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रविवार, 19 मई 2013

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अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 2,   अंक  : 8, अप्रैल 2013 


भाव जगत के कथाकार इलाचंद्र जोशी का स्मरण


फोटो परिचय : संगोष्ठी को संबोधित करती
 भाषा विज्ञान विभाग,
लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व अध्यक्ष
प्रो. ऊषा सिन्हा
कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ ने जन्मदिन (13 दिसम्बर, 2013) पर भाव जगत के कथाकार इलाचंद्र जोशी का भावपूर्ण स्मरण किया। सृजन पीठ द्वारा राजकीय उच्च्तर माध्यमिक विद्यालय, मल्ला रामगढ़ (नैनीताल) में इलाचंद्र जोशी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य व्याख्याता लखनऊ विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. ऊषा सिन्हा ने कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य एवं मनोविज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वालों में इलाचंद्र जोशी प्रमुख हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। विभिन्न विधाओं पर गम्भीर रचनाएँ उनकी हिंदी साहित्य को अमूल्य देन हैं। जोशी जी ने यद्यपि सभी विधाओं में लेखनी चलायी लेकिन उन्हें सर्वाधिक ख्याति मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास के क्षेत्र में मिली। पात्रों की मानसिक स्थिति का जो सजीव चित्रण उनकी कहानियों और उपन्यासों में मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
प्रो. सिन्हा ने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में सामाजिक कुरीतियों के बाह्य जगत को उद्घाटित किया परन्तु इलाचंद्र जोशी ने व्यक्ति के बाह्य जगत से कहीं अधिक महत्व आन्तरिक जगत को दिया है। उन्होंने हिंदी में पहले-पहल मनोविश्लेषण प्रधान उपन्यासों की परम्परा का सूत्रपात किया। चरित्रों के भाव जगत के सूक्ष्म विश्लेषण में उनके उपन्यास बेजोड़ हैं। उनकी विशेषता थी कि अध्ययनशील होते हुए भी दार्शनिकता का प्रभाव उनकी रचनाओं में नहीं दिखाई देता जिस कारण वे आम आदमी के अधिक निकट हैं।
महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि इलाचंद्र जोशी अपने समय के उन प्रबुद्ध साहित्यकारों में थे जिन्होंने भारतीय एवं विदेशी साहित्य का व्यापक अध्ययन किया था। उन पर रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व का विशेष प्रभाव रहा तथा सदैव लिखते रहने की प्रेरणा उन्हें शरतचन्द्र से मिली। जोशी जी कथाकार एवं उपन्यासकार होने के साथ एक सफल सम्पादक, आलोचक तथा पत्रकार भी थे। उनकी मनोविश्लेषणात्मक शैली अन्य लेखकों से बिल्कुल अलग है। इस शैली के कारण ही उनका साहित्य प्रायः दुरूह एवं जटिल प्रतीत होता है।
रा0उ0मा0वि0 मल्ला रामगढ़ के प्राध्यापक मुख्तार सिंह ने कहा कि इलाचंद्र जोशी का संपूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। बचपन में पिता की मृत्यु, आर्थिक संकट का निरंतर बने रहना, नौकरी करना और छोड़ना उनका स्वभाव बन गया था। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद वह टूटे नहीं बल्कि इन स्थितियों को उन्होंने अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाया। उनका बहुचर्चित उपन्यास ‘जहाज का पंछी’ एक तरह से उनके अपने जीवन की गाथा है।
सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने बताया कि 1960 में इलाचंद्र जी कुछ महीनों तक महादेवी वर्मा के रामगढ़ स्थित घर ‘मीरा कुटीर’ में रहे जहाँ उन्होंने ‘ऋतुचक्र’ नामक उपन्यास लिखा। पहाड़ी जीवन को लेकर लिखा गया उनका यह एकमात्र उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि महादेवी जी के घर ‘मीरा कुटीर’ में ही कुमाऊँ विश्वविद्यालय की महादेवी वर्मा सृजन पीठ स्थापित है।
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मल्ला रामगढ़ के प्रधानाचार्य देवेन्द्र कुमार जोशी ने महादेवी वर्मा सृजन पीठ की पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस आयोजन से भूले-बिसरे साहित्यकार इलाचंद्र जोशी के व्यक्तित्व के छुए-अनछुए पहलुओं को जानने का अवसर मिला। निरंतर संघर्षरत रहकर जोशी जी ने साहित्य जगत में जो मुकाम हासिल किया, निसंदेह उससे विद्यार्थियों को प्रेरणा मिली होगी। इस प्रकार के आयोजनों की विद्यार्थियों में साहित्यिक जागरूकता उत्पन्न करने में विशेष भूमिका है। उन्होंने भविष्य में भी पीठ द्वारा विद्यालय में साहित्यिक गतिविधियाँ आयोजित कर विद्यार्थियों को साहित्य के प्रति जागरूक व प्रोत्साहित करने पर बल दिया। छात्रा दिलमाया थापा ने अपनी मौलिक कविता का पाठ किया। इससे पूर्व गणमान्य अतिथियों द्वारा इलाचंद्र जोशी के चित्र पर माल्यार्पण से संगोष्ठी का प्रारम्भ हुआ।
इस अवसर पर पीताम्बर दत्त भट्ट, प्रभात कुमार साह, ताहिर हुसैन, मुख्तार सिंह, ईश्वरी दत्त जोशी, शेखर चन्द्र गुणवन्त, बसन्त सिंह बिष्ट, रमेश सिंह रावत, साबिर खाँ, प्रमोद रैखोला, बहादुर सिंह आदि उपस्थित थे। संगोष्ठी का संचालन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया। (समाचार प्रस्तुति : मोहन सिंह रावत, बर्ड्स आई व्यू, इम्पायर होटल परिसर, तल्लीताल, नैनीताल-263 002, उत्तराखण्ड)



