आपका परिचय

बुधवार, 4 मार्च 2015

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 4,   अंक  : 05-06,   जनवरी-फ़रवरी 2015


।। कथा प्रवाह ।।

सामग्री :  इस अंक में ‘पड़ाव और पड़ताल’ के पांचवें खण्ड से सर्वश्री अशोक लव, दीपक मशाल, बलराम, राजकुमार गौतम, डॉ. सतीशराज पुष्करणा व श्री हरनाम शर्मा;  ‘हौसला’ संग्रह  से श्री मधुकांत की तथा अन्य में श्री दिलीप भाटिया, सुश्री पुष्पा जमुआर, श्री किशन लाल शर्मा व श्री राजेन्द्र प्रसाद यादव की लघुकथाएँ। 


पड़ाव और पड़ताल-खण्ड 5 संकलन से कुछ लघुकथाएँ 

{सुप्रतिष्ठित लघुकथाकार एवं दिशा प्रकाशन के संचालक श्री मधुदीप जी द्वारा संयोजित लघुकथा संकलन श्रंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ के पांचवें खण्ड का सम्पादन स्वयं मधुदीप जी ने किया है। पूर्व खण्डों की भांति इस खण्ड में भी छः लघुकथाकारों की 11-11 लघुकथाएं, उन लघुकथाओं पर अलग-अलग समीक्षकों की समीक्षाएँ, सभी 66 लघुकथाओं पर एक समालोचक का समालोचनात्मक आलेख, लघुकथा पर एक अग्रलेख तथा लघुकथा आन्दोलन के पुरोधाओं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं, में से किसी एक के आलेख/साक्षात्कार रूप में विचारों को शामिल किया गया है। इस पांचवें खण्ड शामिल छः लघुकथाकारों में शामिल हैं- सर्वश्री अशोक लव, दीपक मशाल, बलराम, राजकुमार गौतम, डॉ. सतीशराज पुष्करणा व श्री हरनाम शर्मा। इनकी चयनित लघुकथाओं पर समीक्षात्मक आलेख क्रमशः सर्वश्री पवन शर्मा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, महेश दर्पण, सूर्यकान्त नागर, डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रा, प्रो. रूप देवगुण व डॉ. सतीश दुबे जी ने लिखे हैं। आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी के साथ डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी की भेंटवार्ता को धरोहर के अन्तर्गत शामिल किया गया है। अग्रलेख ‘लघुकथा का सौन्दर्यशास्त्र’ डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’ जी ने लिखा है। इस खण्ड के सभी छः लघुकथाकारों की एक-एक प्रतिनिधि लघुकथा हम अपने पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।}


अशोक लव

अविश्वास
     उस दिन सूरज बहुत थका-थका सा उगा था। रमेश की तरह वह भी मानो रातभर सोया न था। 
     रमेश पूछ-पूछकर हार गया था। पत्नी घुम-फिरकर एक ही उत्तर देती- ‘‘मुझे नहीं पता अस्पताल कैसे पहुँची, किसने पहुँचाया। होश में आते ही तुम्हें फोन करवा दिया था।’’
     वह बार-बार पूछता- ‘‘तुम सच-सच क्यों नहीं बता देतीं? जो हो गया सो हो गया।’’
रेखा चित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 

     ‘‘कुछ हुआ हो तो बताऊँ।’’ 
     ‘‘देखो! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अस्पताल ले जाने से पहले वे तुम्हें और कहाँ ले गए थे?’’
     ‘‘मैंने बताया न कि अँधेरे के कारण सामने पड़े पत्थर से ठोकर लगते ही मैं बेहोश हो गई थी। होश आया तो अस्पताल में थी।’’
     ‘‘डॉक्टर ने बताया था कि तीन युवक तुम्हें दाखिल करा गए थे। तुम सच-सच क्यों नहीं बता देतीं? मैं उस किस्म का आदमी नहीं हूँ जैसा तुम सोच रही हो। आखिर तुम्हारा पति हूँ।’’
     ‘‘जब कुछ हुआ ही नहीं तो क्या बताऊँ? तुम मुझ पर विश्वास क्यों नहीं करते?’’
     रातभर पति-पत्नी के मध्य अविश्वास तैरता रहा था।

