आपका परिचय

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग : वर्ष : 2,  अंक : 6,  फरवरी  2013 

।।कथा प्रवाह।।

सामग्री  :  इस अंक में  अशोक वर्मा, डॉ. कमल चोपड़ा, कुमार नरेन्द्र, मधुकान्त, मधुदीप, विक्रम सोनी, प्रद्युम्न भल्ला, सन्तोष सुपेकर, डॉ नन्द लाल भारती व दिनेश कुमार छाजेड़ की लघुकथाएं।


{हाल ही में हमें लघुकथा का एक पुराना, चर्चित और महत्वपूर्ण संकलन पढ़ने का अवसर मिला। यह संकलन है दिशा प्रकाशन के निदेशक एवं वरिष्ठ लघुकथाकार श्री मधुदीप जी द्वारा संपादित एवं दिशा प्रकाशन द्वारा वर्ष 1988 में प्रकाशित ‘‘पड़ाव और पड़ताल’’,  जिसकी प्रति उन्होंने इस वर्ष के विश्व पुस्तक मेले में स्नेहवश मुझे भेंट की।  डॉ. कमल किशोर गोयनका जी की व्यापक भूमिका से युक्त इस संकलन में लघुकथा आन्देलन के छः महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों सर्वश्री अशोक वर्मा, डॉ. कमल चोपड़ा, कुमार नरेन्द्र, मधुकान्त, मधुदीप एवं श्री विक्रम सोनी की प्रतिनिधि लघुकथाएं तथा इनकी लघुकथाओं का मूल्यांकन करते सर्वश्री (प्रो.) सुरेशचन्द गुप्त, (डॉ.) स्वर्ण किरण, विनय विश्वरस, (प्रो.) रूप देवगुण, भगीरथ, (डॉ.) सतीश दुबे एवं (डॉ.) सुलेखचंद्र शर्मा के आलेख शामिल हैं। इसी संकलन से इस बार हम सभी छः लघुकथकारों की एक-एक लघुकथा प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रकाशन के पच्चीस वर्ष बाद भी इन लघुकथाओं में ताजगी का अहसास व्याप्त है, यह तथ्य लघुकथा की शक्ति को प्रदर्शित करता है।}

अशोक वर्मा





धरती घूमती है
     
      
        ‘‘परीक्षाएँ समाप्त हो गयी हैं; इसका मतलब यह तो नहीं कि सारे दिन बाहर ही खेलते रहो। कुछ पढ़ा-लिखा भी करो.....नालायक!‘’
         ‘‘यह क्या, तुम तीसरी कक्षा की किताब लेकर बैठे हो! तीसरी की परीक्षा तो इस बार दे ही दी है, फिर ये किताबें पढ़ने का लाभ?....बेशर्म कहीं के।’’
रेखा चित्र : मनीषा सक्सेना   
     ‘‘हाँ-हाँ, ला देंगे चौथी क्लास की किताबें भी। परिणाम तो आने दो। जाओ कुछ और पढ़ो।’’
     ‘‘अरे! सारा दिन कहानी-किस्से पढ़ते, तुम बोर नहीं होते! आँखों पर भी जोर पड़ता है इस तरह। खुली हवा में सुबह-शाम बाहर खेल आया करो। यही तो उम्र है खेलने-कूदने की। चलो उठो, जाओ......।’’

  • 110, लाजवन्ती गार्डन, नयी दिल्ली-46




डॉ. कमल चोपड़ा




दर

    ‘‘का बात है.....मन-मन मा मुस्कात हो....हमका भी बताव भइयन....‘‘
    ‘‘हाँ-हाँ...का बताई भैया! बातई एइसी हय....कल रात सपना में हम का देखी- अक हमें ट्रक लोड करने के दिहाड़ी में पाँच सौ रुपीया मिला रहा....और जौन हमार मालिक सगरे दिन टेलीफून करत रहा उसे सिर्फई तीन रुपीये मिल रहे....हा-हा....का बड़ा, का छोट....सबकू महनत के हिसाब से पइसा मिला रहा....हा-हा....।’’
    ‘‘का हा-हा....अबे उल्लू! का दूसरई दुनिया में जीवत हो भइयन....हाड़-तोड़ महनत, सुरती, चार रोटी और मीठे सपने...साले, कुत्ते-बिल्ली जनावर हुई गये हम! थोड़ी देर पहले राधेश्याम बतावत रहा; कल रात गल्ले के दाम पाँच रुपइया बोरी चढ़ जाने से हमार मालिक को पाँच लाख का फायदा हुई गवा हय....’’
रेखा चित्र : बी मोहन नेगी 
    ‘‘क....का....पाँच....लाखऽऽऽ, वह भी फून पर बइठे-बइठे....। वह किस रेट से..... किस दर से भइया....!’’

  • 1600/114, त्रिनगर, दिल्ली-110035




कुमार नरेन्द्र




लगाम
      
      बारात चलते-चलते अचानक रुक गयी। बैण्ड का बजना बन्द हो गया। यकायक चारों तरफ खामोशी छा गयी।
      सभी बाराती लगाम वाले को घेरकर खड़े हो गये थे, जोकि मात्र बारह वर्षीय बालक था। हुआ यूँ कि दूल्हे के बहनोई घोड़ी की लगाम पकड़कर अपना फोटो खिंचवाना चाह रहे थे।
      बालक ने नजराने के तौर पर 11 रुपये माँगे थे, जिसे देने से बहनोई साहब इन्कार कर रहे थे। बालक ने दो-तीन बार फिर आग्रह किया....। खैर! उन्होंने गुस्से में आकर दो-तीन थप्पड़ बालक के जड़ दिये और बालक की कटोरे जैसी आँखों से सहज रूप से आँसू झरने लगे। इस क्रियाकलाप को बैंडमास्टर देख रहे थे, उन्हें भी यह सब अप्रिय लगा, सो विद्रोह-स्वरूप बैंड का बजना तुरन्त बन्द हो गया।
रेखा चित्र : राजेंद्र परदेशी 
    ....झगड़ा बढ़ता देख बिचौलिये किस्म के लोग अपने-अपने छज्जों से नीचे सड़क पर उतर आये। फैसला था कि होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अन्ततः दूल्हे के पिता ने उसे पाँच रुपये थमा दिये, जिसे लड़के ने लेने से इन्कार कर दिया। बारातियों व अन्य लोगों को लगा- लड़का बस यूँ ही समझौते के लिए तैयार हो गया है।
    ....राम-नाम लेते बैंड फिर बजने लगा। बारात आगे खिसकने लगी। ....पर यह क्या....?
    बालक ने लगाम को, एक झटका, जोर से दिया.... और देखते-ही-देखते दूल्हे मियाँ और सात वर्षीय भतीजा नीचे सड़क पर धड़ाम से आकर गिरे।
    बैंड था कि रुकने का नाम ही न ले रहा था।

