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रविवार, 30 सितंबर 2012

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 2,  अंक : 1,  सितम्बर  2012


। विमर्श 

सामग्री :  समकालीन लघुकथा  के सन्दर्भ में  प्रेमचंद की लघु कथा रचनाओं पर दो आलेख- 'प्रेमचंद बनाम समकालीन लघुकथा' / डॉ. अशोक भाटिया एवं 'कुछ रचनाएँ अच्छी लघुकथाएँ' / डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ



हाल ही में प्रेमचंद के समकालीन लघुकथा में योगदान पर लघुकथा के वरिष्ठ हस्ताक्षर एवं चिंतक डॉ. बलराम 
अग्रवाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘समकालीन लघुकथा एवं प्रेमचंद’ प्रकाशित हुई हैं। इस पुस्तक में प्रेमचंद की लघु आकारीय चौदह कथा रचनाएं, जिनकी चर्चा लघुकथा में उनके योगदान के सन्दर्भ में बहुधा की जाती है, के साथ उनकी इन रचनाओं के लघुकथा के सन्दर्भ में मूल्यांकन तथा लघुकथा के विकास के सन्दर्भ में प्रेमचंद के योगदान पर केन्द्रित उन्तीस वरिष्ठ साहित्यकारों के आलेख संकलित हैं। इस पुस्तक में लघुकथा में प्रेमचंद के योगदान पर गम्भीर चर्चा तो हुई ही है, लघुकथा-समालोचना के कई आयाम भी खुलकर सामने आए हैं। इसी सन्दर्भ में उक्त पुस्तक से दो आलेख हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।


