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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग : वर्ष  :  3,  अंक  : 01-02,  सितम्बर-अक्टूबर 2013


।।कथा प्रवाह।।
सामग्री :  इस अंक में श्री पारस दासोत, श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल, डॉ. शैलेश गुप्त ‘वीर’, डॉ. करुणा पान्डे, श्री राधेश्याम भारतीय की लघुकथाएँ।



पारस दासोत


{वरिष्ठ लघुकथाकार पारस दासोत जी की किन्नरों की समस्याओं एवं उनके अनेक जीवन पहलुओं को रेखांकित करती लघुकथाओं का संग्रह ‘‘मेरी किन्नर केन्दित लघुकथाएँ’’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी विषयसंगत 87 लघुकथाएँ शामिल हैं। यह संग्रह अपनी तरह का अनूठा प्रयास है, जिसके माध्यम से दासोत जी ने किन्नरों के जीवन में गहरे तक झांकने की कोशिश की है। पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं इसी संग्रह से उनकी पाँच लघुकथाएँ।}

आँचल की भूख
    किन्नर, चूल्हे के पास इस तरह बैठा था,...
    मानो, वह बच्चे को अपने आँचल में छुपाकर स्तनपान करा रहा है।
    यह दृश्य देखकर,
    एक साथी चिल्लाया- ‘‘हरामजादी! हमें मरवायेगी क्या! ये, ये बच्चा, कहाँ से उठा लायी तू ऽऽ! जा! इसको वहीं वापस छोड़ आ! सुना नहीं तूने! ऐ राँड की जायी! सुना नहीं तूने! ला मुझको दे, मैं छोड़ आऊँगी!’’
    साथी किन्नर ने, इन्हीं शब्दों के साथ, अपने साथी किन्नर से बच्चा........
    ‘‘तकिया ऽऽ! तू तकिया को गोद में लिए...थी!’’ -साथी किन्नर, किन्नर को तकिया वापिस सौंपते हुए बोला- ‘‘ले! पिला! पिला, अपने बच्चे को दूध पिला!’’
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सभी किन्नरों की आँखों से आँसू छलक रहे थे।

कोख का स्पर्श
    मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ,...
    बूढ़ा किन्नर, अपने एक साथी किन्नर से प्रार्थना भरे स्वर में बोला-
    ‘‘मे....मेरा...पेट....बहुत दुख रहा है री ऽऽ!’’
    ‘‘डाक्टर साब को और लेकर आऊँ?’’
    ‘‘अ...अरे...अब...न...नहीं री! मैं....तेरे हाथ जोड़ूँ, एक औरत को ले आ! मेरा पेट मसल देगी री, जा!’’
    ‘‘मैं मसल दूँ, पेट?’’
    ‘‘न नहीं री! तेरे हाथ तो....तालियाँ पीट-पीट कर कठोर हो...., जा न री!’’
    ........
    साथी किन्नर किसको लाता! वह बेचारा एक वैश्या को ले आया। जब वैश्या, बूढ़े किन्नर का पेट मसल रही थी, वृद्ध किन्नर, उसका आँचल थामकर, प्रार्थना भरे स्वर में बोला- ‘‘माँ, माँ ऽऽ... ए माँ, मुझको अपनी गोदी में एक बार सुलाले माँ!’’
    अब....
     वैश्या ने, जैसे ही उसके सिर को अपनी गोद में रखकर अपने हाथ का स्पर्श दिया, बूढ़े किन्नर ने, अपना शरीर त्याग दिया।
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    वैश्या, किन्नर के शव को पागलों की तरह चूम रही थी।

यूँ ही
    ‘‘किन्नरों के मोहल्ले में आग लग गई!’’
    ‘‘कहाँ? ये मोहल्ला कहाँ है, किन्नरों का?’’
छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 
    ‘‘मालूम नहीं मुझको।’’
    ‘‘क्यों तुमको किसने कहा?’’
    ‘‘बाजार में एक किन्नर, अपने दूसरे साथी को बोल रहा था।’’
    ‘‘भाई साहब! आपको मालूम है, ये किन्नरों का मोहल्ला कहाँ है?’’
    ‘‘नहीं।’’
    ‘‘दादा, आपको मालूम है, ये किन्नरों का मोहल्ला....?’’
    ‘‘नहीं बेटे, मुझको मालूम नहीं।’’
    ‘‘अंकल! आपको तो मालूम होगा, ये किन्नरों का मोहल्ला?’’
    ‘‘मेरे को जानकारी नहीं है। क्यों, क्या जाना है, तुझे वहाँ?’’
    ‘‘नहीं,....कुछ नहीं, यूँ ही!’’