‘मौरसदार लड़ता है’ का लोकार्पण
विगत दिनों तिलाड़ी सम्मान समिति के तत्वावधान में महावीर रंवाल्टा के नाटक ‘मौरसदार लड़ता है’ का लोकार्पण उत्तराखंड सरकार में मंत्री प्रीतम सिंह पंवार किया। बड़कोट में सम्पन्न इस कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर पंचायत अध्यक्ष बुद्धि सिंह रावत ने की। मुख्य अतिथि श्री प्रीतम सिंह पंवार ने महावीर रंवाल्टा की सृजनशीलता की प्रशंसा करते हुए कहा कि रचनात्मक कार्यों से समाज में नई चेतना विकसित होती है। इस अवसर पर अति.जिलाधिकारी बी.डी.मिश्रा, प्र. वनाधिकारी डी.के. सिंह, उपजिलाधिकारी बड़कोट परमानन्द राम, डॉ.विजय बहुगुणा व श्री सकलचन्द ने भी अपने विचार रखे। संचालन प्रो.आर.एस.असवाल ने किया। (समा.सौजन्य: महावीर रंवाल्टा)



भगवान अटलानी जी बने  सिंधी एडवाइज़री बोर्ड के सदस्य

   


       वरिष्ठ लेखक भगवान अटलानी को केन्द्रीय साहित्य अकादमी के सिंधी एडवाइज़री बोर्ड का सदस्य मनोनीत किया गया है। राजस्थान से मनोनीत होने वाले वे अकेले सदस्य हैं। डा. प्रेमप्रकाश (अहमदाबाद) के संयोजन में गठित बोर्ड में वीना श्रंगी (दिल्ली), जया जादवानी (रायपुर), डा. हूंदराज बलवानी (अहमदाबाद), नंद जवेरी (मुम्बई), खीमन मूलानी (भोपाल), डा. विनोद आसूदानी (नागपुर), डा. कन्हैयालाल लेखवानी (पुणे) और अर्जुन चावला (अलीगढ़) को सम्मिलित किया गया है। इन सबका कार्यकाल पांच वर्षों का होगा।
          अटलानी की अब तक 22 पुस्तकें प्रकाषित हो चुकी हैं। उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोेच्च सम्मान मीरा पुरस्कार तथा राजस्थान सिंधी अकादमी का सर्वोच्च सम्मान सामी पुरस्कार मिल चुका है। वे राजस्थान सिंधी अकादमी के अध्यक्ष रहे हैं। (समाचार सौजन्य : भगवान अटलानी, डी-183,मालवीय नगर, जयपुर-302017)




