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रविवार, 6 जुलाई 2014

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 09-10, मई-जून 2014 

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।।किताबें।।

सामग्री : इस अंक में रतन चन्द्र रत्नेश के कहानी संग्रह 'झील में उतरती ठण्ड' की सुदर्शन वशिष्ठ द्वारा लिखित समीक्षा। 



सुदर्शन वशिष्ठ

छोटी कहानियों के माध्यम से बड़े अनुभव

     ‘‘झील में उतरती ठण्ड’’ रतन चंद ‘रत्नेश’ की सोलह कहानियों का संकलन है। अधिकांश कहानियां आकार में छोटी हैं। वास्तव में छोटी कहानी के माध्यम से बड़ी बात कहना अधिक कठिन रहता है। ऐसी कहानियों में फालतू की बात करने की गुंजाईश बहुत कम रह जाती है। किंतु इस चुनौती को रत्नेश ने सहजता से स्वीकार किया है।
     गांव का बदलता परिवेश हो या छोटे शहर के बड़े अनुभव; परिवारिक समस्या हो या दफ्तर का माहौल; बुजुर्गों की उपेक्षा हो या युवाओं की बेकारी; आज के माहौल का आतंक हो या समाज की विसंगतियां; सब विषयों को छूने का प्रयास किया गया है कहानियों के माध्यम से। 
     संग्रह की पहली दो कहानियां: बुजुर्गों के जीवन और मनोदशा को रेखांकित करती हैं। ‘वह चली गई तो’ एक वृद्ध दम्पति की कहानी है जिसमें वृद्ध खुद ही रखी हर चीज को भूल जाने का आदी हो गया है। कोई भी किताब, पत्रिका, चप्पल, ऐनक कहीं रखने पर वह अकसर भूल जाता है। उसे यह भी महसूस होने लगता है कि पत्नी उसकी कोई चीज ढूंढने के बजाय पड़ोसन को सूट दिखाने में ज्यादा रूचि लेती है। किंतु सुबह तौलिया, किताब, चश्मा अपनी जगह सहेजा हुआ देख कर उसे तसल्ली होती है। साथ ही यह चिंता भी सताने लगती है कि यदि पत्नी पहले चली गई तो वह अपनी शेष जिंदगी कैसे गुजारेगा! दूसरी कहानी ‘झील में उतरती ठण्ड’ जिस पर संग्रह का शीर्षक भी रखा गया है, एक शालीन बुजुर्ग की कथा है जो रोज झील के किनारे सैर करने आता है। ऐसे बुजुर्ग जो अपने समय में रोबीले और मस्तमौला रहे, अब पत्नियों की मृत्यु के बाद बच्चांे की उपेक्षा झेल रहे हैं। समय बिताना उनके लिए एक समस्या बन गई हैं। रोज सैर करते-करते अकसर उनसे जान पहचान भी हो जाया करती है। एक रिटायर्ड कर्नल जिसकी एक आलीशान कोठी है जो अब दोनों बेटों के नाम है। उससे आठ दस साल छोटा एक साथी जो हाई कोर्ट में समय बिताने की खातिर वकालत करता था, अचानक चल बसा। उसके कुछ समय बाद कर्नल साहब भी दोपहर की नींद के बाद उठ नहीं पाए।
     रतन चंद रत्नेश की कहानियां एक अप्रत्याशित और चमत्कारिक मोड़ पर आ कर रुकती हैं और यही इनकी विशेषता है। यहां दो कहानियों का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है। पहली कहानी ‘आपकी सुरक्षा में’ आज की संवेदनहीन व्यवस्था पर आधारित है जिसमें सभी अपने अपने में मस्त और व्यस्त हैं। समय पड़ने पर कोई सहायता के लिए आगे आने को तैयार नहीं। उधर समाजविरोधी तत्व रात को सामने सामने ही स्कूटर के अस्थिपंजर खोल कर ले जाने को आमादा हैं। स्कूटर मालिक और पत्नी घर की बत्ती जगा कर उन्हें भगाने के लिए खिड़की से चिल्लाते हैं किंतु वे आराम से बेख़ौफ, उनसे वर्तालाप करते हुए अपने काम में लगे रहते हैं। अपने मित्र दोस्तों के बाद पुलिस को फोन लगाने पर भी कोई सहायता नहीं मिलती। अंततः बेबसी में रोशनी बुझाने के ठीक पहले गली का आवारा कुत्ता बौंजो जिसे वे दूध रोटी देते थे, उन पर भौंकता है और देखते देखते गली के और कुत्ते इकट्ठा हो कर उन पर टूट पड़ते हैं। पड़ौसी व पुलिस की सहायता न मिलने पर चोरों का आवारा कुत्तों से डर कर भागना एक मारक घटना है।
