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बुधवार, 24 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर -दिसम्बर 2016



लघुकथा : अगली पीढ़ी

कृष्णचन्द्र महादेविया

{लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित इस स्तम्भ का आरम्भ अविराम साहित्यिकी के मुद्रित प्रारूप में जनवरी-मार्च 2015 अंक से किया गया था। उसी सामग्री को इंटरनेट पर अपने पाठकों के लिए भी हम क्रमश: उपलब्ध करवाना आरम्भ कर रहे हैं। 
इस स्तम्भ का उद्देश्य लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन में अच्छी चीजों को तलाशना और रेखांकित करना है। अपेक्षा यही है कि ये लघुकथाकार अपने समय और सामर्थ्य को पहचानें, कमजोरियों से निजात पायें और लघुकथा को आगे लेकर जायें। यह काम दो तरह से करने का प्रयास है। सामान्यतः नई पीढ़ी के रचनाकार विशेष के उपलब्ध लघुकथा लेखन के आधार पर प्रभावित करने वाले प्रमुख बिन्दुओं व उसकी कमजोरियों को आलेखबद्ध करते हुए समालोचनात्मक टिप्पणी के साथ उसकी कुछ अच्छी लघुकथाएँ दी जाती हैं। दूसरे प्रारूप में किसी विशिष्ट बिषय/बिन्दुओं (जो रेखांकित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो) पर केन्द्रित नई पीढ़ी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं में उन लघुकथाकारों की रचनात्मकता के बिन्दुओं की प्रस्तुति कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं के साथ देने पर विचार किया जा सकता है। प्रस्तुत लघुकथाकारों से अनुरोध है कि समालोचना को अन्यथा न लें। उद्देश्य लघुकथा सृजन में आपके/आपकी पीढ़ी के रचनाकारों की भूमिका को रेखांकित करना मात्र है। इस अंक में हम कृष्णचन्द्र महादेविया पर प्रस्तुति दे रहे हैं। -अंक संपादक}

संभावनाओं की तलाश ही भावी रास्ता है : डॉ. उमेश महादोषी 
      बहुत बार ऐसा लगता है कि लघुकथा की वरिष्ठ पीढ़ी ने लघुकथा को जो आयाम प्रदान किए, नई पीढ़ी वहां से आगे ले जाना तो दूर, उस मुकाम पर भी लघुकथा का सम्मान बनाए रख पाने में सक्षम नहीं है। यद्यपि यह पूरा सच नहीं है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नई पीढ़ी का लघुकथा सृजन बहुत सारी कमजोरियों और अग्रगामी योगदान के अभाव से भरा पड़ा है। लेखन की निरन्तरता के बावजूद प्रगति की अवधारणा, क्रमागत हो या जैनेटिक, के अनुरूप उनका लघुकथा सृजन उस रूप में नहीं आ पा रहा है, जैसे एक प्रतिष्ठित विधा की जिम्मेवार पीढ़ी से अपेक्षा की जाती है। इन लघुकथाकारों में से अधिकांश के पूरे संग्रह को पढ़ने के बाद भी आठ-दस प्रभावशाली लघुकथाएं छांट पाना मुश्किल होता है। कमजोरियों की एक लम्बी सूची बनाई जा सकती है। विषयों और कथ्यों का अंधाधुंध दोहराव, कुछ विशेष विषयों की सतत परिक्रमा, किसी रचना में कोई कथ्य निकल रहा है या नहीं, इसकी परवाह किए बिना लघुकथा के नाम पर लिखते चले जाना, एक बार लिखने के बाद स्वसमीक्षा की दृष्टि से उस पर पुनर्विचार के दरवाजे को बन्द कर लेना, अध्ययन का अर्थ सिर्फ दूसरों की लघुकथा को मात्र कथ्य की दृष्टि से