प्रो.विनोद अश्क के तीसरे ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण

वरिष्ठ कवि-शायर प्रो. विनोद अश्क के तीसरे ग़ज़ल संग्रह ‘तेरे क़दमों के निशां’ का लोकार्पण गत 03 मार्च को सुप्रसिद्ध गीतकार श्री गोपालदास ‘नीरज’ जी द्वारा अलीगढ़ स्थित अपने आवास पर किया गया। साधारण एवं संक्षिप्त कार्यक्रम में श्री नीरज जी एवं प्रो. अश्क ने अपनी-अपनी ग़ज़लों का पाठ भी किया। (समाचार सौजन्य: प्रो. विनोद अश्क, शामली)


उद्भ्रांत में दृष्टि की व्यापकता और दार्शनिक तत्व :  प्रो. निर्मला जैन

            उद्भ्रांत की दृष्टि-व्यापकता तथा दार्शनिक तत्व को छूने की कोशिश अद्भुत है जो उनकी लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ में स्पष्ट परिलक्षित होती है। यह बात वरिष्ठ आलोचक तथा साहित्यकार प्रो. निर्मला जैन ने साहित्य अकादेमी के संगोष्ठी कक्ष में अमन प्रकाशन, कानपुर के तत्वावधान में, उद्भ्रांत की लम्बी कविताओं के संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, गहरी सागर-सी’ तथा उनके साहित्य पर केन्द्रित अन्य लेखकों/सम्पादकों की आधा दर्जन से अधिक पुस्तकों के लोकार्पण समारोह के अवसर पर ‘उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कही।
उन्होंने कहा कि मिथक का मूल अर्थ वहीं से निकलता है जहाँ से उसका जन्म हुआ है और जब भी कोई कृतिकार उसे अपनी वैचारिक दृष्टि के साथ खींचकर नया गढ़ने की कोशिश करता है तब यदि वह मूल अर्थ की व्यंजना से जुड़ा रहता है तभी उसमें मिथकीय संवेदना बनी रहती है। उन्होंने कहा कि यद्यपि आज लम्बी कविताओं का दौर नहीं है, फिर भी ऐसी कविताएं विचारशून्य नहीं होती हैं। उन्होंने ऐसी रचनाओं के लिए ‘लिबर्टी’ और ‘विज़न’ की आवश्यकता पर बल दिया। नामवर जी को ‘शब्दों का अद्भुत खिलाड़ी’ बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘प्रतिभा का विस्फोट’ क्यों कहा इसे समझना होगा। अज्ञेय की ज़्यादातर कविताएं छोटी हैं जबकि मुक्तिबोध लम्बी कविताएं ही लिखते हैं। उनकी कविताओं का फ़ॉर्म भी अलग है। आज कवि के जुझारू व्यक्तित्व से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा।
पिछले डेढ़ दशक से दिल्ली में स्थाई तौर पर रह रहे उद्भ्रांत की अनेक पुस्तकों के नियमित अंतराल पर लोकार्पण होते रहे हैं तथा उनको केन्द्र में रखते हुए विचारोत्तेजक गोष्ठियाँ भी आयोजित हुईं, किन्तु उद्भ्रांत से सम्बंधित किसी भी गोष्ठी में पहली बार आयीं प्रो. जैन ने कहा कि निमंत्रण के बावजूद वे ऐसी गोष्ठियों में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं, किन्तु यहाँ आकर उद्भ्रांत के रचना-परिमाण से परिचित होने के बाद हतप्रभ लगीं।
इसके पूर्व संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रसिद्ध आलोचक डॉ. कर्णसिंह चौहान ने कहा कि ‘राधा-कृष्ण’ जैसे मिथकों पर लिखना उद्भ्रांत की प्राथमिकता रही है, किन्तु इसे सम्हालना उतना ही कठिन है, क्योंकि विषय की प्रासंगिकता के लिए ‘रिजिडिटी’ अनिवार्य होती है, उसमें लचीलापन नहीं होता है। उन्होंने कहा कि राधाभाव एक अमूर्त विषय है जोकि पूर्ण समर्पण के भाव से संयुत है, जबकि उद्धव का प्रसंग राधाभाव का विखण्डन है। उन्होंने कहा कि चीरहरण का पक्ष लेकर उसे न्यायसंगत ठहराना बहुत ही मुश्किल है। उद्भ्रांत में यह क्षमता है कि वे कठिन से कठिन कार्य को सहजता से कर लेते हैं। वे गोपियों के स्नान प्रसंग के माध्यम से आधुनिक नैतिकता की बात को आगे बढ़कर स्पष्ट करते हैं। उन्होंने कहा कि आज खाप पंचायतों के ‘ड्रेसकोड’ को प्रमाणित करते हुए यह कविता वर्तमान संदर्भों से जुड़ती है। नारी स्वतंत्रता और प्रतिबंध पर कविता के माध्यम से नयी राय रखी गयी है। वस्तुतः उद्भ्रांत ने काव्य के जितने रूपों का प्रयोग किया है, समकालीन कवियों में कम ही लोगों ने किया है। किसी भी अन्य कवि ने परिमाण में इतना नहीं लिखा, साथ ही उन पर केन्द्रित आलोचना-कर्म भी विपुल मात्रा में हुआ है। उन पर लिखित और सम्पादित दर्जनों पुस्तकें आई हैं, जो उनके रचनाकर्म के महत्त्व की सूचक हैं।
मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित डॉ. पी.एन. सिंह (गाजीपुर) ने संगोष्ठी में न आ सकने का दुख जताते हुए एक पत्र के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज की। उनके ई-मेल से प्राप्त पत्र को अखिलेश मिश्र ने पढ़ा। पत्र में डॉ. सिंह ने लिखा कि उद्भ्रांत जी ने अपने अन्दर और बाहर दोनों को साधा है, और ठीक से साधा है। इनकी कविताओं में विचार के साथ-साथ सौन्दर्य भी है। इन्हें मिथकों का कवि न मानकर विचारों का कवि मानना उचित होगा। मिथकों को लेते तो हैं, लेकिन उनका अतिक्रमण भी करते रहते हैं, और यह अतिक्रमण ही सामान्य कवियों से उन्हें ऊपर उठाता है। ‘अभिनव पाण्डव’ में महाभारत की घटनाओं को अधर्म मानते हुए कवि ने युधिष्ठिर के पक्ष को भी प्रश्नांकित किया है। इनका प्रत्येक काव्य-संकलन ऐसे ही मूल्यगत संघर्षों की उपज है। इस तरह उद्भ्रांत एक ऐसे कवि हैं जो स्पष्ट पर भी थोड़ी और अस्पष्टता की चादर ओढ़ा कर अपने कवि-विश्व का निर्माण करते हैं।
       संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि उद्भ्रांत का व्यक्तित्व आग्रही है, जिस कारण उनका वक्तव्य महत्त्वपूर्ण और मानवीय तत्वों से युक्त हो जाता है। ‘राधामाधव’ कृति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राधा का उल्लेख पहले-पहल अपभ्रंश में मिलता है। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि भक्तिकाल में जो कुछ कहा गया, विशेषतः स्त्री चरित्रों को लेकर, उसका सेक्सुअलटी से क्या कोई रिश्ता है, इस पर विमर्श होना चाहिए। उद्भ्रांत के मिथकीय प्रसंग यथार्थवादी प्रतीत होते हैं। उनकी लम्बी कविताओं का ज़िक्र करते हुए डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि उनकी रचनाओं में मानवीय पक्ष बहुत ही सक्षम है जिससे वे अपने को इस स्थिति में लाकर खड़ा कर देते हैं, जहाँ से मूक भी व्यक्त होने लगता है।
        वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि किसी पुराने आख्यान की सीमा होती है, आप उसे कहीं से कहीं नहीं ले जा सकते, किन्तु उद्भ्रांत जी प्रतीकों के माध्यम से उसे कहीं से कहीं लेकर जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि ‘तोता’ कविता उनके काव्य का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करती। भूमण्डलीकरण आदि बड़े विषयों को तोते पर लाद देंगे तब तो उसे मरना ही पड़ेगा। दरअसल, उद्भ्रांत जी अपनी कविता में सब कुछ कह लेना चाहते हैं। उनकी लम्बी कविताओं में ही आलोचना के सूत्र हैं। वहाँ व्यापकता और गहराई भी है। हालांकि, उनकी लम्बी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविताओं में प्रबोधिनी नहीं है, कविता के ड्रामेटिक फार्म टकरा रहे हैं, विज़नरी और विज़न का महत्त्व नहीं रह गया है। उनकी ज़्यादातर लम्बी कविताओं में ‘फ़ार्म’ की व्याकुलता नहीं दिखती, अन्य कविताओं में मिलती है। उन्होंने कहा कि विस्तार से कविता की क्षति होती है और मार्मिक प्रसंग भी ढक जाते हैं, तथापि उनकी कविताओं में गतिशीलता है। नामवर जी के ‘प्रतिभा के विस्फोट’ को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इतनी अधिक कविताएं सामने आई हैं कि इसे ‘कविता का विस्फोट तो कहा ही जा सकता है। बहुत पहले शम्भुनाथ सिंह द्वारा संपादित ‘नवगीत सप्तक’ के संदर्भ में कवि उद्भ्रांत की सक्रियता का ज़िक्र करते हुए उन्होंने पिछले दिनों आये कवि के बहुचर्चित काव्यनाटक ‘ब्लैकहोल’ को भी भारती के काव्यनाटक ‘अंधायुग’ के साथ स्मरण किया।
