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बुधवार, 24 मई 2017

किताबें

               अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2016


किताबें
डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’



इंद्रधनुषी बिम्बों से सजा एक कविता-संग्रह

कविता और संगीत का अनूठा संगम कही जा सकने वाली समर्थ्य और प्रतिष्ठित कवयित्री डॉ. मीरा गौतम का सद्यः प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘मुझे गाने दो मल्हार’ पढ़कर महाप्राण ‘निराला’ की याद ताजा हो आई, क्योंकि डॉ. मीरा ने जो कविताएँ रची हैं, वे वस्तुतः ‘मुक्त छंद’ की कविताएँ हैं, मात्र ‘अतुकान्त’ गद्य के टुकड़े नहीं हैं!
     अपने विलक्षण ‘समर्पण’ में कवयित्री ने जो कुछ लिखा है, वह उनके ‘हृदय’
को पाठकों के समक्ष रख देने में सक्षम और समर्थ हुआ है- ‘‘मल्हार एक राग है जिसे वर्षा ऋतु में गाया जाता है! भीतर आर्द्र संवेदनाएँ चुक रही हैं और बाहर मनुष्य के हस्तक्षेपों से पूरा भूगोल असंतुलित हो रहा है। दोनों एक-दूसरे को ढहाने पर लगे हैं! उन सबके लिए जो मेरी यह बात महसूस कर लें कि विकट स्थितियों में मल्हार का निनादित होना कितना जरूरी है कि बाहर और भीतर दोनों ही बचे रह सकें।’’
     निस्संदेह, डॉ. मीरा की ये कविताएँ आज की आपाधापी में हमारे जीवन में आते जा रहे ‘भीतर’ और ‘बाहर’ के असंतुलन से जूझने की कविताएँ हैं, जो उद्वेलित भी करती हैं और प्रेरणा भी देती हैं। मेरी दृष्टि में आज तो ये कविताएँ नितांत प्रासंगिक हो उठी हैं। मीरा की इन कविताओं में अनेक रंग हैं, संगीत के अनेक रागों का जिक्र इनमें है और जीवन की छवियों के महकते फूल भी आपको इन कविताओं में मिल जाएँगे तो साथ ही कुछ चुभते हुए प्रश्नों के कांटे भी चुभेंगे जरूर!
     ‘कविता के बंध जाने का डर’ शीर्षक अपनी कविता में डॉ. मीरा ने साफ चेतावनी दी है- ‘मैं’ लिपटता जाता है कविता से जब,/लिजलिजेपन की हद से/मुक्त होना असंभव था,/कविता आप बीती का टोकरा तो नहीं/अपने सर से उठाकर/पाठक के सर पर टेक दिया/गर्दन तोड़ने के लिए! (पृष्ठ-62)
     डॉ. मीरा के ये शब्द आज की हिंदी कविता को ‘आइना’ दिखाने वाले हैं, जिनमें कहीं आपका ‘दर्द’ भी छिपा हो सकता है। ऐसी ही एक और कविता है- ‘बीहड़ों में पगडंडियाँ’, जिसमें कवयित्री मीरा गौतम का ‘दिल’ ही जैसे बोल उठा है। इस कविता का सच निश्चय ही आपकी आँखों को गीला करने की सामर्थ्य स्वयं में रखता है- ‘‘अपना सा मन दे दो कवि!/चोट सहूँ पत्थर बन जाऊँ!/0 0 0/इतना ही हो पास/छद्म के चाबुक खाकर भी/बिखरूँ नहीं,/पालती रहूँ ऊर्जा तन-मन में/संभावनाओं के जागें स्वर,/व्यर्थता न रहे क्षण भर/बीहड़ों में पगडंडियाँ मापने की तरह!’’ (पृष्ठ-63)
     डॉ. मीरा ने इस काव्य संग्रह में प्रकाशित कुल 65 कविताओं में ऐसी इन्द्र धनुषी छवियाँ संजोई हैं कि पाठक का मन अनायास ही ‘वाह’ कह उठता है। अपनी पहली ही कविता में मीरा अपने ‘काव्य-दर्शन’ की जैसे घोषणा कर देती है-‘‘बादलों से कहेंगे हम/पगडंडियां बचाकर रक्खें हमारे लिए/0 0 0/विध्वंस के बाद भी/जगहें मिल ही जाती हैं/अनंत संभावनाओं की तरह/नया घर बन जाता है’’ (पृष्ठ-9)
     कवयित्री के ह्नदय में ‘बढ़ते विश्वव्यापी आतंकवाद’ के प्रति चिंता की सहज अभिव्यक्ति उनकी ‘ताबूतों में जिंदगी’ कविता में देखते ही बनती है। आतंकवाद का घिनौना सच एकबारगी तो हमारी आँखों में साकार हो उठता है, जब वे अपनी इस कविता में अत्यंत भावुक होकर कहती हैं- ‘‘अभी-अभी दंगों में/दहन हुआ नवजात शिशु/आँखों से मर गया पानी!/आतंक उतर आया जमीन पर/रक्त में बहता है पिशाच/तवों पर सिक रही/वोटों की रोटी!’’ (पृष्ठ-15)