     इसी प्रकार एक दूसरी कहानी ‘खेत में कणक’ में हरिया को बिस्तर में सोए हुए साथ के खेत में पशुओं के होने का आभास होता है। सुक्खे की कणक में गौंएं चर रहीं थीं। वह बिस्तर में लेटा हुआ इन्हें खदेड़ने से पहले कई विचार करता है। उसके मन में सामने खेत में चरती गौंओं  को देख सुक्खे की उसके प्रति बेरुखी और पड़ौसी धर्म की ऊहापोह मची रहती है। अंततः वह उन्हें भगा कर एक उदार विजयी भाव से निश्ंिचत हो पिछवाड़े दातुन करने लगता है तो दंग रह जाता है। उसका पूरा खेत गौंए चर चुकी थीं।
     ‘तीन दस्तक’ मोहन राकेश की कहानी की तरह चलती हुई ‘आपकी सुरक्षा में’ से मेल खाती है। ‘खोयी हुई आशा’ एक गूंगी महिला की कहानी है जो एबनॉर्मल होते हुए भी घर परिवार केा सम्भालती है। बड़ी लड़की के अस्पताल में भर्ती होने पर उसका छोटी लड़की सहित अकस्मात गुम हो जाना लापरवाह ड्राइवर पति का चिंता का कारण बनता है। एफ0आई0आर0 करवाने के बाद मुश्किल से अख़बार में विज्ञापन देने पर भी वह मिल नहीं पातीं। अंत में एक साधु के कहने पर कि वे दोनों उत्तर प्रदेश के एक मंदिर में है, पति पैसे जुटा कर वहां जाने की साध पालता है। ‘नशे में बहकी विदाई’ कहानी में विवाह के मौके पर शराब पी कर तरह तरह के विषयों पर चर्चा करते हुए मित्रों का सजीव चित्रण जीवंत भाषा में देखने को मिलता है।
     ‘एक गुमशुदा पुस्तक’ में मनुष्य की बहुत कुछ पा लेने की दमित इच्छा की कहानी है जिसमें मोदी को रद्दी वाले से किताब मिलती है जिसमें जो इच्छा करो, मिल जाने के नुस्खे लिखे हैं। वह दो करोड़ पाने की इच्छा करता है और मेल से आने वालों लाखों कराड़ों के धन को पाना चाहता है। अपने मित्र कुलकर्णी को किताब दिखा कर अपने मन की बात कहता है किंतु कुलकर्णी के जाने पर वह किताब उसे घर में नहीं मिल पाती। आजकल लोग किस तरह एक मृगतृष्णा को लिए जी रहे हैं, इस कहानी से स्पष्ट होता है।
     ‘अपने हिस्से की हवा’ में अपने चचेरे भाई के पास नौकर की तरह रहते एक बेकार युवक हिमांशु की व्यथा-कथा है जो रोज सुबह नाश्ता तैयार करने के बाद अख़बारों में आए विज्ञापनों के अनुसार नौकरी की तलाश में निकल जाता है। सामने के मकान से आती प्राणदायक मादक गन्ध से अपने फेफड़ों को भरता हुआ वह आज सुपरवाइजर की पोस्ट के लिए ‘ऑन द स्पॉट’ इंटरव्यू देने का मन बनाता है। यह आधुनिक क्लिनिक खानदानी वैद्य का था जिसमें अब खानदानी बैद्य की आदमकद फोटों के साथ  अतिआधुनिक स्वागत कक्ष था। यहां आ कर लगा कि आज लगभग नव्वें प्रतिशत लोग गुप्त रोगों से पीड़ित हैं और कई सामान्य रोग भी गुप्त रोगों की श्रेणी में आते हैं। उस का बायोडेटा एक पर्ची पर ले कर लम्बे इंतजार के बाद भी इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया जाता और अंत में घर में सूचना देने की घोषणा कर दी जाती है। बाहर आने पर उसे तसल्ली होती है इस भागमभाग में वह अकेला नहीं है।