          डॉ. भगवान सिंह ने संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मानक साहित्य में मिथकीय शब्द ‘राधा’ नहीं है, किन्तु बाद के साहित्य में आ जाता है। उन्होंने ‘राधा’ को ‘लक्ष्मी’ के साथ जोडते हुए कहा कि राधा के परिवर्तित स्वरूप में निर्लज्जता, चंचलता में परिवर्तित हो जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रतिध्वनि उत्पन्न करने वाली कविता को तैयार करने में एवं उसकी भाषा गढ़ने में बहुत अधिक श्रम लगता है लेकिन तभी कविता पाठकों तक पहुँचती है। इस दृष्टि से उद्भ्रांत संपूर्णता के कवि हैं।
         इसके पूर्व संगोष्ठी में पधारे प्रबुद्धजनों की चर्चा में भागीदारी के लिए उद्भ्रांत ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि राधामाधव के संकेतित प्रसंगों में स्त्री-स्वातंत्र्य को शाश्वत मूल्यों से जोड़कर देखने की कोशिश है। उन्होंने आलोचकों से कवि के सामने उपस्थित चुनौती को समझने का आग्रह करते हुए कहा कि ऐसे कवि को अपना समय देखना होता है, उस समय को भी देखना होता है जिसके माध्यम से वह वर्तमान समय को देख रहा है तथा साथ में अपने आत्म के भीतर चलते द्वंद्व को भी। इन सभी के संयोग से ही ऐसी कृति संभव हो पाती है। प्रारंभ में उन्होंने लम्बी कविताओं के अपने लोकार्पित संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, गहरी सागर-सी’ की प्रारंभिक दो कविताओं ‘तोता’ और ‘कृति मेरी पुत्री है’ का पाठ किया।
        संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे दूरदर्शन के महानिदेशक श्री त्रिपुरारि शरण ने चुटकी लेते हुए कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति की कसौटी यही है कि जिस विषय पर ज्ञान न हो, उस पर अधिक नहीं बोलना चाहिए। उन्होंने उद्भ्रांत के कवि-कर्म को रेखांकित करते हुए कहा कि जीवन दर्शन की जो सीमारेखा है, उसकी जटिलता के बावजूद वे अपनी बातों को प्रभावी ढंग से रख पाते हैं। यह उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
कार्यक्रम में जिन अन्य पुस्तकों का लोकार्पण हुआ वे इस प्रकार हैं--डॉ. कर्णसिंह चौहान द्वारा सम्पादित ‘राधामाधव’: राधाभाव और कृष्णत्व का नया विमर्श’, डॉ. लक्ष्मीकांत पाण्डेय द्वारा सम्पादित ‘रुद्रावतार और राम की शक्तिपूजा’, श्री अपूर्व जोशी द्वारा सम्पादित ‘अभिनव पाण्डव: महाभारत का युगीन विमर्श’, श्री नंदकिशोर नौटियाल की आलोचना पुस्तक ‘उद्भ्रांत का संस्कृति चिंतन’, श्री अवधबिहारी श्रीवास्तव द्वारा लिखित आलोचना पुस्तक ‘साहित्य संवाद: केन्द्र में उद्भ्रांत’, उड़िया के प्रख्यात विद्वान पद्मश्री डॉ. श्रीनिवास उद्गाता द्वारा ‘राधामाधव’ का उड़िया काव्यान्तरण तथा उद्भ्रांत विरचित ‘रुद्रावतार’ का नया साहित्यिक संस्करण एवं ‘अभिनव पाण्डव’ का तीसरा संस्करण।
       संगोष्ठी में कवि की धर्मपत्नी श्रीमती ऊषा उद्भ्रांत, पुत्री तूलिका एवं सर्जना के साथ ही सर्वश्री दिनेश मिश्र, वरिष्ठ कथाकार डॉ. मधुकर गंगाधर, पी-7 चैनल के निदेशक श्री शरददत्त, साहित्य अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, डॉ. वीरेन्द्र सक्सेना, डॉ. बली सिंह, राजकुमार गौतम, सुश्री कमलेश जैन, अमरनाथ ‘अमर’, हीरालाल नागर, ‘कथा’ के सम्पादक अनुज, राकेश त्यागी, प्रशांतमणि तिवारी तथा बी.एम. शर्मा सहित राजधानी के साहित्य, कला और संस्कृतिकर्मियों की उपस्थिति सराहनीय रही।
            संगोष्ठी का संचालन श्री पुरुषोत्तम एन. सिंह ने किया। संगोष्ठी के आयोजक श्री अरविंद वाजपेयी, प्रबंध निदेशक (अमन प्रकाशन) ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया। (समाचार प्रस्तुतकर्ता :  अखिलेश मिश्र, 256सी, पॉकेट सी,  मयूर विहार, फेस-2, दिल्ली-110091 / suniltomar95@gmail.com)