पढ़ना, तकनीक समझने की जरूरत न समझना, लघुकथा में अपने लेखक को प्रकट करने का मोह संवरण न करना, रचना के प्रकाशन को स्तर की गारंटी मान लेना, संग्रह प्रकाशित कराने की जल्दी में परिपक्वता की प्रक्रिया को नजरअन्दाज कर देना, दूसरे अच्छे लघुकथाकारों की रचनाओं में किसी कारणवश मान्य तकनीक से इतर किसी प्रयोग को समझे बिना अनुसरण करना, अपनी रचना में मौलिकता या दूसरों की रचनाओं से भिन्नता के बारे में विचार न करना, रिपोर्टिंग और रचनात्मकता की प्रस्तुति के अन्तर को न समझना, सामयिक घटनाओं में छुपे बुनियादी संकेतों/परिवर्तनों को पकड़ने और उनमें रचनात्मकता की तलाश में अक्षमता, मूल्यों की तार्किकता के प्रति उपेक्षा आदि अनेक चीजें हैं। एक रचनाकार की प्रतिक्रिया में साधारण व्यक्ति से अलग और आगे जाने की अपेक्षा निहित होती है। दोनों में रचनात्मकता के स्तर पर बुनियादी अन्तर होना चाहिए, जो दुर्भाग्य से बाद की पीढ़ियों की अनेकानेक लघुकथाओं में नहीं दिख रहा है। इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन नियोजित अध्ययन व चिंतन की प्रक्रिया का अभाव हर हाल में है। पठन-नोटिंग-चिन्तन और परिवर्द्धन-प्रयोग की श्रंखला गायब है। यद्यपि यह निराशाजनक परिदृश्य है, तदापि अपेक्षित चीजों के अभाव के बावजूद सृजन की निरंतरता को आशा की किरण मानकर मैं बाद की पीढ़ी के लघुकथा लेखकों में लघुकथा के भविष्य की संभावनाओं की तलाश जरूरी समझता हूँ।
      मैं जानता हूँ कि परिदृश्य में बहुत सारी छुपी और बिखरी हुई चीजें होती हैं। इनमें काफी सारी अच्छी चीजें होती हैं। बात उन अच्छी चीजों को उभारकर लाने की है। कसूरवार सिर्फ लेखक नहीं हैं, समीक्षकों-समालोचकों के साथ संपादकगण और रचनात्मकता को रेखांकित करने के प्रयासों से सम्बद्ध पूरी बिरादरी कहीं न कहीं जिम्मेवार है, जिसने नई पीढ़ी के लघुकथा सृजन को यत्र-तत्र बिखरी हुई अच्छी चीजों के सन्दर्भ में समेकित नहीं किया। मुझे लगता है, मधुदीप जी द्वारा आरम्भ की गई ‘पड़ाव और पड़ताल’ श्रंखला जैसे कुछ प्रयास, पूरी तरह नई पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित, किये गये होते तो परिदृश्य कुछ अलग होता। 
     यहां यह भी स्पष्ट करना है कि निराशा के कुछ कारणों के बावजूद लेखन को हतोत्साहित नहीं किया जा सकता। लेखन जैसे भी, जैसा भी हो, होते रहना चाहिए। लेखन में सुधार और निखार के सारे प्रयास लेखन के साथ चल सकते हैं, उन्हें चलना चाहिए। और इस तरह से चलना चाहिए कि वे किसी को लेखन से विमुख करने का कारण न बनें, लेखन की ओर लोगों को आकर्षित करने और आकर्षण बनाए रखने की भूमिका निभायें। कारण- लेखन कहीं न कहीं मनुष्य को जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित करता है। लेखन से जुड़ा व्यक्ति कहीं न कही, कभी न कभी जीवन मूल्यों की समझ से जरूर जुड़ेगा। लेखन होगा तो उसमें अच्छी चीजें भी जरूर आयेंगी। दोहराव को भी किसी मुद्दे (विषय, कथ्य आदि के रूप में) को समर्थन की व्यापकता और उसके महत्व को रेखांकित करने वाले तत्व की तरह देखा जा सकता