  • फ्लैट-363-ए, सूर्य अपार्टमेन्ट, सेक्टर-6, द्वारका, नई दिल्ली-110075 / मोबाइल : 09971010063




दीपक मशाल




ठेस
     ‘‘फ़िल्म तो अच्छी थी लेकिन इस एक्टर के बजाय किसी मस्क्युलर हीरो को लेते तो ये और भी अधिक हिट होती।’’ शो ख़त्म होने पर सिने कॉम्प्लेक्स का एग्जिट गेट धकेलकर बाहर निकलते हुए प्रेमी ने प्रेमिका पर अपना फ़िल्मी ज्ञान झाड़ा 
     ‘‘हम्म, हो सकता है।’’ प्रेमिका ने धीरे से कहा।  
     ‘‘क्या हुआ तुम इतनी चुप क्यों हो?’’ प्रेमिका की उँगलियों में उँगलियाँ डाल उसका हाथ थामे लड़के ने शिकंजा कसते हुए पूछा। 
     ‘‘नहीं हुआ कुछ नहीं समीर, बस तुम्हें बताना था कि अगले एक-दो हफ़्तों के लिए तुम्हें कहीं किसी दोस्त के यहाँ शिफ्ट करना होगा।’’
     ‘‘अरे ये क्या बात हुई!’’ 
     दोनों के हाथ छूट चुके थे 
     ‘‘समझा कर यार, सुबह पापा का फोन आया था। परसों वो किसी काम के सिलसिले में यहाँ आ रहे हैं, इसी बहाने मेरे साथ रहेंगे और शहर भी घूम लेंगे। मैं नहीं चाहती कि घर वाले जानें कि मैं लिव-इन में रहती हूँ।’’ 
     ‘‘ऐसे कैसे विधि! चार दिन बाद तो वैलेंटाइन्स डे है...।’’ लड़का परेशान हो उठा और उसने तंज मारा, ‘‘तुम तो कहती थीं कि तुम्हारी फैमिली बड़ी ब्रॉडमाइंडेड है, तुम्हारे मम्मी-पापा ने भी तो लव मैरिज की है? फिर
रेखा चित्र : के. रविन्द्र 
दिक्क़त क्या है यार, उन्हें बता दो ना।’’ 

     ‘‘समीर, मैं तुम्हें सिर्फ एक महीने से जानती हूँ, अभी हमें एक दूसरे को जानने को कुछ और वक़्त चाहिए और अगर पापा मेरे किसी फैसले में दीवार नहीं बनते तो इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं मर्यादा का पर्दा भी गिरा दूँ।’’ 
     लड़का फिर हँसने लगा और प्यार से बोला, ‘‘तुम भी अजीब हो विधि, एक तरफ़ मॉडर्न बनती हो और दूसरी तरफ़ मर्यादा की बात करती हो, फिर प्यार तो एक नज़र में होता है।’’ 
     ‘‘अच्छा! तो इसका मतलब- अगर तुम्हारी बहिन तुमसे अपने लिव-इन रिलेशन के बारे में बताये तो तुम खुशी-खुशी मान जाओगे?
     ’’विधि!!’’
     समीर भीड़ की परवाह किए बिना चीख पड़ा और इस बार आवाज़ में प्यार नहीं गुस्सा था, ठीक वही गुस्सा जो ठेस से उपजता है। 

  • भारत में : द्वारा श्री रामबिहारी चौरसिया, मालवीय नगर, बजरिया कोंच (शुक्लाजी की दुकान के सामने), जिला-जालौन-285205, उ.प्र. / ई मेल : mashal.com@gmail.com



