयल ने कूक मचाई।
कहाँ समय है कि तुम सूंघो-
क्यों उपवन ने दिक्-दिगन्त सुगन्ध फैलाई।
कहाँ समय है कि तुम झूमो-
भोर होते बरसा महुआ, चहुँ ओर मादकता छाई।
कहाँ समय है कि तुम देखो-
क्यों आम बौराया, पत्ती शरमाई।
कहाँ समय है कि तुम बोलो-
‘आओ करे आलिंगन, यह वसंत ऋतु आई’
यह फूलों का फूलना
यह पलाश की लाली
यह सुगंधित मधुकलश
यह फ़िजा मतवाली।
यह वासंती बयार में लचकती हुई डाली-
यह धरा के हाथों में सजी फूलों की थाली।
निश्चय ही वर्ष में एक बार-
सजाती है प्रकृति-नटी
स्वागत के तोरण-द्वार।
मानव मन को झकझोर जाती है।
नस-नस में मधुरस हिलोर जाती है।
परन्तु इस मशीनी युग में-
पर्यावरण के छेड़छाड़ में
जन मानस की रेलमपेल में-
और....
धरा की भीड़-भाड़ में-
तुम्हारे मन में वह मादक अणु कहाँ?
जहाँ मादकता का विस्फोट हो।
तुम मानव नहीं-
केवल एक रोबोट हो।
रोबोट कर्मनिष्ठ तो होता है-
पर उसके पास मन नहीं होता।
छायाचित्र : उमेश महादोषी |
तन नहीं होता।
वसंत का क्या-
आदिकाल से अनन्त काल तक
आता-जाता रहेगा और
वासंती पवन आंचल फैलायेगी।
संदेह है तो बस इतना-
कि इस मशीन युगीन मानव को-
प्रकृति की यह मादक रचना-
क्या गुदगुदायेगी?
- सी-78, शिवालिक नगर, हरिद्वार-249403 (उत्तराखंड)
प्रबोध कुमार गोविल
{वरिष्ठ साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल जी एवं संभावनाशील युवा कवि मन्टूकुमार का संयुक्त कविता संग्रह ‘उगती प्यास दिवंगत पानी’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह से प्रस्तुत हैं दोनों कवियों की दो-दो कविताएँ।}
दो कविताएँ
अब भी उगाते हैं अन्न
कौन कहता है कि
अब नहीं उगाते पौष्टिक अन्न
जिसे खाकर पैदा हों
वास्तविक आदमी
खेत अब भी उगाते हैं अन्न
रेखाचित्र : महावीर रंवाल्टा |
तो तहकीकात की जानी चाहिये
उन इल्लियों व कीटों की
नहीं, जो पनप जाते हैं
खेतों में भुरभुरी मिट्टी में
बल्कि उनकी
जो पनप जाते हैं
चमचमाते शहरों की
जगमगाती कोठियों में!
खेत अब भी उगाते हैं अन्न...!
दुखद है पानी का दिवंगत होना...
ताण्डव होता है
विभीषिका का
पड़ जाता है
भीषण अकाल
जब पानी
सूख जाता है
बादलों में
रेखाचित्र : सिद्धेश्वर |
नालों में
नलों में
लेकिन इससे भी
भयावह
ताण्डव,
इससे भी वीभत्स
विभीषिका
खड़ी हो जाती है
द्वार पर
जब
पानी मर जाता है
आंखों में
खून में
रिश्तों में....।
- बी-301, मंगलम जाग्रति रेजीडेन्सी, 447, कृपलानी मार्ग, आदर्श नगर, जयपुर-302004 (राज.)
मन्टू कुमार
दो कविताएँ
अम्मा
नजर में रहती हो, पर नजर नहीं आतीं
अम्मा......
कहने को सब साथ हैं अपने पर,
वो अपनापन नहीं झलकता अम्मा...
पहले एक-एक पल में थे कई जीवन
रेखाचित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा |
अम्मा....
हम खुश रहकर मुस्कराते थे और
तुम हमें खुश देखकर मुस्कराती थीं,
बस अंतर यही था अम्मा....
ख्वाइश भी नहीं है कुछ इस जहाँ से पाने की
तुम्हारा अहसास ही काफी है,
अकेले में रोने के लिए अम्मा...
जहाँ तुम चली गईं, उस जहाँ में
हमं कब बुलाओगी अम्मा....
तुमने दिखाए थे जो सपने
उन सपनों की खातिर,
बस जी रहे हैं, अम्मा...।
चेहरे
चेहरे मिले हैं, हजारों
यूं सफ़र करते-करते, जिंदगी की राहों में
कि
किसी ने ऊपर वाले का दर्जा पा लिया
तो कोई
सामने से गुजर गया और नज़र भी न आया...।
- द्वारा श्री प्रबोध कुमार गोविल, बी-301, मंगलम जाग्रति रेजीडेन्सी, 447, कृपलानी मार्ग, आदर्श नगर, जयपुर-302004 (राज.)