है। हमें लेखकीय परिमार्जन के दायरे में लाना इस बात को है कि दोहराव किसी तरह की ऊब पैदा करने का कारण न बन जाये और लेखक का योगदान उसमें दिखाई दे। स्वभावतः दोहराव में रचनात्मकता की शक्ति का संचार ही लेखक का योगदान हो सकता है। विद्यमान की सूक्ष्मताओं को गृहण करने और उनकी प्रभावी प्रस्तुति की योग्यता एक रचनाकार की क्षमताओं में शामिल होनी चाहिए। बाद की पीढ़ी के लघुकथाकारों से यह एक बड़ी अपेक्षा है। मौलिकता के अर्थ का बड़ा हिस्सा भी इन्हीं क्षमताओं में निहित होता है। 
      जीवन के विभिन्न पृष्ठों पर फोकस और अपनी मारक क्षमता के चलते लघुकथा साहित्य को आगे ले जाने की शक्ति अर्जित कर चुकी है। इस शक्ति को जीवन मूल्यों के संरक्षण और परिवर्तन की दिशा का नियन्ता बनाने का काम नए रचनाकारों के ही हाथों में है, वे इस जिम्मेदारी को समझें और पूरी सिद्दत से निभायें, इस सम्भावना की तलाश का कुछ दायित्व, एक लघु-पत्रिका के नाते हमारा भी है।

कृष्णचन्द्र महादेविया की लघुकथा में रचनात्मकता के बिन्दु
लगभग पचपन वर्षीय महादेविया जी हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हैं। उन्होंने लघुकथा लेखन पिछली सदी के नवें दशक के आरम्भ में शुरू किया था और उनका पहला लघुकथा संग्रह ‘उग्रवादी’ 1992 में तथा दूसरा ‘बेटी का दर्द’ 2013 में आया। स्वाभाविक है कि लघुकथा में उनके पदार्पण से पूर्व बहुत कुछ हो चुका था और उन्हें लघुकथा आन्दोलन वाली पहली पीढ़ी के बाद के लघुकथाकारों में शुमार किया जा सकता है; यद्यपि आज वह हिमाचल के चर्चित लेखकों में शुमार किए जाते हैं। ‘बेटी का दर्द’ से पूर्व मैंने उनकी कुछ ही लघुकथाएं पढ़ीं थी। इस संग्रह को पढ़ने के बाद उनके लघुकथा लेखन को समझने का अवसर मिला। परिदृश्य से निरपेक्ष होकर देखा जाये तो उनकी सक्रिय उपस्थिति और सामाजिक सरोकारो के साथ चलना सर्वदा प्रशंसनीय है। लेकिन परिदृश्य से जोड़कर बात की जाये तो लघुकथा में व्याप्त बहुत सारी कमजोरियों से वह अछूते नहीं हैं। समस्याओं को लघुकथा में उठाते हुए वह आम आदमी के चिंतन से इतर लेखकीय दृष्टि की अपेक्षाओं तक कम पहुंच पा रहे हैं। उदाहरण के लिए ‘रोज की सवारी’ में डेली पैसेन्जर्स को किराए में दिए जाने वाले कन्सेसन पर तंज कसा गया है। ‘डेली पैसेन्जरी’ स्वयं एक समस्या है और वहाँ कन्सेसन की जरूरत के एकाधिक पहलू हैं। उस पर तंज उचित नहीं लगता। इस तरह की एकांगी और उथली चीजें लघुकथा को सवालों के घेरे में ही खड़ा करेंगी। इस लघुकथा में डेली पैसेन्जर्स को कन्सेसन के साथ कमजोरों, असहायों, वृद्धों की सहायता का समांतर मुद्दा उठाया जा सकता है। यह रचनाकार की क्षमताओं पर निर्भर करेगा कि वह कितने प्रभावी या कलात्मक तरीके से इसे उठा पाता है। एक लेखक से चिन्तन में गहराई और प्रभावगत व्यापकता की अपेक्षा की जाती है। जीवन व्यापार के सिद्धान्तों को चुनौती देते हुए तार्किकता जरूरी होती है। बिना किसी नवीनता या कलात्मकता के विषयों व कथ्यों का अनुसरण भी महादेविया जी की लघुकथाओं में बड़ी संख्या में है। एक ही