  • द्वारा दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035




मधुकान्त





मौसम
     
       गोपाल जैसा साधारण किसान का लड़का अपने दोस्तों के साथ यदि पिकनिक पर न जाये तो किसी को क्या ....लेकिन उसकी सुरीली आवाज को कोई न छोड़ना चाहता था इसलिए सबने आग्रहपूर्वक उसे चलने के लिए तैयार कर ही लिया।
     झील के दायें किनारे हरी-हरी घास पर दो-दो, चार-चार के समूह में बिखरकर वे आनन्द लूट रहे थे। डॉन और जोनी पॉप म्यूजिक पर थिरक रहे थे। मोना और कमल झील के किनारे बैठे पानी में कंकड़ फेंक रहे थे। कुछ ताश खेलने बैठ गये थे तथा कुछ....
     अचानक पश्चिम से एक काला बादल उठा और सूर्य को अपनी चपेट में लेता हुआ मौसम को मस्त बना गया। पॉप म्यूजिक अधिक तेज हो गया।
     अब गाने के लिए गोपाल की खोज हुई। वह एक ठूँठ के नीचे खड़ा सोच रहा था। वीणा का ग्रुप उसकी ओर भागा.... ‘‘इस मौसम ने तो हमारी पिकनिक को चार चाँद लगा दिये हैं, हो जाये कोई मस्त-मस्त गीत....।’’
     ‘‘नहीं वीणा....मन नही है’’, उसके चेहरे की रेखायें अधिक गहरा गयी थीं।
     ‘‘क्या बात है....तुम इतने उदास-उदास क्यों हो? सलिल ने निकट आकर पूछा।
     ‘‘कुछ नहीं....ऐसे ही...’’
     ‘‘फिर भी....कुछ बताओ तो सही....’’ वीणा ने आग्रह किया।
     ‘‘वीणा...बात ऐसी है कि गाँव में फसल पकी खड़ी है....।’’ एक-एक शब्द उसके तालू से चिपककर निकल रहे थे।

  • अनूप बंसल ‘मधुकान्त’, साँपला-124501, रोहतक (हरियाणा)



मधुदीप





तनी हुई मुट्ठियाँ
     
      वे चारों स्थानीय म्युनिसिपैलिटी में तीसरे दर्जे के लिपिक थे। नयी-नयी भर्ती थी, खून गर्म था। चारों ही विभाग में फैले भ्रष्टाचार से दुखी थे। उनकी रगों का जवान खून बार-बार बगावत पर उतारू हो जाता। रोज ही वे इस व्यवस्था के खिलाफ कुछ करने के लिए गुप्त मंत्रणा करते।
     धीरे-धीरे उनकी मंत्रणा के समाचार अधिकारियों त पहुँचे। अधिकारी श्रीवास्तव जी इस विभाग में पिछले बीस वर्षों से थे। आज तक उनके सामने कभी ऐसी स्थिति नहीं आयी थी। एक बार तो वे झल्लाये; लेकिन फिर उन्होंने धैर्य से काम लेना ही उचित समझा।
रेखा चित्र : के. रविन्द्र 
     अब उनमें से ‘क’ एक तथाकथित बढ़िया सीट पर लगा हुआ है। ‘ग’ को ‘क’ से झगड़ा किये जाने के अपराध में सस्पेंड कर दिया गया है। ‘घ’ को बार-बार वार्निंग दी गयी कि उसका काम ठीक नहीं है और अब उसे दूसरे विभाग में बदल दिया गया है। ‘ख’ अलबत्ता वहीं उसी विभाग में अपनी पुरानी सीट पर है। वह बार-बार संघर्ष के लिए मानसिक तनाव से मुट्ठियाँ भी उछालता है; परन्तु साथ ही वह यह भी जानता है कि उसके साथ इस संघर्ष में ‘क’, ‘ग’ और ‘घ’ अब कभी नहीं आ पायेंगे। यह सोचकर उसकी तनी हुई मुट्ठियाँ शिथिलता से नीचे की ओर झुकने ही लगी थीं कि तभी बराबर से आकर ‘च’, ‘छ’ और ‘ज’ ने उसकी मुट्ठियाँ हवा में ही थाम ली हैं।

  • निदेशक :  दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035



विक्रम सोनी





बड़ी मछली का आहार
     
        आँखों के ऊपर, माथे से हथेली सटाकर सूरज की ऊँचाई नापता हुआ वह बड़बड़ाया, ‘‘हाँडी के भाग में चूल्हे की आँच और करछुल की मार ही बदी होती है। चल बेटा नटवर! बाजार-हाट का टैम हो गया है।’’
     कमर में चमड़े का पट्टा कसे, पट्टे के सहारे सात हाथ ऊँचा बाँस का डण्डा खोंसे, डण्डे पर आड़ी बँधी बाँस की कमटियाँ-सीढ़ीनुमा। कमटियों के सहारे फीता, चूड़ी, चोली, हेयर-पिन, रबर के खिलौने, फुग्गे और कई तरह की मालायें झूल रही थीं।
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
     बायें हाथ से डण्डे को सँभाले, दायें हाथ से टिन का चोंगा मुँह से सटाये, धीरे-धीरे चलता हुआ, भर्रायी आवाज में वह चिल्ला रहा था, ‘‘पाँच हाथ का फीता, चाभी वाला चीता। हर माल रुपइया एक, चलते-फिरते देख।’’
     अन्ततः उसे बाजार से बाहर निकलना ही पड़ता। किसी भी दुकान के सामने नटवर के पहुँचते ही चाभी वाले चीते की तरह दुकानदार गुर्राता, ‘‘अबे ओ, फूट इहाँ से। साला गाहकी बिगाड़ता है।’’

  • बी-4, तृप्ति विहार, इन्दौर रोड, उज्जैन (म.प्र.)


कुछ और लघुकथाएँ



प्रद्युम्न भल्ला





ज़मीर
      
        होटल का वह कमरा पूरी तरह वातानुकूलित था, जहाँ वे पांचों बैठे हुए थे। सामने टेबल पर विदेशी ह्विस्की, शाही कबाब, सोडा, वर्फ, नमकीन काजू पड़े हुए थे। वे प्रान्त के विभिन्न हिस्सों से आये छंटे हुए बदमाश थे। दो-दो पैग वे लगा चुके थे।
      एक से एक खूंख़ार दुर्द्धर अपराधी थे वे। किसी के पास विदेशी पिस्तौल थी तो कोई रामपुरी का मास्टर था।
      तीसरा पैग पीकर वे कुछ सरूर में आए।
      -मैंने उस साले सेठ को दिन-दहाड़े लिटा दिया, पहले ने कहा।
      -अपुन ने उस खद्दरधारी को नरक पहुँचाया..... दूसरा बोला।
      चौथा पैग अन्दर गया तो फिर और रंग चढ़ा।
      -अबकी बार साले मंत्री को ठिकाने लगाना है...... तीसरे ने कहा।
      -अरे ये तो अपनी ही बिरादरी के हैं, मारना है तो चोर की माँ को मार.... चौथा बिगड़ा। अब तक वे दो-दो पैग और पी चुके थे।
      -क्यों वे, तू क्यों नहीं बोलता? लड़खड़ाती आवाज में पहले ने पांचवें से पूछा।
      -क्या बोलूँ मैं.... सालो.... हम भी तो मरेंगे यूँ ही एक दिन..... पांचवां बोला।
      .....ठहरो..... तुम क्या सोचते हो, तुम जिन्दा हो..... पहला भारी आवाज में बोला और उनकी कल्पनाओं में माँ, बाप, पत्नी, बच्चे, यार, रिश्तेदार सजीव हो उठे.....
      कमरे की ठंडक के बावजूद सबके चेहरों पर पसीना था।

  • 508, सेक्टर-20, अर्बन एस्टेट, कैथल-136027 (हरि.)