बलराम




अपने लोग
     दिल्ली विकास प्राधिकरण की एक स्कीम में अड़तालीस स्क्वायर मीटर के प्लॉट के रजिस्ट्रेशन के लिए वह मात्र अठारह सौ रुपए जुटा पाया था। अन्तिम तिथि करीब थी और उसे दो सौ रुपए तत्काल चाहिए थे। उसे इस बात का गर्व था कि डेढ़ हजार से लेकर तीन हजार रुपए प्रति माह तक पाने वाले कई लोग उसके मित्र हैं और आवश्यकता पड़ने पर हजार-पाँच सौ तो मिल ही सकते हैं।
     और अब जब जरूरत पड़ी तो सबसे पहले वह उस मित्र के पास पहुँचा, जो सबसे अधिक तनखाह पाता था। उस मित्र ने कहा कि तत्काल तो कुछ नहीं हो सकता। दो-चार दिन बाद कहीं से कुछ हो गया तो दे सकता हूँ। इसके बाद वह दूसरे मित्र के पास गया तो उसने भी तत्काल दे पाने में असमर्थता जाहिर करते हुए कहा कि
रेखा चित्र : संदीप राशिनकर 
दफ्तर आना। वहाँ दस रुपए सैकड़ा प्रति माह पर एक आदमी से दिलवा दूँगा। तीसरा, जो कि उसका अन्तरंग था, मात्र पचास रुपए दे पाया।

     लौटकर वह अपने घर के सामने चारपाई पर उदास-सा बैठा था कि बगल का पड़ोसी किराएदार रामदास उसके पास आया और उदासी का कारण पूछा। जैसे ही उसने स्थिति बताई, रामदास ने अपनी जेब से पखवारे की आज ही मिली पूरी तनखाह निकालकर उसके सामने रख दी और कहा कि जितने चाहिए, रख लो।

  • सी-69, उपकार अपार्टमेंट, मयूर विहार फेस प्रथम, दिल्ली-110091 / मोबाइल : 09810333933



राजकुमार गौतम

अफसरशाही
     महीने का पहला इतवार था। सौदा-सुलफ लेकर पालसिंह शहर से लौट रहा था। बढ़ती महँगाई से परेशान पालसिंह के पंजे साइकिल-पैडलों के उठे हुए फन भी नहीं दबा पा रहे थे।
      फर्जी मेडीकल क्लेम्स, एल.टी.सी. तथा फण्ड से लिया टेम्परेरी एडवांस - सभी का ‘कमाया’ पैसा इस महँगाई की लम्बी जीभ चाट जाती थी। पूरी तनखाह को जेब में डालकर वह शहर गया था और मात्र राशन-पानी का ही अविश्वसनीय रकम का बिल बनिए ने बनाकर उसके हाथों में थमा दिया था। अब पालसिंह के पास उतने रुपए भी न बचे थे जितने कि महीने के शेष दिन। और आज तारीख थी सिर्फ तीन!
      पालसिंह ने देखा- सड़क पर कुछ आदमी जमा हैं। सड़क के किनारे ही सलेटी रंग की एक कार खड़ी है, जिसका एक दरवाजा खुला हुआ है। करीब जाते-जाते पालसिंह को लगा कि कार जानी-पहचानी है। उसने अपनी साइकिल को एक पेड़ से उलझाया और करीब-करीब दौड़ते हुए भीड़ में घुस गया। पालसिंह की आशंका सही थी- डायरेक्टर साहब ही थे।
     पालसिंह सब-कुछ भूल गया। डायरेक्टर साहब बेसुध-से कार की सीट पर पड़े हाँफ रहे थे। उसने साहब के जूते उतारे। उनके तलवों पर मालिश की। गाड़ी को एक तरफ लगवा दिया। पास के भट्टे पर से पानी लाया, साहब को दो घूंट पानी निगलवाया।
रेखा चित्र :
कमलेश चौरसिया 