विषय पर एकांगी दृष्टिकोंण का दोहराव भी काफी है। मसलन यौन संबन्धी विषयों पर वह बहुत सारी रचनाओं में मुखरित हुए हैं और अधिकांश में उनकी उँगली महिलाओं के चरित्र पर अधिक उठी है, वह भी बिना किसी विशेष रचनात्मक अन्दाज के। काफी सारी रचनाओं में लघुकथा कहते-कहते उनका लेखक स्वयं मैदान में कूदकर रचना के अन्त को लचर बना देता है। लघुकथा के दैहिक गठन में कलात्मकता का प्रायः अभाव है। कमजोरियां  हैं, लेकिन लघुकथा में महादेविया जी की सक्रिय उपस्थिति और निरन्तरता उनके अन्दर की ऊर्जा और सम्भावनाओं की ओर भी संकेत करती है। उनके साथ कई अच्छी चीजें भी हैं। उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि वह हिमाचल की जमीन पर बैठकर लघुकथा लिख रहे हैं। वहां के पात्र, वहां के परिवेश की छाप उनकी लघुकथाओं में दिखती है। पहाड़ की कई रूढ़ियों से वह सीना तानकर टकराते दिखाई देते हैं। वहां के सामाजिक भेदभाव पर कटाक्ष करते हैं। सामाजिक सरोकारों के प्रति उनका लगाव और मानवीय संवेदना के उभार का स्तर संतोष प्रदान करता है। ये ऐसे बिन्दु हैं, जो उनकी लघुकथा की ताकत हैं। इस दृष्टि से नानी और धार, भ्रष्टाचार, प्रसव की पीड़ा, भीड़ का हिस्सा, विष बीज, बदहाल मानसिकता, प्यार और इज्जत, बेटी का दर्द, कीड़े, बेशर्म, क्षय रोग आदि उनकी श्रेष्ठ लघुकथाएँ। इनमें से नानी और धार, प्रसव की पीड़ा, क्षय रोग, बेटी का दर्द और बेशर्म को हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
     ‘प्रसव की पीड़ा’ में अंधविश्वासों पर आधारित पहाड की एक विशेष समस्या को़ (संभवतः यह किसी क्षेत्र विशेष की समस्या है) उठाया गया है, जिसमें पत्नी को प्रसव पीड़ा आरम्भ होने के बाद पुरुष उस पीड़ा को महसूस करने का ढोंग रचता है और इस बहाने काम छोड़कर आराम करने लगता है। पोष्टिक आहार आदि जो देखभाल महिला की होनी चाहिए, उसे पुरुष लूट लेता है। महिला बेचारी को न पौष्टिक आहार मिलता है, न आराम। इस समस्या में महिलाओं के प्रति अन्याय और उनकी बदहाली की स्थिति तो निहित है ही, पुरुषों की अकर्मण्यता के साथ उनके आर्थिक हालातों के बिगड़ने का कारण भी निहित है। इसी सामाजिक-आर्थिक समस्या को ‘प्रसव की पीड़ा’ में अभिव्यक्ति दी गई है। इस समस्या को एक और लघुकथा ‘उदास आंखें’ में भी महादेविया जी ने उठाया है। दरअसल पहाड़ों पर आज भी अंधविश्वासों पर आधारित अनेक दुरूह समस्यायें मौजूद हैं, जिन पर पहाड़ की आबोहवा से जुड़े लेखक ही बेहतर लिख सकते हैं।   
      ‘बेटी का दर्द’ में एक और अंधविश्वास पर हमला किया गया है। ‘‘हाँ, तुम्हारा नाम रख दिया होता तो भैया नहीं आना था। देवता के गुर ने यही कहा था और पूरे घर-गाँव में यह पक्का विश्वास है।’’ भोले-भाले लोगों को कैसे-कैसे अंधविश्वासों की घुट्टी पिला दी जाती है और यह घुट्टी कैसे विश्वास में बदल जाती है! सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ ‘बेटा’ आज भी जिस तरह एक बड़ा इनवेस्टमेंट बना हुआ है, वह बेटे की उम्मीद में बच्चों की लाइन लगा देने का अपराध पढ़े-लिखों से भी करवा लेता है। अशिक्षा के अंधेरे में तो यह काम और भी आसान हो जाता है। लेकिन बेनाम बच्ची का भोला-सा सवाल ‘‘माँ ऽऽ! यदि आपके पेट में भैया नहीं दीदी ही होगी तो क्या उसका भी नाम नहीं रखोगी?’’ मां को आक्रोशित तो करता है, पर झकझोरता भी है। शायद इसीलिए थप्पड़ मारने को हाथ उठाने के बाद वह काँपती बेटी की कातर आँखों में झाँक पाती है और उसका हाथ उठा ही रह जाता है। रत्नी कनैतण के काँपने में उसकी बेवशी को भी देखा जा सकता है। यह बेवशी ही उसे रास्ता दिखायेगी। लघुकथा में इसे रचनात्मकता का बिन्दु और उसकी ताकत माना जा सकता है।
     ‘नानी और धार’ पहाड़ों के प्रति वहां के लोगों के लगाव और अपनेपन को तो अभिव्यक्ति मिली ही है, पहाड़ों पर मानवीय हस्तक्षेप के कारण पैदा हो रही समस्याओं की ओर भी संकेत किया गया है। इन समस्याओं से निजात के लिए पहाड़ के लोगों को स्वयं ही पहल करनी होगी, लघुकथा इस रचनात्मक संदेश को सफलतापूर्वक संप्रेषित करती है। पहाड़ों पर जीवन वैसे ही अत्यंत दुरूह है, ऊपर से ऐसे मानवीय हस्तक्षेप, जिन्हें टाला जा सकता है, उसे और भी दुरूह बना देते हैं। पहाड़ पर औद्योगिकीकरण का बोझ भयंकर दुष्परिणाम ही देगा। एक नवयुवक के द्वारा नब्बे साल की नानी को समझाना, और नानी का जोश के साथ इसके खिलाफ खड़ा होना युवा एवं बुजुर्ग के गठजोड़ को भी प्रतिबिम्बित करता है। आसान रोजगार और लाभ की आकांक्षा के वशीभूत पहाड़ों की समस्या के प्रति प्रसुप्त प्रायः प्रौढ़ पीढ़ी इसे समझे।
     ‘क्षय रोग’ यूं तो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सामान्य लघुकथा प्रतीत होती है, लेकिन नई प्रधान की सोच में पहाड़ की महिला के संघर्ष और संकल्प का जो रूप प्रतिबिम्बित हुआ है, वह इसे खास बना देता है। प्रधान श्रेष्ठा पर्स खोलकर एक बारगी रिश्वत देने की बात सोचती है, लेकिन पहाड़ की औरत की संघर्षशीलता का चरित्र उसे रोक देता है। वह आगे की सोचती है और निडरतापूर्वक अपनी बात अकाउंटेंट के सामने पूरी दृढ़ता के साथ रखती है। ‘तुम देखते जाना’ शब्द महत्वपूर्ण हैं। ये शब्द ही बाद में अकाउंटेंट सिपहिया को बेचैन कर देते हैं। लेखक रचना का अन्त ‘गूंगा नाचता नहीं, जब नाचता है तो आंगन उखाड़ देता है’ मुहावरे से करके लघुकथा को और भी प्रभावशाली बना देता है। 
     ‘बेशर्म’ इस मायने में एक ताकतवर लघुकथा है कि यह रचना उन परित्यक्ता माँओं के बारे में अलग तरह से सोचने को प्रेरित करती है, जिनको बच्चों सहित घर से निकाल दिया जाता है। बच्चों के संरक्षण की विवशता में पुनर्विवाह या किसी पुरुष के साथ जीवन बिताने को गलत दृष्टि से देखा जाता है। इस परिदृश्य में यद्यपि परिवर्तन आया है लेकिन सोच के स्तर पर अभी भी काफी गुंजाइश है। चिड़िया के बार-बार भगाने के बाद भी उसी जगह घोंसला बनाने और पत्नी के साथ संवाद की प्रतीकात्मकता के माध्यम से कथ्य को संप्रेषित करना लघुकथा को प्रभावशाली बनाता है। नई पीढ़ी का बेटा माँ के लोहार के साथ जीवन बिताने की विवशता को अन्ततः उसकी संतान यानी अपने आप से जोड़कर देखने लगता है और अपनी गलती का अहसास करता है। बूढ़ी माँ को जिस कारण से चरित्रहीन मानकर घर से निकाल दिया था, उसी कारण से श्रद्धा से भर उठता है और उसे वापस अपने पास लाने का निर्णय करता है। यही तो है रचनात्मकता! लघ्वाकार में तार्किकता का समावेश प्रभावित करता है।