सन्तोष सुपेकर




अपराध बोध की दस्तक
     
कॉलोनी का शांत वातावरण एकाएक ब्रेक की तीव्र चरमराहट, जोरदार शोरगुल, बच्चे की दर्दनाक स्तब्धकारी चीख और तीव्र आक्रोश के मिले-जुले स्वरों से दहल उठा। तेजी से आ रही एक बस ने सड़क पर क्रिकेट खेलते दस वर्षीय राजू को बुरी तरह कुचल डाला था। भीड़ इकट्ठी हो रही थी, राजू की रक्तरंजित लाश के आसपास बदहवास, उसकी माँ और पड़ोसी इकट्ठे होकर बुक्का फाड़कर रो रहे थे। बस को रोक लिया गया था, उसकी सवारियां उतरकर भाग गई थीं, ड्राइवर को घंरकर बुरी तरह पीटा जा रहा था, बस के टायरों की हवा निकाल दी गई थी, उसके सारे कांच फोड़ दिये गए थे और अब उसमें आग लगाने की तैयारी चल रही थी......
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
    सामने के भव्य काम्पलेक्स की दूसरी मंजिल पर खड़े रामस्वरूप जी सारा नजारा देख रहे थे। सबकी तरह उनकी आंखे भी यकायक हुए इस हादसे से नम हो गईं थीं लेकिन एक अपराध बोध भी उनके मन में दस्तक दे रहा था कि उस बस के ड्राइवर के स्थान पर उन्हें पीटा जाना चाहिये था, इसी बुरी तरह से.....
    उन्होंने ही तो अपने रालनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर बगीचे के लिये आरक्षित कॉलोनी की भूमि पर भव्य कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स बनवाया था...

  • 31, सुदामानगर, उज्जैन-456001 (म.प्र.)



डॉ नन्द लाल भारती





विजया
    
        विजया का एक हाथ पोलियो लील चुकी थी। उसके माता-पिता उसके भविष्य को लेकर बहुत दुखी रहते थे। विजया पढाई  के मामले अव्वल थी। एक दिन उसके माँ-बाप घर आये मेहमानों से विजया के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर कर रहे थे। इसी बीच विजया आ गयी। उसके आते ही सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटे को चीरते हुए बोली, ‘‘मम्मी-पापा, मैं विकलांग हूँ तो मै अपने पाँव नहीं जमा सकती। आप लोग मुझे लेकर चिंतित रहते हैं?’’
     मम्मी उषा बोली- नहीं बिटिया ......
     विजया- झूठ!
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
     पापा दर्शन- सच बेटी। तू तो हमारे लिए वरदान है।
     विजया- चिंता का कारण भी।
     दर्शन विजया को छाती से लगा लिए उनकी पलकें गीली हो गयी।
     विजया बोली पापा तन से भले जमाना विकलांग कह दे पर मन से विकलांग नहीं हूँ। एक दिन साबित कर दूंगी। माँ-बाप के भरपूर सहयोग से।
     वक्त ने करवट बदला विजया डाक्टर बन गयी। वह जटिल आपरेशन भी बड़ी आसानी से कर लेती, जिसे करने में दोनों हाथ वाले डाक्टरो के हाथ काँप जाते। विजया की कामयाबी को देखकर लोग कहते सच आदमी तन से भले विकलांग हो पर मन से नहीं होना चाहिए, तभी तरक्की के पहाड़ चढ़ सकता है विजया की तरह.....

  • आजाददीप, 15-एम, वीणा नगर, इन्दौर (म.प्र.)



दिनेश कुमार छाजेड़





बोलना
    
        मनोहर लाल जी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। धूमधाम से जन्मोत्सव मनाया गया। पुत्र के बड़े होने पर पता चला कि उसको बोलने में परेशानी होती है। हर शब्द अटक-अटक कर बोलता है। शब्दों का उच्चारण स्पष्ट नहीं होता है।
    पुत्र की ऐसी हालत देखकर उन्हें व उनकी पत्नी को बड़ा दुख होता था। उसके भविष्य के बारे में सोचकर चिंतित रहते थे। लेकिन वो निराश नहीं हुए। अच्छे डॉक्टरों से इलाज कराया, देवी-देवताओं की मनोतियाँ रखी। इलाज के लिए बेहिसाब धन खर्च किया। कर्जा लिया। आखिरकार मेहनत काम आई। उनके पुत्र की बोलने की क्षमता ठीक हो गई।
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
    समय के साथ पुत्र बड़ा हुआ, पढ़ाई पूरी की, अच्छी कम्पनी में नौकरी लग गई। उसका विवाह भी ऊँचे परिवार में हुआ।
    ऊँचे घर की लड़की बहू बनकर आई। लेकिन परिवार में रोज खट-पट होने लगी। मनोहर लाल जी अक्सर चुपचाप रहते, लेकिन सास-बहू में झगड़ा होता रहता। पुत्र भी ऐसी स्थिति में तनाव में रहता, कभी-कभी वह भी अपनी माँ को गुस्से में अनाप-शनाप कह देता। एक दिन तो हद हो गई जब उसने माँ को कहा कि इस घर में रहना है तो जैसे हम कहेंगे, वैसे ही रहना पड़ेगा; नहीं तो शहर के वृद्धाश्रम में जाकर रहो।
    मनोहर लाल जी यह सुनकर अवाक रह गये। सोचने लगे क्या यही सुनने के लिए इसका इलाज कराया था!

  • ब्लॉक 63/395, भारी पानी संयंत्र कॉलोनी, रावतभाटा-323307 (राज.)

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2, अंक : 06,  फरवरी 2013 

।।कथा कहानी।।

सामग्री :  डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’ की  कहानी-  जीवन रेखा।


डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’




