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बुधवार, 26 अगस्त 2015

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  :  4,   अंक  : 07-12,  मार्च-अगस्त 2015 



        {लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा }


।।किताबें।।

सामग्री : इस अंक में समकालीन सामाजिक विसंगतियों पर तिरछी नजर के निशाने / श्री कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’ के व्यंग्य कविता संग्रह 'दुर्गति-चालीसा' की डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ल द्वारा तथा साहित्य धर्म का निर्वाह करती कविताएँ / प्रशान्त उपाध्याय के काव्य संग्रह 'शब्द की आँख में जंगल'  की डॉ. उमेश महादोषी द्वारा समीक्षा। 

डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ल


समीक्षक 

समकालीन सामाजिक विसंगतियों पर तिरछी नजर के निशाने 
श्री कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’ ने जीवन के विविध क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्ट आचरण से त्रस्त आज के समय और समाज का, तत्कालीन और समकालीन परिदृश्य बहुत तल्खी के साथ कुरेदते, कचोटते, छेदते और चीरते शब्दों में अर्थवान करने का प्रयास किया है। उनकी व्यंग्योक्तियों में जनतंत्र और प्रजातंत्र का स्वप्न भंग तो राजनीतिज्ञ के भ्रष्ट आचरण का भंडाफोड़ है। समाजवाद के बदलते और दिखावटी चेहरों की नकाब के अन्दर की तस्वीर है, जो सरकारी कामकाज में कामचोरी, रिश्वतखोरी, भाई-भतीजों की टेण्डर डालने और खुलने-खुलवाने की खुली लूट की भर्त्सना करती है। चरित्रहीनता, आचरणहीनता, सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट, रहन-सहन, खानपान तथा भोजन-वस्त्रों में व्याप्त
बेशर्मी भी इन कटूक्तियों का विषय बनी है। सेक्स और हिंसा, कालाधन और इसका दुरुपयोग भी ‘सलिल जी’ के मन को कचोटता रहा है, जिसका उन्होंने खुलकर वर्णन किया है। श्री कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’ की पुस्तक ‘दुर्गति चालीसा’ की व्यंग्योक्तियां साहित्यकार के आक्रोश का परिणाम हैं जिसमें देशकाल और परिस्थितियों की दुर्गति का अहिंसक प्रतिकार शब्द की शक्ति के साथ समाज के समक्ष उपस्थित हुआ है।
     ‘दुर्गति-चालीसा’ में राजनैतिक अराजकता और भारतीय स्वातंत्रय के लिए बलिदान हो जाने वाले शहीदों के स्वप्नों को बिखरते देखकर कहा गया है कि ‘अंगरेजों से पाया राज, बापू संग मर गया सुराज’ और ‘काले धन में डूबा मुल्क’ में आज किस तरह ‘हुआ जरूरी सुविधा शुल्क’ का खुलेआम धन्धा पनप रहा है। यह तो इसी से समझा जा सकता है कि नोटों की गड्डी से दबकर, नैतिकता का डब्बा गोल हो रहा है। ये चुनाव हैं या