     ये लघुकथाएँ गठन और प्रस्तुति के स्तर भी संतोष प्रदान करती हैं। महादेविया जी में इन लघुकथाओं से भी आगे जाने की क्षमता है। जरूरत है कुछ चीजों के बारे में मुड़कर देखने की। जहाँ जरूरी है, एक जिम्मेवार लेखक के तौर पर रचनाओं के पुनर्लेखन का हौसला भी दिखाना चाहिए। दूसरे पहचान और योगदान- दोनों की दृष्टि से आज वह जिस मुकाम पर आकर वह खड़े हो चुके हैं, वहाँ अब संख्या बढ़ाने की बजाय  लघुकथा में चिन्तन की गहराई के साथ तकनीक और कलात्मकता के स्तर पर ध्यान दे सकते हैं। लघुकथा को सृजनात्मक स्तर पर जहां ले जाने की जरूरत है, उस रचनात्मक बिन्दु पर उनकी दृष्टि होने की अपेक्षा हम कर सकते हैं। प्रस्तुत हैं उनकी सन्दर्भित लघुकथाएँ।

कृष्णचन्द्र महादेविया की पाँच लघुकथाएँ 

प्रसव की पीड़ा
     ‘‘ओ थल्लू ओ थल्लू ठाकर....! भई तेेरे घर बच्चा आने वाला है, तेरी बीवी प्रसव पीड़ा में है।’’ तेल का कनस्तर सड़क पर रखते हुए कांसी तेली ने दस-बारह मजदूरों में काम करते हुए मजदूर को आवाज दी।
     देवदार वृक्षों से लदे पहाड़ की ढलान पर सड़क बनाने का कार्य चला हुआ था। कांसी तेली की आवाज सभी मजदूरों ने सुनी। थल्लू ठाकर तो काम करना छोड़कर वहीं बैठ गया और प्रसव होती महिला की तरह कराहने लग पड़ा। मजदूरों ने अपना काम रोक दिया और आनन-फानन में लकड़ी के मजबूत दो आठ-दस फुट डंडों में कम्बल से पालकी जैसी बना ली। फिर कराहते थल्लू ठाकर को पालकी में बिठाया और चार जन पालकी उठा उसे पहाड़ी की दूसरी तरफ उसके घर ले चले। बाकी मजदूर भी साथ हो लिए।
     अभी पाँच बजने को आधा घंटा शेष था। मौके पर मेट तो चुप रहा जबकि ओवरसियर तिल्ली पांडा उन्हें रोकता ही रह गया। जब मजदूरों ने उसके बोलने पर कान नहीं दिए तो उसने मेट से पूछा-
     ‘‘मिस्टर चावला, व्हाट इज दिस? ठीक-ठाक आदमी को उठाकर ले गए। बच्चा इसकी बीवी को होना है, और कराहता थल्लू ठाकर है!’’
     पांडा हैरानी के सागर में गोते लगाने लगा तो मेट ने गंभीर और उदास स्वर में कहा-
     ‘‘सर, अभी आप नए आये हैं देखते जाइए... सर, बढ़िया मेवे और दूध-घी पति खाएगा और प्रसवा पत्नी को मेवों की जूठन और कम सन्तुलित आहार...सर, कहाँ तो आज चाँद--मंगल पर बसने की बातें हो रही हैं तो कहाँ ये पहाड़ों की घाटी में बसे गाँव!... आज भी गुरु-चेला, झाड़-फूंक, अंधविश्वासों को मनाते, जात-पांत, छूत-छात में लिपटे, बकरों-भैंसों की बलि में कल्याण ढूंढ़ते और सड़े रीति-रिवाजों में लिपटे लोग! कहने को प्रगतिशील कहाते हैं। आँख के अन्धे नाम नयन सुख!’’
     ओवरसियर तिल्ली पांडा सिर पकड़कर वहीं बैठ गया।

नानी और धार
     ‘‘नानी, कल रैली में चल रही हो न?’’   
     ‘‘नब्बे वर्ष की उम्र में बेटा कहाँ जाऊँगी?.... पर ये तो बता, ये रैली कैसी है?’’
