आपका परिचय

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

अविराम विस्तारित

। । सामग्री। । 
अविराम विस्तारित  :  डॉ. प्रेम कुमार की  एक लघुकहानी 

।।कथा कहानी।।

डॉ. प्रेम कुमार
महाबली

    गाँव भर में अब वह अकेला महाबली था। उसका एक जिगरी दोस्त था। लोग उसे महाबली का पिल्ला कहते थे। दोनों की ऐसी धाक कि बैंक, अस्पताल, स्कुल, पंचायत, थाना, कचहरी- सब उसके सामने दण्डवत होने लगें, इशारों पर नाचें! खाने-पीने, जीने-मरने, लिखने-पढ़ने, लड़ने-भिड़ने की हर चीज पर उनका अधिकार! बिना पेटेंट कराए हर चीज के सर्वाधिकार उनके पास सुरक्षित! तमाम तरह की दुकानों-फैक्टरियों के मालिक वे, उनके परिवारीजन-रिश्तेदार या फिर उनके चेले-चण्टारी! रुतबे की हद यह कि उनकी दुकानों से खरीदे माल से भले कोई बीमार हो या मर जाए- क्या मजाल कि कानून उस ओर निगाह भी उठा सके अपनी। इससे भी बड़ी बात यह कि उनसे न खरीदा गया सब कुछ रातों-रात ज़हर बना-बता दिया जाता और उसे घातक-मारक सिद्व भी करा दिया जाता। खरीदने और बेचने वालों पर चाहे जहाँ अभियोग लगता, मुकदमा जहाँ कहीं भी चलता- पर दण्ड हमेशा महाबली की इच्छा क अनुसार ही दिया जाता।
   महाबली के हर शब्द, हर कार्य को अनूठा, मौलिक, दिव्य या अपरिहार्य ठहराने वाले सिद्धों, महंतों, ज्ञानियों, मुल्लाओं की भी पूरी एक फौज थी। महाबली के अहसानों में गले-गले तक डूबे ये लोग अपने आका की आँखों के इशारे को समझकर जब जो करते-कहते, वो सब उनके ब्याज चुकाने जैसा होता। इसी सबके चलते किसी की मजाल नहीं थी कि महाबली या उनके पिल्ले की अनुमति के बिना कोई छींक या डकार भी ले सके। पिल्ले की नमकहलाली का आलम यह कि बिन बाँधे भी प्रतिपल महाबली के साथ। महाबली के सब कुछ को मानवीय, लोकतान्त्रिक, न्यायसंगत बताने-ठहराने के लिए रात-दिन ऐसी भौं-भौं कि न फिर गले में खराश की चिन्ता, न गले में खून आ जाने की फिक्र! जानवर चुराए जाएँ या आदमी, फसल कटे-जले या जमीन पर कब्जा हो, हत्या हो या बलात्कार- ये लोग पीड़ित के भी साथ होते और अभियुक्त के भी। रिपोर्ट लिखाने के लिए उनकी सिफ़ारिश ज़रूरी होती और बरी होने के लिए उनका धन और समर्थन! हत्यारों के हथियार उन्हीं से खरीदे गये होते और कफ़न -दफ्न का सामान भी उन्हीं की दुकानों से लाया जाता। उनका सूचनातंत्र इतना प्रभावी और संवेदी कि जो जैसा वो चाहते, लोगों को वही और वैसा खाना-पीना, करना-सोचना और बोलना पड़ता!
   इतने सबके बावजूद कुछ ऐसा था कि उनके दिल की फाँस की चुभन, आँखों में की जलन और किरकिराहट कभी खत्म ही न होती। दरअसल उस गाँव में चंद सिरफिरे थे जो अपनों के बीच बातों-बातों में कुछ कह-पूछ लिया करते थे। मसलन वे पूछते कि तमाम तरह से मरने-खपने के बाद भी सारा ये गाँव रोजी-रोटी या दवा-दारू के लिए महाबली का मुँहदेखा या मोहताज क्यों है! कौन नहीं जानता कि महाबली ने अपने हाथ से टूक तक नहीं तोड़ा। महनत-मजदूरी से कुछ कमाने-बनाने का तो सवाल ही नहीं है। सस्ता खरीदा, अपनी मुहर लगाई, मनमानी कीमत पर बेचा। दलाली, चौथ वसूली, धौंसपट्टी, दादागीरी का धंधा अलग से। देखते-देखते सबसे बड़ा और अमीर बन बैठा! जो जरा तना, उसके बाल-बच्चे गायब या उसका काम तमाम! कुछ और नहीं तो जाँचों और कोर्ट-कचहरी में ऐसा फंसा दिया कि उस पर न जीते बने और न मरते! ऐसे में सवाल और बातें जब महाबली और उसके दोस्त तक पहुंचती तो उनकी आँखें लाल-पीली हो उठतीं, मुट्ठियाँ कस जातीं और दाँत किटकिटाकर बजने लगते।
