आपका परिचय

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

किताबें


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 1, अंक : 11, जुलाई  2012 

{अविराम के ब्लाग के इस अंक में  दो  पुस्तकों की समीक्षा  रख  रहे हैं।  कृपया समीक्षा भेजने के साथ  पुस्तक की एक प्रति हमारे अवलोकनार्थ (डा. उमेश महादोषी, एफ-488/2, राजेन्द्र नगर, रुड़की-247667, जिला - हरिद्वार, उत्तराखण्ड के पते पर) अवश्य भेजें।}  



उमेश महादोषी


बूँद से समुद्र तक : समय-सापेक्ष लघुकथाएँ

    ‘बूँद से समुद्र तकडॉ॰ सतीश दुबे की वर्ष 2011 में प्रकाशित नवीनतम लघुकथा-पुस्तक है। चार खण्डों में विभक्त इस पुस्तक के पहले खण्ड में उनकी विगत तीन वर्षों में लिखी गई 104 लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। दूसरे खण्ड में 1974 में प्रकाशित उनके पहले और चर्चित लघुकथा संग्रह सिसकता उजासकी 18 प्रतिनिधि लघुकथाएँ और उक्त पुस्तक पर वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकान्त नागर द्वारा लिखित समीक्षात्मक टिप्पणी शामिल है। सिसकता उजास आठवें दशक का बेहद महत्वपूर्ण संग्रह माना जाता है क्योंकि इसमें संग्रहीत लघुकथाएँ कथ्य, शिल्प, भाषा, सम्प्रेषणशीलता आदि की दृष्टि से बेहद सशक्त एवं प्रभावशाली तो हैं ही, आधुनिक लघुकथा के रूप-स्वरूप के निर्धारण की दृष्टि से भी अग्रणी रही हैं। इस संग्रह में कथ्य की विविधिता की दृष्टि से लघुकथा के फलक को नए आयाम भी मिलते दिखाई देते हैं। शायद इसीलिए बूँद से समुद्र तकमें इस संग्रह की प्रतिनिधि लघुकथाओं की पुनर्प्रस्तुति की गई है। तीसरे खण्ड में 1965-66 में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित बारह लघुकथाओं को शामिल किया गया है। यह वह समय था जब आधुनिक लघुकथा अपना रूप-स्वरूप तलाश कर रही थी और समकालीन समाज के चेहरे, उसकी विसंगतियों और परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब साहित्य के दर्पण में उभारने के लिए प्रयासरत थी। इस अर्थ में दुबे जी की ये लघुकथाएँ आधुनिक लघुकथा की पृष्ठभूमि की तरह हैं क्योंकि आधुनिक लघुकथा आज जिस मुकाम पर है, उसका आभास उन्होंने 1965-66 में लिखी इन लघुकथाओं के माध्यम से दे दिया था। पुस्तक के चौथे और आखिरी खण्ड में डॉ॰ सतीश दुबे के व्यक्तित्व एवं हिन्दी लघुकथा में उनके योगदान को रेखांकित करते दस समकालीन साहित्यकारों कमलकिशोर गोयनका, डॉ॰ श्रीराम परिहार, डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे, बसंत निरगुणे, जितेन्द्र जीतू, श्याम सुन्दर अग्रवाल, प्रतापसिंह सोढ़ी, मधुदीप, रामयतन यादव, खुदेजा खान एवं श्याम गोविन्द के आलेख (जिनमें एक साक्षात्कार है) शामिल हैं। लघुकथा के सन्दर्भ में इन लेखकों ने उनके व्यक्तित्व एवं रचनात्मकता के विभिन्न पक्षों को सामने रखा है। नए रचनाकारों एवं शोधकर्ताओं को उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराने की दृष्टि से ये सभी आलेख महत्वपूर्ण हैं। इस तरह पुस्तक के बाद वाले तीनों खण्डों की सामग्री डाक्टर साहब की लघुकथा यात्रा को सूत्रबद्ध करती है, जबकि प्रथम खण्ड की लघुकथाएँ उनके वर्तमान लघुकथा लेखन की प्रस्तुति को।
पहले खण्ड में शामिल 104 लघुकथाएँ 2008-2010 की अवधि में लिखी गई हैं और इस बात का पूरा अहसास कराती हैं कि ये इसी कालखण्ड की रचनाएँ हैं। रचनात्मक ऊर्जा की दृष्टि से अड़सठ से सत्तर वर्ष की आयु के दुबे जी इन लघुकथाओं में अठारह से तीस वर्ष के युवाओं के साथ चलते दिखाई देते हैं, लेकिन प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से अपने अनुभवों के पूरे वजन के साथ। वह अपनी रचनात्मक यात्रा में सदैव गतिशील रहना पसन्द करते हैं। यही वह बात है जो उनके रचनाकार को महान बनाती है। एक महान रचनाकार अपनी उम्र के साथ नहीं, अपने समयके साथ चलता है।  