     इन कविताओं में ‘स्त्री’ भी बड़ी सिद्दत के साथ विद्यमान है, लेकिन कोई ‘नारा’ या कोरा ‘वाद’ बनकर नहीं, बल्कि एक शक्ति और सृष्टि की धात्री के रूप में है। कई कविताओं में स्त्री के भिन्न-भिन्न रूप आपको मिलेंगे। ‘चलो सखी घूम आएँ’, ‘पर्वत की बेटियाँ हैं नदियाँ’ और ‘पर्वतों की तलहटी में’ जैसी कविताओं में ऐसी ‘स्त्री’ विद्यमान है, जो निरंतर गलती रहती है, कभी ‘उफ’ नहीं करती, लेकिन ‘स्त्री: विषपायिनी’ शीर्षक कविता में डॉ. मीरा ने ‘स्त्री’ के सर्वथा विलक्ष़्ाण रूप को उकेरा है-‘‘जीवित है विषपायिनी/शताब्दियों से/निर्वासित कर देने की/प्रताड़नाओं के बीच,/0 0 0/उसके इर्द-गिर्द कई घेरे/कई-कई पहरे/सर्पों के विषदन्त तोड़ने में/सदियों से माहिर/फिर भी सहज और/निष्पन्द है विषपायिनी!’’ (पृष्ठ-30)
     इस संग्रह की कई कवितायें चुभती भी हैं और सवालों को भी उठाती हैं। ऐसी कविता है ‘धूप के पैगाम’, जहाँ कविता की सजग अभिव्यक्ति-क्षमता को कवयित्री एक बार पुकारती है, जैसे आज वह खो गई हो? ‘कविता का वनवास’ और ‘बंट रही है कविता; सचमुच विचारोत्तेजक रचनाएँ कही जा सकती हैं, जिनमें कविता के सृजन की छटपटाहट मिलती है। डॉ. मीरा की कुछ कविताओं में गहरा दर्शन उभरा है, जिनमें ‘कहाँ हो नीलकण्ठ’ और ‘पत्तों का मरण-पर्व’ पाठकों को अवश्य प्रभावित करेंगी। इस संग्रह की एक कविता मुझे सचमुच बहुत ‘बोल्ड’ और बेहद सामयिक लगी है, जिसने बेबाक ढंग से चुभते सवाल पर आपका ध्यान खींचा है। यह कविता है ‘मीडिया में हिंदी’, जिसमें डॉ. मीरा ने चुभते सवाल उठाए हैं- ‘‘बहुत संवर गई है/बणज-ब्यौपार में!/0  0  0/उधार की लिपि में/अंग्रेजी की बन आई/देवनागरी के हर पाये पर/माल ढोती-लादती है अंग्रेजी’’ (पृष्ठ-58)
     मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि डॉ. मीरा की यह कविता हिंदी को बिगाड़ते आज के ‘मीडियार्मियों’ की आँखें जरूर खोल सकेगी। कवयित्री ने ‘पर्यावरण’ और सामाजिक संबंधों में निरंतर आते जा रहे विघटन को लेकर भी बहुत सहज कविताएँ लिखी हैं, जो अपनी विचार-शक्ति से प्रभावित करती हैं। डॉ. मीरा की एक कविता ‘अंगारों में दहकते हैं शब्द’ तो सचमुच आपको हिला देगी और आप ‘शब्द-ब्रह्म’ की शक्ति को नमन करेंगे। एक प्यारी कविता है ‘चलो सखि! घूम आएं’, जिसमें डॉ. मीरा ने बड़ी शिद्दत से ‘नारी-स्वभाव’ पर प्यारे कटाक्ष भी किए हैं, जो देखते ही बनते हैं। आप भी देखिए इन पंक्तियों में छिपा हुआ कटाक्ष- ‘‘पीढ़ियां बीत गयी हैं उनकी/निंदा-रस पीते-पिलाते/उस जमात में/हम शामिल न हो जाएं/चलो सखि घूम आएं/पार्क का चक्कर लगा आएं!’’ (पृष्ठ-19)
     कवयित्री डॉ. मीरा गौतम का यह कविता संग्रह निस्संदेह एक ताज़गी भरी रचनाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो अपनी सुगंध से आपको मोह लेगा। पुस्तक का मुद्रण सुन्दर और आवरण-पृष्ठ ख़ासा नयनाभिराम है। इस संग्रह से अनेक संभावनाओं को जन्म मिल रहा है, इसलिए इसका स्वागत हिंदी जगत में होना जरूरी है।
मुझे गाने दो मल्हार : कविता संग्रह : डॉ. मीरा गौतम। प्रकाशक : यूनिस्टार बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, एस.सी.ओ. 26-27, से.34ए, चण्डीगढ़। मूल्य : रु.175/- मात्र।

  • 74/3, न्यू नेहरू नगर, रुड़की-247667, जिला हरिद्वार (उ.खंड)/मोबाइल : 09412070351

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