शांतिनिकेतन (प.बंगाल) में ‘शुभ तारिका’ का लोकार्पण


कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के विश्व भारती, शांतिनिकेतन (बोलपुर, कोलकाता) के मंच पर पत्रिका ‘शुभ तारिका’ के नवीनतम अंक का परिचय ससम्मान प्रसारित हुआ। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के 65वें अधिवेशन 16-18 मार्च 2013 ‘खुला अधिवेशन’ के अवसर पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के प्रधानमंत्री डॉ. विभूति मिश्र, अध्यक्ष सूर्य प्रकाश दीक्षित तथा हिन्दी विभाग शांतिनिकेतन के सचिव डॉ. रामचन्द्र राय द्वारा शुभ तारिका का लोकार्पण किया गया।
पत्रिका की संपादक श्रीमती उर्मि कृष्ण ने सम्मेलन में बताया कि ‘शुभ तारिका’ अम्बाला छावनी (हरियाणा) के विकलांग व्यक्ति डॉ. महाराज कृष्ण जैन द्वारा 41 वर्ष पूर्व एक पृष्ठ से आरंभ की गई। यह हिन्दी मासिक पत्रिका आज सौ-सौ पृष्ठों के साहित्यिक अंक निकाल रही है। इस अधिवेशन में उर्मि कृष्ण ने पूर्वोत्तर की भाषा समस्या और हिन्दी पर अपना आलेख भी प्रस्तुत किया। 
सम्मेलन में देशभर से पधारे भारतीय भाषा प्रेमी, हिन्दी, बंगला, असमिया, तेलगू, तमिल, कन्नड़, के साहित्यकार उपस्थित थे। शुभ तारिका की प्रशंसा के साथ-साथ कई हिन्दीतर प्रदेश के व्यक्तियों ने भी पत्रिका की सदस्यता ली तथा इसे सराहा। ‘खुला अधिवेशन’ का सफल संचालन श्याम कृष्ण पाण्डेय ने किया। (समाचार प्रस्तुतकर्ता : श्रीमती उर्मि कृष्ण, संपादक ‘शुभ तारिका’, ‘कृष्णदीप’, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी-133001, हरियाणा)




