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बुधवार, 4 मार्च 2015

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अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 4,   अंक  : 05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2015  

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क्षणिका गिने-चुने शब्दों की गागर में एक सम्पूर्ण विचार-भाव की काव्याभिव्यक्ति है : विष्णु त्रिपाठी


चक्रधर शुक्ल के क्षणिका संग्रह ‘अँगूठा दिखाते समीकरण’ का लोकार्पण सम्पन्न


    
 कानपुर की सुप्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘निमित्त’ के तत्वाधान में 22 फरवरी 2014 को रानीगंज, कानपुर स्थित सेवा संस्थान में सुप्रसिद्धसाहित्यिकार डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ल की अध्यक्षता में चर्चित व्यंग्यकार चक्रधर शुक्ल के क्षणिका संग्रह ‘अँगूठा दिखाते समीकरण’ का लोकार्पण सम्पन्न हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. उमेश महादोषी, विशिष्ट अतिथि सुप्रष्ठित पत्रकारद्वय श्री नवोदित (दिल्ली) व श्री विष्णु त्रिपाठी (कानपुर), मुख्य वक्ता सुप्रतिष्ठित व्यंग्यकार डॉ. सुरेश अवस्थी, सामान्य अतिथि श्री नागेशचन्द्र दीक्षित, श्री रामनाथ बाजपेयी एवं स्मृतिशेष पं. सिद्धेश्वर अवस्थी के सुपुत्र श्री प्रमोद अवस्थी के कर-कमलों से लोकार्पण सम्पन्न
हुआ। इस सारस्वत अवसर पर मंचस्थ अतिथियों का सम्मान प्रतीक चिह्न, शाल एवं पुष्पहार से किया गया। रचनाकार श्री चक्रधर शुक्ल को सभी उपस्थित अतिथियों ने अपना स्नेहाशीष प्रदान किया। समारोह में वह क्षण अत्यन्त भावुकता एवं गरिमा से भरा हुआ था, जब मंच के आग्रह पर श्री चक्रधर शुक्ल ने अपनी माताजी श्रीमती सावित्री देवी शुक्ला से सपरिवार आशीर्वाद लिया। उपस्थित सभी अतिथियों एवं दर्शकों-श्रोताओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर करतल ध्वनि से सम्मान देते हुए इस क्षण को आत्मसात किया।
      इस अवसर पर लोकार्पित कृति ‘अगूँठा दिखाते समीकरण’ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए समारोह अध्यक्ष प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ल ने कहा कि चक्रधर शुक्ल का क्षणिका संसार प्रयोगधर्मा सृजनशीलता का साक्षी है। धारदार पैनी क्षणिकाओं में आत्माभिव्यक्ति की सफल प्रस्तुति शब्द-तत्व की चमत्कारी परिणति से ही सम्भव हुई है। अनूभूत तथा तर्क की संगति से उपजी क्षणिकाएँ अपना प्रभाव डालने में सक्षम हैं। बुद्धि-तत्व से युक्त समर्थ रचनाकार लघुकलेवर किन्तु संवेदना से परिपूर्ण अर्थ प्रक्षेपित करने में सफल हो जाते हैं, जो काव्य का साध्य होता है और लक्ष्य को भेदकर मनुष्य की अभिरुचि में साहित्यिक
दायित्व का कलात्मक बिम्ब एकदम सहज ढंग से प्रस्तुत कर देते हैं। श्री शुक्ल की चमत्कारी क्षणिकाओं के विषय आज के मनुष्य की सभी जीवन स्थितियों से जन्मे प्रकृत और विकृत अनुभवों से स्वानुभूत परिणामों की परिणतियों के प्रसूत हैं।
     सुप्रसिद्ध वयोवृद्ध पत्रकार श्री विष्णु त्रिपाठी के अनुसार रचनाकार की पैनी दृष्टि और सामाजिक सरोकारों के सुन्दर युग्म का नतीज़ा है कि उनकी क्षणिकाएँ महाकवि बिहारी लाल के दोहों की तरह देखने में छोटी हैं, लेकिन मार लम्बी और घाव गहरे
करती हैं। इन्होंने समाज, परिवार, देश की राजनीति- लगभग सभी क्षेत्रों की विद्रूपता और विसंगतियों को हँसाकर-गुदगुदाकर प्रस्तुत किया है। मैं मानता हूँ कि क्षणिका गिने-चुने शब्दों की गागर में एक सम्पूर्ण विचार-भाव की काव्याभिव्यक्ति है। अज्ञेय की प्रसिद्ध कविता ‘साँप’ क्षणिका ही तो है।
     दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध पत्रकार-संपादक-रचनाकार श्री नवोदित ने क्षणिका विधा को आज की व्यस्त दिनचर्या से जोड़ते हुए कहा कि आज के भागमभाग के दौर में जब सब इंस्टैंट रिलीफ, इंस्टैंट फायदे चाहने लगे हैं तो क्षणिकाओं का महत्व भी बढ़ गया है।  लोग सरकारों से भी उनचास दिन और सौ दिनों में वायदे पूरे करने की उम्मीद रखते हैं। ऐसे में क्षणिका दस-पन्द्रह सेकेण्ड में
कविता के हर पहलू का मजा देती है। और फिर चक्रधर शुक्ल की क्षणिकाएँ तो इतनी गहरी मार करती हैं कि खण्डकाव्य की पूर्ति कर देती हैं। उन्होंने जीवन के हर पहलू को छुआ है, वह जैसे चलते-चलते विषय को पकड़ लेते हैं और फिर यह विषय सबके हो जाते हैं। सबको अपील करते हैं। दिल को छूने का मामले में चक्रधर जी को महारत हासिल है।
     इससे पूर्व कृति पर चर्चा का प्रारम्भ करते हुए मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. सुरेश अवस्थी ने इसे जीवन की जरूरी काव्यरस गर्भा बताते हुए कहा कि सामर्थ्यवान व्यंग्य
कवि श्री चक्रधर शुक्ल की कृति ‘अँगूठा दिखाते समीकरण’ व्यंग्योक्तियाँ साफ-सुथरे छद्म ओढ़े चेहरों के सच को उजागर कर लोगों को सही रास्ता दिखाती हैं। न्यूनतम शब्दों में अधिकतम मारक-शक्ति से सम्पन्न क्षणिकानुमा इन रचनाओं में रचनाकार अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ मौजूद दिखता है। वह विसंगतियों को गन्ने की तरह छील-पेरकर जीवन के लिए जरूरी रस निकालने की सफल कोशिश करता है। कहा जा सकता है कि चक्रधर की व्यंग्योक्तियाँ ‘देखने में छोटी लगैं, घाव करैं गंभीर।
     आयोजन के मुख्य अतिथि डॉ. उमेश महादोषी ने अपने वक्तव्य में क्षणिका विधा की सामर्थ्य को रेखांकित
करते हुए कहा कि कई सीमाओं को स्वीकारने के बावजूद क्षणिका को संकीर्ण दायरे में आबद्ध करने का पक्षधर मैं कभी नहीं रहा। समकालीन अभिव्यक्ति की घनीभूत अनुभूतियों का तीव्र संप्रेषण क्षणिका का मूल चरित्र है। इस चरित्र का निर्वाह स्वतंत्र एकल बिम्बों में भी संभव है और कथ्य प्रधान रचनाओं में भी। प्रेम और संवेदनात्मक अनुभूतियों, सरोकारबद्ध कथ्यों, व्यंग्यात्मक चुटकियों, यहाँ तक कि प्रकृति के कुछ मनोहारी चित्रों तक में इस चरित्र का बखूबी निर्वाह देखने को मिल जाता है। उन्होंने चक्रधर शुक्ल की क्षणिकाओं में सहजता व सरलता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह चीज क्षणिका को ताकत देती है।  
 इस अवसर पर कृतिकार चक्रधर शुक्ल ने ‘अँगूठा दिखाते समीकरण’ के प्रकाशन का पूरा श्रेय वरिष्ठ पत्रकार
नवोदित जी को देते हुए कहा कि उनके सहयोग के बिना मेरी इस प्रथम पुस्तक का प्रकाशन संभव ही नहीं था। मेरे ही प्रति नहीं, नवोदित जी का कानपुर के तमाम रचनाधर्मियों के प्रति स्नेह किसी से छुपा नहीं है। उन्होंने जीवन के तमाम सोपानों पर मार्गदर्शक और संरक्षक रहे श्री रामनाथ बाजपेयी जी और कविता के क्षेत्र में उपलब्धियों और रचनात्मकता के विकास का श्रेय श्री नागेशचन्द्र दीक्षित जी को देते हुए उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। 
    लोकार्पित क्षणिका संग्रह पर कई अन्य सम्मानित वक्ताओं ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का भावपूर्ण सुन्दर-सफल संचालन डॉ. मुकेश सिंह ने किया। प्रारंभ में श्री नन्नेंलाल तिवारी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। स्वागत समारोह में अनेक उपस्थित स्थानीय साहित्यकारों व गणमान्य व्यक्तियों ने सहयोग किया। अन्त में ‘निमित्त’ के सचिव श्यामसुन्दर निगम ने सभी अतिथियों का आभार ज्ञापित करते हुए स्थानीय प्रकाशक श्री पंकज जी का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिन्होंने कृति के उनके प्रकाशन से इतर प्रकाशन से प्रकाशित होने के बावजूद कार्यक्रम में हर तरह के सहयोग का जज्बा दिखाया और अन्त तक हर तरह से साथ रहे। (समाचार सौजन्य : श्यामसुन्दर निगम, सचिव : निमित्त, कानपुर)