     ‘कथा कोलाज’ में गांव की बदलती तसवीर पेश की गई है जिसमें एक सूखती नदी पर भव्य भवन बनाए जाने उल्लेख है जबकि गांव में बहती नदीं ख्वाजा पीर की होती थी। यह नदी या खड्ड भी कभी हरहराती थी, अब इस पर एक स्टोन क्रशर भी लग गया है। अमरो तायी द्वारा सुनाई परदेसी की दुकान और बाज पण्डित की कथा अब लोक कथा बनती जा रही है और खड्ड में धीरे धीरे कई मकान और दुकानें बनती गईं। गांव में अब कोई गाय न पाल कर भैंस ही पालता है। गांव वालों द्वारा अवारा छोड़ी गई गायों का ट्रेक्टर में डाल कर दूर छोड़े के लिए हर घर से दस दस रूपए इकट्ठा किए जाते हैं और लड़के रात को शराब के अहाते में लड़के नशे में डूब कर गाते हैं।
     ‘उन्हें आंसू दिखाई नहीं देते’ आज की हड़ताली परंपरा की कहानी है जिसमें गरीब लक्ष्मी अपने बेटे के दिल का वाल्व बदलाने के लिए अस्पताल की कुव्यवस्था का शिकार होती है। ऑप्रेशन का समय आने पर अचानक कर्मचारियों की हड़ताल हो जाती है जिस के कारण सभी मरीज असहाय से पड़े हुए मृत्यु से जूझते रहते हैं और कईयों की हालत नाजुक हो जाती है। ‘आग में तपा सोना’ एक ऐसी विधवा की कहानी है जो अपनी बेटी की खातिर दो बच्चों के बाप एक विधुर प्रोफेसर से दूसरा विवाह करने को राजी हो जाती है। विवाह के बाद उसकी बेटी से अच्छा व्यवहार नहीं होता अतः अपनी बैंक की नौकरी के सहारे पुनः अकेली रहने को विवश हो जाती है।
     जैसाकि पहले कहा गया, रत्नेश के इस संग्रह में छोटी कहानियां अधिक हैं। ऐसी कुछ कहानियां प्रसंग मात्र है तो कुछ अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहती हैं। ‘पहचान तो हैं’, ‘अब कहीं और नहीं’, बहुत बड़ा काम’, ‘बापू तां आ नहीं सकदे’ ऐसी ही छोटी कहानियां हैं जिनमें अफसर तन्त्र, पारिवारिक विद्रुपदाएं, दफतर संस्कृति पर रेखाचित्र खींचे गए हैं। नौकरी में पद की दूरी को किनारे रख जो एक आपसी नजदीकी बनती है वह बड़ा अधिकारी बनने पर कैसे पुनः दूरी में बदल जाती है या आज दफतरों में देरी से आने, चाय पीने या खाना खाने, क्रिकेट की चर्चा करने का काम ही किया जाता है; इसका चित्रण छोटी कहानियों में किया गया है। ‘बापू तां आ नहीं सकदे’ कहानी में एक बच्चे के जीवट का चित्रण कहानी को सजीव बनाता है। नाई द्वारा जैसे तैसे लापरवाही में टिंड में बदले उसके बाल, मैले कपड़े उसके अभावों से भरे जीवन को दर्शाते हैं मगर मां की बीमारी पर उसका बाप से मिलने जाने का जीवट एक गहरा प्रभाव छोड़ता है।
      कुल मिला कर संग्रह की कहानियां एक प्रभाव छोड़ने में समर्थ हैं। लेखक की अपनी एक शैली है। ‘जैसे कोई बुत बोल उठा’, ‘हिन्दी के अख़बारों में नौकरियां कम होती है, छोकरियां अधिक’, ‘आवाज बेकार वस्तुओं की तरह नीचे टपकती है’ जैसे वाक्यांश लेखक की परिपक्व शैली को दर्शाते हैं। कहानियांे में स्थानीय बोली व पंजाबी का प्रयोग बोझिल नहीं लगता अपितु इन्हें प्रभावी बनाता है।
झील में उतरती ठण्ड :  कहानी संग्रह। लेखक : रतन चंद ‘रत्नेश’। प्रकाशक :  अक्षरधाम प्रकाशन, करनाल रोड़ कैथल (हरि0)। मूल्य: रु.160/- । संस्करण: 2013 

  • ‘‘अभिनंदन’’, कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला-171009, हि.प्र.

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