बरबादी कहकर व्यंग्यकार ने प्रश्न किया है कि जब सदनों में कातिल अपराधी घुसे बैठे हैं तब रोटी, न्याय और सुरक्षा की बात कैसे की जा सकती है। यहाँ तो सिर्फ लूटने की आजादी है फिर यह मुखौटाधारी लुटेरे जनता के धन पर हल्ला क्यों नहीं बोलेंगे? इसी तरह यह भी कहा गया है कि ‘चाटुकारों को तरी मलाई, ‘हरिश्चन्द’ की जांच धुनाई’। इसी के साथ छोटी-छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी जगहों पर लूट-खसोट और चालाकी भरे धन्धों का व्यापार गरम है, जिसके लिए एक अन्योक्ति में कहा गया है- ‘गिद्धों कौवों का आलिंगन/सत्ता हित पावन-गठबन्धन/ललुआ को पारस की कुर्सी/कलुआ के माथे पर चन्दन’।
    वर्गीय विशेषता से युक्त समाज में सामाजिक नियमों को निर्धारित करने वाली आंतरिक समता और ममता का सद्-भावना प्रधान ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया है। एक वर्ग के तमाम भीतरी और बाहरी सम्बन्ध तथा विभिन्न वर्गों के आपसी सम्बन्ध ही तो मानव सम्बन्ध होते हैं। यह मानवी सम्बन्ध ही मानव चेतना की मूल-भूत नींव हैं, जिस पर संस्कृति, धर्म, दर्शन, राजनीति, कला, साहित्य आदि के भवन निर्मित होते हैं, किन्तु इनको भी अराजक व्यवस्था ने अपने काले पैसे के बल पर खरीदकर अव्यवस्थित और अनैतिक बना दिया है। इस पर ही करारा व्यंग्य करते हुए सलिल जी कहते हैं- ‘‘पढ़े लिखों के खाली झोले/भूखे पेट आंख में शोले/जननायक जी आंखे मूंदे/‘ओम शान्ति’ हंसकर बोले‘‘।
    अपनी कवित्वमय फब्तियों में व्यंग्यकार ने स्वीकार किया है कि- ‘सीता समा चुकी पृथ्वी में, सूपर्णखा की जय जय बोल/अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल, अस्सी नब्बे पूरे सौ/नौ दिन चले अढ़ाई कोस, चालिस चोर हो गये सौ’।
    इस राजनीति बनाम अखाड़ेबाजी के खेल में आरक्षण की आग में जलते पीढ़ी के नौनिहाल, संख्या बल पर पनपी गुण्डागीरी और विकल्पहीन समाज व्यवस्था के लिए कवि के मन में जो दर्द उपजा है, वह ही घनीभूत होकर इस तरह हो गया है- ‘बदहाली/कुहासे की तरह/हो चुकी इतनी घनी/विवशता की है दहशत/आक्रोश की सनसनी/दूर तक भी नजर नहीं आती/टिमटिमाती हुई रोशनी’।
     अनेेक पारम्परिक शब्दों को नये अर्थों में प्रयोग करते हुए ‘दुर्गति-चालीसा’ के व्यंग्यकार ने छन्द प्रयोगों में अपनी प्रतिभा से चुटीले शब्द वाण चलाने का प्रयास किया है, जो उसके लक्ष्य बोध को सार्थक बना सकते हैं क्योंकि ये व्यंग्यकार की तिरछी नजर के निशाने हैं।
दुर्गति-चालीसा :  व्यंग्य संग्रह : कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’। प्रका. :  ‘वाणी’ साहित्यिक संस्था एवं प्रकाशन संस्थान, कानपुर। मूल्य :  रु. 60/- मात्र। संस्करण : 2014।     