जीवन रेखा

      गर्मियों के शुरूआती दिन थे। हवा खुश्क हो चली थी और हवाओं के साथ चारों तरफ गर्दो-गुब्बार उड़ते दिखाई देने लगे थे। सुबह की पहली किरण के साथ जिस्म से कपड़े उतार फंेकने की ख्वाहिश दिल में गथलने लगी थी। पंखे की तेज रफ्तार हवा जिस्म की सुकून की बजाय एक अजीब से कोफ्त और बदमजगी की एहसास करा रही थी। जिसका कोई समाधान नहीं था। इसलिए सुबह हो जाने के बावजूद न चाहते हुए भी लोग अपने-अपने कमरे में पंखे के नीचे अलसाए से पडे थे।
     रहीम फर्ज की नमाज के बाद मस्जिद से घर लौट चुका था। उसने अपनी फितरत के मुताबिक कुरआन पाक की तिलवात खत्म कर ली थी और अम्मी के हाथों बनी प्यारी सी एक कप चाये पीने के बाद बिस्तर पर यों ही लेट गया था। यों ही लेटे हुए कब उसकी आंखों को झपकी आ गई। यह उसे कतई नहीं मालूम...... लेकिन जब आंख खुली तो उसके चेहरे पर परेशानी की लकीरें साफ दिख रही थीं। चेहरे पर हवाइयां उड रही थी। उसके पूरे जिस्म पर कंपकंपी सी तारी थी। होंठ सूख रहे थे, जिसे तर रखने के लिए वह बार-बार होठों पर जबान फेरता। अजीब सी कैफियत थी उसकी। वह कुछ कहना चाहता था पर अम्मी से कोई ऐसी....वैसी बात कहकर उन्हें बिलावजह परेशानी में डालने का उसका कोई इरादा नहीं था। वह कुछ पल यों ही कमरे में टहलता रहा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस ख्वाब की ताबीर क्या सच होकर रहेगी? वह अब्बू के कमरे में गया। वह भी अपनी बिस्तर पर नमाज के बाद निहाल से लेटे थे। अभी वह किससे क्या कहे, किससे न कहे! इसी उधेडबन में खोया हुआ था। वह किसी नतीजे पर पहुंचने की नामुमकिन कोशिश में जुटा था।
     अभी वह इसी उलझन में फंसा था कि अचानक कमरे में टेलीफोन की घंटी बज उठी। वह किसी खौफनाक खबर की दहशत में घिरा टेलीफोन की ओर बढ़ा। उसने फोन को कान से लगाया। दूसरी ओर से छोटे चाचा पूछ रहे थे- कौन ? रहीम! अरे! भईया कहां है? एक खबर देनी है। बहुत गडबड़ हो गया है यहां रात में। 
    ‘‘ऐसा क्या हो गया है चाचा जी? सब खैरियत तो है न?’’ रहीम ने सहमते हुए पूछा।
     ‘‘अब क्या कहें रहीम! कल रात कलीमउद्दीन की बीवी चल बसी। उसे हम लोग हस्पताल ले जाने के लिए रिक्शे पर बिठा ही रहे थे। उसने रिक्शा के चार कदम बढ़ते ही रास्ते में दम तोड़ दिया। फिर भी हस्पताल ले गए। एक उम्मीद बची थी। वह भी वहां जाकर टूट गई। भईया को सब बता दीजिए और आप लोग जल्दी से आ जाइए। दादाजी को भी अपने साथ लेते आइए। देर मत कीजिए.... बस निकलने की तैयारी कीजिए.... जोहर (दोपहर) की नमाज के बाद कफन-दफन का इंतेजाम किया गया है, ताकि खानदान के दूसरे लोग भी आ जाएं। अच्छा अब फोन रखता हँू।’’ वह कहना चाहता था कि अब्बू को जगा देता हँू। आप खुद बात कर लीजिए, लेकिन तब तक उन्होंने फोन कट कर दिया। वह चोगा हाथ में पकड़े हुए भौंचक खड़ा रह गया।
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
     जब रहीम ने यह खबर सुनी तो उसकी रूह कांप गई। ‘‘अरे! मेरे ख्वाब का मतलब भी तो यही निकलता है। उसने झपकी आने के बाद ख्वाब मेें यही तो देखा था कि एक जगह कुछ लोग जमा है। उनके हाथ दुआ के लिए उठे हैं और उनमें से एक शख्स रहीम से करीब आकर कहता है- ‘‘मगफिरत की दुआ करो... मगफिर (माफी)।’’  जिसके बाद उसकी नींद खुल गई थी। वह किसी अनहोनी की खबर से आतंकित हो उठा था। ओह! यह क्या देखा था मैंने... ओह पहले अम्मी-अब्बू को खबर तो दे दूँ। उसने जो यह बात घर में बतायी तो सब सकते में पड़ गए। 
     जोहरा भाभी गर्भवती थी। यह सबको मालूम था, लेकिन बच्चे की पैदाइश के वक्त ही मौत हो जाएगी। यह किसी के लिए भी यकीन करना कठिन था। दादा जी को यह खबर मिली तो वह रो पड़े। ’’या अल्लाह! अब उसके घर का क्या होगा... अरे! यह सब हुआ तो कैसे ? उसे तकलीफ होते ही हस्पताल क्यों नहीं ले गए लोग? क्या कर रहे थे सब घर में? ऐसी लापरवाही होती है भला... या खुदा यह क्या कहर बरपा किया?’’ दादा जी भरी आंखो से अपना दर्द जाहिर करते रहे। आसमान तकते रहे.... आहें भरते रहे।
      ‘‘रहीम! मैं तो बिना आफिस से छुट्टी की दरख्वास्त मंजूर कराए, गांव नहीं जा सकता। मेरी बजाय तुम दादा जी के साथ गांव चले आओ। आठ बजे की लोकल से। अभी ट्रेन आने में करीब बीस मिनट बाकी हैं। आरा से बस मिल जाएगी। दोपहर के पहले घर पहुंच जाओगे....।’’  जिंदगी में पहली बार रहीम ने भारी मन से गांव जाने के लिए तैयार होने लगा। इससे पहले वह जब भी गांव गया। वहां जाना उसकी दुगुनी खुशी का सबब रहा था। उसे गांव का माहौल बेहद पसंद था। मगर इस बार उसकी खुशियों को न जाने किसकी नजर लग गई थी।
     आनन-फानन की तैयारी के बाद किसी तरह वह दादा जी के साथ गांव पहुंचा तो जोहर की नमाज का वक्त निकल चुका था और मईयत को मस्जिद के करीब नमाजे जनाजा के लिए लाया जा चुका था। अपने-पराये सभी जमा थे वहां पर, बस हमारे पहुंचने का इंतेजार था। पूरा माहौल गम से बोझिल था।
      जब भाभी जान को कब्र में लिटाया गया। कलीम भईया बुक्का फाड़कर से पड़े। किसी तरह कुछ लोगों ने संभाला। हिम्मत से काम लेने की सलाह दी। पर दिल कोई पत्थर तो नहीं जिससे गम का ज्वार नहीं फूटे। फिर भी उनकी आंखो में आंसू थमते से लगे, किन्तु दिल में न जाने कितने गम के पहाड़ तैरते और आपस में टकराते रहे। आखिरी बार भाभी का चेहरा खोलकर सबको दिखाया गया। रहीम ने भी देखा। भाभी का पीलिया के रोगी की तरह पीला पड़ चुका चेहरा। जिस पर तब भी कहीं कोई तनाव या दुख का साया नहीं था। कब्र पर मिट्टी डालने के बाद सबने उनकी मुक्ति की दुआएं कीं और उल्टे पैर घरों को लौट गए।
      एकबारगी कलीम भईया की जिंदगी वीरान हो गई थी। यह बात पूरे खानदान को गहरे कचोट रही थी। अजीब-अजीब बातंे सुनने को मिल रही थी यानि जितनी मुँह उतनी बातें। बातों के सिलसिला का कोई अन्तिम छोर नहीं था। छोटे चाचा रहीम को पुश्तैनी मकान के सामने तैयब चाचा के चतबूतरे पर बिठाते हुए कहने लगे- ‘‘यह सब हादिसा इतनी जल्दी हो गया कि किसी को वक्त ही नहीं मिला कि आधी रात को कोई कुछ कर सके। अन्दर कलीम की मेहरारू को दर्द हुआ तो घर की औरतों-मर्दो ने समझा कि सब थोड़ी देर में हमेशा की तरह ठीक-ठाक हो जाएगा। वैसे भी जोहरा कोई पहली बार बच्चा तो नहीं जनने जा रही थी। इसके पहले वह पांच बेटियां और तीन बेटों को जन्म दे चुकी थी। यह नौवां बच्चा था जो उसके गर्भ में पल रहा था और अब कुछ ही मिनटों में बाहर आना चाहता था। घर के दरवाजे पर बैठे मर्दो को खुशखबरी का इंतेजार था। रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे होंगे कि तभी इसी चबूतरे पर रहीम मेरी जरा सी आंख झपक गई। तब जानते हो। मैंने ख्वाब में क्या देखा?’’
      ‘‘क्या देखा चाचा जी? कोई बुरा सपना... ?’’ उसने बेतरह चौंकते हुए पूछा।
