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रविवार, 19 मई 2013

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 2,  अंक : 8,  अप्रैल  2013

।।सामग्री।।  डॉ. सुरेन्द्र वर्मा का हाइकु विषयक आलेख 'हिंदी हाइकु का सामाजिक सरोकार'।

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा



हिन्दी हाइकु का सामाजिक सरोकार

      हाइकु की विषय वस्तु आरम्भ से ही दार्शनिक अनुभूतियाँ  और विचार रहे हैं। दार्शनिक सोच की गम्भीरतम बातों को हाइकु ने कम से कम शब्दों में प्रस्तुत करना अपना लक्ष्य बनाया। जापान में हाइकु-रचनाओं के अंतर्गत बौद्ध, जैन तथा चीनी दर्शन के गूढ़तम विचारों को स्थान दिया गया। किन्तु धीरे धीरे हाइकु की विषय वस्तु में परिवर्तन आया और हाइकु प्रकृति से प्राप्त सूक्ष्म मानवी संवेदनाओं से जुड़ गया इस दौर से हाइकु मुख्यतः प्राकृतिक संस्कृतियों का चित्रण और उनका मानवीकरण हो गया। इसमें प्रकृति के बहाने मानव इच्छाओं, इच्छाओं और यहाँ तक कि मानवी दुर्बलताओं का चित्रण होने लगा। ऋतुओं से एकाकार होना, उनसे एक आंतरिक सम्बन्ध स्थापित करना और उनमें अपने अस्तित्व को विलीन कर हाइकु रचनाओं का सृजन कवि का अभीष्ट हो गया। किन्तु समय बदला और वक्त के साथ-साथ हाइकु की विषय-सामग्री में भी परिवर्तन आने लगा। हाइकु, जो अभी तक मुख्यतः व्यक्ति के सोच और मार्मिक अनुभूतियों का वाहक था, अधिक सामाजिक होने लगा। यह जीवन के यथार्थ से, जनसम्भावनाओं से और व्यक्ति के सामाजिक परिवेश से जुड़ने लगा।
     भारत में अभी भी सामान्य पाठक के मन में हाइकु की विषयवस्तु को लेकर एक भ्रम की स्थिति है। अभी भी यही समझा जाता है कि हाइकु कविताओं में केवल दार्शनिक अनुभूतियाँ और प्रकृति की मार्मिक अभिव्यक्ति ही होनी चाहिए। लेकिन इधर हिन्दी में जो हाइकु रचनाएं आई है उसने इस संकुचित समझ को झुठलाया है। आखिर कवि भी एक सामाजिक परिवेश में रहता है और अपने आर्थिक-राजनैतिक वातावरण से उसकी एक सतत क्रिया-प्रतिक्रिया संपन्न होती रहती है। ऐसे में यह सोचना कि हाइकुकार कोरी कल्पना के हाथी-दांत महल में बंद होकर केवल अपने सूक्ष्म दार्शनिक सोच या अपनी नितांत व्यक्तिगत अनुभूतियों को ही परोसेगा, गलत होगा। हिन्दी के हाइकुकार की आँखे खुली हुई हैं और वह अपने परिवेश के प्रति सजग है। अतः यह कोई अचम्भा नही कि वह अपने हाइकु काव्य में भी अपने परिवेश की विसंगतियों, विमूल्यों, राजनीति के पतन और दुमँुहेपन तथा सामाजिक राजनैतिक विषमताओं को लगातार अभिव्यक्ति दे रहा है। वेशक इसका यह मतलब नहीं है कि गूढ़ दार्शनिक विचार और अनुभूतियों और प्रकृति का मार्मिक चित्रण पूरी तरह हाइकु साहित्य से खारिज कर दिया गया है।
     भारत एक आर्थिक विषमता का देश है। अतः कवि का कोमल हृदय यहाँ की दरिद्रता तो देखकर सहज ही करूणा से भर आता है। सुविधाओं से रहित एक मजदूर के अथक परिश्रम का एक चित्रण देखें कि जिसे सिर से पांव तक कोई राहत नहीं है।
‘‘ईंटे उसके/सिर पे, नंगे पांव/तपती भू पर’’ -डॉ. रमेश कुमार त्रिपाठी)
     इतनी तकलीफ के बावजूद भी, उसे भला क्या मिलता है?
‘‘हंसता रहा/अभावों में अभाव/रोया गरीब’’ -मुकेश रावत
‘‘गरीब मरा/जन्म से ही मरा था/जिया ही कब’’ -रमेशचन्द्र शर्मा ‘चंद्र’
