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बुधवार, 24 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2016



।। कथा कहानी ।। 


लक्ष्मी रानी लाल



शिउली  
      शीतल मंद समीर चलने लगी थी। रोम-रोम इस अहसास से पुलकित होने लगा कि दुर्गा पूजा अब समीप है। बच्चे अपनी खरीदारी की सूची माता-पिता को थमा रहे थे तो युवाओं में अजीब गर्मजोशी थी। वे सब कुछ नवीन ढंग से मनाना चाहते थे। पुरानी प्रत्येक चीज से उन्हें बासीपन की गंध लगती। लेकिन अपनी संस्कृति एवं परम्परा से उन्हें बेहद लगाव होने की वजह से वे भी उसी रंग में डूब जाते।
      दूर्वा तालाब के किनारे बैठी जल में बिम्बित नीले आकाश को देख रही थी। तभी एक प्यारी-सी नन्हीं-सी चिड़िया का बिम्ब जल पर उभरा, जो मानो भ्रमित होकर इधर -उधर उड़ रही थी। शायद वह निर्णय लेने में अवश हो उठी थी कि किस दिशा में जाए। अचानक चिड़िया ने निर्णय ले लिया और इच्छित दिशा में बढ़ गई।
      जैसे शांत झील में कंकड़ आ गिरा हो, वैसे ही दूर्वा का मन भी उद्विग्न हो उठा। क्या प्रकृति और पशु-पक्षी से सीख लेना सार्थक हो सकता है। मैं अपने भविष्य को सँवारने का निर्णय ले लूँ। अब आत्मकेन्द्रित होकर अपने हित को सोचना भी आवश्यक है। कर्त्तव्यनिष्ठ होकर क्या प्राप्त हुआ?
      आज वह नितांत अकेली रह गई। पूजा की तैयारी वह किसके लिए करे? जिस निमाई की माँगों को पूरी करने में उसकी जिन्दगी खप गई, वह तो आज पत्नी के साथ दुर्गापुर में है। उसे कभी बांकुड़ा की याद भला क्योंकर आएगी, बांकुड़ा को याद करेगा तो बड़ी बहन को याद करने को विवश हो उठेगा, जिसने अपनी खुशियों को त्याग करके उसे अपने पाँव पर खड़ा होने लायक बना दिया था। उसके जीवन को बनाने के लिए जिस दीदी ने जतिन को निराश लौटा दिया था अब उसे याद करके लाभ ही क्या? जो कुछ अपनी दीदी से प्राप्त होने योग्य था सब कुछ तो उसने पा लिया। अब शेष क्या रह गया?
      निमाई शायद इस सत्य को नहीं जानता था कि बहनों के हृदय में भाइयों के लिए सदैव असीम स्नेह रहता है। उसे क्या पता कि जिस बहन को भाग्य के सहारे अकेली छोड़ वह पत्नी के साथ पूजा की तैयारी में निमग्न है, वही बहन स्मृति-पिटारा खोल उसे याद कर रही है। दूर्वा के सामने अतीत के वो सुखद पल जीवंत हो उठे, जो दोनों भाई-बहन ने एक साथ बिताए थे, ‘‘सुकू दीदी, पूजा में मेरे लिए कैसे कपड़े खरीद रही हो?’’ अपनी दीदी का आँचल थाम वह मनुहार कर बैठता। वह जानता था कि दीदी उसकी पसंद का सब कुछ खरीद कर देगी।
      माँ की याद इन्हें नहीं थी, क्योंकि इनके बचपन में ही उनकी मृत्यु हो गई थी। पिता ने दोनों भाई-बहन को बहुत ही यत्न से पाला। दूर्वा के ग्रेजुएशन करते ही लंबी बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गई। दूर्वा के दुर्भाग्य का सूत्रपात उसी दिन हो चुका था जब उसके पिता बिस्तर पर गिरे थे। परिवार की सम्पूर्ण जिम्मेदारियाँ उसके निर्बल कंधों पर आ गिरीं। उसने ट्यूशन करके सारी जिम्मेदारियाँ निभाईं।
