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शुक्रवार, 29 जून 2012

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 1, अंक : 10, जून  2012

।।सामग्री।।

हिन्दी लघुकथा का विकास एवं मूल्यांकन’ से जुड़े प्रमुख चिंतन-बिंदुओं पर वरिष्ठ लघुकथा चिन्तक श्री बलराम अग्रवाल से जामिया मिलिया इस्लामिया वि.वि., नई दिल्ली में शोध हेतु सुश्री शोभा भारती की बातचीत 



बलराम अग्रवाल 

केवल लघु आकार ही लघुकथा की पठनीयता का प्रमुख आधार नहीं है : बलराम अग्रवाल




शोभा भारती : आपके विचार से हिन्दी की पहली लघुकथा किसे कहा जाना चाहिए और क्यों?
बलराम अग्रवाल :  इस प्रश्न के विस्तृत उत्तर के लिए आप कृपया मेरा लेख ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ पढ़ लें। यह ‘समांतर’ पत्रिका के लघुकथा विशेषांक जुलाई-सितम्बर, 2001 में प्रकाशित हुआ था और इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। लिंक है — http://www.laghukatha-varta.blogspot.com/2009/01/1.html

शोभा भारती :  लघुकथा के उद्भव को लेकर कुछ लोगों का मानना है कि इसका मूल पंचतंत्र, हितोपदेश और जातक कथाओं में है, जबकि कुछ लोग कहते हैं कि यह वर्तमान जीवन की विसंगतियों से उद्भूत है। आप क्या सोचते है?
बलराम अग्रवाल : मेरा सुझाव है कि लघुकथा से सम्बन्धित कुछ बारीकियों को आसानी से समझ लेने के लिए सभी को नहीं तो कम-से-कम लघुकथा विषयक शोधों से जुड़े लोगों को बारीक-सी एक विभाजन अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए। यह कि सन् 1970 तक की सभी लघ्वाकारीय कथा-रचनाएँ, वे चाहे दृष्टांत परम्परा की हों चाहे भाव परम्परा की हों, गम्भीर कथ्य परम्परा की हों या व्यंग्यात्मक पैरोडी परम्परा की, ‘लघुकथा’ हैं; और सन् 1971 से अब तक की लघुकथाएँ ‘समकालीन लघुकथा’ हैं। यह बात ‘लघुकथा’ के शनैः शनैः परिवर्तित व परिवर्द्धित स्वरूप के मद्देनज़र कही जा रही है। लघुकथा में यह परिवर्तन व परिवर्द्धन यद्यपि सन् 1965 के आसपास से दिखाई देना प्रारम्भ हो जाता है तथापि बहुलता के साथ यह सन् 1971 के बाद ही प्रकट होता है। इसलिए जिस लघु-आकारीय कथा-रचना का मूल पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाएँ अथवा अन्य पुरातन कथा-स्रोत बताए जाते हैं वह (इने-गिने अपवादों को छोड़कर, घनीभूतता के साथ सन् 1970 तक तथा विरलता के साथ 1975-76 तक भी) ‘लघुकथा’ है और जिसका उद्भव वर्तमान जीवन की विसंगतियों से बताया जा रहा है, वह पूर्व-कथित उसी ‘लघुकथा’ का विकसित स्वरूप ‘समकालीन लघुकथा’ है जिसका प्रादुर्भाव लगभग सभी लघुकथा-आलोचक 1971 से स्वीकार करते हैं।

शोभा भारती :  कथाकुल में जन्मी लघुकथा को आप उपविधा मानते हैं या विधा?
बलराम अग्रवाल : रचनात्मक साहित्य में मैं ‘उपविधा’ जैसे किसी भी प्रकार को प्रारम्भ से ही नहीं मानता। डॉ॰ उमेश महादोषी के इसी सवाल के जवाब में सन् 1988 में मैंने कहा था-“यह लघुकथा में लेखन के स्तर पर चुक गए कुण्ठित लोगों द्वारा छोड़ा गया शिगूफा है...” (देखें- लघुकथा विशेषांक ‘सम्बोधन’: सं॰ क़मर मेवाड़ी/पृष्ठ99)।

शोभा भारती :  आरम्भिक लघुकथाओं और आज की लघुकथाओं में आप क्या अन्तर पाते हैं?
बलराम अग्रवाल : आरम्भिक लघुकथाएँ आम तौर पर उपदेश और उद्बोधन की मुद्रा में नजर आती हैं या फिर व्यंग्य व कटाक्षपरक पैरोडी कथा के रूप में, जबकि समकालीन लघुकथा मानवीय संवेदना को प्रभावित करने वाली बाह्य भौतिक स्थिति अथवा आन्तरिक मनःस्थिति के चित्रण मात्र से पाठक मन में आकुलता उत्पन्न करने का, मस्तिष्क में द्वंद्व उत्पन्न करने का दायित्व-निर्वाह करती है। अध्ययन से सिद्ध होता है कि समकालीन लघुकथा पाठक के समक्ष सिर्फ निदान प्रस्तुत करती है, समाधान नहीं। 