हाइकु पर ‘सरस्वती सुमन’ एक और पहल
‘सरस्वती सुमन’ ने हाइकु पर महत्वपूर्ण विशेषांक के बाद एक और पहल की घोषणा की है। जो हाइकुकार किन्हीं कारणों से विशेषांक में शामिल नहीं हो पाये हैं, वे अपने 20 हाइकु ईमेल से वाकमैन चाणक्य, कृतिदेव, शुषा या यूनिकोड फांट में वर्ड की फाइल में  saraswatisuman @rediffmail.com या rdkamboj@gmail.com पर 30 मार्च 15 तक भेज सकते हैं। चयनित हाइकु सरस्वती सुमन के आगामी किसी अंक में हाइकु परिशिष्टि में शामिल किये जायेंगे। (समाचार प्रस्तुति :  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, अतिथि संपादक)



लखनऊ में संपन्न हुआ चौथा नवगीत महोत्सव




लखनऊ में विभूति खण्ड स्थित ‘कालिन्दी विला’ के परिसर में दो दिवसीय ‘नवगीत महोत्सव-2014’ का शुभारम्भ 15 नवम्बर की सुबह 8 बजे हुआ। ‘अनुभूति’, ‘अभिव्यक्ति’ एवं ‘नवगीत की पाठशाला’ के माध्यम से वेब पर नवगीत का व्यापक प्रचार-प्रसार करने हेतु प्रतिबद्ध ‘अभिव्यक्ति विश्वम’ द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम न केवल अपनी रचनात्मकता एवं मौलिकता के लिए जाना जाता है, बल्कि नवगीत के शिल्प और कथ्य के विविध पहलुओं से अद्भुत परिचय कराता है। ख्यातिलब्ध सम्पादिका पूर्णिमा वर्मन जी एवं प्रवीण सक्सैना जी के सौजन्य से आयोजित यह कार्यक्रम पिछले चार वर्षों से लखनऊ में सम्पन्न हो रहा है।