      ‘‘हाँ! मैेंने महसूस किया कि सामने के ढलान वली गली से एक अजगर फंुफकारता हुआ दौड़ता चला आ रहा है और वह घर में घुसकर किसी को डस लेता है। यह ख्वाब टूटना था कि मेरे कानों में घर की औरतों के रोने-चीखने की आवाजें पड़ीं। मैं दोड़ कर अंन्दर गया। कमरे में सारी औरतें बेहाल थीं। सबकी आंखों में आंसू थे। जोहरा बस एक ही बाते रटे जा रही थी, ‘‘मुझे डागडर के पास ले चलो... अब मैं नहीं बचूंगी। बस किसी तरह हस्पताल चलो... मेरा दम घुट रहा है... कोई गला दबा रहा है।’’
      ‘‘फिर आप लोगों ने उसे हस्पताल ले जाने में देर क्यांे की ? उसे सही वक्त पर हस्पताल में दाखिल करा दिया गया होता तो शायद भाभी की जान बच जाती और यह परिवार नहीं उजड़ता।’’
     ‘‘अब क्या कहें रहीम! रात के वक्त रिक्शा तलाशने में देर हो गई। कोई चार कदम जाने के लिए तैयार नहीं थ। फिर तो यही कहा जाएगा न कि होनी को कौन टाल सकता है रहीम! वह तो कभी डाक्टर के पास गई ही नहीं। किसी की नहीं सुनती थी। वह सोच रही थी कि हमेशा की तरह यह बच्चा भी घर पर भी पैदा हो लेगा।’’
     ‘‘मगर चाचा जी! पिछली बार जब मैं गांव आया था। तब भाभी जान के चेहरे की रंगत देखकर उनसे कहा भी था। भाभी जान! आप की तबियत कुछ ठीक नही लगती। आप किसी डाक्टर से चेकअप करा लीजिए... तब उसने हंसते हुए धीमे लहजे में कहा था, ‘‘मुझे कुछ नहीं होगा रहीम बाबू! खा पीकर सेहतमंद हो जाऊँगी।’’ और आदतन वह चारपाई पर बैठी मुस्कुराती रही थीं।
      जब रहीम अपने ख्वाब की बात चाचा जी को बताने लगा तो वह सुनकर भौंचक रह गए। फिर तनिक धीमे लहजे में बोले, ‘रहीम! सच बात तो यह है कि उसके ऊपर भूत-प्रेत का साया था। वह भूत खेलाती थी। उसी ने उसकी जान ली है। तुम्हारी चाची भी यही कहती है। यही सही है। वरना एक अच्छी-भली औरत अचानक कैसे मर सकती है। फिर हम दोनों के सपने भी तो यही साबित करते हैं।’’ चाचा ने दिल की तसल्ली के लिए अपनी सोच जाहिर की। रहीम ने उनकी बातें सुनी, किन्तु कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
      दूसरे दिन वह पटना वापसी के लिए तैयार हुआ। कुछ और मेहमान भी जाने को तैयार दिखे। घर मुहल्ले की औरतें दरवाजे पर जमा हो गई। सबकी आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे। तभी एक औरत ने एक नवजात शिशु को कपड़े में लपेटकर सामने किया,- ‘‘यही है.... मुनिया! जिसे जोहरा ने मरने से पहले जन्म दिया। अब इसकी परवरिश कौन करेगा बाबू? यह भी मर जाती तो भला होता....? इस घर में कोई दूसरी औरत है कहां ? सारे बच्चे छोटे हैं। या अल्लाह यह क्या गजब किया..? किस बात की इतनी बड़ी सजा दी कलीम को ? बेचारा तंग-तनहा होकर रह गया...।’’ उसी भीड़ से किसी की आवाज आयी,’’ अरे ! यह बेटी नहीं नागिन है... माँ को ही डस गई’’।
पटना वापसी के कुछ दिनों बाद ही खबर मिली! बच्ची मर गई! किसी ने कहा कि उसकी सही ढंग से देखभल नहीं हुई, किसी ने कहा, उसे नमक चटाकर मार दिया गया। पहले से ही पांच पांच बेटियां क्या कम हैं, जो इसका जिम्मा कोई ढोये।’
      बरसों बाद भी रहीम को अपनी जोहरा भाभी से पहली मुलाकात याद थी। वह एक खुशगवार सुबह थी जब वह सपरिवार गांव गया था। दादी मां और चाचियों के साथ चचेरी भाभी ने भी पटनिया बाबू कहते हुए आवभगत में कोई कोर कसर नहीं रहने दी थी। रात देर तक भाभी उसके साथ अपने पीहर की बातें कहती-सुनती रही थी। उसे चिनिया बादाम मंगाकर खाने को विवश किया था। जब तक वह गांव में रहा हर रात धान के बदले बादाम और कुछ दूसरी खट्टी-मिटी चीजे मंगाकर वह खिलाती रही थीं।
      जोहरा भाभी औसतन कद काठी की होते हुए भी चेहरे से बेहद खूबसूरत दिखती थी। बातें खूब किया करती। हंसी मजाक तो उनके होठों पर चिपके रहते। किसी को रोते हुए भी हंसने को मजबूर कर देना, उनके किरदार की खूंबी थी। रहीम से जोहरा की गहरी छनती। दोनों अधिकतर समय साथ रहते, क्योंकि रहीम रिश्ते में देवर लगता था। इसलिए वह उसे किसी न किसी बहाने छेड़ने से भी नहीं चूकतीं। सज संवर कर रहना। उनको खूब पसंद था।
      छोटे चाचा और चचेरे भाई दोनों की शादियां एक साथ ही हुई थीं और एक दिन के फासले से दोनों जगह बारात गई थी। छोटी चाची कुछ पढ़ी लिखी थी, जबकि जोहरा भाभी ने पढ़ाई का वक्त सहेलियां के साथ पीहर की गलियों में मटरगश्ती करते हुए गुजारा था या फिर जैसा कि वह रहीम से कहती रही  थी कि जब गंगा नदी के बाढ़ का पानी उनके घर के दरवाजे तक आ लगता। वह किसी नाव पर सवार होकर नदी की सैर करतीं। गीत गातीं। पानी से अठखेलियां करतीं। वह तैरना भी जानती थीं। जबकि छोटी चाची उपन्यासों की शौकीन थीं और वह अपनी किताबों में ही फुर्सत के वक्त काट लिया करतीं।
      मगर रहीम को यह ख्याल आते ही बड़ी घुटन होती कि जोहरा भाभी को पांच बेटियों और तीन बेटों के जन्म देने के बाद भी तसल्ली क्यों कर नहीं हुई थी। वह और बच्चे की ख्वाहिशमंद क्यों थी? घर में खेती-‘बाडी थी और कलीम भईया की छोटी सी सरकारी नौकरी। तिस पर पूरे दस जनों की रात-दिन की आवश्यकताएं। कभी किसी के तन पर पूरे वस्त्र नहीं तो कभी मन मुताबिक खाने पीने की चीजें नहीं, मगर कलीम भईया भाभी का बहुत ख्याल रखते थे। उनकी जरूरत की किसी चीज में कोई कमी नहीं आने देते थे। जोहरा भाभी की खुशी में ही उनकी खुशी में ही उनकी खुशी पोशीदा थी।
       दरअसल इसकी भी एक खास वजह थी। खानदान में जोहरा भाभी के बच्चों के साथ साथ छोटी चाची के बच्चों की तादाद भी तेजी से बढ़ रही थी। कभी चाची जान गर्भवती होतीं तो कभी भाभी जान। एक-दूसरे की खबर लगते ही वह भी इस कोशिश में जुट जाती। नतीजा यह हुआ कि हर साल किसी ने किसी के बच्चे की पैदाईश का सिलसिला जारी रहा। यों कि दोनों के बीच एक शीत युद्ध की स्थिति बन गई और इस युद्ध में छोटी चाची विजयी हुई। जोहरा भाभी जहां नौवीं बच्ची के जन्म के साथ दुनिया को अलविदा कह गयीं। छोटी चाची ने अधिक बेटों को जन्म देकर रिकार्ड कायम किया। इस कोशिश में उनके हाथ भी जले। एक बेटा मानसिक रूप से विक्षिप्त पैदा हुआ। तब कहीं जाकर वह भी थमीं और दूसरे उन्हें जोहरा भाभी की मौत ने सकते में डाल दिया।
      जोहरा भाभी से पहले खानदान में किसी जवान औरत या मर्द की मौत नहीं हुई थी और यह जान भी बच्चे जनने के होड़ में गई थी। यह बात रहीम खूब समझ रहा था। कलीम भईया भाभी की उस हालत में सेहत और खानपान का ख्याल नहीं रख पाये थे। हमेशा की तरह इस बार भी वह बच्चा आराम से जन्म दे लेगी।
      बहरहाल, जोहरा भाभी अब इस दुनिया में नहीं, किंतु रहीम को लगता है कि आज भी वह उसके बेहद करीब बैठी बातें हंसी-मजाक कर रही है। उसे मनुहार कुछ न कुछ खाने को विवश कर रही हैं। उसके उल्टे-सीधे सवाल करके परेशान कर रही है। जिसके चेहरे में जाड़े के धूप सी नरमी और चांदनी सी चमक बसी थी। काश! वह ज्यादा बच्चे की हवस से बच पातीं। वह उनकी कुरबत से महरूम नहीं होता। आखिर घर की रौनक थीं वह।