      अतीत के गलियारे में दूर्वा चक्कर लगा रही थी कि स्मृति-अर्गला को खोल जतिन झाँकता दिखाई दिया। उसकी याद एक सुवासित समीर-सी चारों ओर अपनी सुगंध फैलाने लगी।
      उस दिन वह शिउली के पेड़ के नीचे बैठ फूलों को चुनकर आँचल में भर रही थी, तभी एक बड़ी-बड़ी आँखों वाला अत्याकर्षक युवक उसके सामने होठों पर मुस्कराहट लिए आ खड़ा हुआ। उसने घबराकर अपनी पलकें झुका लीं। ‘‘कितना सुंदर शिउली का फूल।’’ युवक अक्समात कह उठा।
      ‘‘इसे देखूँ कि उसे।’’ अस्फुट स्वर उसके कानों से फिर टकराए।
      दूर्वा बेहद घबरा उठी। एकांत का लाभ उठाकर युवक कहीं कोई बदतमीजी न कर दे, यह सोचकर वह आँचल संभालती तेज कदमों से अपने घर की ओर चल पड़ी। अपने ही कदमों की आहट से उसे भ्रम होने लगा कि कहीं वह युवक उसका पीछा तो नहीं कर रहा। उसकी साँस धौंकनी-सी चलने लगी।
      शिउली के फूलों की सुगंध से ही माँ दुर्गा के आगमन का संकेत लोगों को मिल जाता है। दूर्वा भी शिउली के रूप और खुश्बू से भाव विभोर हो उठती। शिउली के फूलों को चुनना उसकी दिनचर्या में शामिल था। चुने हुए फूलों में से कुछ को प्रतिदिन वह पूजा में चढ़ाती तो कुछ से अपनी मेज को सजाती। एक से एक कलात्मक अल्पना वह इन फूलों से बना देती। दिन भर शिउली की खुश्बू से मादकता छाई रहती। लेकिन आज की घटना ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह फूल चुनने जाए अथवा नहीं? शिउली से अत्यधिक प्रेम के आगे सारे तर्क चित्त हो गए।
      बहुत ही सतर्कता से वह चारों ओर देखती शिउली के वृक्ष के नीचे पहुँची। उसने अपने को आश्वस्त किया कि वह कोई राहगीर रहा होगा। वह अपने मुहल्ले के प्रत्येक व्यक्ति को पहचानती थी। अवश्य कोई बाहर से आया हुआ व्यक्ति होगा। आगंतुक चाहे जो हो पर उसने दूर्वा के मन में उथल-पुथल मचा दी थी।
      आहट होते ही वह अपनी सुराहीदार गर्दन को उठाकर चारों ओर एक बार अवश्य देख लेती। उसकी सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखों में एक कौतूहल-सा जाग उठा। उस युवक ने जो कुछ फूल को लक्ष्य करके कहा था उसे वह भूलने में सर्वथा असमर्थ हो उठी। उस युवक की आँखें बेहद आकर्षक थीं। उसकी काली घनी बरौनियों को वह भी तो देखकर मुग्ध हो उठी थी। उसने अपने मन के चोर को पकड़ा। कल से वह तो उसी के बिषय में सोच रही है।
      फूलों से आँचल भरकर वह बड़े इत्मीनान से खड़ी हुई। चेहरे पर लटक आए बालों को सुंदर ढंग से लपेट लिया और घर की ओर चल पड़ी। अचानक उसकी दृष्टि सामने वाले सघन वृ़क्ष की ओर गयी, जिसकी छाया में वह युवक बैठा अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से अपलक उसे निहार रहा था। दूर्वा अनजान बनने का नाटक करते हुए तेजी से चल पड़ी। 