इनमें वर्तमान समय का यथार्थ तो है ही, समय और परिस्थितियों के अनुरूप नए आदर्शों/मूल्यों को स्थापित करने एवं तदनुरूप समाज, विशेषतः नई पीढ़ी के मार्गदर्शन की भावना भी ध्वनित हो रही है। खुशनुमा सुबहमें प्रो. शुक्ला के शलाका को आत्महत्या के विचार से उबारने में की घटना में प्रो. शुक्ला के व्यक्तित्व का एक सामान्य आदर्श निहित तो है ही, शलाका को ऐसे प्रेमी, जो उसकी चिन्ता किए बिना किसी और से शादी करने जा रहा है, से अपने को मानसिक रूप से अलग कर लेने की अप्रत्यक्ष प्रेरणा भी एक परिस्थितिजन्य आदर्श की ओर ले जाती है। एक और उदाहरणसामान्यतः एक नौ वर्ष के बच्चे का अपने माता-पिता के विरुद्ध शिकायत लेकर थाने पहुँच जाना और उसकी शिकायत पर पुलिस द्वारा कार्यवाही करना अच्छा नहीं माना जायेगा, परन्तु यदि बच्चे के प्रति माता-पिता अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह न करें,  उसके साथ मार-पीट करें, खाना देने में कोताही करें, ऐसे में बच्चा समाज में घटती घटनाओं की देखा-देखी अपनी समझ या कहीं से पुलिस मदद उपलब्ध होने की (आजकल छोटे बच्चों की स्कूली किताबों में बच्चों के अधिकारों एवं उपलब्ध सुरक्षा-संरक्षण की जानकारी उपलब्ध है) जानकारी पाकर माता-पिता के विरूद्ध शिकायत लेकर पुलिस थाने में पहुँच जाये और पुलिस बच्चे की शिकायत को गम्भीरता से लेकर समुचित कार्यवाही करे, तो साहित्यिक दृष्टि (और सामाजिक भी) से यह एक परिस्थितिजन्य आदर्श स्थिति होगी, क्योंकि इससे बच्चों के प्रति माता-पिता एवं दूसरे संरक्षकों की जानबूझकर अवहेलना एवं शोषण तो रुकेगा ही, बच्चों में सकारात्मक जागरूकता और बच्चों के संरक्षकों में अपने उत्तरदायित्वों के प्रति सतर्कता बढ़ेगी। बच्चे, बूढ़े, महिला और किसी भी दृष्टि से कमजोर व्यक्ति के मानवीय अधिकारों के संरक्षण की बात को व्यावहारिक स्तर पर उठाना आज की जरूरत है। जिन्दा है....नचिकेतालघुकथा में समाज के मार्गदर्शन के लिए यही परिस्थितिजन्य आदर्श है।
पेशे की जातमें बेरोजगारी से निजात पाने के लिए जाति विशेष से जोड़कर देखी जाने वाली नौकरी को स्वीकार करने के पक्ष में चक्रधर ने जातिबन्धन तोड़कर सामाजिक रूपान्तरण का जो तर्क सामने रखा है, वह भी परिस्थितिजन्य नए आदर्श की स्थापना ही है। भ्रममें सूर्यांश के पापा के शब्द ‘...हम भी इतने कूप-मण्डूक नहीं कि तुम लोगों की भावना को समझकर काम्प्रोमाइज नहीं करें... भी पीढ़ी-अन्तराल को लाँघकर नए मूल्यों का स्वीकार ही है। और भी अनेक रचनाएँ हैं। दरअसल, डाक्टर दुबे सामान्य आदर्शों/मूल्यों के साथ सकारण आधुनिकता को स्वीकार करते हैं, इसलिए उनके आदर्श समय और परिवर्तन के प्रवाह को वाधित नहीं करते, अपितु उसके साथ बहने-तैरने का आनन्द लेते हैं। फाइनल आन्सरऔर इच्छाओं का प्रतिबिम्बजैसी लघुकथाओं में इसे और-अच्छे से समझा जा सकता है। दरअसल यह परिस्थितिजन्य आदर्श समय सापेक्ष गतिशीलता को ही ध्वनित करता है।
अभी कुछ माह पूर्व ही डॉ॰ तारिक को दिए एक साक्षात्कार में डाक्टर साहब ने कहा था—‘आज अपने समय के समाज से जितना कहानीकार जुड़ा है, उतना लघुकथाकार नहीं। शायद अपनी ही शिकायत को दूर करने की पहल उन्होंने स्वयं आगे आकर बूँद से समुद्र तककी इन लघुकथाओं में की है। वर्तमान समाज कई कोणों से इन लघुकथाओं में प्रतिबिम्बित हुआ है। मानव-मन की कुण्ठाग्रस्त मनोवैज्ञानिक गुत्थियों को प्रपोजमें बखूबी चित्रित किया है।
छोटी और निकृष्ट सोच के सहारे व्यक्ति किस तरह अपनी प्रतिष्ठा के ताने-बाने बुनता है, इसे भीड़ में भेंटमें देखा जा सकता है। इस तरह के कथ्य कम मौकों पर ही रचनात्मकता की धार पर शान बनकर चमकते हैं। शहर के बीच मौत’,  मूर्ति’, ‘अपहरण’, ‘पाबन्दी’, ‘हरि इच्छा बलवान...!!’, ‘मुद्दा-ए-बहस’, ‘तप्त सूरज की ठंडी ऊष्मा’, ‘पेशी आदि कई लघुकथाओं में समाज का नकारात्मक चेहरा उभरकर सामने आया है। लेकिन यह नकारात्मकता ही समाज का पूरा प्रतिबिम्ब नहीं है, समाज में सकारात्मक चीजें भी हैं। प्रमुख अतिथि’, ‘नदी, नदी है...!’, ‘गंगाजल’, ‘प्रतिभागी आदि लघुकथाएँ भी हमारे अपने समय और  उसके सरोकारों को ही प्रतिबिम्बित करती हैं। ये कथ्य कहीं से आयातित नहीं किए गये हैं, इसी समाज के मानस-पटल से लिए गए हैं।
