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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

बाल अविराम

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष :  2,  अंक : 9-10 ,  मई-जून  2013

।।बाल अविराम।।

सामग्री :  बाल अविराम के इस अंक में प्रस्तुत हैं वरिष्ठ कवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएँ,  सक्षम गंभीर, राधिका शर्मा व मिली भाटिया के चित्रों के साथ।




प्रभुदयाल श्रीवास्तव




कड़क ठंड है

कितनी ज्यादा कड़क ठंड है
करते सी-सी पापा,
दादा कहते शीत लहर है
कैसे कटे बुढ़ापा।

बरफ पड़ेगी मम्मी कहतीं
ओढ़ रजाई सोओ,
किसी बात की जिद मत करना
चित्र : सक्षम गंभीर 
अब बिलकुल न रोओ।

किंतु घंटे दो घंटे में
पापा चाय मंगाते
बार-बार मम्मीजी को ही,
बिस्तर से उठवाते।

दादा कहते गरम पकोड़े
खाने का मन होता,
नाम पकोड़ों का सुनकर
किस तरह भला मैं सोता।

दादी कहती पैर दुख रहे
बेटा पैर दबाओ,
हाथ दबाकर मुन्ने राजा
ढेर आशीषें पाओ।

शायद बने पकोड़े आगे
मन में गणित लगाता,
दादी के हाथों पैरों को
हँसकर खूब दबाता। 


पाकिट खर्च बढ़ा दो मम्मी

पाकिट खर्च बढ़ा दो मम्मी
पाकिट खर्च बढ़ा दो पापा
चित्र : राधिका शर्मा 
एक रुपये में तो पापाजी
अब बाज़ार में कुछ न आता।

एक रुपये में तो मम्मीजी
चाकलेट तक न मिल पाती
इतने से थोड़े पैसे में
भुने चने मैं कैसे लाती?

ब्रेड मिल रही है पंद्रह में
और कुरकुरे दस में आते
एक रुपये की क्या कीमत है
पापाजी क्यों समझ न पाते।

पिज्जा है इतना महंगा कि
तीस रुपये में आ पाता है
एक रुपया रखकर पाकिट में
मेरा तन मन शर्माता है।

आलू चिप्स पाँच में आते
और बिस्कुट पेकिट दस में
अब तो ज्यादा चुप रह जाना
रहा नहीं मेरे बस में।

न अमरूद मिले इतने में
न ही जामुन मिल पाये
एक रुपये में प्रिय मम्मीजी
आप बता दो क्या लायें?

मुझको खाना आज जलेबी
पेंटिंग : मिली भाटिया 
मुझको खाना रसगुल्ला
इतने से पैसों में बोलो
क्या मिल पाये आज भला।

तुम्हीं बता दो अब मम्मीजी
कैसे पाकिट खर्च चले
समझा दो थोड़ा पापाको
उधर न मेरी दाल गले।

कम से कम दस करवा दें
इतने से काम चला लेंगे
एक साल तक प्रिय मम्मीजी
कष्ट आपको न देंगे।
  • 12 शिवम सुंदरम नगर छिंदवाड़ा म. प्र.              

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