      घर पहुँचकर वह धम्म से सोफे पर जा आँखें बंद करके बैठ गई। वह बहुत देर तक उस नवयुवक के विषय में सोचती रही। उसे कोई अदृश्य डोर उसकी ओर खींचे लिए जा रही थी। उसे वह क्षणभर को ही तो देख पाई थी। पर ऐसा लगता मानों पहले भी कहीं देखा है। कब, कहाँ? वह सोचती रही। तभी उसके पिताजी हाथ में थैला लिए बाजार से लौटे।
      ‘‘सुकी, बोस बाबू का भांजा जतिन आज आएगा। अभी-अभी उससे मुलाकात हुई है।’’ सब्जियों से भरा थैला दूर्वा को थमाते हुए उसके पिता सरकार बाबू ने कहा। ‘‘...कौन...? जौतिन भैया...?’’ आश्चर्य मिश्रित हर्ष से दूर्वा ने कहा। दूर्वा ने हर्षातिरेक में घर की सफाई शुरु कर दी। उसके बचपन की यादें उसे आज अपनी ओर खींच रही थीं। बोस बाबू, जो कि उसके पड़ोसी थे, का भांजा जतिन गर्मी की छुट्टियों में सात साल पहले आया था। सभी लड़के-लड़कियाँ एक साथ खेलते थे पर जतिन और दूर्वा में खूब पटती थी। आज उसी बाल सखा के आगमन की बात सुन दूर्वा बेहद प्रफुल्लित व उत्साहित हो उठी।
      निमाई बी. ए. आनर्स की अपनी फाइनल परीक्षा की तैयारी में लगा हुआ था। पिताजी बरामदे में बैठे समाचार पत्र पढ़ रहे थे। तभी दूर्वा ने सुना पिताजी किसी से बातें कर रहे हैं। उन दोनों के वार्तालाप से उसने अनुमान लगा लिया कि जतिन दा आ चुके हैं। भीगे हाथों को अपने आँचल से पोंछती बहुत व्यग्रता से वह बैठक में पहुँची। सामने नज़र पड़ी तो वह प्रस्तर-सी खड़ी रह गई। उसके पिता जिस युवक को जतिन कहकर गले लगा रहे थे वह कोई और नहीं, वही युवक था जिसने दूर्वा की रातों की नींद उड़ा दी थी। उसकी आँखों में संकोच, हर्ष व आश्चर्य के भाव आने-जाने लगे। बहुत मुश्किल से वह अपनी पलकें झुका सकी।
      जतिन के होठों पर मंद-मंद मुस्कुराहट खेल रही थी। उसने दूर्वा के पिता को बताया कि उसने दूर्वा को पहले ही पहचान लिया था, जबकि दूर्वा ने उसे नहीं पहचाना था। संकोच ने दूर्वा के होंठ जकड़ लिए। उसे सहज होने में समय लगा। जतिन पहले की तरह ही दूर्वा के घर आने-जाने लगा। उसने दूर्वा के जतिन ‘भैया’ कहने पर आपत्ति जताई। सप्ताह भर में ही दोनों के बीच औपचारिकता की दीवार ढह गई।
      उस दिन लॉन पर ओस की बूँदें जमा थीं। भोर की पहली किरण फूलों पर बिखर रही थी। दूर्वा के पिता समाचार पत्र पढ़ने में लीन थे। तभी जतिन आया। अभिवादन करने के बाद बिना किसी भूमिका के उसने दूर्वा का हाथ उनसे माँगा।