  • 119/50-सी, दर्शनपुरवा, कानपुर-12, उ.प्र. / मोबाइल : 09839202423




डॉ. उमेश महादोषी


समीक्षक 


साहित्य धर्म का निर्वाह करती कविताएँ
       प्रशान्त उपाध्याय उन कवियों में शामिल हैं, जिन्होंने कवि सम्मेलनों के मंच पर लम्बे समय से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है किन्तु पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों तक अपनी रचनात्मकता को पहुँचाने के प्रति भी सतर्क रहे हैं। कवि सम्मेलन के श्रोता और प्रकाशन माध्यमों के पाठक- दो स्थितियों की तरह होते हैं, जिनके मध्य आधुनिक परिप्रेक्ष्य में एक बड़ा गैप होता है। भले इस गैप को पैदा करने में मंच के कवियों का भी बड़ा योगदान है, पर यह एक यथार्थ स्थिति है। प्रशान्त जी जैसे कवियों के लिए इन दोनों स्थितियों से गुजरते हुए मनोरंजन से सरोकारों तक की उद्देश्य-यात्रा के साथ-साथ श्रोताओं की मानसिकता के समक्ष समर्पण करने से बचते हुए भी उसके साथ तारतम्य बैठाने से लेकर अपनी साहित्यिक प्रतिबद्धता को बचाये रखने के कठिन रास्ते पर चलना होता है। मैंने उन्हें कवि सम्मेलन के मंच से कविता पाठ करते सुना नहीं है, पर वह एक लम्बे अर्से से इस कर्म से निरंतरता के साथ जुड़े हुए हैं। मुझे उनकी प्रकाशनार्थ और प्रकाशित रचनाओं का पाठ करने का अवसर काफी मिला है। उनमें कई रचनाएँ ऐसी भी रही हैं, जिन्हें निश्चित रूप से वह मंच से भी पढ़ते होंगे, सो दोनों स्तरों से उन्हें समझने की कोशिश संभव है।
     एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद उनका कविता संग्रह ‘शब्द की आँख में ज्रगल’ के रूप में सामने आया है। संग्रह के दोनों खण्डों- क्षणिका (सीपियों में अनुभूति) और नई कविता (अभिव्यक्ति के तट पर) की अनेक रचनाएँ पहले से पढ़ी हुई होने के बावजूद संग्रहीत रूप में प्रशान्त जी की रचनात्मकता के सन्दर्भ में एक सार्थक अहसास देती हैं। प्रथम खण्ड की सभी 30 क्षणिकाओं और दूसरे खण्ड की सभी नई कविता में रचित 31 रचनाओं में कवि या तो सामयिक स्थितियों-परिस्थितियों के घेरों को तोड़ने की बेचैनी से जूझ रहा है या फिर सामाजिक सरोकारों के प्रश्नों से। यद्यपि कुछेक क्षणिकाओं में व्यंग्य की धार मौजूद है किन्तु समग्रतः मंच पर व्यंग्य कवि की छवि को संग्रह में चेहरा बनाने सेे बचा गया है, भले इस कोशिश में उनकी कुछ अच्छी व्यंग्य रचनाएँ संग्रह का हिस्सा बनने से रह गई हैं। इस बदले हुए रूप में भी प्रशान्त पाठकों को प्रभावित करने में सफल हैं। सहजता के साथ अपनी बात कहने वाले इस कवि ने क्षणिका की पहचान को रेखांकित करने का काम भी किया है। अनुभवों से जनित अनुभूति में सहजता-सरलता के पुट का एक उदाहरण देखिए- ‘‘सृष्टि के कम्प्यूटर पर/ज़िन्दगी/एक फाइल की तरह है/जो सेव करते-करते/डिलीट हो जाती है’’ और यह भी- ‘‘मेरा मन/जब भी तुम्हें बुलाता है/थका-हारा सम्बोधन/हर बार/लौट आता है।’’
     समकालीन कविता के सामाजिक सरोकार मनुष्य और मनुष्यता से जुड़ी समस्याओं से लेकर उसकी सोच के समाधान की जरूरत पर भी बल देते हैं। इस अर्थ में वह कबीर की अनुगामिनी है। प्रशान्त की इस क्षणिका को उनकी व्यंग्य दृष्टि के साथ भी जोड़कर देखा जा सकता है- ‘‘अब मन्दिर में प्रार्थनाएँ/ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर/हो रही हैं/लोग ईश्वर को/बहरा सिद्ध करने पर तुले हैं।’’ और सामयिक यथार्थ के परिदृश्य पर क्षणिका में कवि की बेचैनी देखिए- ‘‘सभ्यता और नंगापन/क्या अजीब जोड़ी है/संस्कृति/लँगड़ा कर चलती है/विकास ने/उसकी टाँग तोड़ी है।’’ झूठ के शासन में सच के परिणाम की प्रतीक्षा मनुष्य का धैर्य चुका देती है। यह समाज और व्यवस्था- दोनों से जुड़ा प्रश्न है। कवि की व्यंग्य दृष्टि बेचैन हो जाती है- ‘‘सोचता हूँ/अपनी इच्छाओं के घर में/झूठ की खिड़कियाँ लगा दूँ/सच के दरवाज़े/बहुत देर से खुलते हैं।’’