इन लघुकथाओं में समाज का एक और पक्ष भी है, जो उसकी गतिशीलता को प्रतिबिम्बित करता है। किसी भी समाज की गतिशीलता प्रतिबिम्बित होती है उसमें विद्यमान नवीन जीवनमूल्यों के प्रति आकर्षण, मानवीय महत्वाकांक्षाओं के प्रवाह, सामाजिक संचेतना के संचार तथा शोषण, अन्याय व दूसरी नकारात्मकताओं के प्रति आक्रोश एवं संघर्षशीलता और इन सबसे गुजरते मनुष्य के अन्तर्मन में प्रेम और अपनत्व की अविरलता में। पेशे की जात, भ्रम, फाइनल आन्सर जैसी लघुकथाओं में बदलते जीवनमूल्यों के प्रति स्वीकार की भावना है। अर्जुन ने कहा...!!में मानवीय महत्वाकांक्षा का प्रवाह भी है और सामाजिक संचेतना का संचार भी। सुहाग के निशानमें प्रेमा के शब्द अपनी परिस्थितियों के अनुरूप नए मूल्यों का सृजन भी करते हैं, इनमें सामाजिक संचेतना भी ध्वनित होती है और इनमें थोपी गई परिस्थितियों के प्रति आक्रोश भी है। दस्तूर’, ‘मां का धर्म’, ‘गुरु दक्षिणा...!!’, ‘महंगा माल आदि कई लघुकथाएँ आक्रोश एवं संघर्ष की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
डॉ॰ दुबे साहब ने प्रेम की गहराई को कविता जैसी अभिव्यक्ति दी है लघुकथा प्रेम-ब्लॉगमें। शैलीगत प्रयोग की दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण लघुकथा है। प्रेम और अपनेपन की डोर आदमी और जानवर के बीच भी एक अटूट और निश्छल रिश्ता बना सकती है। रिश्ताई नेहबंधमें एक बन्दर और मदारी के ऐसे ही रिश्ते में जीवन की झंकार सुनाई देती है। मनुष्यों के बीच तो ऐसे रिश्तों का बनना और भी स्वाभाविक है। तभी तो अंजलिमें एक गैस ऐजेन्सी की रिसेप्सनिस्ट गीतांजलि एक दिन अनायास एक बुजुर्ग गैस-ग्राहक के घर पहुँच जाती है और उनकी बेटी बन जाती है। रिश्तों में बसे प्यार और अपनेपन से झरती जीवन की धड़कनों की यही झंकार ऊर्जा की सौगातमें पोते पार्थ के उत्साह और निश्छल प्यार से पगी फोन-वार्ता के रूप में दादाजी की नशों की रगों में उतरकर उन्हें ताजगी से भर देती है। शायद इसी कारण हकलघुकथा में पिता द्वारा अपनी सम्पत्ति में बेटी को उसका हक देने की इच्छा पर बेटी मृणाल सम्पत्ति की बजाय हक के रूप में घर का प्यार मांगती है। रिश्तों में व्याप्त प्यार और अपनापन पीढ़ी अन्तराल को पाटकर बड़ों (विशेषतः माता-पिता) को बच्चों की भावनाएं समझने में भी मददगार सिद्ध होता है, और कई बार तो नए जीवन-मूल्यों की स्थापना में भी। इच्छाओं का प्रतिबिम्ब, फाइनल आन्सर, सानिध्य सुख-सुकून, भ्रम आदि इस तथ्य को रेखांकित करती प्रभावशाली लघुकथाएं हैं। प्यार और अपनेपन की यह झंकार कई बार एकान्त क्षणों की साथी स्मृतियों में घोंसला बनाकर अकेलेपन का सहारा बन जाती है। अगला पड़ाव, सहारा, क्षितिज-अस्ताचल की एक शाम आदि जैसी भावनात्मक लघुकथाओं में इसकी तीव्र अनुभूति होती है। लेकिन उपेक्षा के क्षणों में इस झंकार को सुनने की चाहत बहुत बड़ी पीड़ा का कारण बन जाती है। थके पाँवों का सफरलघुकथा के चाचाजी ऐसी ही पीड़ा के कारण बूँदें टपकाने का प्रयास कर रही छोटी-छोटी आँखें को जोरों से भींचने को विवश हैं।
कथ्य, भाषा, शिल्प और सम्प्रेषणीयता सभी स्तरों पर ये लघुकथाएं उदाहरण हैं। पर इनका भाव पक्ष बेहद प्रभावशाली है। कई लघुकथाएं तो लघुकथा के साथ कविता का अहसास कराती हैं। विविधिता की दृष्टि से ये लघुकथाएँ जीवन के बहुत से पक्षों पर रोशनी डालती हैं। निश्चित रूप से श्याम गोविन्द जी के शब्दों में वह (डॉ॰ दुबे) लघुकथा में जीवन की समग्रता जैसी चीज पैदा कर रहे हैं।