शोभा भारती :  लघुकथा के उत्कर्ष के लिए लघुकथाकारों, संपादकों और प्रकाशकों द्वारा किए गये प्रयास क्या आपको पर्याप्त लगते हैं?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथा के उत्कर्ष के लिए मात्र लघुकथाकारों ने ही नहीं अन्य साहित्यकारों ने भी खासे प्रयास किए हैं। कथाकारों-कवियों में असगर वजाहत, विष्णु नागर, प्रेमपाल शर्मा, चित्रा मुद्गल, महेश दर्पण, प्रेमकुमार मणि आदि, आलोचकों में डॉ॰ कमल किशोर गोयनका, डॉ॰ ब्रजकिशोर पाठक, डॉ॰ सुरेश गुप्त, डॉ॰ रत्नलाल शर्मा, कृष्णानन्द कृष्ण आदि तथा संपादकों में कमलेश्वर, अवध नारायण मुद्गल, राजेन्द्र यादव, रमेश बतरा, प्रभाकर श्रोत्रिय, हसन जमाल, क़मर मेवाड़ी, अवध प्रताप सिंह, महाराज कृष्ण जैन व उर्मि कृष्ण, प्रकाश जैन व मोहिनी जैन, शैलेन्द्र सागर, बलराम, अशोक भाटिया, सुकेश साहनी, सतीशराज पुष्करणा, कमल चोपड़ा, डॉ॰ रामकुमार घोटड़ आदि के अवदान को नकारना असम्भव है। प्रिंट क्षेत्र के प्रकाशकों में अयन प्रकाशन के स्वामी श्रीयुत भूपाल सूद ने काफी लघुकथा संग्रह व संकलन प्रकाशित किए हैं। दिशा प्रकाशन, किताबघर व भावना प्रकाशन ने भी लघुकथा के संग्रह व संकलन वरीयता से प्रकाशित किए हैं। बावजूद इस सबके लघुकथा के उन्नयन का भाव किसी प्रकाशक के मन में रहा हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। बलराम द्वारा संपादित ‘विश्व लघुकथा कोश’ सन्मार्ग प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था, लेकिन वह विशुद्ध व्यापारिक एप्रोच का मामला प्रतीत होता है। लघुकथा के उन्नयन का अत्यन्त महत्वपूर्ण और साफ-सुथरा काम रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ व सुकेश साहनी की टीम ने ‘लघुकथा डॉट कॉम’ नाम से वेबसाइट संपादित करके किया है। इस कार्य में वे धन और बल दोनों खपा रहे हैं।

शोभा भारती :  कहानी और लघुकथा में आकार के अलावा क्या अंतर आप देखते हैं?
बलराम अग्रवाल :  सबसे पहले तो यह जान लेना आवश्यक है कि अनेक कथा-रचनाएँ छोटे आकार की होते हुए भी कहानी ही होती हैं, लघुकथा नहीं। इसलिए आकार में छोटी होने-मात्र के कारण ही किसी कथा-रचना को लघुकथा मान लेना न्यायसंगत नहीं है और न ही यह कि केवल लघु-आकार ही लघुकथा की पठनीयता और जनप्रियता का कारण है। कहानी सामाजिक विसंगतियों, असंगत मानवीय क्रिया-कलापों व मानसिक व्यापारों के कारणों और कारकों की पड़ताल तथा उनका खुलासा करती हुई पाठकीय संवेदना को छूने-जगाने का प्रयास करती है जबकि लघुकथा सामाजिक विसंगतियों, असंगत मानवीय क्रिया-कलापों व मानसिक व्यापारों को पाठक के सामने सीधे प्रस्तुत कर देती है तथा कथा-संप्रेषण में वांछनीय कारणों व कारकों का आभास कराती हुई उन्हें कथा के नेपथ्य में बनाए भी रखती है। कहानी को केन्द्रीय कथ्य के आजू-बाजू भी अनेक स्थितियों के दर्शन कराने, चित्रण करने की छूट प्राप्त है जबकि लघुकथा में यह अवांछित है क्योंकि ऐसा करने से लघुकथा के शैल्पिक-गठन में छितराव आ जाने का खतरा बराबर बना रहता है।

शोभा भारती :  लघुकथा अक्सर समाज की विसंगतियों की ओर ही इशारा करती है। क्या आपको लगता है कि इसमें मनुष्य की सकारात्मक भावनाओं का अंकन भी उतनी ही तीव्रता से सम्भव है?
बलराम अग्रवाल :  अलग-अलग कालखण्ड में सामाजिक आवश्यकताएँ, मानवीय प्राथमिकताएँ और साहित्यिक अपेक्षाएँ अलग-अलग ही हुआ करती हैं। निःसंदेह समकालीन लघुकथा का प्रारम्भिक काल समाज की विसंगतियों की ओर इशारा करने को वरीयता देने वाला ही रहा होगा। इस तथ्य को उस समय की अनेक सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं-दुर्घटनाओं के अध्ययन के द्वारा आसानी से जाना-समझा जा सकता है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि लघुकथाकारों का ध्यान मनुष्य की सकारात्मक भावनाओं की ओर अथवा मानवीय संवेदनशीलता के उत्कृष्ट पक्ष की ओर कभी गया ही नहीं। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘ऊँचाई’, रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’, सुकेश साहनी की ‘ठडी रजाई’, पृथ्वीराज अरोड़ा की ‘बेटी तो बेटी होती है’, स्वयं मेरी (यानी बलराम अग्रवाल की) ‘गोभोजन कथा’, श्यामसुंदर अग्रवाल की ‘संतू’, श्यामसुंदर दीप्ति की ‘हद’, अशोक भाटिया की ‘कपों की कहानी’, सुभाष नीरव की ‘अपने घर जाओ न अंकल’, विपिन जैन की ‘कंधा’ आदि अनगिनत लघुकथाएँ हैं जिनमें मनुष्य की सकारात्मक भावनाओं का, मानवीय संवेदनशीलता का अंकन सफलतापूर्वक हुआ है।

शोभा भारती :  कब कोई लघुकथा मात्र चुटकुला बनकर रह जाती है?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथा ही नहीं, कोई कहानी भी चुटकुला बनकर रह जा सकती है, अगर कथ्य-संप्रेषण की ओर कथाकार गंभीरता से अपने कदम न बढ़ाए और रचना-समापन में यथेष्ट सावधानी न बरते। अन्तर केवल यह है कि आकारगत लघुता वाली रचना को चुटकुला कह देना आसान होता है जबकि लम्बी रचना को चुटकुला न कहकर हास-परिहास की रचना कह दिया जाता है।