     दरिद्रता दरिद्र है ही। भारतीय समाज में लड़कियों/स्त्रियों की हालत, भले ही उनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न ही क्यों न हो, और भी बुरी है।
‘‘जनक सुता/किससे कहे व्यथा/सब लंकेश’’ -संतोष चौधरी
‘‘खूंटे से बंधी/गाय जैसा जीवन/जीती लड़की’’ -रमेशचन्द्र शर्मा ‘चंद्र’
      किसी ने ठीक ही कहा है, राजनीति बदमाशों का अंतिम आश्रय है। ऐसे में राजनीतिज्ञों का चरित्र हमें सहज ही सालता है-
‘‘नेता की बात/गूलर के फूल सी/अता न पता’’ -बालकृष्ण थोलम्बिया
      ऐसे में भला आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि भारत के सांसद जनता को कोई शिष्ट आचरण का उदाहरण प्रस्तुत कर सकेंगे?
‘‘अच्छे सलीके/संसद के छिलके/मूंगफली के’’ -डॉ ओमप्रकाश शर्मा
      सारे मूल्य ताक पर रख दिए गए है और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सच्चाई विलुप्त हो गई है और ‘‘तोल दी गई/वजन रखकर/ईमानदारी’’ -सतीश राठी
      भ्रष्टाचार का यह हाल है कि जनता की तकलीफ में भी राजनीतिज्ञ और अधिकारी पैसा बनाने से बाज नही आते।
‘‘आ गई बाड़/खुल गया विभाग/बहा रूपया’’ -राजेन्द्र पाण्डेय
      कवि आश्चर्य करता है कि यह कैसे हुआ?
‘‘यह कैसे हुआ/आदमी से भी बड़े/हो गए पैसे’’ -सुधीर कुशवाह
      कोई भी संवेदनशील कवि ऐसे वातावरण में अपने को घुटता हुआ महसूस करेगा। स्वतंत्रता के बाद जन साधारण ने जनतंत्र को लेकर काफी उम्मीदें संजोई थी लेकिन ‘‘झरे सपने/‘राज’ है, ‘नीति’ नहीं/लूटें अपने’’ -डॉ. रामप्रसाद मिश्र
      पूरा का पूरा जनतंत्र, भीड तंत्र में परिवर्तित हो गया हे। तभी तो कवि कटाक्ष करता है-
‘‘भीड तंत्र में/सोचो समझो नहीं/बजाओ ताली’’ -रमेश चन्द्र शर्मा ‘चंद्र’
      आज समाज का पूरा का पूरा माहौल दहशत और डर से भरा हुआ है। कही आंतकवादियों का डर है, कहीं फिरका परस्ती से भय है तो कहीं स्वयं सुरक्षा देने वाली पुलिस से। परिस्थितियों को नियंत्रित करने के बाद भी वास्तविक शांति स्थापित नही हो पाती।
‘‘चीखती रही/हादसे के बाद भी/घाटाल शांति’’ -प्रदीप श्रीवास्तव
     समाज में व्यक्ति अकेला पड़ गया है। भीड़ है लेकिन वह अकेला है। एक दूसरे से कोई मतलब नहीं। संवाद तो अनुपस्थिति है ही। आपसी सम्बन्ध भी अब केवल आर्थिक रह गए हैं।
‘‘खूंटी लटके/सम्बन्ध परिधान/घर बाजार’‘ -अशोक आनन
     ऐसे माहौल में सिवा इसके कि कवि कटाक्ष करे और व्यंग्य को हथियार की तरह इस्तेमाल करे और कोई चारा शेष नहीं है। हाइकु व्यंग्य का वाहक कभी नहीं रहा, लेकिन आज के विसंगत परिवेश में वह तंज करने के लिए बाध्य है -
‘‘दिन दहाड़े/नंगे दरख्त पर/बैठा है उल्लू‘‘ -डॉ. रमेश त्रिपाठी
‘‘सरे बाजार/खूंटियों पर टंगे/चेहरे बिके’’  -डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
      किन्तु इस भयावह माहौल में भी उम्मीद की किरण अभी बाकी है। रात के बाद सुबह फिर आएगी।
‘‘हर अंधेरा/पालात है गर्भ में/प्रकाश रेख’’  -श्री गोपाल जैन
     और यह प्रकाश रेख केवल युवा प्रयत्न में ही देखी जा सकती है- ‘‘है जवान तू/भगीरथ भी है तू/चल ला गंगा’’ -पारस दासोत

  • 10, एच.आई.जी., 1, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद (उ.प्र.)


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