          कार्यक्रम का शुभारम्भ देश-विदेश से पधारे नए-पुराने साहित्यकारों की उपस्थिति में वरिष्ठ नवगीतकार सर्वश्री कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, धनन्जय सिंह, बुद्धिनाथ मिश्र, निर्मल शुक्ल, राम नारायण रमण, शीलेन्द्र सिंह चौहान, बृजेश श्रीवास्तव, डॉ. अनिल मिश्र एवं जगदीश व्योम के द्वारा माँ सरस्वती के समक्ष दीप-प्रज्ज्वलन से हुआ। प्रथम सत्र में चर्चित चित्रकार-प्राध्यापक डॉ. राजीव नयन जी ने शब्द-रंग पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। नए-पुराने नवगीतकारों के गीतों पर आधारित यह पोस्टर प्रदर्शनी आगंतुकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही। ये पोस्टर पूर्णिमा वर्मन, रोहित रूसिया, विजेंद्र विज एवं अमित कल्ला द्वारा तैयार किये गए थे। तदुपरांत देश भर से आमंत्रित आठ नवोदित रचनाकारों के दो-दो नवगीतों का
पाठ हुआ। इस सत्र में पवन प्रताप सिंह, सुवर्णा दीक्षित, विजेन्द्र विज, अमित कल्ला, प्रदीप शुक्ल, सीमा हरिशर्मा, हरिवल्लभ शर्मा एवं संजीव सलिल का रचना पाठ हुआ, जिस पर वरिष्ठ नवगीतकारों- सर्वश्री कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, धनन्जय सिंह, बृजेश श्रीवास्तव एवं पंकज परिमल ने अपने सुझाव दिए। इस अवसर पर कुमार रवीन्द्र जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नवगीत में नवता को लेकर व्याप्त भ्रम को दूर करते हुए कहा कि शाब्दिकता तथा संप्रेषणीयता के बीच तारतम्यता के न टूटने देने के प्रति आग्रही होना नवगीतकारों का दायित्व है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री राम सेंगर जी ने नवगीत महोत्सव को उत्सव बताते हुए कहा है कि इस प्रकार की कार्यशालाएं युवा रचनाकारों के रचनात्मक व्यकितत्व के विकास तथा उनमें नवगीत की समझ बढाने में सहायक होंगी। इस सत्र का सफल संचालन जगदीश व्योम जी ने किया।
     कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लब्धप्रतिष्ठित गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का ‘गीत और नवगीत में अंतर’ शीर्षक पर व्याख्यान हुआ। आपका कहना था कि नवगीत का प्रादुर्भाव हुआ ही इसलिये था कि एक ओर हिन्दी कविता लगातार दूरूह होती जा रही थी, और दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में शब्द-प्रवाह को तिरोहित किया जाना बहुत कठिन था। अतः नवगीत नव-लय-ताल-छंद और कथ्य के साथ सामने आया।
     कार्यक्रम के तीसरे सत्र में देश भर से आये वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा नवगीतों का पाठ हुआ। इस सत्र के प्रमुख आकर्षण रहे- सर्वश्री कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, अवध बिहारी श्रीवास्तव, राम नारायण रमण, श्याम श्रीवास्तव, ब्रजेश श्रीवास्तव, शीलेन्द्र सिंह चौहान, डॉ मृदुल, राकेश चक्र, जगदीश पंकज एवं अनिल मिश्रा।
कार्यक्रम के अध्यक्ष कुमार रवीन्द्र जी  एवं मुख्य अतिथि राम सेंगर जी रहे। मंच संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया।
     कार्यक्रम के प्रथम दिवस का समापन सांस्कृतिक संध्या से हुआ, जिसमें रोहित रूसिया, अमित कल्ला, रामशंकर वर्मा, सुवर्णा दीक्षित, सौम्या आशीष एवं आशीष (अभिनय एवं स्वर), विजेंद्र विज (फिल्म निर्माण), सृष्टि श्रीवास्तव (कत्थक नृत्य), सम्राट आनन्द, रजत श्रीवास्तव, मयंक सिंह एवं सिद्धांत सिंह (संगीत), अमित कल्ला (लोक गीत एवं संगीत) ने अपनी आकर्षक एवं मधुर प्रस्तुतियाँ दीं। इस सत्र में कुछ नवगीतों को माध्यम बनाकर नवोदित रचनाकारों द्वारा एक नाटिका प्रस्तुत की गयी और इसके तुरंत बाद फिल्म, गणेश वंदना, भजन, कत्थक नृत्य, लोक गीत, राजस्थानी संगीत आदि की प्रस्तुतियों ने सबका मन मोह लिया। उपस्थित रचनाकारों/काव्यरसिकों/अतिथियों ने इस सांस्कृतिक संध्या की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
इस सत्र का सफल संचालन रोहित रूसिया ने किया।
     ‘नवगीत महोत्सव-2014’ का दूसरा दिन भी काफी महत्वपूर्ण रहा। अकादमिक शोधपत्रों के वाचन के सत्र में नवगीत विधा पर प्रकाश डालते हुए विद्वानों ने नवगीत आंदोलन, दशा और दिशा, संरचना एवं सम्प्रेषण, चुनौतियाँ आदि विषयों पर व्यापक चर्चा की। वरिष्ठ गीतकवि राम सेंगर जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नवगीत दशक और डॉ. शम्भुनाथ सिंह जी से जुड़े अनुभव साझा किये। उन्होंने बताया कि नवगीत दशक को प्रकाशित करने की योजना 1962 में बनी थी, किन्तु वह बहुत बाद में पुस्तकाकार हो सकी। श्रद्धेय डॉ. शम्भुनाथ सिंह जी के निर्देशन में उन्होंने स्वयं नवगीत दशक-एक, दो, तीन
की पांडुलिपियों को अपनी हस्तलिपि में तैयार किया था। ‘नवगीत की दशा और दिशा’ विषय पर अपना वक्तव्य देते हुए डॉ. धनन्जय सिंह जी ने कहा कि नवगीत संज्ञा नहीं वस्तुतः विशेषण है। आज की मुख्य आवश्यकता शास्त्र की जड़ता से मुक्ति है, न कि शास्त्र की गति से मुक्ति। ‘नवगीत: सरंचना एवं सम्प्रेषण’ पर मधुकर अष्ठाना जी की उद्घोषणा थी कि नवगीत आज भी प्रासंगिक एवं गीतकवियों की प्रिय विधा है। ‘रचना के रचाव तत्व’ पर बोलते हुए पंकज परिमल जी ने कहा कि शब्द, तुक, लय, प्रतीक मात्र से रचना नहीं होती, बल्कि रचनाकार को रचाव की प्रक्रिया से भी गुजरना होता है। रचाव के बिना भाव शाब्दिक भले हो जायें, रचना नहीं हो सकते। जगदीश व्योम ने ‘नयी कविता तथा नवगीत के मध्य अंतर’ को रेखांकित करते हुए कहा कि रचनाओं में छंद और लय
का अभाव हिन्दी रचनाओं के लिए घातक सिद्ध हुआ। कविताओं के प्रति पाठकों की  अन्यमन्स्कता का मुख्य कारण यही रहा कि कविताओं से गेयता निकल गयी। द्वितीय दिवस का यह सत्र अकादमिक शोधपत्रों के वाचन के तौर पर आयोजित हुआ था, जिसके अंतर्गत वक्ताओं से अन्य नवगीतकार प्रश्न पूछकर समुचित उत्तर प्राप्त कर सकते थे। इस सत्र का मंच संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया था।
     प्रथम सत्र के तुरंत बाद सभी नवगीतकारों/ साहित्यकारों को अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा परिकल्पित ‘सांस्कृतिक भवन’ के निर्माण स्थल पर बस और कारों से ले जाया गया जहाँ उन्हें पूर्णिमा जी ने भावी योजनाओं की जानकारी दी। साथ ही पूर्णिमा जी के पिताजी श्री आदित्य कुमार वर्मन जी ने भवन निर्माण और वास्तुशिल्प की गहरी जानकारी दी।      
     भोजनावकाश के बाद दूसरे सत्र में विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित कुल दो नवगीत-संग्रहों एवं एक संकलन
का लोकार्पण हुआ। ये पुस्तकें थीं- चर्चित रचनाकार पूर्णिमा वर्मन जी का नवगीत-संग्रह ‘चोंच में आकाश’, रोहित रूसिया का नवगीत-संग्रह ‘नदी की धार सी संवेदनाएँ’ एवं डॉ. महेन्द्र भटनागर पर केंद्रित पुस्तक ‘दृष्टि और सृष्टि।’ तदुपरांत विभिन्न विद्वानों ने छः कृतियों पर अपने विचार व्यक्त किये। रोहित रूसिया के नवगीत-संग्रह ‘नदी की धार सी संवेदनाएँ’ पर डॉ. गुलाब सिंह की भूमिका को वीनस केसरी ने प्रस्तुत किया। चर्चित रचनाकार पूर्णिमा वर्मन जी के नवगीत-संग्रह ‘चोंच में आकाश’ पर आचार्य संजीव सलिल ने समीक्षा प्रस्तुत की। ओमप्रकाश तिवारी के नवगीत-संग्रह ‘खिड़कियाँ खोलो’ पर सौरभ पाण्डेय ने अपने विचार रखे। चर्चित कवि यश मालवीय के संग्रह ‘नींद काग़ज़ की तरह’ पर वरिष्ठ साहित्यकार निर्मल शुक्ल जी ने अपना वक्तव्य दिया। निर्मल शुक्ल जी के नवगीत-संग्रह ‘कुछ भी नहीं असंभव’ पर वरिष्ठ गीतकार मधुकर अष्ठाना जी ने समीक्षा प्रस्तुत की। वरिष्ठ गीतकार डॉ. महेन्द्र भटनागर पर केंद्रित पुस्तक ‘दृष्टि और सृष्टि’ पर बृजेश श्रीवास्तव ने समीक्षा प्रस्तुत की। सभी समीक्षकों ने उपर्युक्त नवगीत-संग्रहों एवं संकलन के भाव तथा शिल्प पक्षों पर खुल कर अपनी बात रखी। इस सत्र का संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया।
     तीसरे सत्र से पूर्व अभिव्यक्ति-अनुभूति संस्था की ओर से अवनीश सिंह चौहान (इटावा) को उनके नवगीत संग्रह ‘टुकड़ा काग़ज़ का’, कल्पना रामानी (मुम्बई) को उनके काव्य संग्रह ‘हौसलों के पंख’ तथा रोहित रूसिया (छिंदवाड़ा) को ‘नदी की धार सी संवेदनाएँ’ के लिए सम्मानित तथा पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार स्वरुप इन सभी को 11,000/- (ग्यारह हज़ार) रुपये, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम में कल्पना रामानी अस्वस्थ होने के कारण उपस्थित नहीं हो सकीं, इसलिए उनका पुरस्कार लेने के लिए संध्या सिंह को मंच पर आमंत्रित कर लिया गया। इस सत्र का सफल संचालन जगदीश व्योम जी ने किया।
    तीसरे सत्र में आयोजन की परिपाटी के अनुसार सबसे पहले आमंत्रित रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस वर्ष के आमंत्रित कवियों में चेक गणराज्य से पधारे डॉ. ज्देन्येक वग्नेर, निर्मल शुक्ल, वीरेन्द्र आस्तिक, ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’, शैलेन्द्र शर्मा, पंकज परिमल तथा जयराम जय थे। इनके अतिरिक्त इस सत्र में कुमार रवींद्र, धनञ्जय सिंह, कमलेश भट्ट कमल, ब्रजेश श्रीवास्तव, राकेश चक्र, अनिल
वर्मा, पूर्णिमा वर्मन, मधु प्रधान, जगदीश व्योम, सौरभ पांडे, अवनीश सिंह चौहान, रामशंकर वर्मा, रोहित रूसिया, प्रदीप शुक्ला, संध्या सिंह, शरद सक्सेना, आभा खरे, वीनस केसरी आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का सफल संचालन धनञ्जय सिंह जी ने किया। अनेक स्थानीय साहित्यकार कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
     इस अवसर पर पूर्णिमा वर्मन जी ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गीत भारतीय काव्य का मूल स्वर है, इसके प्रचार प्रसार में हिन्दी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार की असीम संभावनाएँ छुपी हुई हैं। इसे बचाए रखना और इसका विकास करना हमारा उत्तरदायित्व होना चाहिये। अन्य विद्वानों द्वारा नवगीत विधा के बहुमुखी विकास की संभावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही ‘नवगीत महोत्सव 2014’ का विधिवत समापन हुआ। (समाचार सौजन्य : अवनीश सिंह चौहान)




शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ की तीन पुस्तकों का विमोचन


शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ की तीन पुस्तकों का विमोचन


चर्चित  कवि श्री शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ की तीन पुस्तकों ‘यादों के पंछी’, ‘वही हमारा गांव’ व ‘कुण्डलियों का गांव’ तथा उनके एवं डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ के द्वारा संपादित ‘स्मृति, समीक्षा एवं मूल्यांकन’ पुस्तक का विमोचन ‘वाणी’, ‘शब्दिता’ व पूर्वांचल कल्याण समिति के मेरठ में हुए संयुक्त आयोजन व डॉ. माहेश्वर तिवारी (मुरादाबाद) की अध्यक्षता में किया गया। सम्मानित अतिथियों में डॉ.वेदप्रकाश अमिताभ (अलीगढ़), डॉ.पशुपतिनाथ उपाध्याय (अलीगढ़), डॉ.जगन्नाथ प्रसाद वघेल (मुम्बई), डॉ.जयप्रकाश शुक्ल (नई दिल्ली) प्रमुख थे। इस अवसर पर अनेक वक्ताओं ने कृतियों एवं सहयोगी जी के कृतित्व पर प्रकाश डाला। डॉ. जयशंकर शुक्ल ने कहा- ‘‘सहयोगीजी ने दुमदार दोहों में विषय की विविधिता को शिल्प के ढाँचे में ढालकर एक सुन्दर वितान रचा है। चतुष्कल, षटकल, एवं त्रिकल के आव्यूहन का अस्वीकार करते हुए तेरह-ग्यारह को अपना लक्ष्य लेकर कवि ने -वही हमारा गाँव’ सजाया है।’’ डॉ. जगन्नाथ प्रसाद वघेल के अनुसार- ‘‘श्री शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ मार्मिक गीतों के चितेरे कवि हैं। छन्द विधा पर इनका गजब का अधिकार है।’’ डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय के अनुसार ‘‘श्री सहयोगी ने दोहा छन्द में एक नव्य प्रयोग किया है। वह लीक से हटकर पुरातन परम्परानुमोदन में एक नयी सोच के आधार पर समसामयिक परिवेक्ष्य में यथार्थवादी फलक पर नये अन्दाज में अपनी आनुभूतिक अभिव्यंजना को पूरी तन्मयता से ध्वनित करने वाले दोहाकार हैं।’’ मुख्य अतिथि डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने कहा- ‘‘सहयोगी जी के गीतों को ‘नवगीत’ और ‘जनगीत’ तक सीमित नहीं किया जा सकता है। उनकी खाँटी अनूभूतियाँ बहुत ठेठ और अकृतिम भाव से ‘गीत’ बन जाती हैं। परिवेश की प्रामाणिकता उनमें बराबर बनी रहती है और एक ‘विजन’ भी जहाँ-तहाँ कौंधता रहता है लेकिन उनके गीतों में संवेदना का वैभव सदैव ध्यान आकर्षित करता है।’’ अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. माहेश्वर तिवारी ने कहा- ‘‘सहयोगी जी की काव्य भाषा उनकी निजी काव्य भाषा है, जिसमें मुहावरे तो हैं ही, कुछ अत्यंत प्रिय प्रकृति संबंधी बिम्ब हैं जो उनकी कविता को सजाते और संवारते हैं।’’ सभागार में डॉ. अशोक कुमार चौबे, किशन स्वरूप, डॉ. हरिराज सिंह ‘नूर’ आदि सहित अनेक स्थानीय एवं निकटस्थ जनपदों से आये गणमान्य व्यक्ति एवं श्रोता मौजूद थे। विमोचन कार्यक्रम का सफल संचालन नवगीतकार श्री योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने किया। (समाचार सौजन्य: मनु स्वामी)