गगन स्वर का पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह


फोटो : विमोचन करते अतिथिगण 



गगन स्वर साहित्यक एवं सामाजिक पत्रिका/बुक्स (पब्लिकेशन) द्वारा 17 फरवरी, 2013 को हिन्दी भवन, नई दिल्ली में पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समोराह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत सुप्रसिद्ध गायक कलाकार श्री प्रदीप कुमार सोनी के गीतों द्वारा किया गया। तत्पश्चात ”भारत के लघुकथाकार“, (जिसमें लगभग 65 लघुकथाकारों की चुंनिदा लघुकथाओं का संकलन है।) व श्री पुरुषोत्तम कुमार शर्मा द्वारा लिखित लघुकथा संग्रह ”छोटे कदम“, रचना त्यागी आभा द्वारा रचित ”पहली दूब“ (काव्य संग्रह), थोड़ी-थोड़ी धूप काव्य संकलन आदि किताबों का अनावरण हुआ। रचना त्यागी आभा, सूर्य नारायण शूर, अरविन्द श्रीवास्तव, अनित्य नारायण मिश्रा, पुरुषोत्तम कुमार शर्मा को माँ सरस्वती रत्न सम्मान, 2013 व श्री प्रदीप कुमार सोनी को मानव भूषण श्री सम्मान 2013 से विभूषित किया गया। अध्यक्ष डॉ. एम. डी. थॉमस, मुख्य अतिथि पं.सुरेश नीरव, विशिष्ट अतिथि डॉ. रंजन जैदी, डॉ. शरद नारायण खरे, विश्वास त्यागी, राजकुमार सचान होरी व डॉ.तारा गुप्ता आदि की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। संचालन अरविन्द श्रीवास्तव ने किया। (समाचार सौजन्य: पुरुषोत्तम कुमार शर्मा)




हरिद्वार में लघुकथा गोष्ठी का आयोजन
 
अलकनंदा शिक्षा न्यास,हरिद्वार की वीथिका ‘लेखनी’ द्वारा स्व.शिवचरण विद्यालंकार की स्मृति में पारिजात संस्था के संरक्षक श्री माणिक घोषाल की अध्यक्षता में एक लघुकथा गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी के सूत्रधार थे सूर्यकान्त श्रीवास्तव ‘सूर्य’। गोष्ठी में के.एल. दिवान, गांगेय कमल, माधवेन्द्र सिंह, डॉ.मीरा भारद्वाज, सुखपाल सिंह, कु. सीमा ‘सदफ’, डॉ.श्याम बनौघा, डॉ. सुशील कुमार त्यागी, रजनी रंजना, सूर्यकान्त श्रीवास्तव ‘सूर्य’ एवं दादा माणिक घोषाल ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया।(समाचार सौजन्य: सूर्यकान्त श्रीवास्तव ‘सूर्य’)



मुइनुद्दीन अतहर सम्मानित




लघुकथा की समर्पित पत्रिका ‘लघुकथा अभिव्यक्ति’ के संपादक व वरिष्ठ साहित्यकार मोह.मुइनुद्दीन ‘अतहर’ को निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान, बस्ती ने ‘राष्ट्रीय साहित्य गौरव‘ सम्मान तथा पाथेय साहित्य कला अकादमी, जबलपुर द्वारा स्व. गणेश प्रसाद नामदेव स्मृति कथासम्मान ‘साहित्य सार्थी’ से सम्मानित किया है। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर द्वारा भी अतहर जी को समग्र लेखन एवं सम्पादन हेतु ‘विद्यावाचस्पति’ की मानद उपाधि प्रदान की है।(समाचार सौजन्य: मो. मुइनुद्दीन अतहर)

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