   कुछ ही दिन बीते थे कि गाँव में यह सिलसिला शुरू हुआ। शाम होते ही किसी एक गली या मुहल्ले में शामियाना तनता, तख्त छिता। लाइट, माइक और खान-पान की व्यवस्था की जाती। पूरी तैयारी के बाद महाबली दोस्त के साथ मंचासीन होते। मालाएँ पहनाने की होड़ लग जाती। तने-ऐंठे-से महाबली खड़े होते! सन्नाटा छा जाता! महाबली का बोलना शुरू होता- ‘आतंकवाद को दुनियाँ से मिटाना है। लोकतन्त्र स्थापित करना है। मानवता के दुश्मनों का खात्मा करना है।’ खूब सिर हिलत, देर तक तालियाँ बजतीं। तकरीर की लम्बाई और रूखेपन पर ध्यान दिये बिना भीड़ खामोश बैठी महाबली को सुनती रहती। महाबली के बाद उनका दोस्त अपना राग अलापना शुरू करता- ‘महाबली से बेहतर न कभी हुआ है, न हो सकता है। जो महाबली के साथ नहीं हैं वो शांति के दुश्मन हैं, लोकतन्त्र के हत्यारे हैं।’ भीड़ हो-होकर हँसने लगती। तालियाँ और जोर से अधिक देर तक बजती रहतीं। यह सब इसलिए कि भीड़ में शामिल हर शख्स ने मान रखा था कि यह सब गाँव के उन चंद सिरफिरों के लिए कहा गया है, जो यहाँ उपस्थित नहीं हैं। उन्हें खतरा नहीं है। तब तो और भी नहीं जब वो हँस भी रहे हैं, तालियाँ भी बजा रहे हैं और फूल-मालाएँ भी पहना रहे हैं।
   उन्हीं दिनों में से एक की एक सुबह महाबली के दोस्त की भौं-भौं की उस अजीबोगरीब आवाज़ ने गाँव भर को अँधेरे में ही जमा दिया। भाग-दौड़ कर महाबली के द्वार पहुँची भीड़ ने देखा कि महाबली चिंतित-शोक में डूबे से चुप खड़े हैं और उनका दोस्त भौंखे जा रहा है। पूरी भीड़ ने महाबली की मुद्रा अपना ली। देर बाद मालूम हुआ कि आज महाबली के दरवाजे द्वार पर ऐ चूहा मरा पड़ा मिला है। सुनकर लोग सन्न! तमाम तरह के शक, संदेह, अनुमान! जरूर कोई साजिश है, किसी ने दुश्मनी निकाली है। चूहे की अर्थी सजी। भीड़ में से लोगों ने बारी-बारी से उसे कंधा दिया। सबसे आगे महाबली, उनके पीछे उनका दोस्त, उसके पीछे अर्थी और उसके पीछे जो भी थी वो भीड़! उस रोज़ गाँव में न कोई चूल्हा जला, न कोई अपने किसी काम को गया। पर उससे अगली-अगली, फिर अगली सुबह- और अगली सुबह! किसी न किसी की गाय, भैंस, बकरी खूँटे से बँधी मृत मिलने लगी। गाँव बदहवास, आतंकित! हैरान-परेशान महाबली के दरबार में अपने दो हिस्ट्रीशीटर ज़हरखुरान गुर्गों के साथ दोस्त की अध्यक्षता में महाबली ने एक जाँच कमेटी बनाई। रिपोर्ट मिलने पर तीन दिन में दोषी को दंडित किए जाने की घोषणा भी कर दी।
   तीन दिन तक जब कुछ न हुआ तो चौथे दिन लोग फिर महाबली की शरण में जा पहुँचे! उस दिन केवल दो लोगों को अन्दर आकर महाबली से मिलने अनुमति मिली। धूप में बाहर देर तक खड़ी भीड़ पसीने-पसीने होती रही। घंटों बाद जब वो दो लोग बाहर आए तो उन्होंने बताया कि दोषी का पता चल गया है। जन-हित में नाम उजागर नहीं किए जा सकते। तैयारियाँ जारी हैं। अपराधियों को जल्दी ही दण्ड मिल जायेगा। जय-जयकार करती भीड़ ने अपने घरों की ओर रुख किया। लोग घर तक पहुँचे भी नहीं थे कि कुछ गिराने-ढहाने की आवाजें सुनाई दीं। तेज चाल पहुँचे तो दंग- दस-पन्द्रह आदमी कुदालों-फावड़ों से कुछ घरों को मिस्मार करने में जुटे हैं। घंटों के बाद भी नतीजा सिफ़र! भीड़ चिल्लाने-बौखलाने लगी। शोर से पास छाया में खड़े महाबली को परेशान हुआ देख उनके दोस्त ने जैसे कान में एक मंत्र फूँका- ‘हशीश, हैरोइन या सोने की तरह ज़हर भी तो देह में छिपाया जा सकता है। प्रमाण जुटाने के लिए कुछ लोगों के गले-पेट रेतने-चीरने पड़ सकते हैं। सुबूत बिना अभियुक्त दंडित नहीं होगा। दंड बिना आतंकवाद खत्म नहीं होगा। आतंकवाद के खात्मे के बिना न शांति स्थापित हो सकेगी, न लोकतन्त्र। दोस्त की बुद्धिमानी पर महाबली प्रशन्न हुए। उनकी आज्ञा होते ही भीड़ भी उन लोगों की तलाश में जुट गई, जिनकी देह में ज़हर के छिपा होने का संदेह था। इसका कोई मतलब नहीं कि संदेह केवल उन चंद सिरफिरों पर ही था- जो न अपने होंठ सीं सकते थे और न अपने गले और पेट को अपने जिस्म से अलग कर सकते थे।
  • कृष्णा धाम कॉलोनी, आगरा रोड, अलीगढ़ (उ.प्र.)


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