डॉ. डी. एम. मिश्र के कविता संग्रह का लोकार्पण  



वरिष्ठ कवि डॉ.डी.एम. मिश्र के कविता संग्रह ‘‘यह भी एक रास्ता है‘‘ के लोकार्पण और उनकी रचनाधर्मिता पर चर्चा करने के लिये स्थानीय गोमती नगर के जायका रेस्तरां में साहित्यकारों का एक जमावड़ा देखने को मिला। कार्यक्रम का आयोजन ‘‘निकट‘ पत्रिका की सम्पादक प्रज्ञा पान्डेय की ओर से किया गया और आगन्तुकों का स्वागत विजय पुष्पम ने किया। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुये वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा आज साहित्य पर गहरा संकट छाया हुआ है। फिर भी डी. एम. मिश्र ऐसे कवि हैं जो बड़ी तन्मयता से इसका मुकाबला कर रहे हैं। श्री मिश्र की इसके पहली की भी कई कवितायें मैंने पढ़ी हैं और इस संग्रह की भी। इसमें कोई दो राय नही कि इन्होंने इस क्षेत्र में जोरदार विकास किया है। इनकी गुणात्मकता और सरोकार धर्मिता मंे तेजी से निखार आया है। इनकी कविताओं में आमजन जीवन मुखर होता हैं- यही इनकी विशेषता है!
     प्रख्यात कथाकार शिव मूर्ति ने कहा कि गांव के संदर्भ मंे जो सरोकार मेरी कहानियों का है वही इनकी कविताओं का भी। इसलिये इनकी कविताओं ने मुझे प्रभावित किया। इनके पास गेयता, सरोकार और कन्टेन्ट तीनो हैं, जो मुश्किल से किसी के पास एक साथ होता है। इनका गम्भीरता से अध्ययन किया जाना
चाहिये। कवि व पत्रकार सुभाष राय ने साहित्यिक गुटबंदी पर चिंता व्यक्त करते हुये कहा कि साहित्यकार आज खेमांे मे बंटा है जो साहित्य के लिये घातक है। डी. एम. मिश्र की कविता पर बात करते हुये उन्होंने कहा कि ‘‘यह भी एक रास्ता है’’ -एक संकल्प का रास्ता है। मुझे बड़ी खशी है कि श्री मिश्र बड़ी तेजी से अपने रचना संसार का विकास कर रहे हैं। प्रसिद्ध कथाकार डॉ. गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने कहा इनकी कविताओं में कथ्य भी है और तथ्य भी है। यह जुझारू कवि है। समस्याआंे से लड़ना इन्हें आता है। इनकी भाषा सरल है और इनकी दृष्टि जनोन्मुखी है। इसलिये यह कबीर की परम्परा में आते हैं। इनकी कविताओं का मूल्यांकन होना जरूरी है।
     चर्चित रचनाकार दयानन्द पाण्डेय ने कहा इनकी कवितायें ‘‘हान्ट‘‘ करती है। इनकी कविताओं में एक नहीं, अनेक रास्ते खुलते हैं जो बड़ी तेजी और तल्खी के साथ बहुत दूर तक ले जाते हैं। गांधी, त्रिलोचन, नदी रेत हो गयी अति विशिष्ट कवितायें हैं। मां पर सीरीज में कवितायें लिखी गयी है। गाय और गौरेया के रूपक को लेकर वह जिस तरह कविता में दुलरातें है वह किसी सामान्य कवि के बस की बात नही। प्रसिद्ध लेखिका रजनी गुप्त ने कहा कि इनकी कवितायें समसामयिक यथार्थ की कवितायें हैं। साधारण रचते हुये यह कब असाधारण की बात कर जाते हैं पता ही नही चलता। इनकी कई पुस्तके मैंने पढ़ी है जिनका मूल स्वर आम आदमी के प्रति गहरी संवेदना है। जाने-माने रचनाकार वीरेन्द्र सारंग ने कहा इनकी कवितायें मिट्टी से जुड़ी कवितायें है। गाँव और शहर, छोटा और बड़ा, गीत और मुक्त छंद के बीच का यह एक बडा रास्ता निकालते है जो विरले कवि ही कर पाते हैं। प्रसिद्ध कथाकार नसीम साकेती ने कहा कि रचनाकार जितना संवेदनशील होता है, उसकी रचना उतनी ही बड़ी होती है। डी. एम. मिश्र गहन संवेदनाओं के बड़े कवि हैं। छोटी-छोटी कविताओं मंे बड़ी बात कह देना इन्हें आता है। उन्होंने ‘गिरगिटान‘ जैसी कई कविताओं का उदाहरण दिया। कवि व व्यंग्यकार पंकज प्रसून ने कहा कि डी. एम. मिश्र उत्कृष्ट व्यंग्य के रचनाकार हैं और मंचो पर भी खूब सुने और सराहे जाते हैं। 
       गोष्ठी का सफल संचालन करते हुये वरिष्ठ पत्रकार व इंडिया इनसाइड के सम्पादक अरूण सिंह ने कहा कि मै तो डी. एम. मिश्र का मुरीद बन चुका हूं क्योंकि वह इंसान भी अच्छे और उनकी कविता भी अच्छी। अन्यथा इतने दिग्गज् साहित्यकार आज के इस कार्यक्रम में इतने खुली बहस में कैसे हिस्सा लेते। इनके अतिरिक्त डॉ. अनीता श्रीवास्तव, एस. के. सिंह, अरूण निषाद, प्रताप दीक्षित, रोशन प्रेमयोगी, निवेदिता श्रीवास्तव, दिव्या शुक्ला, लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, अतुल मोहन, महेन्द्र भीष्म जैसे साहित्यकारों  ने परिचर्चा मे हिस्सा लिया। अन्त में कवि डी. एम. मिश्र ने आभार प्रगट किया और लोगों की फरमाइश पर अपनी कविताएॅ भी सुनायीं! (समाचार सौजन्य : डॉ. डी. एम. मिश्र)



अरुण ठाकरे  की कृति ‘कविताएँ’ का लोकार्पण 



सृजन संवाद, इन्दौर के तत्वावधान में युवा कवि अरुण ठाकरे के प्रथम काव्य संग्रह ‘कविताएँ’ का भव्य लोकार्पण समारोह 4 दिसंबर 2014 को प्रीतम लाल दुआ सभागार में संपन्न हुआ। सुप्रसि़द्ध साहित्यकार डॉ. सतीश दुबे ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि अरुण की कविताएं हर स्तर पर सत्य का चेहरा तलाशती हैं। इनमें अपने आसपास की तमाम विसंगतियों को समेटा गया है चाहे वह नदी की व्यथा हो जंगल का दर्द हो या जमीन की अंतर्व्यथा। मुख्य अतिथि कथाकार मधुदीप ने कहा, ‘‘पहला संग्रह परीक्षा की तरह होता है। और अरुण ठाकरे इसमे पूरे अंक लेकर उत्तीर्ण हुए हैं’’। वरिष्ठ साहित्यकार वेद हिमांशु ने अपने समीक्षात्मक उद्बोधन मे कहा कि अरुण ठाकरे की कविताएं उनके कवि कि संभावनाओं का रचनात्मक पता देती हैं तथा भविष्य के प्रति एक विश्वसनीय आश्वस्ति जगाती है। वरिष्ठ कवियित्री रश्मि रमानी ने कहा कि अरुण कि इन कविताओं को जीवन से जुड़ी सहज प्रतिक्रिया कहा जाना चाहिये।
   कार्यक्रम का संचालन शामसुन्दर पालोड ने, आभार प्रदर्शन सृजन संवाद के अध्यक्ष राज केसरवानी ने एवं स्वागत वक्तव्य कांतिलाल ठाकरे ने दिया। इस अवसर पर चन्द्रसेन विराट, डॉ. सरोज कुमार, सूर्यकान्त नागर, हरे राम वाजपयी, सदाशिव कौतुक एवं प्रदीप नवीन सहित नगर के अनेक साहित्यिक सुधीजन उपस्थित थे। (समाचार सौजन्य : राजश्री हिमांशु)


शशि पाधा को केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर लेखक सम्मान 




जम्मू की मूल निवासी साहित्यकार सुश्री शशि पाधा को ‘अनन्त की ओर’ कृति हेतु केन्द्रीय हिदी निदेशालय ने हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखक योजना के अन्तर्गत रु. एक लाख का पुरस्कार प्रदान किया है। सम्मान राशि लेखिका को आन लाइन भुगतान द्वारा प्रदान की जायेगी। (समाचार प्रस्तुति :  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’) 



माधुरी राऊलकर का ग़ज़ल संग्रह लोकार्पित





नागपुर की कवयित्री माधुरी राऊलकर के नए ग़ज़ल संग्रह ‘साये से भी दूर’ का लोकार्पण विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन, नागपुर के  सभागृह में डॉ.सागर खादीवाला की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर विशेष अतिथि थे- महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य साहित्यकार किशन शर्मा, सुप्रसिद्ध गायक एम.ए.कादर व नवभारत के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रमोहन द्विवेदी। अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे तथा अनेक संस्थाओं द्वारा माधुरी जी को सम्मानित किया गया। माधुरी राऊलकर ने अपनी ग़ज़लों का पाठ भी किया। ओमप्रकाश सोनी, प्रशांत पंडित, प्रदीप सावरकर, प्रकाश वाकेकर, ब्रजेशनंदन सिंह, अतुल त्रिवेदी, डॉ. कृष्णा श्रीवास्तव, कुसुम श्रीवास्तव, ऐषा चटर्जी, डॉ. उषा मुसारी, डॉ. शीला भार्गव, उषा अग्रवाल, रीमा चड्ढा, विमलेश सूर्यवंशी आदि की उपस्थिति में संपन्न इस आयोजन का संचालन अविनाश बागड़े व आभार प्रदर्शन अनिल मालोकर ने किया। (समाचार सौजन्य : माधुरी राऊलकर)


कैनेडा में विश्व हिन्दी दिवस पर हुआ सरस्वती सुमन व कृष्णा वर्मा के हाइकु संग्रह का लोकार्पण