  • संपादक/कथा सागर त्रैमासिक,  कोर्ट रोड़,  जज कोठी के सामने,  जामताड़ा,  झारखंड-815351

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक : 6, फरवरी  2013  

।।क्षणिकाएँ।।

सामग्री :  डॉ. बलराम अग्रवाल, नारायण सिंह निर्दोष व डॉ. सुरेश सपन की क्षणिकाएँ।


डॉ. बलराम अग्रवाल





दो क्षणिकाएँ

1.
बिटिया ने 
ऊपर को
पत्थर जो उछाला
रेखा चित्र : राजेंद्र परदेशी 
नीचे को बैठ गया
सूरज बेचारा
छिप गया
डरपोक खरगोश सा दिन
2.
शब्द को 
न शूल बनाओ
न सुई करके
हवा में फेंको
फूट जायेंगी
सभी ओर हैं- मेरी आँखें

  • एम-70, उल्धनपुर, दिगम्बर जैन मन्दिर के पास, नवीन शाहदरा, दिल्ली


नारायण सिंह निर्दोष





दो क्षणिकाएँ

1.
पाँवों में
फटी चप्पलों की कीमत
जमा (+)
रेखा चित्र : शशिभूषण बडोनी 
जिस्म पर टंगे
चिथड़ों की कीमत
और कुल पर 
शत-प्रतिशत छूट
बराबर (=)
गरीब की कुल कीमत
2.
सहन करने की 
आखिरी हद से पूर्व ही
जब हम/बौखला जाते हैं
तब जनम लेता है- द्वन्द
फिर कुंठायें
और ढह जता है
हमारा/बचा-खुचा व्यक्तित्व

  • सी-21, लैह (स्म्प्।भ्) अपार्टमेन्ट्स, वसुन्धरा एन्क्लेव, दिल्ली-110096


डॉ. सुरेश सपन





दो क्षणिकाएँ
छाया चित्र : उमेश महादोषी 

1.
बिखरे हुए/शब्द
कुछ डायरी के इस पन्ने पर
कुछ डायरी के उस पन्ने पर
सूख गये/बस एक धूप में 
वे शब्द सब
डायरी के उस पन्ने पर
2.
आसमान साफ है
मगर जमीन पर धुंध है
कत्ल होने वाला है
जीर्ण-शीर्ण आदमी का

  • डॉ. एस.सी.पाण्डे, वरिष्ठ वैज्ञानिक, विवेकानन्द कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक : 6,   फरवरी  2013  

।।हाइकु।।

सामग्री : इस अंक में डॉ. भावना कुँअर के दस हाइकु।


डॉ. भावना कुँअर




दस हाइकु 


1.
कलियाँ खिलीं
कोयल गाने लगीं
नाचे मयूर।
2.
वो मृग छौना
बहुत ही सलौना
कुलाचें भरे।
3.
लेटी थी धूप
सागर तट पर
प्यास बुझाने।
4.
धुन बनाए
ओलों की बरसात
जैसे हो साज़।
5.
बरखा रानी
फैला गई खुशबू
सोंधी मिट्टी की।
6.
हुई आहट
छाया चित्र : रोहित काम्बोज 
खोला था जब द्वार
मिला  त्यौहार।
7.
परदेस में 
जब होली मनाई
तू याद आई।
8.
पड़ी है सूनी
भैया जी की कलाई
राखी न आई।
9.
घोर तन्हाई
जब माँ याद आई
फूटी रुलाई।
10.
सुबक पड़ी
कैसी थी वो निष्ठुर
विदा की घड़ी।

  • सिडनी, आस्ट्रेलिया (ई मेल : bhawnak2002@gmail-com)

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग : वर्ष : 2, अंक : 6,  फरवरी   2013

।।जनक छन्द।।

सामग्री : हरिश्चन्द्र शाक्य के पाँच जनक छंद।



हरिश्चन्द्र शाक्य 



जनक छन्द


1.
कैसा अद्भुत ज्ञान है
ईश्वर को ब्रह्माण्ड में
खोज रहा विज्ञान है
2.
अधर-अधर पर गीत है
छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 
हवा प्रगति की चल गयी
खुशियों का संगीत है
3.
बाज, बाज ना आ रहा
बेकसूर जो कीर हैं
मार-मार कर खा रहा
4.
कैसी दुनिया आज की
चहुँ दिशि तूती बोलती 
भ्रष्टाचारी राज की
5.
मेंटो तुम छल-छन्द को
प्रेम-सुधारस बाँट दो
पाओ परमानन्द को

  • शाक्य प्रकाशन, घण्टाघर चौक,  क्लब घर,  मैनपुरी-205001 (उ0प्र0)

बाल अविराम

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक : 6,  फरवरी  2013  


।।बाल अविराम।।

सामग्री : सुकेश साहनी की बाल-कहानी एवं अनिल द्विवेदी ‘तपन’ की दो कवितायेँ। नए बाल चित्रकार- स्मिति गंभीर व सक्षम गम्भीर।


सुकेश साहनी






{सुप्रसिद्ध कथाकार सुकेश साहनी का लघु संग्रह ‘‘अक्ल बड़ी या भैंस’’ गत वर्ष प्रकाशित हुआ था, जिसमें उनकी बारह प्रेरक बालकथाएं संग्रहीत हैं। प्रस्तुत है इसी संग्रह से उनकी एक बालकथा।}