रेखा अग्रवाल
{कवयित्री रेखा अग्रवाल का काव्य संग्रह ‘यादों का सफ़र’ हमें हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसी संग्रह से प्रस्तुत हैं उनकी दो ग़ज़लें।}
दो ग़ज़लें
1.
वो शख़्स मेरे खून का प्यासा भी है बहुत।
जिसको के मैंने टूट के चाहा भी है बहुत।
सिमटा तो बूँद-बूँद में दरया बना रहा,
बनकर फिर आस्मान वो फैला भी है बहुत।
रेखा चित्र : बी मोहन नेगी |
हर इक क़दम पे माँ की दुआ साथ-साथ थी,
और उसपे मेरी जान का सद्क़ा भी है बहुत।
काँटे निकाल देता है काँटा ही पाँव का,
काँटों पे चलके हमने ये देखा भी है बहुत।
अक्सर तो दर्द सीने में जमकर ही रह गया,
लेकिन कभी ये आँख से पिघला भी है बहुत।
तहज़ीब की हदों में जो बँधकर रहा सदा,
उसके लिए तो मामूली ‘रेखा’ भी है बहुत।
2.
रेखाचित्र : नरेश उदास |
मगर मैं छोड़ ही जाऊँगी कुछ निशाँ अपना
करूँ मैं किस तरह शिकवा भला अज़ीजों से,
मैं जिसके साथ रही वो भी था कहाँ अपना।
ख़ुदाया मेरी मुसाफ़त को मंज़िलें देना,
बहुत दिनों से है गुमराह कारवाँ अपना।
मैं अपने आप से करती हूँ इन दिनों बातें,
न हम कलाम न कोई है हमज़ुबाँ अपना।
झुका जहाँ भी अक़ीदत से सर कहीं मेरा,
बना लिया है उसी दर को आस्ताँ अपना।
अजीब फैला है कुहरा सा इन दिनों ‘रेखा’
है आइने में भी चेहरा धुआँ-धुआँ अपना।
- 25/12, मधुबन, 25, रिथर्डन रोड, वेपरे, चैन्नई-600007 (तमिलनाडु)
डॉ. मीरा भारद्वाज
{कवयित्री डॉ. मीरा भारद्वाज का कविता संग्रह ‘बुलबुला’ हमें हाल ही में पढ़ने को मिला। इन भावपूर्ण कविताओं में से प्रस्तुत हैं दो कविताएँ।}
बेटी
आज अच्छा लगा
बिना आहट
उसका यूँ आना
आकर बाँहे फैलाना
जैसे प्यासे को सागर का मिल जाना।
सिमट गई उसकी बाँहों में
मुझे भी तलाश थी
सशक्त कंधों की।
रेखाचित्र : नरेश उदास |
मस्तिष्क की असह्य थकन
घबराता अवसादित मन
टिका दिया उसके कंधों पर।
स्नेहिल बाहुपाश की दृढ़ता
कम्पित हथेलियों का स्पर्श
यकायक परिपक्व हो गया
हो गया नई ऊर्जा का संचरण
बिना कुछ कहे
समझ मेरी उलझन
निःशब्द तसल्ली शान्ति देती
मेरी युवा बेटी
आज माँ के इतना करीब थी।
कितने नासमझ निर्मम हैं वे लोग
जो कर देते भ्रूण-हत्या।
अनकही
सड़क के इस पार
शीत का प्रकोप
कोहरा घना छा गया
बीती रात का दुःख
शिलाखण्ड बना गया।
टकराते थे संवेग
लहरों की भाँति
वक्त बेमौके बाँच गया
भाग्य की पाती।
निर्जीव सुत देह पास पड़ी थी
मन में उद्वेग प्रश्नों की झड़ी थी।
सड़क के उस पार
दो मंजिला अस्पताल
नमूना बेमिसाल।
छायाचित्र : उमेश महादोषी |
कोने-कोने से परिचित
उद्विग्न था चित्त
मस्तिष्क था भरमाया
जड़ सीढ़ियों से आँख मूँद
कई बार उतर आया।
बिंध गया हृदय, पहुँची ठेस
बनाया अपने हाथों, निषिद्ध प्रवेश।
मौन विडम्बना
जिन्दगी पराजित खड़ी थी,
पिता की पथराई आँखें
शून्य में गड़ी थी।
- ए-10, राजलोक विहार, निकट गीत-गोविन्द बैंकट हॉल, ज्वालापुर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)।
मनीषा जी और मन्टु को हार्दिक बधाई उत्तम सृजन हेतु।
जवाब देंहटाएं..,
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मेरा काव्य जगत......
http://yuvaam.blogspot.com/p/blog-page_9024.html?m=0
बहुत अच्छा प्रयास....बहुत सुंदर कविताएं / ग़ज़लें आपको एवं रचनाकारों को बधाई
जवाब देंहटाएंसमस्त रचनाकारोँ का धन्यवाद।
जवाब देंहटाएं@
मेरी कविताएँ
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