समीक्षित कृति : बूँद से समुद्र तक। कृतिकार : डॉ॰ सतीश दुबे। प्रकाशक: साहित्य संस्थान, ई-10/663, उत्तरांचल कालोनी, निकट संगम सिनेमा, लोनी बार्डर, गाजियाबाद-201102 संस्करण: 2011 मूल्य: 495/- मात्र  



हिंदी लघुकथा : समकालीन लघुकथा की पड़ताल 

    लघुकथा लेखन के साथ लघुकथा शोध एवं विमर्श के क्षेत्र में डॉ॰ शकुन्तला किरण ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्हें समकालीन लघुकथा पर पीएच.डी. उपाधि हेतु शोध के लिए पंजीकृत प्रथम शोधार्थी के रूप में तो जाना ही जाता है, तत्संबंधी अध्ययन एवं चिन्तन और परिणामस्वरूप लघुकथा के उन्नयन में योगदान हेतु उन्हें गिने-चुने लघुकथाकारों में शुमार किया जाता है। उनके वृहद् अध्ययन एवं शोधकार्य का ही एक सार्थक परिणाम है उनकी पुस्तक हिन्दी लघुकथा। इस पुस्तक  में उन्होंने आठवें दशक तक की लघुकथा की सम्पूर्ण रचनागत, विकास और संघर्ष यात्रा का शोधपरक एवं समालोचनात्मक लेखा-जोखा विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है। साथ ही उन्होंने इसमें लघुकथा के उद्भव एवं इतिहास सम्बन्धी सूत्रों को भी सावधानी और सूक्ष्मता के साथ रखने का प्रयास किया है। यद्यपि आठवें दशक के बाद लघुकथा पर काफी काम हुआ है, तथापि इस पुस्तक को इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि लघुकथा की आज तक की सम्पूर्ण यात्रा में आठवें दशक का कालखण्ड प्रतिनिधि कालखण्ड की तरह स्थित है और समकालीन लघुकथा की अधिकांश प्रवृत्तियों के दर्शन इस कालखण्ड में हो जाते हैं। इतना ही नहीं, लघुकथा को जिन विरोधों-अवरोधों के साथ बहुत सारी ऊल-जलूल उक्तियों, धारणाओं और थोपे गये वैचारिक विरोधाभासों का सामना करना पड़ा है, उनमें से भी अधिकांश आठवें दशक में सिर उठा चुके थे। डॉ॰ शकुन्तला किरण ने संयमित और तर्कसंगत ढंग से अपनी इस पुस्तक में तमाम बातों का नोटिस भी लिया है और तमाम नकारात्मक धारणाओं का खण्डन तथा भ्रमों व रूढि़यों का समाधान भी प्रस्तुत किया है।
पूरी पुस्तक को योजनाबद्ध पाँच वृहद् अध्यायों में वर्गीकृत किया गया हैहिन्दी लघुकथा: युगीन प्रभावों की भूमिका; आधुनिक हिन्दी लघुकथा: उद्भव और विकास; आठवें दशक के हिन्दी लघुकथा संग्रह, संकलन, विशेषांक: विश्लेषण एवं मूल्यांकन; हिन्दी लघुकथा: विशेषताएँ, व्याप्ति एवं निरन्तरता तथा हिन्दी लघुकथा: वर्गीकरण, पात्रगत विशेषताएं एवं जीवन मूल्य। प्रत्येक अध्याय में विषय से संबद्ध तथ्यों को उपयुक्त उद्धरणों के द्वारा तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया गया है तथा उनकी प्रामाणिकता को पुष्ट करने के लिए प्रत्येक अध्याय के अन्त में सन्दर्भ सूची भी दी गई है।
पहले अध्याय हिन्दी लघुकथा: युगीन प्रभावों की भूमिकाके आरम्भ में वर्तमान युग की तमाम स्थितियों-परिस्थितियों का जायजा लेते हुए मानव जीवन पर उनके प्रभावों की पड़ताल की गई है। यह पड़ताल समकालीन लघुकथा की आधार-भूमि को तलाशने जैसी है। इसके बाद लघुकथा के व्यापक अर्थ को विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं/मतों के समालोचनात्मक विवेचन के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। कहानी और लघुकथा के समरूपों के सन्दर्भ में लघुकथा सम्बन्धी भ्रमात्मक दृष्टिकोणों का विस्तार से विवेचन किया गया है। इसी सन्दर्भ में लघुकथा का उसके समरूपों (बोधकथा, भावकथा, चुटकुला, लतीफा आदि एवं कहानी) से अन्तर भी समुचित उदाहरण देकर स्पष्ट किया गया है। साथ ही समकालीन हिन्दी लघुकथा की विशिष्ट पहचान और उसकी मारक क्षमता को भी रेखांकित किया गया है। इस सन्दर्भ में समकालीन हिन्दी लघुकथा के सापेक्ष हिन्दीतर अन्य भारतीय भाषाओं यथाउर्दू, कन्नड़, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, बंगला, पंजाबी, तमिल आदि तथा सीरियाई (लेबनान