     एक टैक्सी को रोककर साहब को अपने घर ले गया...साइकिल पर जाकर शहर से एक अच्छे डाक्टर को बुला लाया...मोहल्ले-पड़ोस में उसकी अस्थाई धाक जम गई...साहब ने डॉक्टर से हँस-हँसकर बातें कीं...बताया, कभी हल्का-सा फिट आ जाता है तो कुछ देर के लिए सेंसलेसनेस फील होती है...फरॅर ए लिटिल...नाउ नो ट्रबल...अब बिल्कुल ठीक हूँ।’’
     कार में बैठने से पहले पालसिंह के कन्धे पर हाथ रखकर, ‘‘थैक्यू, थैंक्य वेरी मच!’’ कहा। एक बच्चे को पास बुलाकर उसका नाम भी पूछा याहब ने।
     इस दो घण्टे के झमेले में पालसिंह की जेब में रेजगारी के चन्द सिक्के ही बचे रह गए थे।
     अगले दिन पालसिंह दफ्तर गया। जेब खाली होने के बावजूद वह उत्साहित था। बराबर की सीटवाले साथी को सारा वृतरन्त बताया। बराबरवाले ने अपने बराबरवाले को बताया।
     कुशल-क्षेम पूछने के बहाने चमचे लोग साहब के पास पहुँच गए।
     ‘‘किसने बताया तुम्हें?’’
     ‘‘सर, वो मिस्टर पालसिंह हैं ना...रिकार्ड सेक्शन में!’’
     
     थोड़ी देर बाद पालसिंह के अण्डमान-निकोबार के लिए स्थानान्तरण के आदेश आ धमके।

  • बी-55, पॉकेट-4, केन्द्रीय विहार-2, सेक्टर-82, नोएडा-201304, उ.प्र. / मोबाइल : 09313636195




डॉ. सतीशराज पुष्करणा




सहानुभूति
     कहीं से स्थानान्तरण होकर आए नए-नए अधिकारी और वहाँ की वर्कशॉप के एक कर्मचारी रामू दादा के मध्य अधिकारी के कार्यालय में गर्मागर्म वार्तालाप हो रहा था। अधिकारी किसी कार्य के समय पर पूरा न होने पर उसे ऊँचे स्वर में डाँट रहे थे- ‘‘तुम निहायत ही आलसी और कामचोर हो।’’
     ‘‘देखिए सर! इस तरह गाली देने का आपको कोई हक नहीं है।’’
     ‘‘क्यों नहीं है?’’
     ‘‘आप भी सरकारी नौकर हैं, और मैं भी।’’
     ‘‘चोप्प!’’
     ‘‘दहाड़िए मत! आप ट्रान्सफर से ज्यादा मेरा कुछ नहीं कर सकते।’’
     ‘‘और वही मैं होने नहीं दूँगा।’’
     ‘‘आपको जो कहना या पूछना हो, लिखकर कहें या पूछें। मैं जवाब दे दूँगा। किन्तु, आप इस प्रकार मुझे डाँट नहीं सकते। वरना...’’
रेखा चित्र : सिद्धेश्वर 

     ‘‘मैं लिखित कार्यवाई करके तुम्हारे बीवी-बच्चों के पेट पर लात नहीं मारूँगा। गलती तुम करते हो। डाँटकर प्रताड़ित भी तुम्हें ही करूँगा। तुम्हें जो करना हो, कर लेना, समझे!’’
     निरुत्तर हुआ-सा रामू इसके बाद चुपचाप सिर झुकाए कार्यालय से निकल आया।
     बाहर खड़े उसके समस्त साथियों ने सहज ही अनुमान लगाया कि आज घर जाते समय साहब की खैर नहीं। दादा इन्हें भी अपने हाथ जरूर दिखाएगा ताकि वे फिर किसी को इस प्रकार अपमानित न कर सकें।
     इतने में उन्हीं में से एक फूटा, ‘‘दादा! लगता है इसे भी सबक सिखाना ही पड़ेगा।’’
     ‘‘नहीं रे! सबक तो आज उसने ही सिखा दिया है मुझे। वह सिर्फ अपना अफसर ही नहीं, बाप भी है, मुझसे भी ज्यादा उसे मेरे बच्चों की चिन्ता है।’’
     इतना कहकर वह अपने कार्यस्थल की ओर बढ़ गया।