डॉ. अशोक भाटिया



प्रेमचंद बनाम समकालीन लघुकथा

    कथा सम्राट प्रेमचंद अपने उपन्यास और कहानियों के कारण प्रसिद्ध हैं। उन्होंने लघुकथा के शिल्प में भी बीसेक रचनाएँ लिखी हैं, उनमें से निम्नलिखित सात लघुकथाओं पर समकालीन लघुकथा के संदर्भ में बात की जानी जरूरी है- बाबाजी का भोग, गुरुदेव, राष्ट्र का सेवक, बंद दरवाजा, ठाकुर का कुआँ, यह भी नशा, वह भी नशा। (सम्भवतः इस सूची में तीसरे क्रम पर ‘गमी’ का नाम छूट गया है) इन्हें इनके प्रकाशन वर्ष के क्रम में रखा गया है।
    उपर्युक्त सभी लघुकथाएँ समकालीन लघुकथा की तरह यथार्थवादी परंपरा की रचनाएँ हैं। जिस दौर में प्रेमचंद ने नायक सूरदास के सच और अहिंसा के आदर्श को गाँधीवादी धरातल पर स्थापित करने वाला उपन्यास ‘रंगभूमि’ (1925) लिखा, उस दौर में ‘बाबाजी का भोग’ जैसी बाबाओं के पाखंड को पेश करती लघुकथा लिखी। वे भाषा के प्रति सचेत थे- यह उनकी ‘गुरुमंत्र’ लघुकथा को पढ़कर स्पष्ट होता है, जिसमें पंडित मोटेराम शास्त्री, पंडित चिन्तामणि को बाबाओं की भाषा सिखलाते हैं। बाबाओं के पाखंड का एक नया पहलू उघेड़ती यह लघुकथा ‘बाबाजी का भोग’ लघुकथा को और बल प्रदान करती है। समकालीन लघुकथाकार इन रचनाओं से भाषा की अमीरी और बारीकी का अध्ययन कर सकते हैं।
    ‘गमी’ लघुकथा का प्रकाशन काल (1929) हटा दें तो यह आज की लिखी रचना लगती है। यही स्थिति ‘राष्ट्र का सेवक’ (1930) की है। दोनों रचनाएँ क्रमवार समकालीन सामाजिक और राननीतिक यथार्थ में एक बड़ी दखलंदाजी करने वाली छोटे आकार की रचनाएँ हैं। ‘बंद दरवाजा’ बाल मनोविज्ञान की सहज प्रभावशाली लघुकथा है। आज के कुछ लघुकथा समीक्षक ‘सन्देश देने की जरूरी शर्त मानते हुए’ इस लघुकथा की रचनाशीलता को सीमित कर रहे हैं। इस कसौटी को मान लेने पर जीवन और रचना में, इस तरह फर्क आ जाएगा कि जीवन के बहुत सारे पहलू रचनाओं में नहीं आ सकेंगे। ऐसे समीक्षकों को ‘बंद दरवाजा’ रचना कई बार पढ़नी चाहिए, जो लेखक को कुछ और स्पेस देने की वकालत करते हैं।
    ‘ठाकुर का कुआँ’ लघुकथा अपने कथानक के मुताबिक अपना रूप बनाती है और जैसे समकालीन लघुकथाओं (1971 के बाद की) को एक चुनौती देती है। ‘ठाकुर का कुआँ’ रचना आज के किसी लेखक द्वारा लिखी गई होती, तो शायद इससे आधी जगह में लिखी जाती, उसमें जोखू की ओर से (प्रसंग आने पर) ब्राह्मण, ठाकुर और साहूकार के बारे में कही गई बातों को स्थान न दिया गया होता। ठाकुर के कुएँ पर इकट्ठे हुए पाँच-दस बेफिक्रों की बातें अनावश्यक विस्तार मानकर छोड़ दी जातीं। कुएँ की मुंडेर की ओट में बैठी गंगा के विद्रोही दिल में उठे विचार (जो इस रचना को विशेष ताकत देते हैं) तो लघुकथा लेखक के लिए बिल्कुल भर्ती का माल होते। इसी प्रकार कुएँ पर आई दो औरतों की बातचीत (जो बड़े घरों की औरतों की बुरी हालत दर्शाती हैं) भी इस काल लघुकथा लेखक की लघुकथा में शामिल होने की योग्यता न रखतीं। तो फिर बाकी क्या बचता है? साफ-स्पष्ट जोखू-गंगी के संवाद, फिर ठाकुर के कुएँ पर पानी लेने जाना और पानी खींचना, ठाकुर के घर का दरवाजा खुलना और गंगी का बिना पानी लिए भाग आना। तब इस रचना में से रचनात्मकता के बहुत सारे सूत्र निकल जाते। दरअसल- ‘ठाकुर का कुआँ’ में दो दृश्य हैं। एक घर का, दूसरा कुएँ का। इस कारण भी लघुकथा प्रेमी (लेखक और समीक्षक) इसको लघुकथा नहीं मानेंगे। कुछ इस प्रकार के आकार पर भी आपत्ति कर सकते हैं। इतना तय है कि ऊपर बताए गए प्रसंग ही सही मायने में गहराई लाते हैं। इस लघुकथा के प्रकाश में आज के लघुकथा लेखकों और आलोचकों को नए सिरे से वर्तमान लघुकथा की रचनाशीलता पर फिर से विचार करना चाहिए।
    इसी प्रकार मुंशी प्रेमचंद के आखिरी दौर की रचना ‘यह भी नशा, वह भी नशा’ (1937) दो पात्रों की एक-उद्देशीय, पर दो दिनों में फैली एक-एक घटना को इस सहजता से प्रस्तुत करती है कि मिस्टर बुल के सामने राय साहिब की गलत सोच व्यंग्य की धार से स्पष्ट हो जाती है और पाठक को सोचने के लिए विवश कर देती है।
    इन सब (सात) रचनाओं में हमें ज़िंदगी की जो धड़कन सुनाई देती है, वह महत्वपूर्ण हैं। इसके अंदर की गहरी संवेदना में हमें से गुजरने के बाद, शिद्दत से अनुभव किए गए और उभारे गए ज़िंदगी के जो सवाल हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। इसलिए उनको उभारने के लिए इन रचनाओं की जो शैली है, उस पर आज के लघुकथा-लेखकों को विचार करना चाहिए और उसमें से अपनाने वाले पहलुओं को स्वीकार करना चाहिए। 
  • 1882, सेक्टर-13, अरबन स्टेट, करनाल-132001 (हरियाणा)



डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ

कुछ रचनाएँ अच्छी लघुकथाएँ

     निश्चय ही प्रेमचंद की कुछ रचनाएँ ‘लघुकथा’ मानी जा सकती हैं। लघुकथा के लिए अपरिहार्य- स्पष्ट विजन, संवेदनात्मक छुअन और सुगठित संरचना से युक्त लघु आकार-सरीखी विशेषताएँ उनकी ‘राष्ट्र का सेवक’, ‘बंद दरवाजा’ शीर्षक रचनाओं में विद्यमान हैं। ‘राष्ट्र का सेवक’ कथनी और करनी के कंट्रास्ट में जिस विडंबना को रेखांकित करती है, वह आज के समय और समाज का सच भी है। इंदिरा का प्रेम दोगले आचरण की भेंट चढ़ जाता है और इस त्रासदी को प्रेमचंद ने व्यंग्य की तीक्ष्णता से और सघन कर दिया है। ‘बंद दरवाजा’ एक खूबसूरत लघुकथा है। बालमन की विभिन्न मनःस्थितियों का यथार्थ-चित्रण तो इसमें संवेदनात्मक   धरातल पर है ही, इसकी भाषा और सुगठित संरचना भी देखने योग्य है। वर्तमान में लिखी जा रही बहुत कम लघुकथाएँ मनोवैज्ञानिक घात-प्रतिघात को लघुकथा के मुहावरे में सफलता से संप्रेषित कर पाई हैं। वर्तमान लघुकथाओं की एक बड़ी संख्या ‘राष्ट्र का सेवक’ के-से व्यंग्यात्मक तेवर में रचित हैं। ‘बाँसुरी’, ‘दरवाजा’ आदि रचनाएँ आकार में छोटी होते हुए भी लघुकथा नहीं हैं। बाँसुरी तो एक कहानी का अंतिम पैरा मात्र है ही, ‘दरवाजा’ मानवीकरण के माध्यम से कुछ स्थितियों-मनःस्थितियों का बयान भर है। इसमें बिखराव है और इसकी प्रतीकात्मकता संप्रेषण में बाधक बनती है। ‘बाबाजी का भोग’, ‘गुरुमंत्र’ और ‘गमी’ जैसी रचनाओं को आसानी से व्यंग्य-विधा के खाते में रख सकते हैं। लघुकथा की कसावट लगभग इनमें अनुपस्थित है। ‘शादी की वजह’ तो व्यंग्यात्मक निबंध है ही। ‘यह भी नशा, वह भी नशा’ का विजन स्पष्ट है, लेकिन दो स्थितियों के कंट्रास्ट में जो कुछ बयान किया गया है, उसमें संक्षिप्तता और सुगठित रचना का स्पष्ट अभाव-सा है। ‘ठाकुर का कुआँ’ को कभी लघुकथा माना गया, ऐसा याद नहीं आता। बल्कि ‘जुर्माना’ कहानी का नाम अवश्य लिया जाता रहा है। ‘बीमार बहन’ में लघुकथा का आभास है। इसमें संवेदनात्मक मर्मस्पर्शिता है लेकिन ‘विजन’ के अभाव में यह एक करुण गद्यचित्र बन कर रह गई है।
    आज की लघुकथाओं में व्यंग्य का उपयोग बहुत सर्जनात्मक रूप में होता है। अनेक लघुकथाएँ वर्तमान विद्रूप और विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक प्रहार करती हैं। यह प्रहार-कर्म आवश्यक है। प्रेमचंद की ‘राष्ट्र का सेवक’, ‘कश्मीरी सेब’ आदि रचनाओं में व्यंग्यात्मक चुभन है, लेकिन ‘कश्मीरी सेब’ में व्यंग्यात्मक प्रभाव बिखरा हुआ है। इस तरह का बिखराव अर्थात व्यंग्य-कथन का रचना के कथ्य से संश्लिष्ट न होना आज के अच्छे लघुकथा-लेखकों को काम्य नहीं है। फालतू विवरण या स्फीति से बचा जा सकता है। चूँकि लघुकथाकार की दृष्टि चिड़िया की आँख पर होती है अतः बाग, पेड़, डाली आदि के ब्यौरे उसकी दृष्टि में निरर्थक होते हैं। वर्तमान लघुकथाओं में ‘आलोचनात्मक यथार्थवाद’ विशेष रूप से द्रष्टव्य है और सकारात्मक मूल्यबोध को स्वीकारने के बावजूद ‘आदर्शवाद’ करीब-करीब खारिज कर दिया गया है। अतः प्रेमचंद की ‘देवी’ रचना में जो आदर्श वेष्टित नारी चरित्र है, वह वर्तमान लघुकथाओं के कुछ काम का नहीं लगता।
    लेकिन आज का हिंदी लघुकथा-लेखक प्रेमचंद की ‘बंद दरवाजा’ जैसी लघुकथा से बहुत कुछ सीख सकता है- ‘कथ्य’ के चुनाव से लेकर उसकी प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति का कौशल तक। नए लेखकों और पुराने धुरंधरों को भी प्रेमचंद की कई लघुकथाएँ और कुछ लघुकथानुमा रचनाएँ कथ्य-शिल्प की संश्लिष्टता, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और तीक्ष्ण किंतु प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति आदि कई संदर्भों में प्रेरित-प्रोत्साहित कर सकती है।
  • डी-131, रमेश विहार, ज्ञान सरोवर, अलीगढ़-202001 (उ.प्र.)

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