भाल पर उभरे आँसू
    बीच सड़क पर डले किन्नर को देखकर....
    एक राहगीर, उसके साथी किन्नर से बोला-
    ‘‘यह तो मर गया।’’
    ‘‘क्या ऽऽ! ये मर गयी!’’
    साथी किन्नर नाच रहा था।
    ...........
    ‘‘कमाल है! तुम्हारा साथी मर गया और तुम हो कि नाच रहे हो!’’
    ‘‘क्या, क्या कहा आपने, ‘‘मैं, मैं नाच रही हूँ’’ किन्नर, राहगीर से नाचते-नाचते बोला- ‘‘मैं नाच नहीं रही, मैं तो रो रही हूँ! फूट-फूटकर रो रही हूँ! देखो, ये, ये रहे मेरे आँसू!‘‘
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साथी किन्नर, अपने भाल पर उभरे पसीने को जमीन पर टपका रहा था।

चाहत
रेखाचित्र : पारस दासोत 
    किन्नर, अपने लिए डबलबेड खरीदकर ले आया।
    डबलबेड देखकर,
    वृद्ध किन्नर, किन्नर को गालियाँ बकते हुए चिल्लाया-
    ‘‘जा, ये डबलबेड दुकानदार को वापिस करके आ! उसको बोल देना- ‘‘हम किन्नर हैं, हम इसका क्या करेंगे! हमको तो कोई सिंगलबेड दे दो!’’
    ‘‘दीदी! मैं दुकानदार से बोली थी। यही कहा था, लेकिन दीदी, वो दुकानदार मुझसे बोला, ‘‘तुम डबलबेड ही ले जाओ! तुम्हारे लिये ये जरूरी है, तुम डबलबेड पर ही सोओ!‘‘ दीदी, फिर भी मैंने उसको मना किया था, पर दुकानदार माना ही नहीं, बोला- ‘‘जो बिटिया, अपनी शादी के लिये तैयार न हो रही हो, उसको डबलबेड पर अकेली सुलाओ। देखो कुछ ही दिनों में उसका शरीर, साथी की माँग करने लगेगा। वो अपनी शादी के लिए जल्द तैयार हो जाएगी।’’ दीदी, दुकानदार बोला- ‘‘तुम्हारे शरीर की चाहत, इस जन्म में न पूरी हुई सही, पर अगले जन्म में अवश्य पूरी होगी। ले जाओ ये पलंग!’’
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   वृद्ध किन्नर, डबलबेड अपने कमरे में लगवा रहा था। 

  • प्लाट नं.129, गली नं.9 (बी), मोती नगर, क्वींस रोड, वैशाली, जयपुर-21



श्याम सुन्दर अग्रवाल




तीस वर्ष बाद           
      ‘‘आज फिर सुखविंदर की माँ का फोन आया था।’’
      पत्नी ने बताया तो नरेश व्याकुल हो उठा, ‘‘तीसरे दिन ही फोन आ जाता है किसी न किसी का। दिमाग खराब कर रखा है।’’
सुखविंदर इंजनियरिंग कालेज में उनकी बेटी बबली का सहपाठी रहा था। दोनों एक-दूसरे को चाहते थे। न लड़का कहीं और शादी करने को तैयार था, न लड़की। लड़का ठीक था, बहुत पढ़ा-लिखा और सुंदर भी। परंतु था जात-बिरादरी से बाहर का। इसलिए समाज में होने वाली बदनामी से नरेश बहुत डर रहा था। उसका विचार था कि थक-हार कर जब लड़का कहीं और शादी कर लेगा तो बबली स्वयं उनकी बात मान लेगी।
      थोड़ा सहज हुआ तो उसने पूछा, ‘‘क्या कहती थी वह?’’
     ‘‘कुछ नहीं, बधाई दे रही थी। सुखविंदर की सरकारी नौकरी लग गई। वह एक बार आपसे मिलना चाहती है।’’
     ‘‘ना हमें किस बात की बधाई? क्या लगता है वह हमारा? लगता है आज उसकी मिलने की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। आज देकर आता हूँ उसे अच्छी तरह बधाई।’’ नरेश क्रोध में उबल रहा था।
      तीस किलोमीटर के लगभग का फासला था। एक घंटे पश्चात नरेश सुखविंदर की कोठी पर था। ड्राइंगरूम की शीतलता ने उसके क्रोध की ज्वाला को थोड़ा शांत किया। एक लड़की ठंडे पानी का गिलास रख गई। थोड़ी देर बाद ही लगभग पचास वर्ष की एक औरत ने आकर हाथ जोड़ ‘नमस्कार’ कहा और वह उसके सामने बैठ गई।
     वह सोच ही रहा था कि बात कहाँ से शुरु करे, तभी सुखविंदर की माँ की शहद-सी मीठी आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘‘बहुत गुस्से में लगते हो, नरेश जी।’’ 
      आवाज उसे जानी-पहचानी सी लगी। उसके बोलने से पहले ही वह फिर बोल पड़ी,   ‘‘एक बात पूछ सकती हूँ?’’
      नरेश जैसे वशीभूत हो गया, ‘‘ज़रूर पूछिए।’’
      ‘‘आपको सुखविंदर में कोई कमी दिखाई देती है?’’
      ‘‘कमी...कमी तो कोई नहीं, मगर जब जात-बिरादरी ही एक नहीं...’’
      ‘‘बस....केवल जात-बिरादरी....?’’
      ‘‘आपको यह मामूली बात लगती है?’’
      वह कुछ देर उसे देखती रही और फिर बोली, ‘‘मुझे पहचाना?’’
      नरेश ने याददाश्त के घोड़े बहुत दौड़ाए, लेकिन असफल रहा। सुखविंदर की माँ को जैसे सदमा पहुँचा, ‘‘....अपनी दीपी को भी नहीं पहचाना!’’
     नरेश तो जैसे आसमान से नीचे गिर कर ज़मीन में धँस गया। उसकी कालेज की संगिनी दीपेंद्र, उसकी
छाया चित्र :  उमेश महादोषी 
ज़िंदगी का पहला और आखिरी प्यार, दीपी। वह दीपी को अवाक् देखता रह गया।