     ‘‘ताम्रधार बचाने के लिए, सीमेंट कारखाने के खिलाफ नानीजी।’’
     ‘‘अरे बेटा, सारी उम्र तो इस धार और जंगल के आँचल में काटा। इससे प्यार-दुलार रखवाल रहा। इसी से तो बिछावन-घास और लकड़ियाँ ढोई हैं।’’
     ‘‘जी नानी, इसी पहाड़ को बचाना है।’’
     ‘‘बेटा तब तो यहाँ भी दो पहाड़ी पार, उन कारखानों वाली धारों की तरह बम्ब फटेंगे, लोग-बाग, पंछी-पशु सब बेघर हो जाएँगे।’’
     ‘‘हाँ नानीजी, ऐसा ही होगा। बीमारी फैलेगी, पानी सूखेगा। कई तरह की गंदगी फैलेगी नानी।’’
     ‘‘तब तो रैली में हरगिज आऊँगी पुत्तर। आग लगे इस नासपीटे सीमेंट के कारखाने को। नरक में जाएँ लगाने वाले।’’ नानी ने गुस्से में कहा।
     अब नानी गाँव भर की औरतों के साथ लोक-गीत, हँसी-मजाक करते हुए ताम्रधार जाने के किस्सों में खो सी गईं। बेसिर चौहान नानी के जज्बे के आगे नतमस्तक हुआ, धार के प्रति उनके प्रेम के किस्से सुनने लग गया था।
क्षय रोग
    राज सिपहिया ठणदारी के पास जा-जा कर रजड़ी पंचायत की नई प्रधान श्रेष्ठा राणे दुःखी हो गई थी। वह जान चुकी थी कि विकासखण्ड कार्यालय का यह अकाउंटेंट उसे टरका रहा है, पर क्यों टरका रहा है वह समझ नहीं पाई थी। आज प्रधान राज सिपहिया के पास जाकर बैठ गई और मधुर स्वर में बोली-
     ‘‘अकाउंटेंटजी, मेरा चेक बना दें, कई दिन हो गए हैं मुझे आते-आते। अब तो लेबर भी मारने को तैयार खड़ी है।’’
     ‘‘हं...हं....ऽऽऽ वजन रखो न ऊपर से, तभी तो चेक कटेगा।’’
     ‘‘मैं समझी नहीं सिपहिया जी।’’
     ‘‘चेक काटने के लिए चढ़ती लगती है।’’ सिपहिया ने दाँत निकाले, जैसे मरी कुतिया के दाँत निकल जाते हैं।
     ‘‘श्रेष्ठा राणे का माथा ठनका, वह सब समझ गई। यह आदमी रिश्वतखोर है। वह नकली मुस्कान के साथ बोली- ‘‘कितना वजन रखूँ जी?’’।
     ‘‘मात्र एक हजार।’’ इधर-उधर देखते सिपहिया ने धीरे से कहा। फिर सीट पर पीठ टिका कर दोनों हाथ अंगड़ाई के अंदाज में ऊपर उठाकर दसों उंगलियों को खुली कर एक हजार का संकेत भी कर दिया।
     ‘‘एक हजार।’’ रजड़ी की प्रधान हैरान होती बोली।
     ‘‘मात्र एक हजार, वैसे तो दो हजार बनते हैं।’’ सिपहिया ने कपड़ा व्यापारी की तरह कहा। उसकी आँखों में चमक आ गई थी।
     प्रधान ने अपना पर्स देखा, उसमें ग्यारह सौ रुपए थे। उसने सोचा बार-बार के दौड़ने और चक्कर काटने से बेहतर है कि एक हजार सिपहिया के फसके में डाल दे। किंतु अचानक उसे ख्याल आया कि ऐसे तो इस आदमी का पेट बढ़ता जाएगा। हर बार फाइल पर वजन रखने को कहेगा। इसकी आदत को पोषित करना ठीक नहीं। रिश्वत के क्षयरोग से इस दफ्तर को मुक्ति दिलानी ही होगी। श्रेष्ठा राणे ने तेज और गंभीर स्वर में कहा- ‘‘सिपहिया, चेक तो आपको काटना ही पड़ेगा। मैं देखती हूँ आप और कितने चक्कर कटवाओगे। आपको एक हजार तो क्या मैं पच्चीस पैसे भी नहीं दूँगी। क्षयरोग फैलाने वाले आप जैसे कर्मचारियों के लिए मुझ जैसे प्रधानों को दवाई पिलानी ही होगी, तुम देखते जाना।’’
     सिपहिया ने घाघ प्रधानों तक को न छोड़ा था तो राणे किस खेत की मूली थी। एक बार तो वह उपेक्षा और अकड़ से हँस दिया। फिर एक अन्य महिला से श्रेष्ठा राणे की जिलाधीश से मिलने की बात सुनकर वह चौंक गया था। श्रेष्ठा राणे के तेवर और दृढ़ता भरे शब्दों से अब वह बेचैन हो गया था। गूंगा नाचता नहीं, जब नाचता है तो आंगन उखाड़ देता है।