अक्ल बड़ी या भैंस

     स्कूल से घर लौटते ही उदय ने चक्की के दो भारी पाट जैसे-तैसे स्टोर से बाहर निकाल दिए। फिर उन्हें लोहे की एक छड़ के, दोनों सिरों पर फँसाकर भारोत्तोलन का प्रयास करने लगा। चक्की के पाट बहुत भारी थे। प्रथम प्रयास में ही उसके पीठ में दर्द जागा और वह चीख पड़ा।
पेंटिंग : सक्षम गंभीर 
     उसकी चीख सुनकर माँ रसोईघर से दौड़ती हुई आ गयीं। उदय की पीठ में असहनीय पीड़ा हो रही थी। उन्होंने उदय को तब कुछ नहीं कहा। वे उदय को एक तरह से एक अच्छा लड़का मानती थीं। उदय जब कुछ राहत-सी महसूस करने लगा तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें आज क्या सूझी?’’
    जवाब में उदय की आँखें भर आयीं, ‘‘माँ, आज स्कूल में मदन ने फिर मेरा हाथ उमेठ दिया। वह मुझसे बहुत तगड़ा है। मैं उससे भी ज्यादा तगड़ा बनूँगा।’’
    ‘‘अच्छा, पहले यह बताओ, स्कूल में तुम्हारे अध्यापक किसे अधिक चाहते हैं, तुम्हें या मदन को?’’
    ‘‘मुझे।’’
    माँ ने उसे समझाया- ‘‘तुम्हारी बातों से स्पष्ट है कि मदन में शारीरिक बल है, बुद्धि नहीं। बुद्धिमान आदमी अपने गुण की डींगें नहीं हाँकता। तुम चाहो तो अपनी बुद्धि के बल पर उसका घमंड दूर कर सकते हो।’’
    माँ के समझाने से उदय को नई शक्ति मिली। वह सोचने लगा। सोचते-सोचते उसकी आँखे खुशी से चमक उठीं।
पेंटिंग : सक्षम गंभीर 
    अगले दिन खेल क मैदान में उदय अपने कुछ मित्रों के साथ खड़ा था। तभी वहाँ मदन भी आ गया। अपनी आदत के मुताबिक आते ही उसने डींग हाँकनी शुरू की, ‘‘देखो, मैं यह पत्थर कितनी दूर फेंक सकता हूँ।’’ इतना कहकर वह एक भारी से पत्थर को फेंककर दिखाने लगा।
    ‘‘मदन, मुझसे मुकाबला करोगे?’’ उदय ने पूछा।
    ‘‘अबे तू!  जा मरियल, तू क्या खाकर मेरा मुकाबला करेगा?’’ मदन ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा।
     ‘‘ज्यादा घमंड ठीक नहीं होता’’, उदय ने अपना रूमाल उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘‘इस रूमाल को ही जरा उस पत्थर तक फेंककर दिखा दो।’’
    ‘‘बस ये....ये लो।’’ मदन ने पूरी ताकत से रूमाल फेंका। रुमाल हवा में लहराता हुआ पास ही गिर गया।
     उदय ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम इस जरा से रूमाल को ही नहीं फेंक पाए, पर मैं इस रुमाल के साथ-साथ एक पत्थर को भी तुमसे अधिक दूरी तक फेंक सकता हूँ।’’ यह कहकर उदय ने रूमाल में एक छोटा-सा पत्थर लपेटा और उसे काफी दूर तक फेंक दिया। सभी लड़के जोर-जोर से तालियाँ बजाकर हँसने लगे। मदन का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। वह चुपचाप वहाँ से खिसक गया।
    शाम को उदय खुशी-खुशी स्कूल से वापस लौट रहा था। वह आज की घटना जल्दी से जल्दी अपनी माँ को बताना चाहता था।

  • 193/21, सिविल लाइन्स, बरेली-243001 (उत्तर प्रदेश)



अनिल द्विवेदी ‘तपन’




{कवि-कथाकार अनिल द्विवेदी ‘तपन’ का बाल कविताओं का संग्रह ‘‘उड़न खटोला’’ मार्च 2010 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उनकी 22 बाल कविताएं संग्रहीत हैं। प्रस्तुत हैं उनके इसी संग्रह से दो बाल कविताएं।}


क्यों अनपढ़ कहलाते?

थके-थके से चूहे चाचा
घर के अंदर आए।
रंग-बिरंगी कई किताबें
अपनी बगल दबाए।।

क्यों उदास हो, मुझे बताओ
चुहिया चाची बोली।
सर में दर्द अगर होता हो
खालो कोई गोली।।
पेंटिंग : इशिता श्रीवास्तव 

बोले चाचा, बात नहीं कुछ
ना कोई बीमारी।
पत्र-पत्रिका ना पढ़ पाना
है मेरी लाचारी।।

पढ़े-लिखे बच्चे अक्सर अब
मेरी हँसी उड़ाते।
थोड़ा सा भी पढ़-लिख लेते
क्यों अनपढ़ कहलाते।।

अभिलाषा

मेरी अभिलाषा है, मैं भी
बादल बन उड़ जाऊँ।
पवन वेग के संग-संग नभ में
हँस-हँस मजे उडाऊँ।।

कितने सुन्दर ये बादल हैं
पल-पल रंग बदलते।
गर्मी से आहत जन-जन की
व्याकुलता को हरते।।
पेंटिंग : स्मिति गंभीर 

तेज गर्जना इनकी सुनकर
सब के तन थर्राते।
मानों शेर सभी धरती के
नभ पर जा गुर्राते।।

निश्छल मन से सेवा करने
आसमान पर आते।
पृथ्वी पर पानी बरसाकर
जीवन सुखद बनाते।।

  • ‘दुलारे निकुंज’, 46-सिपाही ठाकुर, कन्नौज-209725 (उ.प्र.) 


हमारे नए बाल-चित्रकार 

स्मिति गंभीर 




माँ : भारती गंभीर
पिता : राकेश गंभीर
कक्षा : 7 
जन्म : 09-09-2000
स्कूल : ए.पी.एस.2 , रुड़की  











इशिता श्रीवास्तव 





माँ : रागनी श्रीवास्तव‌
पिता : संदीप श्रीवास्तव‌
जन्म : 11‍. 11. 2003
कक्षा : 3
स्कूल : विद्याभूमि पब्लिक स्कूल छिंदवाड़ा
(दादाजी सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री प्रभुदयाल श्रीवास्तव)






सक्षम  गंभीर 




माँ : भारती गंभीर 
पिता : राकेश गंभीर
कक्षा : 4 
जन्म : 08-08-2003
स्कूल : ए.पी.एस.2 , रुड़की 
ई मेल : sakshamgambhir9@gmail.com 






किताबें

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2, अंक : 6 ,  फरवरी   2013  

{अविराम के ब्लाग के इस अंक में प्रख्यात कथाकार एवं चिन्तक श्री विरेन्द्र कुमार गुप्त के उपन्यास ‘‘शून्य से शिखर’’ की  प्रख्यात साहित्यकार व समीक्षक डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ द्वारा लिखित समीक्षा रख रहे हैं। लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ (डा. उमेश महादोषी, एफ-488/2, राजेन्द्र नगर, रुड़की-247667, जिला - हरिद्वार, उत्तराखण्ड के पते पर) अवश्य भेजें।}


डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’



‘संन्यास से संसार और संसार से संन्यास’ का समन्वय कराता उपन्यास ‘शून्य से शिखर’