     ब्रैम्पटन लायब्रेरी, ओंटोरियो, कैनेडा में हिन्दी राइटर्स गिल्ड के एक कार्यक्रम में विजय विक्रान्त द्वारा कृष्णा वर्मा जी के हाइकु संकलन ‘अम्बर बाँचे पाँती’ और ‘सरस्वती-सुमन’ के हाइकु विशेषांक का लोकार्पण हुआ। यह विशेषांक प्रधान सम्पादक डॉ आनन्दसुमन सिंह और अथिति सम्पादक रामेश्वर काम्बोज‘हिमांशु’ ने तैयार किया है। इसमें हाइकु के नये-पुराने कवियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय हाइकुकारों को भी सम्मिलित किया है। कनाडा के पाँच हाइकुकार इसमें सम्मिलित किये गये हैं- निर्मल सिद्दू, मानोशी चटर्जी, कृष्णा वर्मा, डॉ. शैलजा सक्सेना और सविता अग्रवाल। इस विशेषांक में हाइकु के विविध आयामों का विश्लेषण करने वाले 12 आलेख भी हैं। गिल्ड के सभी सदस्यों ने उत्साह से इस विशेषांक का स्वागत किया।
         यहाँ यह बताना सामयिक होगा कि हिन्दी राइटर्स गिल्ड टोरोंटो की दानार्थी संस्था है जो लेखकों और हिन्दी प्रेमियों को साहित्य की समस्त विधाओं में लिखने और चर्चा करने के लिये मंच देती है और उनको पुस्तक प्रकाशन की सुविधाएँ भी प्रदान करती है। यह संस्था 2008 से सक्रिय है और कृष्णा वर्मा जी की पुस्तक गिल्ड से प्रकाशित 11 वीं पुस्तक है। इसे अयन प्रकाशन द्वारा भारत में भी प्रकाशित किया गया है।
कार्यक्रम की संचालिका डॉ. शैलजा सक्सेना ने सबका स्वागत करते हुए हाइकु की व्याख्या में कहा- ‘‘हाइकु क्या है?/ओक भर जल-सा/प्यासे का पानी’’। उन्होंने इतने सार्थक और सक्षम हाइकु लिखने के लिए कृष्णा जी को बधाई दी हैं और कहा कि 683 हाइकु के इस संकलन में मौसम और जीवन के अनेक रंग बिखरे हुए हैं। उन्होंने सर्वप्रथम कृष्णा जी को हाइकु पाठ के लिए आमंत्रित किया। कृष्णा जी ने अपने वक्तव्य में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को अनेक धन्यवाद दिए, जिन्होंने उन्हें हाइकु लिखने की प्रेरणा दी और निरंतर प्रोत्साहन देकर उनके हाइकु के स्तर-सुधार में मदद की। हिमांशु जी ने 9 अक्तुबर 2011 में गिल्ड की एक कार्यशाला में हाइकु, चोका और सेदोका लेखन को विस्तार से समझाया था और सबको इन विधाओं में लिखने की प्रेरणा भी दी थी। कृष्णा जी ने गिल्ड के निदेशक डॉ. शैलजा सक्सेना और सुमन घई को भी धन्यवाद दिया, जिन्होंने हाइकु संकलन छापने के लिये प्रोत्साहित किया और मदद की। कृष्णा जी ने अपने पुस्तक से कुछ हाइकु सुनाए, जो श्रोताओं को बहुत पसन्द आये।
          इस के बाद पुस्तक चर्चा प्रारंभ हुई। टोरोंटो की वरिष्ठ लेखिका डॉ. इंदु रायज़ादा ने पुस्तक पर बोलते हुए कहा कि हाइकु सूक्ति के रूप में मन पर प्रभाव छोड़ते हैं और कृष्णा जी के लगभग सभी हाइकु प्रभावकारी हैं। उन्होंने भी अनेक हाइकु संकलन से पढ़ कर सुनाये। भुवनेश्वरी पांडे ने अपने वक्तव्य में कहा कि हाइकु हमें बताते हैं कि बहुत कम शब्दों में भी बात कही जा सकती है और कृष्णा जी ने यह काम सफलतापूर्वक किया है। सविता अग्रवाल जी ने कहा कि पहले-पहल ऐसा लगता है कि 3 पंक्तियों और इतने कम वर्णों में अपनी बात कैसे कही जा सकती है; कितु धीरे-धीरे समझ में आता है कि बात वास्तव में उतनी ही कहने लायक होती है। उन्होंने कहा कि कृष्णा जी के माँ-बेटी या पारिवारिक संबंधों से जुड़े हाइकु बहुत प्रभावशाली हैं। कृष्णा जी की शब्दावली और प्रकृति चित्रण की उन्होंने प्रशंसा की और अनेक हाइकु का उल्लेख किया, जिस हाइकु ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया था, वह था- ‘‘भिनसार में/टूटी स्वप्न की साँसें/पलकें खुलीं!!’’ संजीव अग्रवाल जी ने 5-6 हाइकु लिख कर हाइकु और कृष्णा जी के बारे में अपने विचार रखे। मानोशी चटर्जी ने कृष्णा जी के अनेक हाइकु उद्धृत करते हुए कहा कि कृष्णा जी के सभी हाइकु एक स्थिति का पूरा चित्र उपस्थित करते हैं जैसे- ‘‘धूप चटोरी/पत्तों का रंग चाट/चढ़ी आकाश!!’’
          शैलजा सक्सेना ने भी कृष्णा जी के लेखन में नए उपमान और सुन्दर बिंबों के प्रयोग की सराहना की और प्रकृति के अनूठे दृश्यों की चर्चा करते हुए कहा- ‘‘कृष्णा की बात/अम्बर बदमाश/बाँचे सभी को!!’’ गिल्ड पंकज शर्मा जी ने हाइकु विधा के इतिहास और विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कृष्णा जी के बिंब, कल्पना की उड़ान और यथार्थ का चित्रण सभी अद्भुत हैं। विद्याभूषण धर ने कहा कि पतझर पर लिखे उनके अनेक हाइकु केवल प्रकृति के चित्र ही नहीं प्रस्तुत करते अपितु  प्रकृति के माध्यम से विस्थापितों की पीड़ा को भी बताते हैं। कश्मीरवासियों के विस्थापन के दर्द को याद करते हुए उन्होंने कहा कि कृष्णा जी के कई हाइकु उन्हें अपने जीवन के दर्द से जोड़ते हैं जैसे-  ‘‘कैसा भूकंप/क्रूर पतझड़ ने/तोड़े कुटुम्ब!!’’ या- ‘‘पत्तों की फौज/ढूँढती नया ठौर/जत्थों में भागे’’। लता पांडे ने कहा- ’’कृष्णा जी के हाइकु जीवन और प्रकृति के सुन्दर समन्वय का समीकरण प्रस्तुत करते हैं।’’
यह लेखक की सफलता होती है कि पाठक उस लेखन से जुड़ पाता है और स्वयं को उस लेखन में देख पाता है।    कृष्णा जी को इस सफलता के लिए श्री पाराशर गौड़, निर्मल सिद्दू और अन्य लोगों ने बहुत बधाई दी। गिल्ड के सदस्यों और अनेक श्रोताओं को हाइकु के सौन्दर्य से परिचित ही नहीं कराया अपितु उन्हें हाइकु लिखने की प्रेरणा भी दी। (समाचार सौजन्य : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’)