प्रान्त), रूसी, अमेरिकी, चीनी, अंग्रेजी, चेक, आयरलैण्ड आदि कई विदेशी भाषाओं की लघुकथाओं का भी उपयुक्त उदाहरणों के साथ नोटिस लिया गया है। यह एक सामान्य सत्य है कि किसी भी काल का साहित्य युगीन प्रभावों से अछूता नहीं रहता, किन्तु जब ये युगीन प्रभाव घनीभूत होकर रचनात्मक वृत्तियों के साथ संश्लिष्ट होते हैं, तो साहित्य में कुछ क्रान्तिकारी परिवर्तन लाते हैं। लघुकथा बीसवीं सदी के ऐसे ही परिवर्तनों का परिणाम है, इसे पुस्तक के पहले अध्याय की तमाम विवेचना से समझा जा सकता है। हालाँकि शकुन्तला जी के कुछेक विचारों पर पुनर्विचार की गुंजाइश महसूस की जा सकती है। उदाहरण के लिए उनका यह कथन कि—‘जैसा अन्तर जयशंकर प्रसाद और कबीर की भाषा में है, लगभग वैसा ही अन्तर कहानी और लघुकथा की भाषा में है। इसी पुस्तक में कहीं अन्यत्र भी उन्होंने लघुकथा की भाषा को कबीर की भाषा माना है। मुझे लगता है कि बहुत-सी समकालीन लघुकथाओं के सन्दर्भ में यह कथन सत्य हो सकता है, पर इसे एक सामान्य तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा। अन्यथा कई प्रभावशाली लघुकथाएँ समकालीन लघुकथा के दायरे से बाहर हो जायेंगी, जो उचित नहीं होगा।
लघुकथा के उद्भव की खोज-बीन में जुटे लोग लघुकथा के बीज प्राचीन और मध्य-युगीन साहित्य में ढूँढ़ते रहे हैं। डॉ॰ शकुन्तला किरण ने इस सम्बन्ध में व्यापक पड़ताल की है और तथ्यपरक विवेचन प्रस्तुत किया है पुस्तक के दूसरे अध्याय में। इस हेतु उन्होंने आठवें दशक से पूर्व की लघुकथाओं के काल को दो प्रमुख कालखण्डों प्राचीनकाल एवं मध्यकाल में विभाजित करके तथ्यों को समझने हुए अपना विवेचन प्रस्तुत किया है। प्राचीनकाल की लघुकथाओं को पुनः तीन वर्गों- (अ) वेद, संहिता, पुराण व उपनिषद् की लघुकथाएँ, (ब) बौद्ध, जैन, महाभारत व रामायणकालीन लघुकथाएँ तथा (स) पंचतन्त्र, हितोपदेश, कथासरित्सागर की लघुकथाएँ में विभाजित करके उनकी प्रवृत्तियों का अध्ययन करके अपना विवेचन प्रस्तुत करते हुए माना है कि—‘अपवादों को छोड़कर दोनों (प्राचीन और आधुनिक लघुकथा) में कथ्य, शिल्प, उद्देश्य एवं प्रभाव के स्तर पर पर्याप्त अन्तर है। इसलिए लघुकथा क्षेत्र में प्राचीन कथाओं की भूमिका को निष्क्रिय माना जा सकता है। मध्यकाल (सन् 1000 से 1970 तक) की लघुकथाओं को उन्होंने पुनः तीन भागों(अ) पद्यकाल (भक्तिकाल एवं रीतिकाल सहित) की लघुकथाएँ (ब) भारत में प्रैस आने के बाद मुद्रित ग्रन्थों (प्रमुखतः उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ से उत्तरकाल तक) की लघुकथाएँ तथा (ब) पत्र-पत्रिकाओं एवं संकलनों (जिसमें उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति असन्तोष/विद्रोह से लेकर 1970 तक के कालखण्ड की लघुकथाएँ शामिल हैं) में बाँटकर उनका अध्ययन किया है और इन कालखण्डों की लघुकथा की प्रवृत्तियों का लेखा-जोखा सामने रखते हुए आधुनिक लघुकथा के परिप्रेक्ष्य में उनकी भूमिका का विवेचन किया है। पद्यकाल की लघुकथाओं में से भक्तिकालीन लघुकथाओं के बारे में लेखिका का मत है कि ये सभी वैष्णव सम्प्रदाय के प्रति अभिरुचि जगाने के उद्देश्य से लिखी गई हैं, जबकि रीतिकालीन लघुकथाओं को पद्यात्मक होने के कारण आधुनिक लघुकथा के सन्दर्भ में उनकी भूमिका को महत्वहीन करार दिया है।
मुद्रणकाल में मुद्रित कई ग्रन्थों यथासिंहासन बत्तीसी, बेताल विंशतिका/बैताल पचीसी, लताइफ-ए-हिन्दी/हिन्दवी में कथाएँ, नकलिया-ए-हिन्दी, सदुपदेश की कथाएँ, हितोपदेश का हिन्दी अनुवाद, वामा मनोरंजन, क्षेत्र-प्रकाश, पन्नन की बात, चैरासी वैष्णवन की वार्ता आदि में शामिल लघुकथाओं को भी लेखिका ने आधुनिक हिन्दी लघुकथा से कथ्य, शिल्प, उद्देश्य, प्रभाव आदि की दृष्टि से बहुत भिन्न माना है। इनमें से अधिकांश की प्रकृति को लेखिका ने नीतिपरक, शिक्षाप्रद या मनोरंजक पाया है,  और स्पष्ट किया है कि उनका चरित्र आधुनिक लघुकथा के समान नहीं हैं।