   प्रख्यात कथाकार एवं चिन्तक श्री विरेन्द्र कुमार गुप्त का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘‘शून्य से शिखर’’ निःसन्देह हिन्दी कथा जगत की उपलब्धि कहा जाना चाहिए। कथाकार श्री भगवती चरण वर्मा ने अपने चर्चित उपन्यास ‘‘चित्रलेखा’’ में संन्यास की ‘व्यर्थता’ को इतिहास और कल्पना के रंगों में ढाला था, लेकिन कथाकार श्री विरेन्द्र कुमार गुप्त ने तो ‘संन्यास से संसार और संसार से संन्यास के बीच अनूठा समन्वय’ स्थापित कराते हुए ‘‘शून्य से शिखर’’ उपन्यास में समाज, राजनीति और धर्म की त्रिवेणी के बीच रोचक कथा का सृजन किया है।
         कथाकार वीरेन्द्र गुप्त ने कथा नायक सदानन्द को निर्मल आश्रम के भिक्षु-संन्यासी से मुख्यमंत्री के पद तक ले जाकर जहाँ राजनीति के दावँ-पेंचों के बीच ‘अध्यात्म-साधना’ पर अत्यन्त गंभीर और सकारात्मक चिन्तन अपने इस उपन्यास ‘शून्य से शिखर’ में दिया है, वहीं सुष्मिता और सुषमा जैसे सजीव नारी-पात्रों के माध्यम से श्रेष्ठ जीवन मूल्यों और नारीत्व की गरिमा भी स्थापित की है।
कथाकार ने ‘शून्य से शिखर’ में कथानक का ताना-बाना इतनी कुशलता से बुना है कि पाठक स्वयं को हर घटना-क्रम के साथ बंधा हुआ सा अनुभव करता है और उपन्यास के सभी पात्रों से पाठक सहज तादात्म्य बनाकर कथारस में डूबा रहता है।
         स्वयं कथाकार ने कथानायक सदानन्द के माध्यम से एक विचार दिया है- ‘‘सांसारिक कर्म और कर्म संन्यास के बीच संतुलन एक मनोवैज्ञानिक विषय है, हमने इसे एक सामाजिक द्वैत के रूप में लिया है, जो हानिकर है। हर तथाकथित संन्यासी के भीतर एक सांसारिक गृहस्थ और हर गृहस्थ के भीतर एक संन्यासी निरन्तर वर्तमान रहता है और रहना चाहिए।’’ (पृष्ठ-6)
        कथाकार वीरेन्द्र गुप्त ने संन्यास-आश्रमों में ‘मोक्ष’ और ‘निर्वाण’ की खोज मंे रहने वाले संन्यासियों के बीच निर्मल आश्रम के भिक्षु सदानन्द और गृहस्थी समीर के बीच वार्तालाप में ही बेधक प्रश्न उठाया है। ‘‘मैं भिक्षा मांगना और भिक्षा देना, दोनों को ही पाप समझता हूँ।’’ -समीर का यह वाक्य ही ‘शून्य से शिख्र’ उपन्यास की नींव बना है।
        कथा-क्रम के अनुसार, कथानायक भिक्षु सदानन्द एक दिन ‘संन्यास’ छोड़कर गृहस्थ बन जाता है और उसके इस जीवन में जन्मदाता माँ-बाप और भाई के साथ-साथ पत्नी ‘सुष्मिता’, ससुर मिश्र जी और मार्गदर्शक मित्र समीर का प्रवेश हो जाता है। कथानायक संस्कृत विद्यालय के शिक्षक से विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री तक बन जाता है।
        कथाकार श्री वीरेन्द्र कुमार गुप्त ने अपने उपन्यास में मनोविज्ञान का ऐसा सार्थक प्रयोग किया है कि पाठक उनके पात्रों, कथानायक सदानन्द, मित्र समीर, मिश्र जी, निर्मल बाबा के साथ-साथ सुष्मिता और सुषमा के चरित्र-चित्रण से अभिभूत हो उठता है।
      ‘शून्य से शिखर’ उपन्यास में कथाकार ने गंभीर चिन्तन को वाणी दी है- ‘‘सीधी सी बात है। स्त्री-पुरुष का संयोग, गृहस्थ ईश्वर का बनाया शाश्वत विधान है। मोक्ष या निर्वाण के लिए यह आपका संन्यास मनुष्य के विकृत अहं की हठ मात्र है, जो प्रकृति की ओर पीठ किये खड़ी है।’’ (पृष्ठ-23)
        कथाकार ने सदानन्द और समीर के वार्तालाप के द्वारा ‘चित्रलेखा’ के कथाकार भगवती चरण वर्मा से बहुत आगे बढ़ कर ‘संन्यास’ पर मंथन किया है- ‘‘पहला अन्तर यह है कि गृहस्थ श्रम करके अपनी और अपने आश्रितों की रोटी अर्जित करता है। संन्यासी परोपजीवी है। दूसरे, गृहस्थ उत्पादन करता है.....उसके द्वारा किया गया उत्पादन केवल उसके लिए नहीं होता, सबके लिए होता है। संन्यासी का लक्ष्य केवल अपनी आत्मा का उद्धार रहता है।’’ (पृष्ठ-31)
       सच यह है कि कथाकार श्री वीरेन्द्र गुप्त ने समाज की ज्वलन्त समस्या पर यह महत्वपूर्ण उपन्यास रचा है।
        कथाकार ने यत्र-तत्र बुद्ध द्वारा संन्यास को एक ‘संस्था’ बनाकर ‘भिक्षुओं के संघ’ बनाने को प्रतिगामी माना है और गृहस्थ को समाज का आधार माना है- ‘‘मैं समझता हूँ, जो साधना संन्यासी करता है, वह गृहस्थ के सब कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी की जा सकती है। सांसारिक युद्धों को लड़ना अपने में एक तपस्या है। एक सच्चा गृहस्थ संन्यासी से कहीं श्रेष्ठ है, क्योंकि वह चुनौतियों से भागता नहीं।’’ (पृष्ठ-53)
         कथानायक सदानन्द के साथ पत्नी सुष्मिता और प्रेयसी सुषमा का ‘त्रिकोंण’ बनाकर कथाकार वीरेन्द्र गुप्त ने नारीत्व को जो गरिमा दी है, वह पाठक के हृदय को अभिभूत कर लेती है। सुषमा के चरित्रांकन में तो जैसे उपन्यासकार ने उदात्त को ही रूपायित कर दिया है। त्याग, दृढ़ता, संकल्प-शक्ति और कर्मशीलता जैसे उदात्त जीवन-मूल्यों को कथाकार ने सुषमा और सुष्मिता के माध्यम से अनूठी अभिव्यक्ति दी है।
        कथाकार वीरेन्द्र कुमार गुप्त का यह उपन्यास निश्चय ही उनके पूर्व उपन्यासों की ही तरह सकारात्मक चिन्तन प्रधान रोचक कृति है, जिसमें वर्तमान राजनीति के दाँव-पेंच से लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर भी सार्थक चिन्तन पाठकों को मिलेगा। ‘‘शून्य से शिखर’’ निश्चय ही हिन्दी-जगत में स्थान बनाएगा, इस विश्वास के साथ मैं सुधी पाठकों को इस कृति का परिचय दे रहा हूँ।

‘शून्य से शिखर’ : उपन्यास। लेखक : वीरेन्द्र कुमार गुप्त। प्रकाशक : मित्तल एण्ड संस, सी-32, आर्यनगर सोसायटी, मदर डेयरी, पटपड़गंज, दिल्ली-110092। मूल्य : रु.200/-। संस्करण : 2013 (सजिल्द)। पृष्ठ : 127।

  • 74/3, न्यू नेहरू नगर, रुड़की-247667, जिला-हरिद्वार (उत्तराखण्ड)