    क्षणिका में प्रशान्त जी की यह सहजता-सरलता स्वभावगत है। ‘नई कविता’ में भी प्रतीकों के प्रयोग और बिम्बों के निर्माण के बावजूद वह अपने स्वभाव से अधिक विचलन नहीं करते। स्थितियों-परिस्थितियों के घेरों को तोड़ने की बेचैनी में भूख, कुण्ठा, घुटन, उत्पीड़न, क्रन्दन, तबाही, टूटन आदि की कविता लिखते हुए भी उनकी सहजता-सरलता अपना रास्ता नहीं छोड़ती। ‘आग’, ‘अभावों के बीच’, ‘सुलगते हुए प्रश्न’, ‘मेरे देश’, ‘अनपेक्षित आशंका’ जैसी कविताओं के ये अंश देखे जा सकते हैं- ‘‘आग/खेतों, मैदानों, रेगिस्तानों को रौंदती/रास्तों की ख़ामोशी को चीरती/अब आ गयी है/इस शहर तक’’ (आग)
     ‘‘उसके जीवन की अनगिनत विडम्बनाएँ/नागफनी बन कर/एक साथ/उसके हृदय को छलनी कर देती हैं/फिर वह/हथौड़े से ईंट को तोड़ते वक़्त/समझ नहीं पाता/कि वह/ईंट को तोड़ रहा है/या/ख़ुद को’’ (अभावों के बीच)
     ‘‘आज हर तरफ आग है/धुआँ है/सुलझे हुए उत्तरों के अभाव में/उलझे हुए/सुलगते प्रश्न हैं’’ (सुलगते हुए प्रश्न)
     ‘‘कितनी सहजता से बदल रहा है/इस देश का भूगोल/बौनी होती सीमाएँ/ख़ून से लथपथ धरा/काँपती नदी/लहलहाती बारूदी फसलें/ऑक्सीजन की जगह साँसों में/जबरन घुसता हुआ डर/और बुत होते हुए लोग’’ (मेरे देश)
      ‘‘सच तो यह है/कि आज-कल/हर बुद्धिजीवी/आदमी से शहर होने का/अभ्यस्त होता जा रहा है/और मेरा सोच/मेरे अन्दर/किसी अनपेक्षित/ख़ौफ़नाक विस्फोट होने की आशंका से/त्रस्त होता जा रहा है’’ (अनपेक्षित आशंका)
    निसन्देह ये सहज सामयिक कविताएँ अपने समय की आवाज को ऊर्जा दे रही हैं। लेकिन ये यथार्थ का एक चेहरा हैं और साहित्य धर्म का एक पायदान। प्रशान्त जी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं इसलिए वह एक साहित्यिक की प्रतिबद्धता को अपने चिंतन, अपने सोच में लेकर चलते हैं। ‘‘इसलिए मैं करता हूँ/बोझिल वातावरण में/जीवंतता की तलाश/झाँक कर देखना चाहता हूँ/अन्दर ही अन्दर सुलगते हुए/शहर की आँखों में निर्माण के सपने/और कुहासों के घरों में/किरणों के बच्चे/पढ़ना चाहता हूँ/भूखे चेहरों की किताब में/तृप्ति का अध्याय’’ (चूँकि मुझे लिखनी है कविता)। कवि धर्म की यह सकारात्मक ऊर्जा ‘तलाश नये सूरज की’, ‘वसीयत: त्रासदी के नाम’ जैसी कविताओं में भी रची हुई है। निसन्देह भयानक चेहरे वाले यथार्थ का सामना करते हुए सकारात्मक चिंतन और सोच को संरक्षित करना एक बड़ा प्रश्न है। कवि की कल्पना तक यथार्थ की गिरफ्त (कल्पना) में आ चुकी हो तो सकारात्मकता के लिए जगह कहाँ ढूँढ़ी जाये! प्रसंगवश हम प्रशान्त जी की इस क्षणिका की ओर लौट सकते हैं- ‘‘दर्द का/स्वयंवर हो रहा है/फिर कोई/गीत जन्म लेगा‘‘। सकारात्मकता के बीज सृजन में अपनी जगह बना ही लेते हैं और सृजन कभी रुकता नहीं। कुछ उपमाओं में ताजगी का अहसास है- ’भाषणों का सुलगता धुआँ’, ‘किरणों की मछलियाँ’, ‘कुहासों के घरों में किरणों के बच्चे’ ‘संकीर्णता के जूते’ आदि। विश्वास है संग्रह प्रशान्त जी की पहचान को और व्यापक करेगा।
शब्द की आँख में जंगल: कविता संग्रह: प्रशान्त उपाध्याय। प्रका.ः विभोर ज्ञानमाला, एल-जी, 1-2, निर्मल हाइट्स मार्केट, मथुरा रोड, आगरा। मूल्य: रु 90/-मात्र। सं.: 2014।

  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र. / मोबाइल : 09458929004

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