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बुधवार, 24 मई 2017

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अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2016





डॉ. अनीता देवी
ज्वलन्त समस्याओं को चित्रित करती व्यंग्य रचनाएँ


हिन्दी साहित्य की विधाओं में व्यंग्य विधा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम हैं। इसके द्वारा जीवन के विविध आयामों का प्रस्तुतिकरण अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता है। व्यंग्यात्मकता के माध्यम से मानव जीवन में विघटित विसंगतियों व बिडम्बनाओं की सफल अभिव्यक्ति मन को स्पर्श कर जाती है। ‘ख्यालीराम कुंआरा रह गया’ मधुकांत की व्यंग्यात्मक रचनाओं का पहला संग्रह है। लेखक ने समाज में बिगड़ते लिंग अनुपात, नेताओं के काले चेहरों पर आदर्श के मुखौटे, कन्या भ्रूण हत्या, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता, नेतागीरी में वंश परम्परा, रेल व्यवसाय में घाटा, लीडरशिप, मिड-डे-मील घोटाला, स्कूल व्यवस्था में भ्रष्टाचार व आधुनिक शिक्षा पद्धति के दोषपूर्ण होने के कारण होनहार विद्यार्थियों के भी डगमगाते आत्मविश्वास का अत्यन्त मार्मिक, हृदयग्राही एवं सफल चित्रण किया है।
    इस संग्रह की प्रथम रचना ‘नेता ख्यालीराम भीड़ में’ एक नेता के उस चरित्र का वर्णन करती है, जो आदर्श जीवन जीना तो नहीं चाहता लेकिन आदर्शमयी दिखना अवश्य चाहता है। यह रचना आदर्श का मुखौटा पहनने वाले नेताओं पर करारा व्यंग्य है।
     आज देश में मिलावट का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। दूसरा व्यंग्य ‘असली नकली ख्यालीराम’ इसी मिलावटी कारोबार पर करारा व्यंग्य है। ख्यालीराम जैसे व्यक्ति मिलावट की चर्चा तो करते हैं परन्तु कुछ ठोस कार्य नहीं करते।
     संग्रह की तीसरी रचना समाज में बिगड़ते लिंग अनुपात अर्थात लड़कियों की घटती संख्या के फलस्वरूप कुँआरे लड़कों की मानसिक वेदना का चित्रण है। कन्या भ्रूण की हत्याओं से घटती लड़कियों की जनसंख्या के फलस्वरूप गली-मौहल्ले में कुँआरे घूमते लड़कों और माँ-बाप की यही वेदना एक दिन कन्याओं की आवश्यकता का महत्व जता देगी।
    ‘मार्किंग मास्टर ख्यालीराम’ में मूल्यांकन पद्धति का चित्र प्रस्तुत किया गया है। रचनाकार का मानना है कि शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय छात्रों की उत्तर-पुस्तिकाओं का पुनः मूल्यांकन करा ले तो बड़े भयानक परिणाम सामने आ सकते हैं। देश के होने वाले कर्णधारों के साथ ऐसा भद्दा मजाक किया जाएगा तो कैसे उनकी आस्था शिक्षा के साथ जुड़ पाएगी!
     सरकार जनता से टैक्स के रूप में या अन्य साधनों से जो धन जुटाती है, उसकी किस प्रकार बंदर-बांट करके मौज मस्ती की जाती है। इस विषय पर ‘तम्बाकू मंत्री ख्यालीराम’ में दर्शाया गया है।
     देश में रीढ़ की हड्डी समझी जाने वाली रेलवे सदैव घाटे का व्यवसाय कर रही है, क्योंकि इसमें अनेक स्थानों पर भ्रष्टाचार के छिद्र हैं। हाल ही की घटना है 10 करोड़ का रेलवे प्रमोशन घोटाला। जिसमें नियमों को ताक पर रखकर भाई-भतीजावाद की परम्परा को अपनाकर प्रमोशन सीनियॉरिटी के आधार पर नहीं होता। यात्री बेटिकट क्यों चलता है? रेल मन्त्रालय ने न तो इसकी विवशता को समझा और न ही इसको रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाया। 
    नेता बनाने की ‘लीडरशिप एकेडमी’ खुलते ही जो भीड़ इकट्ठी हुई, उससे पता लगता है कि देश में नेतागीरी करने का कितना बड़ा मोह लोगों ने पाल रखा है। अयोग्य से अयोग्य और चरित्रहीन व्यक्ति भी नेता बनने का सपना देखने लगा है। आजादी के 64 वर्ष बीत जाने के बाद भी आज योग्य और प्रशासनिक अधिकारी नेताजी की गुलामी करने के लिए विवश है। ‘विद्याव्रत की अन्त्येष्टि’ पूर्णतया व्यंग्य रचना नहीं है, बल्कि एक रचनाकार की आत्मपीड़ा है।
     कमोवेश प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में किसी न किसी मास्टर का भूत घूमता रहता है, जो कहीं कुछ भी ठीक नहीं होने देगा। कभी मिड-डे-मील में घोटाला तो कभी सामान खरीद में, कभी फंड्स में तो कभी अबोध बालिका पर बुरी नजर... न जाने क्या-क्या।
    यदि सरकार केवल काम के दिनों का वेतन देने लगे तो कर्मचारियों को छुट्टी का दिन सबसे खराब लगेगा। व्यंग्य ‘छुट्टी मास्टर ख्यालीराम’ में छुट्टी के प्रति कर्मचारियों के दृष्टिकोंण को चित्रित करने के साथ उस मजदूर की बात भी कही है जो अचानक छुट्टी हो जाने पर अपने घर खाली हाथ लौटता है।
    ‘स्कूल की मुँडेर पर उल्लू’ स्कूल व्यवस्था के भ्रष्टाचार पर करारा व्यंग्य है। एक ओर अध्यापक को राष्ट्र निर्माता का सम्माननीय पद दिया गया है। जब समाज में अध्यापक ही भ्रष्टाचारी व लालची हो जाएगा तो देश का निर्माण कौन करेगा!
    ‘भूकम्प’ में एक कर्मठ अध्यापक छुट्टी लिए बिना, कोई शुल्क लिए बिना, पढ़ाने के लिए छात्रों को बुलाए। प्राकृतिक आपदा घटने पर उस अध्यापक पर यह अभियोग चलाया जाए कि उसने छुट्टी वाले दिन छात्रों को पढ़ाने के लिए क्यों बुलाया और इसी अपराध में उसे पदच्युत कर दिया जाए तो कौन अध्यापक छात्रों के लिए परिश्रम करेगा। गुरु पर जब इतने बंधन लग जाएंगे तो क्या अध्यापक अपने गुरुत्व की रक्षा कर पाएगा?
     रचनाकार का व्यंग्य विधा में प्रथम प्रयास सफल व उच्चकोटि का है। जिसमें भारतीय समाज की ज्वलन्त समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए इन्हें सुलझााने के प्रयास किए हैं।
ख्यालीराम कुंआरा रह गया : व्यंग्य संग्रह : मधुकांत। प्रकाशक : निहाल पब्लिेकेशन्स एण्ड बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स, सी-70, गली नं. 3, उत्तरी छज्जूपुर, दिल्ली। मूल्य : रु.200/- मात्र। पृष्ठ : 96। संस्करण : 2013। 
  • हिन्दी विभाग, भक्तफूल सिंह महिला डिग्री कॉलेज, खानपुरकलाँ, सोनीपत (हरि.)/मो. 09992572003

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