शोभा भारती : आज के समय में जब साहित्य अपना सामाजिक आधार खोता जा रहा है, क्या आपको लगता है कि लघुकथा अपनी पठनीयता के चलते साहित्य की प्रासंगिकता को वापस ला सकती है?
बलराम अग्रवाल :  समाज से कटा हुआ साहित्य ही अपना सामाजिक आधार खोता है, समूचा साहित्य नहीं। तुलसी, कबीर, खुसरो, ग़ालिब, प्रेमचंद, शरत् चंद्र आदि की रचनाएँ अपना सामाजिक आधार कभी खोएँगी, ऐसा लगता नहीं हैं। समकालीन हिन्दी लघुकथा में आपको मात्र ‘पठनीयता’ का गुण दिखाई देता है जबकि मुझे ‘सम्प्रेषणीयता’ का गुण भी भरपूर नजर आता है। ऐसे समय में, जब अधिकतर साहित्यिक विधाओं के सरोकार कुछेक क्लिष्ट अभिव्यक्तियों और नारेबाजियों में उलझकर आम आदमी से दूर महसूस होते हैं, समकालीन लघुकथा सहज और ग्राह्य कथन-शैली व शिल्प के चलते आम आदमी के एकदम निकट की विधा है और अपना साहित्यिक दायित्व बखूबी निभा रही है।

शोभा भारती :  चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा संग्रह ‘उल्लास’ को आर्य स्मृति सम्मान प्रदान करते हुए स्व॰ कमलेश्वर जी ने कहा था कि आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो गई है। आप इस स्थापना से कितने सहमत हैं?
बलराम अग्रवाल :  इस प्रश्न के जवाब में आप कृपया प्रस्तुत पंक्तियाँ भी पढ़िए और निश्चित करने का यत्न कीजिए कि लघुकथा 16अप्रैल 1989 में प्रो॰ निशान्तकेतु के आधार लेख की प्रस्तुति के उपरान्त पटना में ‘विधा’ स्वीकृत हुई, 16 दिसम्बर, 2000 को कमलेश्वर की घोषणा के बाद दिल्ली में ‘विधा’ स्वीकृत हुई या डॉ॰ रमेश कुन्तल मेघ की अध्यक्षता व डॉ॰ फूलचन्द ‘मानव’ की उपस्थिति में पंचकुला(हरियाणा) में 06 दिसम्बर २००९ को सम्पन्न गोष्ठी में? अपने एक लेख ‘बिहार का हिंदी लघुकथा संसार’ (पुस्तक- ‘भारत का हिंदी लघुकथा संसार’ सं॰ डॉ॰ रामकुमार घोटड़/पृष्ठ 57) में डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा लिखते हैं-“1989 का वर्ष लघुकथा के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष रहा। 16 अप्रैल 1989 को पटना लघुकथा लेखक-आलोचक सम्मेलन ’89 में प्रो॰ निशान्तकेतु द्वारा प्रस्तुत आधार लेख ‘लघुकथा’ की विधागत शास्त्रीयता के बाद विधा-उपविधा का विवाद समाप्त हो गया...” अर्थात लघुकथा को ‘विधा’ की मान्यता मिल गई। इस सम्बन्ध में अगर यह कहा जाय कि विधा-उपविधा का विवाद पटना में पैदा होकर लघुकथा-आलोचना से जुड़े विद्वत-समाज से किसी भी प्रकार के समर्थन के अभाव में प्रो॰ निशान्तकेतु के लेख की आड़ लेकर वहीं दफन होने को विवश हो गया तो अनर्गल नहीं होगा। 
    इस सम्बन्ध में प्रो॰ रूप देवगुण के एक लेख ‘हरियाणा का लघुकथा संसार’ (भारत का हिंदी लघुकथा संसार: संपादक-डॉ॰ राम कुमार घोटड़/पृष्ठ 84) की ये पंक्तियाँ भी दृष्टव्य हैं- ‘06 दिसम्बर, 2009 को साहित्य संगम संस्था, पंचकुला के सौजन्य से पंचकुला में डॉ॰ रमेश कुन्तल मेघ की अध्यक्षता में डॉ॰ फूलचन्द ‘मानव’ (पंजाब) के द्वारा एक लघुकथा गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में ‘लघुकथा का शिल्प और संरचना’ विषय पर प्रो॰ अशोक भाटिया, डॉ॰ सुरेन्द्र मंथन, रामकुमार आत्रेय, रतनचन्द ‘रत्नेश’, योगेश्वर कौर, डॉ॰ ज्ञानचंद शर्मा व मोहिन्द्र राठौड़ द्वारा एक सार्थक चर्चा की गई और डॉ॰ शशि प्रभा, चन्द्र भार्गव, विष्णु सक्सेना ने अपनी-अपनी लघुकथाएँ पढ़ीं। इस आयोजन में पधारे कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों ने पहली बार लघुकथा के अस्तित्व को स्वीकारा और माना कि लघुकथा भी साहित्य की एक स्वतंत्र विधा है।’ मैं समझता हूँ कि इस वक्तव्य में प्रो॰ रूप देवगुण का इशारा उक्त गोष्ठी के अध्यक्ष डॉ॰ रमेश कुन्तल मेघ व डॉ॰ फूलचंद ‘मानव’ सरीखे विद्वानों की ओर है जो 06 दिसम्बर, 2009 से पहले तक लघुकथा की विधागत अस्मिता से या तो परिचित नहीं थे या उसे स्वीकारने की स्थिति में स्वयं को नहीं पा रहे थे।
    और अन्त में आपके अभिमत पर विचार करते हैं। हिन्दी लघुकथा को गरिमापूर्ण साहित्यिक मंच प्रदान करने वाले संपादकों में कमलेश्वर निःसंदेह सर्वाेपरि रहे हैं। उनकी जिस उद्घोषणा की बात आपने की है वह 16 दिसम्बर, 2000 को सम्पन्न ‘आर्य स्मृति सम्मान समारोह’ में कही गई थी। उनकी घोषणा में आए ‘आज’ शब्द का अर्थ वह दिन-विशेष न मानकर काल-विशेष मानना चाहिए। यह ‘काल’ मुख्यतः सन् 1971 से लेकर उनके द्वारा की गई घोषणा वाले दिन और समय-विशेष तक फैला हुआ है। लघुकथा से जुड़े अधिकतर कथाकार, संपादक, आलोचक व शोधकर्ता उस दिन और उस समय-विशेष के बहुत पहले से लघुकथा को ‘विधा’ मानते चले आए हैं। ऐसा न होता तो सन् 1976 में जयपुर विश्वविद्यालय ‘हिन्दी लघुकथा’ को शोध-विषय हेतु पंजीकृत न करता और न ही ‘आर्य स्मृति सम्मान समारोह’ के आयोजकों (किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली) द्वारा सन् 1999 में ही सन् 2000 के सम्मान हेतु ‘लघुकथा’ की पांडुलिपियाँ आमन्त्रित करने सम्बन्धी घोषणा ही की जाती और न कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और चित्रा मुद्गल सरीखे वरिष्ठ कथाकार व कथा-विचारक निर्णायक बनने हेतु अपनी सहमति प्रदान करते। 