  • लघुकथानगर, महेन्द्रू, पटना-800006 (बिहार) / मोबाइल : 09835283820




हरनाम शर्मा




प्रतिक्रियावादी
     अभी बस की पंक्ति में आकर खड़ा ही हुआ था कि एक तटस्थ भाव से घूरते नवयुवक भिखारी ने साधिकार हाथ फैला दिया- ‘‘कुछ पैसे दो।’’
     गठे शरीर का नवयुवक और इस ढंग से भीख माँगे! इसके व्यवहार से मेरी भौंहें तन गईं- ‘‘कुछ काम करके नहीं खा सकते?’’ मैं अनुमान लगा रहा था कि वह लज्जित होकर चला जाएगा।
     ‘‘भाई साहब, मैं काम की ही तलाश में हूँ, तब तक तो खाने को चाहिए न! आप ही यह कृपा कर दें, मुझे कोई काम दिला दें।’’
     ‘‘विचार-गोष्ठी की चख-चख से ऊबकर निकलते हुए सोचा भी न था कि ऐसे ढीठ भिखारी से पाला पड़नेवाला है। साम्यवादी चिन्तक होने के नाते सप्ताह में चार बार कभी दिल्ली, कभी बाहर भाषण-गोष्ठी में साम्यवादी-विदेशी संस्थानों के अनुदान पर आना-जाना लगा रहता है। भिखारी को टालने की गर्ज से कहा, ‘‘मैं खुद ही काम की तलाश में हूँ।’’
     अब भिखारी के ताज्जुब में आने की बारी थी। उसने अपनी आँखों का क्षेत्रफल बढ़ाकर मेरे उजले झकाझक कपड़ों, जूतों, सूटकेस, पान, सिगरेट और चमेली के तेल की सुगन्ध का तादात्म्य मेरी बेरोजगारी से लगाने का असफल-सा प्रयास किया।
     दो बेरोजगार विपरीत स्थितियों में आमने-सामने थे।
     उसके माथे पर सलवटें पाकर मैंने सोचा, ऐसे भिखारी अक्सर बुरा मानकर चले जाते हैं। किन्तु वह
रेखा चित्र : डॉ.सुरेन्द्र वर्मा 
झल्लाया, ‘‘देने हों तो दो, क्यों अपने व्यर्थ चिन्तन में मेरा समय बर्बाद करते हो?’’

     गजब है! मेरा सोच व्यर्थ और इस टटपूँजिए का समय मूल्यवान। काश! हाथ में पकड़ी सिगरेट कोड़ा बन जाती तो उसकी पीठ पर खूब निशान जमाता, गिनता और भूल जाता।
    मैं पीछा छुड़ाने के लिए लाइन से बाहर निकलकर सीधा फिर विचार-गोष्ठी में पहुँचा। वहाँ वही वाद-विवाद, शोर-शराबा था। सीधे तनकर मैंने कहा, ‘‘व्यवहार-रहित चिन्तन व्यर्थ है और हम सभी पालतू कुत्ते यहाँ भौंकने के लिए इकट्ठे हुए हैं।’’ लगभग सभी ने आँखें तरेरीं। कुछ मेरी ओर लपके। मैं मुड़ा तो एक नवयुवक ने कहा, ‘‘कैच हिम, काउण्टर रेवोल्यूशनरी, ही इज फुलिश, रास्कल, स्काउन्ड्रल, रिएक्शनरी...’’
     जब मैं उनकी पहुँच से बाहर हो गया तो मुझे सुनाई दिया, ‘‘लेट हिम गो, ही हैज गॉन मेड।’’ 

  • ए.जी. 1/54-सी, विकासपुरी, नई दिल्ली-110018 / फोन : 011-2554353 / मोबाइल :  09910518657



'हौसला' संग्रह  से कुछ लघुकथाएँ 
मधुकांत 




{चर्चित साहित्यकार मधुकांत जी की निःशक्त जीवन पर केन्द्रित लघुकथाओं का संग्रह ‘‘हौसला’’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह से हमारे पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं उनकी तीन प्रतिनिधि लघुकथाएं।}