     ‘‘तीस वर्ष पहले हमारे माँ-बाप ने जात-बिरादरी के नाम पर जो फैसला किया था, क्या वह सही था?’’
      नरेश की नज़रें झुक गईं। बड़ी कठिनाई से उसके मुख से निकल पाया, ‘‘...समाज में बदनामी...’’
      ‘‘सुखविंदर और बबली तीस वर्ष पहले के नरेश और दीपी नहीं है। वे तो बंधन में बँध चुके हैं, आप उन्हें अलग नहीं कर सकते। अब तो निर्णय यह करना है कि आपने इस घर से रिश्ता जोड़ना है या नहीं।’’
      नरेश पूरी तरह खामोश था। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। उसकी ओर चाय का कप बढ़ाते हुए दीपेंद्र ने कहा, ‘‘आपने गुस्से में पानी नहीं पिया। गुस्सा दूर हो गया हो तो चाय की घूँट....।’’
      नरेश ने कप पकड़ते हुए कहा, ‘‘आपको बधाई देना तो भूल ही गया।’’
      ‘‘किस बात की जनाब?’’
       ‘‘बेटे सुखविंदर को सरकारी नौकरी मिलने की।’’

  • 575, गली नं.5, प्रतापनगर, पो.बा. नं. 44, कोटकपूरा-151204, पंजाब    



डॉ. शैलेश गुप्त ‘वीर’





छंगू भाई
     छंगू भाई का अपने इलाक़े में जलवा था। वे साधन-सम्पन्न तो थे ही, दल-बल से भी कमज़ोर न थे। गलियों मे घूमना और आये दिन झगड़े व मारपीट करना उनकी आदत नहीं, शौक़ थे। दूकानदारों से सामान लेकर पैसे न देना, धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों के बहाने चंदा वसूली तथा संरक्षण के नाम पर हफ़्ता वसूली; यही छंगू भाई की आमदनी के ज़रिया थे। रोज शाम को अपने चेलों के साथ रिक्शे की सवारी का आनन्द लेना उनकी नियमित दिनचर्या थी। किसी रिक्शेवाले की मजाल क्या कि छंगू भाई से पैसे माँग ले। ऐसे ही एक शाम छंगू भाई ने एक रिक्शेवाले को रोका। शायद वह इलाक़े में नया था, उसने वहीं से पूछा- ‘‘हाँ बाबूजी, कहाँ चलना है?’’ 
    ‘‘अबे यहाँ आ लाटस्साब, वहीं से बकवास न कर!’’ पिस्टल बाबा, जो छंगू भाई का दाहिना हाथ था, ने आँखें तरेरकर ज़ोर की झिड़की दी। 
    ‘‘अरे बाबूजी, हम तो पूछे बस थे, बइठ जाओ जहाँ चलना हो।’’ छंगू भाई पिस्टल बाबा के साथ सवार होकर रिक्शे की सवारी का आनन्द लेने लगे। वे सारा इलाक़ा घूम-घामकर वापस अपने अड्डे पर आ गये और रिक्शे से उतरकर अन्दर जाने लगे, तभी रिक्शेवाले ने टोका- ‘‘बाबूजी पइसवा तो दे दो।’’ 
    ‘‘किस बात का पइसवा रे, हम तोर चहता हैं का?, अड्डे में बहुत देर से अकेले बैठा राजन चमचा अचानक तैश में आ गया था। 
     ‘‘भ्भाग जा स्साले, नहीं तो भून डालेंगे।’’ पिस्टल बाबा का गर्म ख़ून और गर्म हो गया था। 