शोभा भारती :  आपकी दृष्टि में लघुकथा के समीक्षात्मक मानदंड क्या हैं?
बलराम अग्रवाल :  मेरी दृष्टि में ‘लघुकथा’ समसामयिक सरोकारों से जुड़ी कथा-रचना है। यह तो स्पष्ट ही है कि यहाँ जिस कथा-रचना को हम ‘लघुकथा’ कह रहे हैं, वह लघु-आकारीय गद्यात्मक कथा-रचना है। उसकी भाषा कितनी ही काव्यात्मक अथवा नाटकीय गुण-सम्पन्न क्यों न हो, वह गद्यगीत अथवा निरी काव्यकृति नहीं है। दूसरी बात यह कि एक लघुकथा किसी एक-ही संवेदन-बिंदु को उद्भासित करती होनी चाहिए, अनेक को नहीं। कथ्य-प्रस्तुति की आवश्यकतानुरूप उसमें लम्बे कालखण्ड का आभास भले ही दिलाया गया हो, लेकिन उसका विस्तृत ब्योरा देने से बचा गया हो। ‘लघुकथा’ में जिसे हम ‘क्षण’ कहते हैं वह द्वंद्व को उभारने वाला या पाठक मस्तिष्क को उस ओर प्रेरित करने वाला होना चाहिए न कि सूत्र-रूप में प्रस्तुत होकर कथाकार्य की इति मान बैठने वाला। कथ्य की प्रस्तुति के अनुरूप कोई कथाकार अनेक शिल्पों व शैलियों का प्रयोग करने को स्वतन्त्र है, लेकिन इस स्वतंत्रता का मनमाना दुरुपयोग न करके उसे विधा को आयाम देने हेतु प्रयासरत नजर आना चाहिए। लघुकथा की भाषा सहज ग्राह्य तथा प्रवाहमयी हो तथा पाठक को चमत्कृत करने मात्र की बजाय कथा कहने के नये मुहावरे गढ़ती-सी लगती हो। 

शोभा भारती :  लघुकथा के विचार-पक्ष पर आप क्या कहना चाहेंगे?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथा का विचार-पक्ष इस समय काफी पुष्ट है। शुरुआती दौर में रमेश बतरा, अवध नारायण मुद्गल, शंकर पुणताम्बेकर, भगीरथ, जगदीश कश्यप,    कृष्ण कमलेश आदि ने लघुकथा के विचार-पक्ष को मजबूती के साथ रखना प्रारम्भ किया था। उसी दौर की अगली कड़ी के रूप में डॉ॰ ब्रजकिशोर पाठक, कृष्णानन्द कृष्ण, निशांतकेतु, डॉ॰ कमल किशोर गोयनका आदि ने इसके विचार-पक्ष पर शोधपरक लेखों व साक्षात्कारों के माध्यम से इसे पुष्ट किया। परन्तु प्रारम्भ से लेकर अद्यतन हालत यह है कि प्रिंट-मीडिया की बहुत-सी वे पत्रिकाएँ जो लगातार लघुकथाएँ प्रकाशित करती आ रही हैं, इसके विचार-पक्ष को प्रस्तुत करने से कन्नी काट रही है; लेकिन संतोष और प्रसन्नता की बात यह है कि पूर्व में लगभग सभी लघु-पत्रिकाएँ तथा वर्तमान में लगभग सभी ई-पत्रिकाएँ तथा इंटरनेट ब्लॉग्स लघुकथाओं के साथ-साथ इसके विचार-पक्ष को भी ससम्मान स्थान दे रहे हैं। अतः विचार-पक्ष की प्रस्तुति में निर्वात की स्थिति नहीं है।

शोभा भारती :  क्या आप भी मानते हैं कि हिन्दी आलोचना ने लघुकथा को अपेक्षित तवज्जो नहीं दी?
बलराम अग्रवाल :  हिन्दी आलोचना अन्य विधाओं की भी समस्त उल्लेखनीय कृतियों पर अपेक्षित तवज्जो कब दे पा रही है? यों भी, एकांकी आदि नयी उद्भूत विधाओं को आलोचकों के बीच अपनी स्थापना के लिए लम्बा संघर्ष पूर्व में भी करना पड़ा है, अब भी करना पड़ रहा है और आगे भी करते रहना पड़ेगा।

शोभा भारती :  बीसवीं सदी की लघुकथा में आप क्या दुर्बलताएँ देखते हैं जिन्हें आने वाले समय में दूर किया जाना जरूरी है?
बलराम अग्रवाल :  मैं समझता हूँ कि बीसवीं सदी की लघुकथा ने निरंतर अपने-आप को परिष्कृत किया है और इसका जो रूप आज इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक के पहले वर्ष में आप देख रही हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि इस कथा-विधा से जुड़े कथाकारों में स्व-विवेक की कमी कभी रही नहीं। दुर्बलताएँ समय-सापेक्ष भी होती हैं। रचना-विधा का जो पक्ष आज प्रशंसनीय है, जरूरी नहीं कि आने वाले कल तक वह प्रसंशनीय ही बना रहेगा। इसलिए मैं समझता हूँ कि इस दिशा में मुझे ही नहीं, किसी को भी मसीहाई अंदाज़ अपनाते हुए सुझाव-विशेष देने की आवश्यकता नहीं है।

शोभा भारती :  पहली लघुकथा आपने कब लिखी?
बलराम अग्रवाल :  मेरी पहली प्रकाशित लघुकथा ‘लौकी की बेल’ थी जो श्रीयुत अश्विनी कुमार द्विवेदी के संपादन में लखनऊ से प्रकाशित होने वाली कथा-पत्रिका ‘कात्यायनी’ के जून 1972 अंक में प्रकाशित हुई थी।