बेटी का दर्द
     रत्नी कनैतण की बेटी स्कूल से लौटकर उसकी टाँगों से लिपटी रोती ही जाती थी। माँ के प्यार करने और पुचकारने का भी कोई असर न दिखता था बस एक ही रट लगाए थी- ‘‘बता न माँ, मेरा नाम क्यों नहीं रखा?... बिना नाम के क्यों रखा मुझे।... बिना नाम की क्यों रही मैं.... बता न माँ।’’
     रत्नी कनैतण का दिल भर आया। बेटी का जान-बूझकर कोई नाम न रखने का अपराधबोध उसे भीतर ही भीतर कचोटने लगा था। फिर भी वह तरह-तरह का प्रलोभन देकर एक बार बेटी को चुप कराने का प्रयत्न करने लगी, पर बच्ची रोती ही जाती थी। आखिर थक-हारकर रत्नी कनैतण उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरती हुई बोली- ‘‘बेटी, तुम्हारा नाम इसलिए नहीं रखा कि तुम्हारे बाद फिर बेटी पैदा न हो, बेटा ही हो। देख अब मेरे पेट में तेरा भैया है। नाम का क्या है तुम भी तो हमारी प्यारी बेटी हो न!’’
      ‘‘नहीं हूँ प्यारी बेटी, मेरा नाम रख दिया होता तो भैया नहीं आना था क्या?’’ रोने से चुप होकर बच्ची बाल सुलभ गुस्से में बोली।
     ‘‘हाँ, तुम्हारा नाम रख दिया होता तो भैया नहीं आना था। देवता के गुर ने यही कहा था और पूरे घर-गाँव में यह पक्का विश्वास है।’’
     ‘‘माँ ऽऽ! यदि आपके पेट में भैया नहीं दीदी ही होगी तो क्या उसका भी नाम नहीं रखोगी?’’ अपनी माँ की आँखों में झांकते बच्ची ने कहा।
     ‘‘चुप कर चुड़ैल, तेरा मुँह जले, अशुभ बोलती है रांड़।’’ रत्नी कनैतण लाल-पीली होकर एकाएक चिल्लाई। थप्पड़ मारने को उठा हाथ काँपती बेटी की कातर आँखों को देखकर उठा ही रह गया। बेटे की आशा में फिर पाँचवीं बेटी हुई तो उसका नाम? सोचकर रत्नी कनैतण अब काँपने लगी थी।

बेशर्म
     पिता द्वारा छोड़ी गई अपनी माँ का लोहार के साथ रहने का इतिहास जान लेने पर नौकरी लगे इकलौते बेटे ने अपनी वृद्ध माँ को घर से निकाल दिया था। स्वयं पत्नी के साथ किराए के बढ़िया मकान में मौज से रहता था।
     उसकी कपड़े की अलमारी के ऊपर चिड़िया के बनाए घोंसले को वह दो बार उखाड़ कर फेंक चुका था। किंतु चिड़िया तीसरी बार फिर तिनके लेकर वहाँ घोंसला बनाने में जुट गई थी।
     ‘‘देखो न रीतु, कितनी ढीठ और बेशर्म है ये चिड़िया, अब तीसरी बार फिर तिनके लेकर वहीं घोंसला बनाने में जुट गई है।’’
     ‘‘हाँ...! माँ बच्चों को पालने के लिए बेशर्म और ढीठ हो जाती है। ममता की मारी है न बेचारी माँ। रहने दो न इसे, बनाने दो घोंसला।’’ पत्नी ने अपने उभरे पेट को देखकर धीरे से कहा।
     पत्नी की बात सुनकर उसे करंट सा लगा और वह चिड़िया को घोंसला बनाते देखता रह गया। ढीठ और बेशर्म शब्द उसके भीतर तक तीर की भांति चुभ गए। उसने अब अपनी वृद्ध माँ को अपने पास लाने का दृढ़ निश्चय कर लिया था।
  • कृष्णचन्द्र महादेविया, पत्रालय- महादेव, सुन्दरनगर, जिला मण्डी-175018(हि.प्र.)/मो.08988152163
  • डॉ. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम्, निकट बी.डी.ए.कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली, उ.प्र./मो.09458929004

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