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गुरुवार, 29 अगस्त 2013

बाल अविराम

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष :  2,  अंक : 11-12 ,  जुलाई-अगस्त  2013

।।बाल अविराम।।

सामग्री : श्रीमती मनीषा सक्सेना की बालकथा 'सर्वश्रेष्ठ उपहार', आरुषि ऐरन, सक्षम गंभीर व  राधिका शर्मा के साथ। 



मनीषा सक्सेना





सर्वश्रेष्ठ उपहार

     कस्तूरबा गांधी राजकीय माध्यमिक स्कूल में शिक्षक दिवस की तैयारी चल रही थी। पिछले कुछ सालों से उनके प्राचार्य महोदय यह देख रहे थे कि बच्चे शिक्षक दिवस पर बाजार से कार्ड, पेन, पुस्तकें इत्यादि खरीदकर ले आते थे और शिक्षकों को भेंट करते थे। उन्होंने सभी शिक्षकों को बुलाया और कहा, ‘‘बच्चों को स्वावलंबी होने की शिक्षा दीजिये और अपने आप कुछ बनाने की प्रवृत्ति को प्रेरित करिये। शिक्षक दिवस पर जो भेंट देने की प्रवृत्ति बच्चों में बढ़ती जा रही है, यह गलत है। इसमें आपकी भी जिम्मेदारी है कि आप इसे रोकें।’’
    बच्चों के प्रिय शिक्षक श्री कृपाशंकर जी ने गत वर्ष ही शिक्षक दिवस वाले दिन अपनी कक्षा के बच्चों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘इस बार तो ठीक है, पर अगले साल कोई भी बच्चा बाजार का बना या बाजार से खरीदा उपहार नहीं लायेगा। जो भी उपहार मुझे देना चाहता है वह अपने-आप बनाकर लायेगा और जो उपहार मुझे सर्वश्रेष्ठ लगेगा, उसे पुरस्कार मिलेगा।
चित्र : सक्षम गंभीर 
     बच्चे बहुत उत्साहित हैं। आठवीं कक्षा के छात्र-छात्राएं अपने प्रिय शिक्षक श्री कृपाशंकर जी को सबसे अनमोल उपहार देने की सोच रहे थे। हर बच्चा अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ उपहार देना चाहता था। बच्चे तो आखिर बच्चे थे। कुछ दिखाते, कुछ छुपाते थे, पर दूसरा क्या बना रहा है उस पर ध्यान जरूर रखने की कोशिश करते थे।
     ज्यादातर बच्चों ने कार्ड बनाये और गुरुजी के सम्मान में कविताओं की कुछ पंक्तियाँ लिखी थी। कइयों ने पोस्टर बनाये थे; कुछ ने कार्टून, कुछ ने बड़े लोगों के पेंसिल स्केच तो किसी ने पेंटिंग्स बनाई थी। कुछ बच्चों ने हस्तकला में पुरानी चूड़ियों, कागज की कतरनों, सींकों, सीप-शंख से नायाब कलाकृतियाँ बनाई थीं। हर बच्चा दूसरे से बढ़कर काम करना चाहता था। संगीत प्रेमी बच्चों ने नये-पुराने गीतों को मिलाकर गीतों का फ्यूजन बनाया तो कोई पुराने गीतों का ही रियाज कर रहा था। एक बच्चे ने कृपाशंकर जी की विभिन्न मुद्राओं की फोटोस जमा कर कोलाज बनाया था। कुछ बच्चों ने उनके पढ़ाने के ढंग,
चित्र : राधिका  शर्मा 
बोलने-चालने, उठने-बैठने की विशेषताओं को दर्शाते हुए उनके भाषणों की नकल पर मोनोएक्टिंग दर्शायी। कुछ लड़कियों ने अपनी कढ़ाई, रुमालों पर दिखाई; तो कुछ ने रिवन से विशिष्ट फूलों का निर्माण कर गुलदस्ता तैयार किया। कुछ बच्चों ने गुलदावदी, गेंदा, तुलसी, फूलदार पौधे गमले में उगाकर तैयार किये।

    शिक्षक दिवस वाले दिन सब बच्चे अपने-अपने उपहार गुरुजी को देते और गुरुजी सबके उपहारों को सराहते हुए कहते- अरे वाह! बहुत अच्छा, अति सुन्दर, बेहतरीन, लगे रहो, शाबाश जैसे विशेषणों से बच्चों को प्रोत्साहित करते। बच्चों द्वारा तैयार कार्यक्रमों का भी सबने मजा लिया, कहानी, नाटक, जादू का खेल, मोनोएक्टिंग दिखाकर प्रशंसा बटोरी।
    अंत में एक छात्र मणि, दुबला पतला सा गुरुजी के पास आया और बोला, ‘‘मैं जो उपहार आपको देना चाहता हूँ, वह मैं यहाँ नहीं ला सकता। आपको मेरे साथ वहीं चलना होगा, जहाँ मैंने उसे रखा है। गुरुजी के साथ बच्चे भी चकित हो गये। ऐसा कौन सा उपहार है जो यहाँ लाया नहीं जा सकता! खैर, गुरुजी सहर्ष तैयार हो गये। उनके साथ कक्षा के दस-बारह छात्र-छात्रायें भी चल दिये। मणि उनको स्कूल के पिछवाड़े में ले गया, जहाँ थोड़ी ऊबड़-खाबड़ जमीन थी। पर यह क्या! वहाँ 10 फीट ग 10 फीट का चौरस था, जिसके बीच में गोला बना था। चौरस के चारों किनारों पर क्यारियां बनी थीं। एक में सदाबहार, दूसरी में गेंदा, तीसरी में गुलदावदी व चौथी में रजनीगंधा व बेला लगा था। बीचोबीच में सावनी का पौधा लगा था, जिसमें सफेद फूल थे। कोने में छौटा सा गड्डा था, जिसमें पानी में कमलिनी खिली थी। सबके मुँह से निकला, ‘‘वाह मणि!’’
चित्र : आरुषि ऐरन 
    गुरुजी के पूछने पर उसने बताया, ‘‘पिछले साल शिक्षक दिवस पर जब आपने कहा था कि सब बच्चे अपने-आप बनाकर कुछ लायेंगे, तभी मैंने स्कूल की क्यारी में से पौधे एक क्यारी में रोपे और फिर बड़े होने पर क्यारियों में लगाये व बड़े किये। माली काका ने ही मुझे यह आइडिया दिया। रोज स्कूल खत्म होने के बाद मैं यहाँ दो घंटा काम करता था।
    गुरु कृपाशंकर जी ने उसे गले से लगाया, फिर बोले, ‘‘आज का सबसे अच्छा उपहार मुझे यही लगा है, क्योंकि-
1. मणि ने मेरी बात सबसे ज्यादा ध्यान से सुनी और उस कार्य के लिए साल भर मेहनत की।
2. प्राप्त साधनों का उपयोग करके अपने उपहार को संवारा।
3. साल भर तक कठिन परिश्रम किया।
4. उसने मुझे सच्चे शिष्य का सर्वश्रेष्ठ उपहार दिया, जिससे आज मैं बहुत गौरान्वित महसूस कर रहा हूँ।
    गुरुजी की आँखों में खुशी के आँसू थे।

  • द्वारा डॉ. चंद्रदीप सक्सेना, जी-17, बेलवेडियर प्रेस कंपाउन्ड, एलनगंज, इलाहाबाद-211002, उ.प्र.

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