शोभा भारती :  किस विधा में लिखकर आपको सबसे ज्यादा संतोष मिलता है?
बलराम अग्रवाल :  निश्चित रूप से लघुकथा में, लेकिन कभी-कभी कविता व कहानी में भी।

शोभा भारती :  लघुकथा की रचना के पीछे रचनाकार की मनःस्थिति के विषय में आप क्या बताना चाहेंगे? यानी वह क्या चीज़ होती है कि आप किसी कथ्य-विशेष को कविता या कहानी के बजाय लघुकथा में व्यक्त करना चाहते हैं?
बलराम अग्रवाल :  मेरा मानना है कि विश्वभर का मानव समुदाय आदम के ज़माने से ही किस्से-कहानियाँ सुनने-कहने में गहरी रुचि लेता है। एक उर्दू कहावत है- कम खर्च बाला नशीं; लघुकथाकार के लिए इससे तात्पर्य है- शाब्दिक मितव्ययता बरतते हुए आनन्दित रहना और मूछों पर ताव दिये घूमना। मन में कौन छोटी-सी बात गहरे चुभ जायेगी और समूचे अस्तित्व को हिलाकर रख देगी अथवा कौन-सा बड़ा हादसा धरती को हिलाकर रख देगा लेकिन मस्तिष्क को छू तक नहीं पायेगा- एकाएक कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं यद्यपि कविता में भी अभिव्यक्त होता रहता हूँ और गाहे-बगाहे कहानी में भी, लेकिन लघुकथा-लेखन जितना अभ्यस्त अन्य विधाओं में नहीं हूँ इसलिए इस विधा में अभिव्यक्त होना मुझे मारक भी महसूस होता है और संतोषप्रद भी।

शोभा भारती :  क्या आप कुछ ऐसे लघुकथाकारों के नाम लेना चाहेंगे जो आपको सचमुच लघुकथा के लिए वरदान लगते हैं?
बलराम अग्रवाल : ऐसे लघुकथाकारों की दो श्रेणियाँ सक्रिय रही हैं, ऐसा मेरा मानना है। पहली श्रेणी में मैं उन लोगों के नाम लेना चाहूँगा जिन्होंने लघुकथा के रचनात्मक और आलोचनात्मक- दोनों पक्ष आम तौर पर साहित्यिक राजनीति से विलग रहते हुए गम्भीरतापूर्वक सुधारे-सँवारे हैं और वैसा ही काम अब भी कर रहे हैं। वे हैं- भगीरथ, डॉ॰ सतीश दुबे, कमल चोपड़ा, सुकेश साहनी, सूर्यकांत नागर, अशोक भाटिया व बलराम। इनमें विक्रम सोनी व स्व॰ रमेश बतरा का नाम भी ससम्मान जोड़ा जाना चाहिए। कुछ अन्य सम्माननीय नाम कहने से छूट भी गये हो सकते हैं। दूसरी श्रेणी में वे लोग हैं जिन्होंने लघुकथा के रचनात्मक और आलोचनात्मक- दोनों पक्षों पर काम तो यथेष्ट किया लेकिन व्यावहारिक स्तर पर वे स्वयं को मर्यादित न रख सके जिसके कारण लघुकथा की विधापरक प्रतिष्ठा, गरिमा और सम्मान- तीनों ही, विद्वत् आलोचक-वर्ग के बीच लगातार क्षत हुए। यद्यपि मैं उनके नामों का उल्लेख करना यहाँ उचित नहीं समझ रहा हूँ तथापि लघुकथा से जुड़े वरिष्ठ हस्ताक्षर बिना बताए भी उन नामों को जानते हैं अतः पहचान लेंगे। 

शोभा भारती :  एक लघुकथाकार के रूप में आप हिन्दी समाज से क्या कहना चाहेंगे?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथाकार के रूप में मैं केवल हिन्दी समाज से ही नहीं समूचे मानव समुदाय से मुखातिब हूँ और अपनी बात को ‘प्रवचन’, ‘सैद्धांतिक आदेश’ या ‘नैतिक निर्देश’ के रूप में बोलने की बजाय रचनात्मक लघुकथा के रूप में ही रखना ज्यादा पसन्द करूँगा



  • शोभा भारती, 1773/31, शान्तिनगर, त्रिनगर, दिल्ली-110035
  • बलराम अग्रवाल, 70, उल्धनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली

200. निर्देश निधि

निर्देश निधि 




जन्म :  1962, जसपुर में। 


शिक्षा :  एम.ए. (इतिहास)। 




लेखन/प्रकाशन/योगदान :  कविता, कहानी, संस्मरण 
एवं सम-सामयिक लेख। कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। 
एक काव्य संग्रह एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशन हेतु तैयार।

सम्पर्क :  द्वारा डॉ. प्रमोद निधि, विद्याभवन, कचहरी रोड, बुलन्दशहर-203084 (उ.प्र.)
                      मोबाइल :  09358488084








अविराम में प्रकाशन 


मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में कविता ‘अगली सदी में’।
ब्लाग संस्करण :  सितम्बर 2011 अंक में कविता ‘भीड़’।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  
आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. 
किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन 
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गुरुवार, 28 जून 2012

199. ऊषा कालिया


ऊषा कालिया






ऊषा जी ने हाल ही में लिखना शुरु किया है। कुछेक रचनाएं प्रकाशित। 




सम्प्रति : एक राष्ट्रीयकृत बैंक में कार्यरत।




सम्पर्क :  घुग्गर नाले, चाणक्यपुरी, पालमपुर-176061, जिल-कांगड़ा (हि.प्र.)
                      मोबाइल :  09418833589






अविराम में प्रकाशन 


मुद्रित अंक :  जनवरी-मार्च 2012 अंक में एक कविता ‘बंटवारा’।
ब्लाग संस्करण :  जनवरी 2012 अंक में एक कविता ‘संस्कार’। 