नकली नोट
      कॉलेज के छात्रों को शरारत सूझी। उन्होंने अपनी कॉपी में दस रुपये के आकार का कागज फाड़ा और सूरदास की ओर बढ़ा दिया- बाबा दस रुपये की मेंगफली दे दो....।
    सूरदास ने दस रुपये के नोट को उंगलियों से पहचानने का प्रयत्न किया .... मुस्कुराया... और दो पैकेट मूंगफली के दे दिए। सीट खाली पड़ी थी इसलिए सूरदास वहीं बैठ गया। राजू और उसके साथी चुपचाप मूंगफली खाने लगे।
     सामने बैठा यात्री सब देख रहा था। जब उससे न रहा गया तो पूछा- बच्चो मूंगफली का स्वाद कैसा है? बच्चों ने नजरें झुका लीं। एक बालक फुसफुसाया- जैसा चोरी के गुड़ का होता है।
     फिर यात्री ने सूरदास से कुछ पूछना चाहा- सूरदास तुमको मालूम है....।
     मुझे सब मालूम है- सूरदास ने हंसते हुए कहा- बचपन में मेरा पोता भी ऐसी ही शरारत करता था.....।
     विद्यार्थियों की आंखें अधिक झुक गयीं। 

कलम बने हाथ
      प्रजातन्त्र के पक्ष में कवि ने जनता के सम्मुख शासन के विरोध में अपनी कविता सुनाई तो जनता ने उसे सपने की बात सोची।
     राजा को जब इसका पता लगा तो उन्होंने कवि को दरबार में बुला लिया। उसे धन-दौलत और मान-
रेखा चित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 
सम्मान का लालच दिया गया परन्तु कवि ने अस्वीकार कर दिया। अपनी आज्ञा का अपमान होता देखकर राजा ने जल्लाद को बुलाकर कविता लिखने वाले के दोनों हाथों को कलम करवा (कटवा) दिया।

    भयभीत जनता ने उसकी कविता सुननी बन्द कर दी। अब वह पेन नहीं पकड़ सकता था परन्तु वह कलम हुए हाथ को रोशनाई में डुबाकर दीवार पर कविताएं लिखने लगा।

भाग-दौड़
     ईमानदार क्लर्की में रोटी की लड़ाई न लड़ी जा रही थी तो उसने सायं के समय एक लाला के यहां पार्ट टाइम कर लिया। पांच बजे दफ्तर छूटते ही उसे छह बजे तक पहुँचना होता था। किसी दिन लेट हो गए तो गए काम से।
     आज भी हाथ में भारी थैला लिए सदर बाजार से गुजर रहा था और प्रतिदिन की भाँति पटरी वालों पर क्रोध आ रहा था। भीड़ के कारण उसके कंधे छिलने से लगे थे।
     उसे इतना तो ध्यान है वह एक बुढ़िया से टकराया, वह गिर पड़ी लेकिन पीछे मुड़कर देखने का अर्थ था पार्ट आइम से छुट्टी, इसलिए वह अधिक तेजी से चलने लगा।
     हार-थककर रात के समय जब घर में प्रवेश किया तो गैलरी में मां के कराहने की आवाज सुनी।
     ‘‘क्या बात है मां?’’ वह वहीं ठहर गया।
     ‘‘पैर में मोच आ गयी, राह चलते एक बदमाश धकेल कर चला गया।’’ मां कराहतक हुए कोसने लगी।
      ‘‘ओह!’’ जेब में पड़ा ओवर टाइम उसे बहुत बोझिल लगने लगा।

  • डॉ. मधुकान्त, 211-एल, मॉडल टाउन, डबल पार्क, रोहतक (हरियाणा) / मोबाइल :  09896667714