 शाह अब्दुल लतीफ़ सेमिनार-दिल्ली में सम्पन्न 



      16-17-18- दिसंबर -2014, दिल्ली में ‘मारुई’ संस्था की ओर से आयोजित शाह अब्दुल लतीफ़ पर छट्टा अंतराष्ट्रीय सेमिनार सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम वाईएमसीए टूरिस्ट होटल के आईसीसी रूम में हुआ। 16 दिसम्बर को उदघाटन समारोह मुख्य मेहमान लोकसभा सदस्य सत्यापलसिंह, भूतपूर्व एम्बेसेडर अर्जुन आसरानी एवं खास मेहमान मशहूर गायिका पद्मश्री शांति हीरानंद की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम के आगाज में दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना की परंपरा निभाई गई। उसी शाम संगीत से सजी महफिल में शाह के कलाम व अन्य सिंधी गीतों की बौछार से सभागार को अपनी आवाज़ से भावविभोर किया- उमा लाला, पद्मा गिदवाणी, सरोजिनी कुमार, नीतू मटाई, रेने मिराजा, तेजा भाटिया, राजेन्द्रकुमार, लजा भाटिया व मनोहर करुणा, पंकज जेसवानी जी ने। प्रोग्राम का सिलसिलेवार संचालन किया वीणा शिरंगी व शालिनी सागर ने।
     17 दिसम्बर को सिंध पाकिस्तान से आए डॉ. सुलेमान शेख़ व उनके साथ आए 14 लेखकों व शायरों ने इस सेमिनार में शिरकत की। उनमें मुख्य सम्मानित अतिथि रहे जनाब ग़ुलाम अली मोराई, एजाज़ अहमद कुरेशी, अमानुल्लाह शेख़, जावेद अहमद शेख़, डॉ. महरूलिनिसा लारिक, बेनिश साजिद, डॉ. मुमताज़ भुटो,
नाज़िर नाज़, सुरेश कुमार वाधवानी, जन्नत जान, महक अली, आमिन लाखो, नसीम अख़्तर जलबानी सिंध से और भारत के हर प्रांत से शिरकत करने वालों की तादाद में थे दिल्ली अकादेमी के वाइस चेरमेन डॉ॰ मुरलीधर जेटले, इस कार्यक्रम की हर्ता-कर्ता वीना शिरंगी, शलिनी सागर, गोवेर्धन शर्मा घायल, भगवान अटलानी, अर्जुन चावला, खेमन मुलानी, लक्ष्मण दुबे, इंदिरा पूनवाला, देवी नागरानी, शोभा लालचंदनी, सिंधु बरखा खुशालानी, डॉ. विनोद आसूदनी, लछमनदास केसवानी, नारी लच्छवानी, बलू चोइथानी, भारती केवलरामानी, हरी हिमथानी, मोहन हिमथानी, रवि प्रकाश टेकचंदानी, शमीम अहमद। सिंध से आए लेखकों ने शाह लतीफ के संदर्भ में अपने अपने प्रपत्र पेश किए। इस सत्र की अध्यक्षता की डॉ. सुलेमान शेख़ ने, ग़ुलाम नबी मोराई, एजाज़ अहमद कुरेशी, अर्जन चावला एवं भगवान अटलानी ने की। 
     दोपहर को भोजन के उपरांत सत्र में सिंध और हिन्द के लेखकों के पुस्तकों के विमोचन हुए, जिसमें वीना शिरंगी की दो पुस्तकों का विमोचन हुआ- ‘साइलेंट पाथ’ और ‘पखा ऐं पवार-डिठे मूँ डींह थ्या’ एवम देवी नागरानी की सिंध के कहानिकारों की कहानियों का हिन्दी में अनुदित संग्रह “पंद्रह सिंधी कहानियाँ” का विमोचन दिल्ली अकादेमी के वाइस चेरमेन डॉ॰ मुरलीधर जेटले, जनाब ग़ुलाम अली मोराई, वीना शिरंगी, व देवी नागरानी, मोहतरमा नाज़िर नाज़ के हाथों से हुआ। उसी शाम एक काव्य गोष्टी का आयोजन भी हुआ, जहां काव्य पाठ की सरिता बहती रही।        
     18 तारीख़ समर्पण की ओर बढ़ते हुए, कुछ प्रपत्र पढ़े गए और आए कविगन का सम्मान हुआ। गोवेर्धन शर्मा घायल ने बड़ी ही तेजस्वी ढंग से दो दिनों के कार्यक्रम की रूपरेखा को दारपेश किया। इस संस्था के सहकार में जुड़े सभी सदस्य मौजूद थे- रेनी मिराजा कुमार, राजेंद्र कुमार, मोहन गुरबानी, श्री मनोहर करणा, रमेश लाल, धीरज कुमार, डॉ. बलदेव आनंद कुमार, प्रो. सादिक़, प्रोमिला शर्मा, सीमा शिरंगी, प्रो. सान्या, श्रीमती सादिक़, शोभा शिरंगी, दीक्षा एवं सिद्धार्थ शिरंगी ...अन्य...! कैमेरामेन राजकुमार रिझवानी एवं रतन पाहुजा ने अपने कैमरा से सभी कोणों से सभा में मौजूद हर एक अदीब को क़ैद करते हुए अपने कार्य को बखूबी अंजाम दिया। एक शानदार व यादगार सेमिनार जहाँ हिन्द-सिंध के सिंधी साहित्यकारों की मिली- जुली एक धारा संगठित रूप में साहित्य के सरोवर में घुल मिल गई। (समाचार सौजन्य : देवी नागरानी)



प्रशान्त उपाध्याय की दोहरी उपलब्धि





ख्याति प्राप्त कवि प्रशान्त उपाध्याय के कविता संग्रह ‘शब्द की आँख में जंगल’ का विमोचन शिकोहाबाद में प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ. महेश भार्गव द्वारा किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रकाश दीक्षित ने की तथा मुख्य अतिथि थे विधायक श्री हरिओम यादव। इस अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसमें देश भर के प्रतिष्ठित कवियों ने भाग लिया। एक अन्य सूचनानुसार  प्रशान्त जी को हिन्दी साहित्य अकादमी, मॉरीशस के ‘हिन्दी साहित्य रत्न 2014’ अवार्ड से सम्मानित किया गया है। सम्मान डॉ. महेश भार्गव की अध्यक्षता में अकादमी तथा हिन्दी साहित्य सभा, आगरा के संयुक्त समारोह में अकादमी के अध्यक्ष डॉ. हेमराज सुन्दर द्वारा दिया गया। (समाचार सौजन्य : डॉ.राजकुमार रंजन व ब्रह्मानन्द झा)



डॉ. ‘यायावर’ के शोधग्रन्थों का विमोचन





फिरोजाबाद में सस्था ‘मनीषा’ के एक आयोजन में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.रामसनेही लाल ‘यायावर’ के शोधग्रन्थों ‘चतुरसेन शास्त्री: ऐतिहासिक एवं राजनीतिक, कथाकार’ व ‘चतुरसेन के कथा साहित्य में समाज, धर्म और नीति’ तथा डॉ. हुकुम सिंह के शोध प्रबन्ध ‘सन्त साहित्य में दलित चेतना (कबीर और रैदास के विशेष सन्दर्भ में)’ का विमोचन सर्वश्री एस.एस.यादव(ए.डी.जे.), डॉ.जी.के.अग्रवाल(आगरा विवि के पूर्व कुलपति), डॉ. मक्खनलाल पाराशर, डॉ.वनवीर प्रसाद शर्मा, डॉ.आर.बी.शर्मा, डॉ.आर.के.पाण्डेय, डॉ. ज्ञान सिंह आदि विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे। (समाचार सौजन्य : डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’)



शिवशंकर यजुर्वेदी को देवीप्रसाद गौड़ ‘मस्त’ सम्मान








रससिद्ध शायर पं. देवीप्रसाद गौड़ ‘मस्त’ की 121 वीं जन्म-जयन्ती के अवसर पर बरेली में आयोजित कवि सम्मेलन एवं साहित्यकार सम्मान समारोह में श्री शिवशंकर यजुर्वेदी को ‘पं.देवीप्रसाद गौड़ ‘मस्त’ सम्मान से सम्मानित किया गया। मुख्य अतिथि गीतकार किशन सरोज व विशिष्ट अतिथि कवि ज्ञानस्वरूप ‘कुमुद’ थे। (समाचार सौजन्य : डा. रामशंकर शर्मा ‘प्रेमी’)