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

198. सुरेश शर्मा


सुरेश शर्मा








जन्म :  6 मई 1938, इन्दौर में। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मूलतः कथाकार। लघुकथा में विशेष योगदान। पत्र-पत्रिकाओं एव संकलनों में अनेकों लघुकथाएँ प्रकाशित। लघु-पत्रिका ‘समान्तर’ के लघुकथा विशेषांक  तथा ‘काली माटी’ व ‘बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएं’ लघुकथा संकलनों का सम्पादन। चार कहानी संकलन संपादित। समांतर, क्षितिज, संयोग साहित्य आदि पत्रिकाओं के सम्पादन में सहयोग। तीन कहानी संग्रह (छोटे लोग, शोभा, थके पाँव) प्रकाशित।


 सम्मान :  माता शरबती देवी स्मृति सम्मान (2009) सहित कई सम्मान। 


सम्प्रति :  स्वतन्त्र लेखन।


सम्पर्क :  235, क्लर्क कालोनी, इन्दौर-452011 (म.प्र.)
                      दूरभाष :  0731-2553260 / मोबाइल : 09926080810








अविराम में प्रकाशन 


मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में दो लघुकथाएं ‘दहेज’ एवं ‘एक दूजे के लिए’।
ब्लाग संस्करण :  सितम्बर 2011 अंक में एक लघुकथा ‘अंधकूप’
                               मार्च 2012 अंक में एक लघुकथा ‘बदला’।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

197. डॉ. प्रेम कुमार


डॉ. प्रेम कुमार


सम्पर्क :  कृष्णा धाम कॉलोनी, आगरा रोड, अलीगढ़ (उ.प्र.)
                      मोबाइल :  09412176047




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ब्लाग संस्करण :  अक्टूबर 2011 अंक में कहानी ‘महाबली’।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

196. रुद्रपाल गुप्त ‘सरस’


196. रुद्रपाल गुप्त ‘सरस’


मूलतः कवि। पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित


सम्प्रति :  अध्यापक।




सम्पर्क :  ‘शिव सदन’, मुरार नगर, औद्यो. क्षेत्र सण्डीला, जिला- हरदोई-241127 (उ.प्र.)
             मोबाइल : 09451411925






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मुद्रित अंक : दिसम्बर 2011 अंक में पांच दोहे।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

195. आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’


195. आर. पी. शर्मा ‘महर्षि’






वरिष्ठ साहित्यकार महर्षि जी ग़ज़ल के विशेषज्ञ हैं। उनकी ‘ग़ज़ल-सृजन’ ग़ज़ल सीखने वालों के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है।




सम्पर्क :  फ्लैट नं.402, प्लॉट नं.11/ए, श्री रामनिवास टट्टा निवासी ब्भ्ैए पेस्टम सागर रोड नं.3, महल-घाटकोपर रोड, चेम्बूर, मुम्बई-400089
            मोबाइल : 09321545179




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मुद्रित संस्करण :  जून 2011 अंक में एक जनक छन्द।
ब्लाग संस्करण :  अक्टूबर 2011 अंक में पांच जनक छन्द।









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194. राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पण’


राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पण’






जन्म : 20 जून 1967, उज्जैन में। 


शिक्षा : वाणिज्य स्नातक एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  प्रमुखतः कविता एवं व्यंग्य विधाओं में। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। दैनिक अवंतिका में वक्रदृष्टि (व्यंग्य का साप्ताहिक) व कारतूस (क्षणिकाओं का दैनिक) तथा दैनिक अग्निपथ में ‘सीधी बात’ (क्षणिकाओं का दैनिक) स्तम्भों का नियमित लेखन। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मृति सरल काव्यांजलि साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष। 


सम्प्रति :  उज्जैन नगरपालिका निगम में सेवारत।


सम्पर्क : 129, ‘प्रयास’, अभिषेक नगर, इन्दौर मार्ग, उज्जैन-456010 (म.प्र.)
                मोबाइल :  09926958436






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ब्लाग संस्करण :  नवम्बर 2011 अंक में व्यंग्यालेख ‘पेट्रोल आसमान पर!’









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193. डा. राजकुमार निजात


डा. राजकुमार निजात






जन्म :  01.04.1953, सिरसा, हरियाणा में। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  लेखन कविता, ग़ज़ल, कथा साहित्य, समीक्षा, निबन्ध, व्यंग्य आदि सभी विधाओं में। दो ग़ज़ल संग्रह (रोशनी का सफर, तपी हुई जमीन), दो कहानी संग्रह (सलवटें, अचानक), एक लघुकथा संग्रह (कटा हुआ सूरज), एक उपन्यास (साये अपने-अपने), एक कविता संग्रह (अब तुम रहने दो), तीन बालगीत संग्रह प्रकाशित। लगभग आधा दर्जन पुस्तकों का सम्पादन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन एवं दूरदर्शन व आकाशवाण्ी से प्रसारण। निजात जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर शोध हेतु एक पी-एच.डी. की उपाधि। एम. फिल. व एम.ए. स्तर के कई अन्य शोध जारी। 


सम्मान :  साहित्य महोपाध्याय की मानद उपाधि सहित अनेक सम्मानों व उपाधियों से विभूषित। 


सम्प्रति : लोकल ऑडिट विभाग, हरियाणा में अधिकारी संवर्ग से सेवानिवृति के बाद लेखन को समर्पित। 


सम्पर्क :  कंगनपुर रोड, कीर्ति नगर, सिरसा-125055, हरियाणा
              मोबाइल : 09416729760 एवं 9466520760






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ब्लाग संस्करण :  सितम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल।











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२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

192. नित्यानन्द ‘तुषार’


नित्यानन्द ‘तुषार’