कुछ और लघुकथाएँ


दिलीप भाटिया




रक्षा बन्धन :  भरी कलाई, भीगी पलकें 
फ्रेन्ड्स,
हेलो! आज राखी है, फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए मेरे पास ऐसी कोई फोटो नहीं है, जिसे आप लाइक या शेयर कर सकें, हाँ, बस एक छोटी सी कहानी है आज धागों के त्यौहार के दिन की, आप सुनेंगे?
प्रातः मन्दिर गया, तो वहां पर मन्दिर की सफाई कर रही ग्रामीण महिला ने मेरी कलाई पर रेशम की डोरी बांध दी, याद आया, अपने जन्म-दिन पर मैंने उसे साड़ी खरीदने हेतु कुछ रूपए दिए थे, उस की इस रिटर्न गिफ्ट से मेरी सूनी कलाई पर पहला स्नेह का धागा बंधा।
घर आया, तो कोरियर वाला, एक लिफाफा दे गया, राखी के साथ एक छोटा सा भाव भरा पत्र ‘‘भैया, मैं अनजान शहर में पति के ऑपरेशन हेतु ट्रेन में यात्रा कर रही थी, हमारी वार्Ÿाालाप से तुमने अपना ब्लड डोनेशन कार्ड दे दिया था, अनजान शहर में वह संजीवनी बना, आज मेरी कलाई में सुहाग की चूड़ियां तुम्हारे ही कार्ड के कारण हैं, तुम्हारी कलाई के लिए राखी का धागा भेज रही हूँ, सुजाता बहन।‘‘ भरी आंखों से स्वयं ही दूसरा धागा कलाई पर बांध लिया। 
      दिन मंे पुरानी कॉलोनी में हमारे यहां काम करने वाली बाई अचानक आ गई ‘‘सर, हर रविवार को आप मेरे बेटे को गणित व अंग्रेजी पढ़ाया करते थे, इस वर्ष कक्षा 10 की बोर्ड की परीक्षा में स्कूल में प्रथम आया है,
 रेखा चित्र : अनुप्रिया 
मैं गरीब, ट्यूशन फीस आपको क्या देती? मेरा बेटा कुछ लायक बन गया है, आज मैं आप को राखी बांधने आई हूँ।‘‘ भरी आंखों से एक और धागा मेरी कलाई पर सज गया था।

सायंकाल समीप के गांव के स्कूल की मेडम का फोन आया, ‘‘सर, आपने नवरात्रि पर हमारे गांव के स्कूल में पोषाहार बनाने वाली दो कामवालियों के साड़ी भेजी थीं, उन्होने आप के लिए राखी भेजी है, आप घर पर हैं, तो मैं उनकी ओर से बांधने आती हूँ, आज स्कूल की छुट्टी है, वरना उनकी इच्छा थी कि आप को हम आज अपने स्कूल में ही बुलाते‘‘ कुछ समय बाद, नाजिमा मेडम घर आकर मेरी कलाई पर दो और धागे बांध गई।
राखी का दिन ऐसा भी होता है, इस समय कलाई भरी हुई है, निर्मल, पवित्र, आत्मीय धागों से एवं आंखें छलक रही हैं, स्नेह, प्यार से। इन रिश्तों को किस श्रेणी में रखूं, सगे, खून के, अपने, पराए, आत्मीय, औपचारिक, स्वार्थी, मतलबी या कुछ और? मुझे तो कुछ समझ में नही आ रहा है, आप मेरी समस्या का समाधान बतलाऐंगे क्या?
फ्रेंड - दिलीप कैलाश

  • 372/201, न्यूमार्केट, रावतभाटा-323307, राजस्थान / मोबाइल नं : 09461591498





पुष्पा जमुआर




अपना अधिकार

     ‘‘क्या बात है राकेश आज बहुत उदास लग रहे हो?’’
     राकेश ने कोई उत्तर न दिया और मौन बैठा रहा। उदय ने पुनः प्रश्न को दोहराया, ‘‘राकेश! चुप क्यों हो? बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?’’
      ‘‘कोई कुछ नहीं कर सकता.... बताने से फायदा?’’
      ‘‘बताओ तो सही....।’’
      ‘‘क्या बताऊँ! आज कई दिन से हमारे घर में महाभारत चल रहा है....।’’
      ‘‘महाभारत! कैसा महाभारत! साफ-साफ कहो न....।’’
      ‘‘मम्मी चाहती हैं मैं इंटर में बायलॉजी लूँ ताकि डाक्टर बन सकूँ....।’’
      ‘‘तो....!’’
रेखा चित्र :  
कमलेश चौरसिया 

