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सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

अविराम विस्तारित


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०६, जनवरी २०१२ 


।।व्यंग्य वाण।।

सामग्री : ओम प्रकाश मंजुल का व्यंग्यालेख 'सौ रुपये में भारत माता की जय'।


ओम प्रकाश मंजुल



सौ रुपये में भारत माता की जय

    भारत सदा से ही जयकारों का देश रहा है, यह बात अलग है कि हमारे देश में जहाँ वर्ष भर नेताओं के जयकारे लगते हैं, वहाँ ‘स्वतन्त्रता दिवस’ (15 अगस्त) और ‘गणतन्त्र दिवस’ (26 जनवरी)- दो ही दिन ऐसे आते हैं, जब हमें ‘भारत माता की जय’ की याद आ पाती है। ‘गणतन्त्र दिवस’ के पावन पर्व पर मुझे भी भारत माता की जयकार से सम्बन्धित एक घटना याद आ रही है।
    प्रसंग कुछ वर्ष पूर्व हमारे पूर्व विद्यालय के नेपाल गये टूर से सम्बद्व है। भारतस्थ ‘बनबसा’ की कस्टम चेकपोस्ट ‘गड्ढा चौकी’ पर हम लोग अपनी बस द्वारा नेपाल पहँुचे। हमने वहाँ के महानगर ‘महेन्द्र नगर’, जो अपनी सुपर मार्केट के लिए अर्ध एशिया में पूर्ण प्रसिद्ध है, का भ्रमण किया। हमें वहाँ की शांत सड़कें और शांत वातावरण बहुत भाया। हमने अपनी यह हर्षानुभूति वहाँ के एक दुकानदार से प्रकट की, तो वह उदास होकर बोला, ‘‘यह भी कोई खुशी की बात है, हम तो इस फैंसी मार्केट में फिश (झख) मारते रहते हैं। मजा तो भारत के महानगरों में है, जिनकी सड़कें पार करने में ही आधा घंटा पास हो जाता है और जहाँ की दुकानें ग्राहकों से खचाखच-ठसाठस भरी रहती हैं’’। वहाँ एक सब्जी कटर की कीमत ढाई सौ रुपये (आज की आठ सौ रुपये) बताई गयी। यह सोने-चाँदी की तो नहीं, पर जापान की बनी जरूर थी। दुकानदार ने उसका विरद वर्णन इस प्रकार किया, ‘‘भारतीय इसे अति गर्व के साथ खरीदकर ले जाते हैं, जबकि नेपाली मात्र ढाई रुपल्ली वाली छुरी भारत से खरीदकर लाते है’’। दोनों के दृष्टिकोंण में कितना बड़ा अन्तर! भारतीयों को विदेश की फैंसी छुरियाँ पसंद हैं, जबकि विदेशियों को भारत के ‘रफ एण्ड टफ’ चाकू अच्छे लगते हैं।
   लौटते समय हम लागों को ‘गड्ढा चौकी’ के चबूतराई चरित्र वाले कस्टम अधिकारियों ने चेकपोस्ट पर रोक लिया और सभी की सर्च चाही। सर्चदल के आपसी सम्बोधनों से संकेत मिला कि उनमें एक मिस्टर मिश्रा, एक मिस्टर खान तथा एक मिस्टर सिंह थे। इस त्रिमूर्ति के ही बीच ‘श्वेत परिधान बीच सुकुमार’ एक शस्यश्यामला सुन्दरी भी शोभित थी, जिसका, काम चलाने के लिए हम उसके वस्त्र या वर्ण के आधार पर ’महाश्वेता’ या ‘महाकाली’ कोई भी नाम रख सकते हैं। मोल-भाव की शैली से यूँ तो ये सभी मूलतः सुविधा-शुल्की लगे, पर मिस्टर खान की खासियत यह थी कि वे अं्रग्रेजीग्रस्त हिन्दी बोल रहे थे, सो वह ग्रीक-लैटिन हिन्दी में ‘फिफ्टी-फिफ्टी पर हेड’ के रेट से बारगेनिंग कर रहे थे, जबकि उदार-उदरा महिला मात्र दो रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से धंधा के लिए बेताब थी। इधर हमारे भ्रमण-दल का प्रमुख, जो नेताई नेचर और कल्चर का था और ऐसी न जाने कितनी महिलाओं की ऐसी की तैसी कर चुका था, ने कुल योग माने नेट टोटल सौ रुपये में ही ‘डील’ पक्की कर ली। मुझे डर था कि ये लोग हमारे मुखिया के मुख पर यह कहकर सौ का पत्ता न मार बैठें, ‘‘तुमने हमारी औकात सिर्फ सौ रुपये समझी है? हमारे पाँच सौ रुपये तुम्हें ‘फौरन रिटर्न’ बनाने के ही हो गये, ‘इम्पोर्टेड माल’ अलग से लाये हो। पुलिस, फारेस्ट, बिजली, कोर्ट, क्लर्क और नेताओं के सुविधा-शुल्क का ग्राफ आकाश छू रहा है और हमें तुम अब भी गिरी नजर से देख रहे हो। हमने तो स्टूडेन्ट्स की खातिर पहले ही आपको खासा बोफोर्स खिला दिया है। हमें चारा ही डाल दो।’’ पर, प्रभु को धन्यवाद, ऐसा हुआ नहीं। सिंह साहब द्वारा पत्ता पकड़े जाने पर वे सब कमल जैसे खिल गये। और सिंह साहब की राष्ट्रीय भाव की तो वह स्थिति थी, जो शुगर के पैशेन्ट की पेसाब करने से पूर्व हुआ करती है। उनने नोट को हवा में तिरंगा की तरह लहराते हुए अति अधीरता से बुलन्द आवाज में कहा, ‘‘एक बार जोर से बोलिए, ‘भारत माता की जय’’। हम सभी उच्चाशयों ने ऊँची आवाज में भारत माता का जयकारा दोहराया और हम लोग ‘जान बची तो लाखों पाये’ वाले आतुर अंदाज से आगे बढ़े। आगे एक साथी ने टिप्पणी की, ‘‘कितने कमीने थे! घूस लेने की खुशी में ‘भारत माता की जय’ बोलते हैं। एक वे थे जो भारत की आजादी के लिए फाँसी पर झूलने से पूर्व ‘भारत माता की जय’ बोला करते थे’’। दूसरे साथी ने तर्क को कुतरते हुए टिप्पणी के प्रति टिप दिया, ‘‘अपना-अपना जरिया-नजरिया है- एक ब्राह्मण ने एक वैश्या बिठा ली। इस पर कुछ ने ब्राह्मण की बुराई की तो कुछ ने कहा, ‘‘देखा! ब्राह्मण ने कितना वरेण्य कार्य किया, एक वैश्या को ब्राह्मणी बना दिया।’’
   सुधी व बुधी पाठक बन्धु! कृपया आप बताएँ- सौ रुपये में भारतमाता की जय अपको कैसे लगी? सस्ती, महँगी या मीरा के शब्दों में कहें तो, ‘‘लियो तराजू तौल’ याने ‘नो नफा, नो नफी’ वाली।

  • कामायनी, कायस्थान, पूरनपुर, जिला-पीलीभीत (उ.प्र.)

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