जन्म :  31.10.1963, ग्राम देवटा जिला बुलन्दशहर (उ.प्र.) में।


शिक्षा : बी.ई. (सिविल इंजीनियरिंग) एवं एम.ए. (हिन्दी)।


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मूलतः ग़ज़लगो। दोहा एवं हाइकु में भी लेखन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं सत्तर से अधिक संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। दूरियों के दिन, सितम की उम्र छोटी है, वो ज़माने अब कहाँ, हम कहाँ हैं एवं ‘अगर साथ दो’ मौलिक प्रकाशित कृतियां। आठ संकलनों का सम्पादन-चयन। वार्षिक साहित्यिक पत्रिका ‘युग वंशिका’ का सम्पादन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों से प्रसारण। कवि सम्मेलनों में सहभागिता। कुछ एल्बमों एवं निर्माणाधीन फिल्मों के लिए भी गीत-लेखन।


सम्प्रति : साहित्य सेवा के साथ सिविल इंजीनियर।


सम्पर्क : आर-64, सेक्टर-12, प्रताप विहार, गाजियाबाद-201009 (उ.प्र.) 
               दूरभाष : 0120-2742464/मोबाइल: 9968046643 एवं 9927800787 
               ई मेल : ntushar63@gmail.com








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मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल।
ब्लाग संस्करण :  नवम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

191. श्रीरंग


श्रीरंग


जन्म :  01.07.1964, इलाहाबाद में।


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मूलतः कवि। अधिकांश प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। दूरदर्शन व आकाशवाणी से कविताएँ प्रसारित। कविता संग्रह ‘यह कैसा समय’, ‘मीर खाँ का सजरा’ एवं ‘नुक्कड़ से नोमपेन्ह’ प्रकाशित कृतियाँ। बांग्ला, मराठी व अन्य भारतीय भाषाओं में चुनिन्दा कविताएँ अनूदित/प्रकाशित। जनवादी लेखक संघ (जलेस) के सदस्य।


सम्मान :  उत्तर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल द्वारा ‘हिन्दी सेवी सम्मान 2002’।


सम्प्रति :  स्थाई अधिवक्ता, उत्तर प्रदेश शासन, उच्च न्यायालय, इलाहाबाद।


सम्पर्क :  128-एम/1-आर, कुशवाहा मार्केट, भोला का पूरा, प्रीतम नगर, इलाहाबाद (उ.प्र.)
               फोन : 09335133894/09807103685






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मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में कविता ‘केवल कुछ लोग’।
ब्लाग संस्करण :  जनवरी 2012 अंक में कविता ‘कवि भर नहीं’।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

190. किशोर श्रीवास्तव


किशोर श्रीवास्तव






आयु : लगभग 48 वर्ष। 


शिक्षा :  एम.ए., एलएलबी,  संपादन कला विशारद, पीजीजेएमसी, संगीत (गायन/वादन) में कनिष्ठ डिप्लोमा आदि। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  कविता व्यंग्य, कहानी व लघुकथा में लेखन के साथ चित्रकारी एवं गायन-वादन में भी रुचि। अभागा राजकुमार (बाल उपन्यास), अच्छी सेहत के नुस्खे, पक्षियों के सुंदर घर, पक्षियों की एकता एवं रिश्तों की डोर व अपना घर (बाल कहानी संग्रह), खरी-खरी (सामाजिक कार्टूनों एवं लघुरचनाओं का संग्रह), कटाक्ष (लघुकथा संग्रह), आप बीती, जग बीती (व्यंग्य संग्रह) आपकी प्रकाशित कृतियां हैं। देश की सैकड़ों पत्र/पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित एवं आकाशवाणी व दूरदर्शन चैनलों पर प्रसारण। एनसीईआरटी द्वारा मुहावरों व कहावतों पर केंद्रित बाल धारावाहिक में अभिनय व बांसुरी वादन। अनेक बाल नाटकों में संगीत दिया। अपने कार्टून, लघु-कथाओं एवं छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से विभिन्न सामाजिक/साम्प्रदायिक विसंगतियों पर कटाक्ष करती एवं सामाजिक/साम्प्रदायिक सद्भाव व मैत्री-भाईचारे के प्रचार-प्रसार हेतु निर्मित लगभग 100 रंगीन पोस्टरों की प्रदर्शनी खरी-खरी’ का वर्ष 1985 से देश के विभिन्न स्थानों पर निःशुल्क प्रदर्शन। 


सम्मान :  स्व. जगदीश कश्यप स्मृति लघुकथा सम्मान व चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट बाल कहानी पुरस्कार सहित कई सम्मानों से विभूषित। 


सम्प्रति :  नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार के एक कार्यालय में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत व ‘हम सब साथ साथ’ पत्रिका का सम्पादन। 


सम्पर्क :  916- बाबा फरीदपुरी, पश्चिमी पटेल नगर, नई दिल्ली-110008 
                     मोबाइल :  09868709348
                    ई मेल :  kishor47@live.com, kishorsemilen@gmail.com 
                    संचालित ब्लॉग : http://srivastavakishor.blogspot.com,
                                                 http://kharikharicartoons.blogspot.com,             
                                                 http://humsabsathsath.blogspot.com





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मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में लघुकथा ‘भूख की समझ’।
                    अप्रैल-जून 2012 अंक में लघुकथा ‘माहौल’।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

189. डॉ. राम कुमार आत्रेय


डॉ. राम कुमार आत्रेय




जन्म :  1 फरवरी 1944।


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मुख्यतः कथा साहित्य एवं बाल साहित्य में योगदान। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन। कहानी,  लघुकथा, एवं बाल साहित्य पर कई पुस्तकें प्रकाशित।


सम्पर्क :  864, ए/12, आजाद नगर, कुरुक्षेत्र-136119 (हरियाणा)
             मोबाइल : 09416272588 






अविराम में प्रकाशन 


मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 अंक में नरेश कुमार उदास की दो पुस्तकों की समीक्षाएं- कविता संगह ‘हमारे       सपनों के हत्यारे’ की    समीक्षा ‘प्रगतिशील विचारधारा की प्रयोगधर्मी कविताएं’ तथा बाल कविता संग्रह ‘बच्चे होते हैं अच्छे’ की समीक्षा ‘सन्देशप्रद बाल कविताएं’।
ब्लाग संस्करण :  नवम्बर 2011 अंक में नरेश कुमार उदास के कहानी संग्रह ‘माँ गांव नहीं छोड़ना चाहतीं’ की समीक्षा ‘रोचक व मर्मस्पर्शी कहानियाँ’।













नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

188. डॉ. अर्पिता अग्रवाल


डॉ. अर्पिता अग्रवाल






सम्पर्क : 120 बी/2, साकेत, मेरठ-250003 (उ.प्र.)






अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 अंक में श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं डॉ. भावना कुँअर द्वारा सम्पादित हाइकु संकलन ‘चन्दनमन’ की समीक्षा ‘चन्दनमन: एक अद्वितीय हाइकु संकलन’।











नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

187. ज्योति जैन


ज्योति जैन






जन्म :  27 अगस्त 1964 को मंदसौर, म.प्र. में।


शिक्षा :  स्नातक।


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मुख्यतः कथा साहित्य एवं समीक्षा में लेखन। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। ‘जलतरंग’ (लघुकथा संग्रह) एवं भोरवेला (कहानी संग्रह) प्रकाशित कृतियां।


सम्मान :  सृजन शिल्पी, श्रीमती शारदा देवी पांडेय स्मृति सम्मान आदि से विभूषित।


सम्पर्क :  1432/24, नन्दानगर, इंदौर-452011 (म.प्र.)।
             मोबाइल: 09300318182






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मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 में श्री सुरेश शर्मा सम्पादित लघुकथा संकलन ‘बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएं’ की समीक्षा ‘सिलवटों वाले चेहरों की व्यथाएं’। 











नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

186. डॉ. नसीम अख़्तर


डॉ. नसीम अख़्तर






जन्म : 05.05.1956।


शिक्षा :  एम.ए. (उर्दू), पी-एच.डी., मुंशी, कामिल, मोअल्लिमे उर्दू।


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मुलतः ग़ज़ल, साथ-साथ कई अन्य विधाओं में लेखन। पत्र-पत्रिकाओं एवं दो दर्जन से अधिक संकलनों में रचनाएं प्रकाशित। अलीगढ़ से प्रकाशित पत्रिका ‘जर्जर कश्ती’ का मार्च 2012 अंक ‘डॉ. नसीम अख्तर विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित। 


सम्मान :  ग़ज़ल के लिए सर्जनात्मक सुतुष्टि संस्थान, जोधपुर द्वारा श्री रतनलाल शर्मा ‘बदनाम’ पुरस्कार तथा म.प्र. तुलसी साहित्य सम्मान 2011 से सम्मानित।


संप्रति :  वरिष्ठ शिक्षक।


संपर्क :  जे. 4/59, हंस तले, वाराणसी-221001 (उ.प्र.) 
             फोन :  08004233796








अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल।
ब्लाग संस्करण :  दिसम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल।











नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

185. शिरोमणि महतो


185. शिरोमणि महतो






जन्म :  29.07.1973।


शिक्षा :  हिन्दी में स्नातकोत्तर। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  कवि-कथाकार महतो जी की रचनाएँ अधिकांश प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। उपेक्षिता (उपन्यास) तथा कभी अकेले नहीं (कविता संग्रह) आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। संकेत ने महतो जी की रचनाधर्मिता पर केन्द्रित विशेषांक भी प्रकाशित किया है।  


सम्मान :  जनकवि रामबली परवाना स्मृति सम्मान से सम्मानित। 


सम्प्रति :  अध्यापन एवं ‘महुआ’ व ‘पंख’ पत्रिकाओं का सम्पादन। 


सम्पर्क :  नवाडीह, बोकारो-829144 (झारखण्ड)
             मोबाइल :  09931552982






अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 अंक में कविता ‘अकाल’।











नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

184. डा. राजेन्द्र मिलन


डा. राजेन्द्र मिलन








शिक्षा :  एम.ए., पी-एच.डी., साहित्य रत्न, आरडीएस लन्दन। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार एवं व्यंग्यकार मिलन जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में महत्वपूर्ण योगदानकिया है। मिलन जी वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रखर चिन्तक तो हैं ही, वह आगरा में अनेक सामाजिक गतिविधियों के केन्द्र बिन्दु भी हैं। नगर महापालिका आगरा में विभिन्न पदों के साथ आगरा की सुप्रसिद्ध जोन्स पब्लिक लाइब्रेरी एवं अनेंको साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के गवाह सुप्रसिद्ध ऑडीटोरियम ‘सूर सदन’ के प्रबन्धन से भी वह सम्बद्ध रहे हैं। उपन्यास एवं अन्य विधाओं पर डॉ. मिलन जी की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। 


सम्मान :  देश-विदेश में मिलन जी को अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।


सम्पर्क :  मिलन मंजरी, आजाद नगर, खंदारी, आगरा-282002, उ.प्र.
               मोबाइल :  09411841430
              ई मेल : rajendramilan.milan@gmail.com




अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल।
                   जनवरी-मार्च 2012 अंक में व्यंग्यालेख ‘इस गौर तलब शेर से मुखातिब हों’।
ब्लाग संस्करण :  अप्रैल-मई 2012 अंक में व्यंग्यालेख ‘इन्टेलेक्चुअल इलेक्शन’।









नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

183. सत्येन्द्र तिवारी


सत्येन्द्र तिवारी






जन्म :  26.12.1947, उज्जैन, म.प्र. में। 


शिक्षा :  स्नातक स्तर तक। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मूलतः गीतकार, यदाकदा काव्य की अन्य विधाओं में भी सृजन। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। 


सम्मान :  विप्रा कला साहित्य मंच, मुरादाबाद द्वारा उत्कृष्ट गीत कवि सम्मान’ से सम्मानित।
सम्प्रति :  निजी क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित संस्थान से सेवानिवृति के बाद स्वतन्त्र लेखन।
सम्पर्क :  20/71, गुप्ता बिल्डिंग, रामनारायण बाजार, कानपुर-208001, उ.प्र,
                       मोबाइल :  09935366560






अविराम में प्रकाशन 


मुद्रित अंक :  सितम्बर 2011 अंक में गीत रचना ‘अंजुरी में लें आंसू’।
ब्लाग संस्करण : नवम्बर 2011 अंक में गीत रचना ‘शब्द तूती बज रही है’।







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