     सरकार बाबू अचानक बुझ से गए। उनके ललाट पर क्षणभर को चिन्ता की रेखाएँ उभर आईं। मानो कह रही हों कि पालनहार को ही ब्याह दोगे तो खाना कौन खिलाएगा? बेटे की फाइनल परीक्षा की फीस कौन भरेगा? गृहस्थी की नैया के खेवनहार को दूसरे के हाथों सौंपकर क्या मंझधार में अपने डूबने का इंतजाम तो नहीं कर रहे? दूर्वा पर्दे के पीछ से खड़ी सब कुछ देख रही थी। उसे वास्तविक स्थिति का भान जैसे ही हुआ, उसका कर्तव्यबोध जाग उठा। उसके मन में झंझावात-सा उठा। वह स्वार्थ के वशीभूत कैसे हो गई? उसमें जीवन से जूझने का जज्बा कायम था। सत्य और यथार्थपरकता से वह मुँह कैसे मोड़ सकती है? हृदयगत पीड़ा को वह छिपाना जानती है। पिता का निरानंद भाव देख उसका सारा उत्साह ही निचुड़ गया।
      उमड़ते आँसुओं के सैलाब पर नियंत्रण रख उसने खुद ही ब्याह के प्रति अपनी विवशता प्रकट कर दी। पिता समझ गए कि आत्मजा ने उन्हें अपदस्थ होने से बचा लिया है। इन सब बातों के बावजूद उन्होंने दोनों को ब्याह करने की अनुमति दे दी। हताश व अवाक्-सा जतिन दूर्वा को देखने लगा। वह दूर्वा के पास आकर उसकी शून्य आँखों में इस समस्या का समाधान ढूँढ़ने लगा। तभी दूर्वा ने गुरुदेव की पंक्तियाँ धीरे से कहीं- ‘‘जिसकी चाहत होती है, उसकी प्राप्ति नहीं होती।’’ पिता ने कुछ सोच दूर्वा को पुनः समझाना चाहा पर वह अपने निर्णय पर दृढ़ चट्टान-सी अटल रही। जतिन की इच्छा हुई कि गुरुदेव की अधूरी पंक्तियों को वह पूरी कर दे- ‘‘जिसकी प्राप्ति होती है, उसकी चाहत नहीं होती।’’ लेकिन मौके की नज़ाकत को देख वह खामोश रह गया।
      कोलकता वापस जाने के वक्त जतिन विदा लेने पहुँचा था। अश्रुसिक्त आँखों से आशीर्वाद देकर सरकार बाबू ने उसे दूर्वा को मना लेने का आग्रह किया था। जतिन ने उन्हें आँखों ही आँखों में आश्वासन दिया था। नियति के आक्रोश को दोनों चुपचाप सह गए।
      संघर्ष के मार्ग पर दूर्वा पूर्व निष्ठा से चलने का निश्चय ले बैठी थी। दूर्वा और जतिन के बीच संवादहीनता की स्थिति बन गई थी। दिल की आवाज आँखों के माध्यम से मुखर हो उठी। समय के पाँव कभी रुकते नहीं। निमाई की नियुक्ति होते ही उसका ब्याह हो गया। उसकी नवविवाहिता पत्नी ने अलग रहने का निर्णय तुरंत ही सुना दिया। वृद्ध पिता एवं असहाय बहन को छोड़ दोनों अलग रहने चले गए। जब तक वह श्वसुर-गृह में रही, पिता-पुत्री ने कठोर यंत्रणा को भी नतमस्तक होकर निःशब्द झेल लिया। अपने शोक विह्वल हृदय की एक भी आशंका को चेहरे पर नहीं आने दिया। विषण्ण चित्त से पिता-पुत्री सब कुछ हँसकर झेल लेते। निमाई अपनी पत्नी से बेहद घबराता था। तर्जनी के आदेश से ही वह निमाई से सारे काम अपने मन के अनुरूप करा लेती। उन दोनों के गृह-त्याग के बाद परिवार में शमशान-सी शांति छा गई। दूर्वा के मस्तिष्क में यह विचार चक्कर लगाता कि अपनी हठधर्मिता की वजह से ही वह जीवन के इस मोड़ पर आ खड़ी हुई है।