      ‘‘पूरी बात तो सुन! पापा चाहते हैं कि मैं मैथ लेकर भविष्य में उन्हीं की तरह इंजीनियर बन सकूं.....।’’
      ‘‘पर तुम क्या चाहते हो?’’
      ‘‘मैं तो एन.डी.ए. ज्वाइन करना चाहता हूँ... मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं स्लेक्ट भी हो जाऊँगा।’’
      ‘‘तो फिर देर किस बात की.... आगे बढ़ो।’’
      ‘‘पर... मम्मी... पापा... का क्या करूँ?’’
      ‘‘अजीब आदमी हो.... पढ़ना तुम्हें है, जीवन तुम्हारा है, रुचि तुम्हारी है.... निर्णय भी तुम्हें ही करना चाहिए...।’’
      ‘‘तो भी यार....।’’
      ‘‘कुछ नहीं, साहस पैदा करो और बहुत ही आदर एवं शालीनता से अपने मम्मी-पापा का अच्छा मूड देखकर उन्हें निर्णय से अवगत करा दो...।’’
      ‘‘तुम ठीक कहते हो... यही करूँगा मैं।’’  

  • ‘काशी निकेतन’, रामसहाय लेन, महेन्द्रू, पटना-800006 (बिहार) / मोबाइल : 09308572771





किशन लाल शर्मा




भविष्य

     ‘‘हमारा नेता कैसा हो?’’
     ‘‘जीतेगा भई जीतेगा।’’
     ‘‘तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है।’’
     नगर निगम के चुनाव होने थे। एक पार्षद प्रत्यासी का जुलूस निकल रहा था। नारों की आवाज सुनकर मैं घर से बाहर निकल आया। जुलूस में लगभग पचास लोग थे। दस-बारह मर्द, आठ-दस युवा और बाकी बच्चे, जो नाबालिग थे। उन्हें अभी वोट देने का अधिकार भी नहीं था।
     बच्चों को नारे लगाते देखकर मैं सोचने लगा। क्या यह बाल मजदूरी या बाल शोषण नहीं? हमारे देश के कर्णधार आखिर देश के भविष्य को किधर ले जा रहे हैं?

  • 103 रामस्वरूप कॉलोनी, आगरा-282010 (उ.प्र.)





राजेन्द्र प्रसाद यादव

सर्वश्रेष्ठ प्राणी

        फार्च्यूनर कार में बैठकर जाते हुए रात्रि में फुटपाथ पर सोते हुए दो व्यक्तियों को देखकर कुत्ता टॉमी ने
रेखा चित्र : उमेश महादोषी 
कुतिया मैरी से दुम हिलाते हुए कहा‘ ‘‘मैरी! यार मुझे तो यह बात झूठी लगती है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणाी है। मैं तो समझता हूँ कि जिस प्रकार से कुत्तों में कुछ तो बहुत ही ऐश-आराम से जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जबकि काफी संख्या में तो कुत्तों को कभी भर पेट भोजन भी नहीं मिलता। इसी प्रकार मनुष्यों में भी कुछ तो इतनी सुविधाओं से लैस हैं, कि वे सारी सुविधाओं का उपभोग ही नहीं कर पाते; जबकि दूसरे बहुत से मनुष्यों को न तो भर पेट भोजन मिल पाता है और न ही विश्राम के लिए उपयुक्त स्थान। फिर यह कैसे माना जा सकता है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है!’’

    मैरी ने सहमति में सिर हिला दिया।

  • ग्राम- पहिया बुजुर्ग, पोस्ट- बाँसेपुर डड़वा, जिला आजमगढ़ (उ.प्र.) / मोबाइल : 09198841245

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