मध्यकाल की लघुकथाओं के तीसरे वर्ग में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर 1970 तक पत्र-पत्रिकाओं एवं संकलनों में शामिल लघुकथाओं के अध्ययन के आधार पर उनकी प्रवृत्तियों को समझने की चेष्टा की गई है। इनमें से 1950 तक की लघुकथाओं के सम्बन्ध में लेखिका अपवादस्वरूप कुछ लघुकथाओं को छोड़कर शेष को कथ्य एवं शिल्प के स्तर पर आधुनिक हिन्दी लघुकथा के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण नहीं माना है। 1950 से 1970 के मध्य की लघुकथाओं के बारे में उनका मत है किइनमें आधुनिक हिन्दी लघुकथा की भाव-भूमि को स्पर्श करती लघुकथाएँ मिल जाती हैं, परन्तु सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से इस कालखण्ड की लघुकथा भी बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।
1970 के बाद देश के राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक बदलावों से जनित प्रभावों का प्रभाव लोगों की सोच पर पड़ा और वह साहित्य में प्रतिबिम्बित भी हुआ। इसने आधुनिक हिन्दी लघुकथा की भावभूमि तैयार की। लघुकथा को चर्चा में लाने के प्रयासों में 1973-74 के कागज संकट का भी कुछ/फौरी योगदान रहा। इस सबका विवरण देते हुए दूसरे अध्याय के दूसरे भाग में डॉ॰ शकुन्तला ने आठवें दशक में लघुकथा की प्रगति का वर्षवार ब्योरा प्रस्तुत किया है। इस ब्योरे में आठवें दशक की लघुकथा की विकास-यात्रा में विभिन्न लघुकथाकारों एवं पत्र-पत्रिकाओं का योगदान भी प्रतिबिम्बित हुआ है, अतः इस दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण है।
तीसरे अध्याय में आधुनिक हिन्दी लघुकथा के उन्नयन में आठवें में प्रकाशित लघुकथा-संग्रहों, संकलनों तथा पत्र-पत्रिकाओं के लघुकथा-विशेषांकों की भूमिका का विश्लेषण एवं मूल्यांकन किया गया है। विभिन्न माध्यमों में प्रकाशित लघुकथाओं की प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए तथा लघुकथा विषयक आलेखों की चर्चा के माध्यम से आधुनिक सन्दर्भों में आठवें दशक की लघुकथा के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास इस अध्याय में है। इसके साथ ही शकुन्तला जी ने आधुनिक लघुकथा संबंधी कई भ्रामक विचारों का खण्डन तथा सम्यक समाधान भी प्रस्तुत किया है। तथ्यों के समर्थन में उन्होंने तर्क और उदाहरण दोनों का ही उपयोग किया है।
चौथे अध्याय में आठवें दशक में उभरकर आई लघुकथा की सामान्य कथ्यगत, शिल्पगत एवं प्रभावगत विशेषताओं को रेखांकित किया गया है और सूक्ष्मतम संवेदनाओं की वाहिका एवं सामाजिक बदलाव के सशक्त व सार्थक माध्यम के रूप में लघुकथा की भूमिका को स्वीकार किया गया है। इस अध्याय में लघुकथा की सभी क्षेत्रों में व्याप्ति तथा उसकी निरन्तरता के प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं।
लघुकथा की दिशा और उसके सामाजिक सरोकारों एवं उस पर परिस्थितियों के प्रभाव को समझने की दृष्टि से लघुकथा को विभिन्न परिवेशों के आधार पर वर्गीकृत करके समझने की कोशिश पुस्तक के अन्तिम अध्याय में परिलक्षित होती है। साथ ही, लघुकथा के पात्रों की विशेषताओं एवं उभरते जीवनमूल्यों का उपयुक्त नोटिस भी लिया गया है, जो अन्ततः सामाजिक बदलाव में लघुकथा की भूमिका को भी स्पष्ट करता है। कुल मिलाकर लघुकथा का जो स्वरूप आठवें दशक में उभरकर सामने आया है, वही आधुनिक मानवीय एवं सामाजिक आवश्यकताओं के सन्दर्भ में उसकी प्रभावी भूमिका को तय करता है। इसे पूरी तरह से समझने की दृष्टि से डॉ॰ शकुन्तला किरण की यह पुस्तक बेहद उपयोगी है। पुस्तक की भूमिकास्वरूप वरिष्ठ लघुकथाकार एवं चिन्तक डॉ॰ सतीश दुबे एवं बलराम अग्रवाल ने संक्षिप्तत: इस पुस्तक की जरूरत के सन्दर्भ को स्पष्ट किया है।