छाया चित्र : उमेश महादोषी 
     ‘‘बाबूजी, अतना गरम काहे होइ रहें हैं, हम अपना महनताना ही तो माँगें हैं, हराम का थोड़े न....।’’ तभी छंगू भाई ने उस रिक्शेवाले के गाल पर एक ज़ोर का थप्पड़ रशीद कर दिया- ‘‘हरामखोर, चुप स्साले....।’’ इस थप्पड़ ने रिक्शेवाले के ख़ून में भी जी भर उबाल भर दिया.... और छंगू भाई इससे पहले कुछ समझ पाते, रिक्शेवाले ने उनके थोबड़े पर चार-पाँच तड़ातड़ जड़ दिये। छंगू भाई ने पीछे मुड़कर अपने साथियों की ओर देखा, वे दोनों नदारद थे और भीड़ खड़े तमाशा देख रही थी। मौके की नज़ाक़त समझते हुए छंगू भाई बीस की नोट उस रिक्शेवाले को थमाकर चुपचाप वहाँ से चले गये।

  • अध्यक्ष: ‘अन्वेशी’,  24/18, राधानगर, फतेहपुर (उ.प्र.)-212601




डॉ. करुणा पान्डे





स्टडी टेबल
    मेरे पति ने जिस मेज पर पढ़ाई की थी, उस स्टडी टेबिल पर मेरे बच्चों ने भी पढ़ाई की। मेज बहुत मजबूत थी, पर ऊपर का टॉप थोड़ा खराब हो गया था। मैंने उसमें नया सनमाइका लगवाकर अपने पोते के स्टडी रूम में रखवा दी।
    तभी मेरा पोता आया और बोला- ‘‘दादी, छी छी, आपने यह सड़ी सी टेबिल मेरे कमरे में क्यों रखी है! मैं तो स्टाइलिश टेबिल लूँगा।’’
    मैंने कहा- ‘‘बेटा, इस पर तेरे दादाजी और तेरे पापा ने पढ़ाई की है। अब तू और तेरे बच्चे पढ़ेंगे।’’ पोते ने टेढ़ा-सा मुँह बनाया और चला गया।
    अगले दिन एक नई स्टडी टेबिल उसके कमरे में थी और पुरानी टेबिल स्टोर रूम में आँसू बहा रही थी।

  • 128, विमको बिला, सिविल लाइन्स, बरेली, उ.प्र.


राधेश्याम भारतीय




छवि
    वह जम्मू से माता वैष्णो के दर्शन कर आज ही घर लौटा था। आते ही बच्चों ने घेर लिया और अपने लिए लाईं चीजों की मांग करने लगे। बच्चों को उनकी चीजें थमा दी गईं।
छाया चित्र : शशि भूषण बडोनी 
    पास ही माँ बैठी थी। उसने बैग से एक कश्मीरी शाल निकाल कर माँ को दी। शाल देते समय उसकी नजर माँ के चेहरे पर पड़ी। उसने देखा तो पाया कि माँ का चेहरा ऐसे नहीं खिला, जैसे खिलना चाहिए था। उसने माँ से पूछा, ‘‘माँ क्या बात है, तबीयत तो ठीक है न?’’
     ‘‘हाँ!’’ माँ ने इतना ही कहा।
    फिर उसने एक जर्सी और जैकेट निकालकर माँ को देते हुए कहा, ‘‘माँ यह रमेश के लिए और जैकेट सुरेश के लिए।’’
    इस बार भी उसने माँ का चेहरा पढ़ने की कोशिश की। पर, इस बार माँ के चेहरे पर प्रशन्नता की एक लहर दौड़ती-सी नजर आयी।
    माँ ने कहा, ‘‘बेटे! तुम्हारे भाई भले ही अलग-अलग रहने लगे हों, पर तू उनका कितना ख्याल रखता है।’’ माँ इतना कह सामान लेकर अपने कमरे में चली गई।
    अब पत्नी के व्यंग्य-वाण छूटे, ‘‘बस, भाइयों की चिंता रहती है...बच्चों को भूल जायेंगे....घरवाली को भूल जायेंगे, पर भाई....भाई न हुए मानो खुदा हो गए हों.....’’
     पत्नी बोले जा रही थी, पर वह तो दीवार पर टंगी पिताजी की तस्वीर का ओर देखे जा रहा था, जो उन्हें बचपन में ही छोड़कर चल बसे थे।

  • नसीब विहार कॉलोनी, घरोंडा, करनाल-132114, हरियाणा

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