      निमाई के गृह-त्याग के बाद सरकार बाबू बिस्तर पर जा गिरे। दूर्वा को देख उनका मन अपराध बोध से ग्रस्त हो उठता। दुर्वह स्मृतियों का बोझ उन्हें अवसादग्रस्त कर देता। अपने मन की व्यथा वह किसी से कह भी नहीं सकते थे। दूर्वा की निरीह मूर्ति को देख उनका मन करुणा से भर उठता। एक रात वे जो सोये तो फिर ना उठे। उनकी मृत्यु के बाद निमाई आया था। बहन से वह आँखें चुराता रहा। एक बार अपने साथ चलने को कहकर सिर्फ औपचारिकता निभाई। दूर्वा ने साथ चलने से इनकार कर दिया। 
      स्मृति-गह्वर में डूबी दूर्वा को समय का ध्यान नहीं रहा। उड़ते हुए पक्षियों के कलरव ने उसका ध्यान खींचा। सूर्यास्त हो रहा था पर अरुणिमा का का प्रकाश अब भी तेज था। अतीत की पगडंडी से लौटने के बाद उसका मन घर लौटने को नहीं हो रहा था। फिर भी थके-हारे कदमों से वह घर की ओर चल पड़ी।        
      एकांत के क्षणों में उसे जतिन की याद बेहद सताती। लेकिन उसने जतिन को तो अपमान की आरी से चीर दिया था। जतिन ने प्रत्यक्ष रूप से उस पर कभी रोष प्रकट नहीं किया, फिर भी अव्यक्त ग़म की छाया उसके चेहरे पर परिलक्षित होती रही थी। उसे कितना आहत कर दिया था उसने अपने एक निर्णय से। अपने हृदय में चाहतों की खुश्बू समेटे जतिन उसके पास विवाह का प्रस्ताव ही तो लेकर आया था। दूर्वा की माँ ने उसके विवाह में देने के लिए गहने रखे थे। वह विवाह में खूब सजेगी क्योंकि यह रुत श्रृंगार की होगी। उसका रूप श्रृंगार करने से दमक उठेगा। जीवन में एकबार रुत आती है श्रृंगार की। जतिन के मन के अनुरूप ही वह सजेगी। लेकिन उसने तो जतिन पर तुषारापात कर दिया। पिता तथा भाई को आर्थिक सहारा देने के लिए उसने प्यार, सर्वस्व त्याग दिया। शाम की उदासी बढ़ती ही जा रही थी। मन यादों के दायरे में चक्कर काटने लगा। जतिन के साथ बिताए सुखद पल उसे याद आने लगे। उसने तो कोई संपर्क सूत्र भी नहीं रखा है कि उससे बातें करे, क्या करे वह? कैसे इन यादों की चुभन को कम करे?
      मंदिर के ढ़ाक बजने की आवाज निरंतर आ रही थी। पड़ोस से शंख-ध्वनि सुनकर वह भी पूजा-गृह में चली गई। आज उसने सम्पूर्ण निष्ठा से ओत-प्रोत होकर शंख-ध्वनि की। अचानक द्वार पर दस्तक हुई। शंख को रखकर सधे कदमों से चलकर उसने द्वार खोला।
      आगंतुक को देख उसे लगा कि पुनः शंख-ध्वनि जोरों से हो रही है। कहीं उसे भ्रम तो नहीं? या कोई दिवा-स्वप्न तो नहीं? उसने मानों झकझोर कर स्वयं से प्रश्न किया। उसे भौंचक खड़ी देख जतिन उसके हाथ थामकर कहा, ‘‘चलो, मैं तुम्हें लेने आया हूँ।’’ दूर्वा को अपनी आँखों-कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। अचानक इतना सारा प्यार पाकर उसकी सिसकियाँ फूट पड़ीं। जतिन ने उसे अपने सीने से लगा लिया। मंदिर से ढ़ाक की आवाज तीव्रतर होती चली गई। उसे महसूस हुआ जैसे उन दोनों के ऊपर शिउली के फूलों की बारिश हो रही हो। अब रुत श्रृंगार की आ पहुँची थी।  
(शिउली - हरसिंगार)
  •  24, एम.आई.जी., आदित्यपुर-2, जमशेदपुर-831013, झार./मोबा. 09334826858 

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