पुस्तक : हिन्दी लघुकथा। लेखिका : डॉ॰ शकुन्तला किरण। प्रकाशक: साहित्य संस्थान, ई-10/660, उत्तरांचल कालोनी (निकट संगम सिनेमा), लोनी बार्डर, गाजियाबाद-201102 (उ.प्र.) प्रथम संस्करण: 2009 मूल्य: रु.395/- मात्र।

समीक्षक संपर्क : एफ-488/2, गली सं. 11, राजेन्द्रनगर, रुड़की-247667, हरिद्वार(उत्तराखण्ड)


गतिविधियाँ

 अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 1, अंक : 11, जुलाई   2012







‘‘प्रेरणा‘‘ पत्रिका के लघु उपन्यास अंक का लोकार्पण व
लघु उपन्यास विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी
 

नई दिल्ली । 18 फरवरी 2012 को हरियाणा साहित्य अकादमी तथा अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के संयुक्त तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित अणुव्रत सभागार में आयोजित लघुउपन्यास विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर समकालीन आलोचना के षिखर पुरूष तथा महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विष्वविद्यालय के कुलाघिपति डाॅÛ नामवर सिंह ने भोपाल से अरूण तिवारी के संपादन में प्रकाषित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘प्रेरणा‘‘ के लघु उपन्यास अंक का लोकार्पण किया।
         इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रख्यात आलोचक व चिंतक डॉÛ नामवर सिंह नें लेखकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप लोगों  का काम लिखना है। आप निश्चिंत होकर लिखते रहें, आपकी रचना लम्बी कहानी है या लघु उपन्यास इसका फैसला आलोचकों को करने दें। रचनाकार को अपनी उर्जा लेखन में खर्च करनी चाहिए । उन्होंने कहा कि यह रहस्य तो रचनाकार ही बता सकता है कि कभी कभी वह कम से कम शब्दों में असरदार बात कह जाता है जबकि कभी कभी उसी बात को प्रभावी ढ़ंग से कहने के लिए उसे लम्बी चैड़ी भूमिका की जरूरत पड़ती है। लम्बी कहानी बनाम लघु उपन्यास के मसले पर श्री सिंह ने कहा कि जिस तरह पद्य विधा में मुक्तक , गजल , खंण्ड काव्य तथा प्रबंध काव्य को साफ-साफ परिभाषित किया गया है इस तरह का कोई वस्तुनिष्ट वर्गीकरण या सीमांकन गद्य साहित्य में नहीं है। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ किस तरह लोग मूल विधा आख्यान, आख्यायिका, गल्फ तथा कथा शब्दों को भूलते जा रहें है तथा ‘शॉट स्टोरी‘ के लिए कहानी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह जानना भी बहुत आवष्यक है कि आजादी के बाद हिंदी कहानी कितनी आगे बढ़ी है। उन्होंने माना कि दलित तथा महिला लेखन ने कहानी को बहुत हद तक प्रभावित किया है अब तो पत्रों तथा डायरी के द्वारा भी कहानियां  लिखी जा रही हैं। अब कहानी का परिदृष्य काफी कुछ बदल चुका है।हमें यह भी देखना है कि कहानी अपने समय की विद्रूपताओं तथा विसंगतियों से किस हद तक मुठभेड़ कर रही है।इस संदर्भ में श्री सिंह नें ‘‘प्रेरणा‘‘ के प्रयास कि प्रषंसा की।  अंत में उन्होंने संतोष प्रकट करते हुए कहा कि अणुव्रत सभागार में आयोजित आज कि यह संगोष्ठी अपने स्वरूप में अहिंसात्मक रही क्योंकि वैचारिक घात -प्रतिघात से आज यहाँ कोई मुर्छित नहीं हुआ।