आचार्य चन्द्रसेन विराट सम्मानित






वरिष्ठ कवि आचार्य चन्द्रसेन विराट को भारतीय वाड्.मय पीठ, कोलकाता द्वारा ‘साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)’ से सम्मानित किया गया है। ज्ञातव्य है कि वर्ष 2014 में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग भी विराट जी को ‘साहित्य सारस्वत’ सम्मान दे चुका है। (समा. सौजन्य : चन्द्रसेन विराट)






अशोक गुप्त ‘अशोक’ सम्मानित






कानपुर के कवि अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’ को राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भगीरथ सेवा संस्थान द्वारा गाजियाबाद में ‘कवि कुल भूषण सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान शिक्षाविद! डॉ. रत्नाकर पाण्डेय तथा प्रो. केशरीलाल वर्मा के कर-कमलों द्वारा दिया गया। (समा. सौजन्य : अशोक गुप्त ‘अशोक’)





उस संसार के बारे में बताइये, जिसमें आप विकसित होना चाहते हैं
पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता में बच्चों ने लिखे पत्र



     संसार के प्रति हर बच्चे की अपनी सोच होती है। किसी के लिए शिक्षित व स्वच्छ भारत प्राथमिकता है तो कोई भ्रष्टाचार मुक्त एवं सामाजिक सौहार्द से भरपूर संसार की कल्पना करता हैै। बाल श्रम उन्मूलन से लेकर बालिकाओं के प्रति हो रहे अत्याचार को रोकने तक की कल्पना आज का युवा करता है। एक तरह वह हाईटेक संसार की आशा रखता है वहीं वह पर्यावरण के प्रति भी सचेत है। ऐसे ही कई विचार उन बच्चों ने पन्नों पर उकेरे, जिन्होंने डाक विभाग द्वारा 4 जनवरी को प्रधान डाकघर में आयोजित 44वीं यूपीयू पत्र लेखन प्रतियोगिता में भाग लिया, जिसका विषय था ‘‘उस संसार के बारे में हमें बताइये, जिसमें आप विकसित होना चाहते हैं।’’  
     इस अवसर पर इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि विश्व डाक संघ द्वारा प्रतिवर्ष पत्र लेखन विधा को प्रोत्साहित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 15 वर्श तक के बच्चों के लिए पत्र लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसी क्रम मंे इलाहाबाद में आयोजित प्रतियोगिता में इलाहाबाद, वाराणसी, जौनपुर व गाजीपुर जनपदों के प्रतियोगी शामिल हुए। पत्र अंग्रेजी या संविधान की आठवीं सूची में निर्दिष्ट किसी भी भाषा में 800 शब्दों की सीमा में लिखना था। श्री यादव ने कहा कि दरअसल पत्र लेखन एक प्रकार का चिंतन है, जो मस्तिष्क को स्थिरता देता है। पत्रों का संवेदनाओं से गहरा रिश्ता है। पत्र लिखना जितना मायने रखता है, उतना ही उसे पढ़ना भी। पत्रों का काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अजीब रहस्य या गोपनीयता, संग्रहणीयता, लेखन कला एवं अतीत को जानने का भाव भी छुपा होता है। श्री यादव ने कहा कि पत्र-लेखन साहित्य की एक गंभीर विधा भी है। शब्दों के विस्तार के साथ बहुत सी अनकही भावनाएं मानो चिट्ठियों में सिमटती जाती हैं। पत्र लेखन प्रतियोगिता का मूल्यांकन परिमण्डलीय स्तर पर लखनऊ में किया जायेगा तथा श्रेष्ठ तीन पत्र लेखन को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मिलित करने हेतु डाक निदेशालय, नई दिल्ली भेजा जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर श्रेष्ठ तीन प्रतियोगियों को क्रमशः रू0 5000, रू0 3000 व रू0 2000 का प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार प्रमाणपत्र सहित दिया जायेगा। इसके अलावा प्रत्येक परिमण्डल की सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को 1000 रूपये का संात्वना पुरस्कार व प्रमाण पत्र दिया जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोत्तम प्रविष्टि को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के पास आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजा जायेगा। 
     इस अवसर पर इलाहाबाद मंडल के वरिष्ठ डाक अधीक्षक श्री रहमतुल्लाह, प्रधान डाकघर के सीनियर पोस्टमास्टर श्री आर. एन. यादव, कार्यालय अधीक्षक श्री आर. पी. श्रीवास्तव सहित डाक अधिकारी-कर्मचारी, भागीदारी कर रहे बच्चों के अभिभावक, शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। (सौजन्य : कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं)



उमेश शर्मा सम्मानित



हरिद्वार के उभरते कवि उमेश शर्मा को विगत दिनों हरिद्वार की साहित्यिक संस्था ‘सुमेरु’ ने ‘ब्रह्मकमल सम्मान’ से सम्मानित किया। उन्हें यह सम्मान 'सुमेरू' संस्था  के अध्यक्ष आचार्य राधेश्याम सेमवाल तथा नगर की एक अन्य साहित्यिक संस्था दीपशिखा के संस्थापक सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार श्री के. एल. दीवान के कर कमलों से प्रदान किया गया।  इससे पूर्व उमेश जी को  पंकस अकादमी, जालंधर ने भी  ‘पंकस अकादमी विशिष्ट सम्मान’ से सम्मानित किया था। (समा. सौजन्य : कुलभूषण शर्मा)



गोण्डा में सम्मान समारोह व कवि सम्मेलन सम्पन्न



          29 नवम्बर 2014 साहित्य प्रोत्साहन संस्थान मनकापुर गोण्डा (उप्र) के तत्वाधान मेँ  एक विशाल काव्य संध्या एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इण्डियन टेलीफोन इण्ड्रस्टीज मनकापुर के जनरल मैनेजर श्री ए.के साहा ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। संस्था द्वारा साहित्य मेँ अमूल्य योगदान के लिए वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओम नीरव (लखनऊ) को ‘साहित्य शिरोमणि’ सम्मान, श्री पुष्पेन्द्र यादव (जालौन) एवं श्री धीरज मिश्र (लखनऊ) को ‘साहित्य भूषण’ सम्मान, श्री गाफिल स्वामी (अलीगढ़) को ‘साहित्य रत्न’ सम्मान, डा. मंजुश्री गुप्ता (अजमेर,राजस्थान) को ‘साहित्य गौरव’ सम्मान तथा श्री राघवेन्द्र चिंगारी (जालौन) को ‘साहित्य श्री’ सम्मान के साथ स्मृति चिन्ह, शाल इत्यादि प्रदान किया गया। इसके उपरान्त कवि सम्मेलन प्रारम्भ हुआ! जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार ओम नीरव ने एवं मंच का संचालन वरिष्ठ कवि खालिद हुसैन एवं राजेश मिश्रा द्वारा किया गया! इस कार्यक्रम मेँ वरिष्ठ कवि सतीश आर्य, शायरा इशरत सुल्ताना, अनुराग मिश्र गैर, राधा कृष्ण मिश्र, हितेश शर्मा, रजनीश तपन, कन्हैया तिवारी, उमा प्रसाद लोधी, अवशेष कुमार विमल, रमेश नन्द, संतोष तन्हा, अशोक कुमार विश्वकर्मा, सुरजीत मान सिँह जलईया, पारस नाथ श्रीवास्तव, अभिनव सरकार आदि कवियों ने अपनी रचनाओँ से श्रोताओँ को मन्त्रमुग्ध कर दिया! कार्यक्रम के अंत मेँ संस्था के सचिव धीरज श्रीवास्तव द्वारा धन्यवाद ज्ञापन कर कार्यक्रम का समापन किया गया। (सौजन्य :  पुष्पेन्द्र यादव)  

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