        संगोष्ठी का संचालन करते हुए रचनाकार शैलेन्द्र चैहान ने कहा कि वर्तमान उपभोक्तावादी युग में साहित्य आम पाठकों से दूर होते जा रहा है। व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य का स्थान सीमित होते जा रहा है। ऐसे प्रतिकुल माहौल में ‘‘प्रेरणा‘‘ जैसी सार्थक लघु पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है। इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार तथा ‘लोकायत‘ के संपादक बलराम ने अमेरिकी लेखिका हेलेन हैंफ के द्वारा इंग्लैण्ड स्थित मार्क एण्ड कंÛ के मालिक फंैक ड्वेल को लिखे 81 पत्रों  के माध्यम से सृजित एक लघुउपन्यास का रागात्मक वर्णन किया है। उन्होंनें यह भी बताया कि विगत दिनों ‘‘प्रेरणा‘‘ ने ‘स्त्री विमर्ष‘ के स्थान पर ‘नारी अस्मिता अंक‘ निकाल कर एक नई शुरूआत की। बलराम ने ‘‘प्रेरणा‘‘ के वर्तमान अकं में प्रकाषित राजेन्द्र लहरिया के ‘एक डायरीःला दिनांक‘ तथा डॉÛष्याम सखा  श्याम के  ‘कोई फायदा नहीं‘ नामक लघु उपन्यासों के कथ्य एवं षिल्प की प्रषंसा की। रचनाकार  डॉÛपल्लव ने लघु उपन्यास के स्वरूप और सरोकार पर प्रकाष डालते हुए कहा कि लम्बी कहानी तथा लघु उपन्यास के आकार को लेकर विभ्रम बना रहता है। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि जब वे चितौड़ में स्कूल के छात्र थे तभी से वे अपने षिक्षक के यहां से ‘‘प्रेरणा‘‘ पत्रिका लेकर पढ़ा करते थे। उन्होंने यह स्वीकार किया कि मेरे जैसे अनेक विद्यार्थियों को ऐसी पत्रिकाओं से दिषा एवं दृष्टि मिलती है। नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय विभाग से जुड़े महेष दर्पण ने लघु उपन्यास की परिभाषा , स्वरूप निर्धारण तथा सीमांकन को लेकर अपना मन्तव्य प्रकट किया। साहित्य के प्रचार-प्रसार में ‘‘प्रेरणा‘‘ की भूमिका की उन्होंनें प्रषंसा की।  प्रकृति  तथा आदिवासी की प्रषंसा करते हुए उन्होंनें कहा कि ये धरती के सच्चे वारिष हैं। कथाकार राजेन्द्र लहरिया नेे लघु उपन्यास में कथ्य एवं शिल्प  के सनातन द्वंद्व की चर्चा करते हुए उनके समानुपातिक प्रयोग की सलाह दी। ‘इंडिया न्यूज‘ से जुड़े अशोक  मिश्र ने  कहा कि लघु पत्रिकाओं को आपसी गुटबाजी से बचते हुए सार्थक, सोद्देश्य  परन्तु प्रासंगिक साहित्य के सृृजन में लगे रहना चाहिए। इस दिशा में ‘प्रेरणा’ का योगदान सराहनीय है।
          इस अवसर पर ‘‘प्रेरणा‘‘ के संपादक अरूण तिवारी ने कहा कि ‘‘प्रेरणा‘‘ का प्रकाशन  मेरे लिए जुनून एवं मिशन है। मैं हर प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए भी इसका प्रकाषन जारी रखने के लिए प्रतिबद्व हूँ। उन्होंने लम्बी कहानी को लघु उपन्यास तथा लघु उपन्यास को लम्बी कहानी समझे जाने वाले भ्रम को रेखंाकित किया जिस पर नामवर सिंह ने अध्यक्षीय वक्तव्य दिया। इस अवसर पर श्री तिवारी ने संगोष्ठी में उपस्थित लोगों के प्रति आभार ज्ञापित किया। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक  श्री 
श्याम  सखा श्याम ने वक्ताओं को पुष्पगुच्छ के साथ शॉल ओढ़ाकर स्वागत एवं सम्मानित किया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को अपने हास्य-व्यंग पूर्ण टिप्पणियों से खूब हंसाते हुए सबके प्रति आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर संगोष्ठी में उपस्थित जिन रचनाकारों ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई उनमें राम कुमार कृषक, उद्भ्रांत , प्रदीप पन्त , डाॅ. कमल किशोर गोयनका , हरे राम समीप , विजय मोहन शर्मा , सुरेन्द्र कुमार श्लेष, राज कुमार गौतम, डॉÛ श्रीमती कमल कुमार, डॉÛ करूणा शर्मा, डॉÛ जसविन्द्र कौर विंद्रा , डॉÛ रूपा सिहं, राजेष शर्मा, रवि प्रताप शुक्ल ,रामनारायण स्वामी, राजेष जैन, विजय वर्धन डागा, महेन्द्र शर्मा, संदीप हरियाणवी, सुधीर कुमार सिहं, उर्मिअरूण, अनिमेष, अनु, रमेश खंडपाल, विजेन्द्र तथा राजीव रजंन के नाम विषेष उल्लेखनीय हैं। अतं में अखिल भारतीय अणुव्रत संस्था के प्रबंध न्यासी घनष्याम बोथरा ने संगोष्ठी में उपस्थित लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आज मैं स्वंय को सौभाग्यषाली मान रहा हूँ कि इतने लब्धप्रतिष्ठीत व मूर्धन्य साहित्यकारों के बीच बैठ कर साहित्यिक विमर्ष कर रहा हूं यह क्षण मेरे जीवन में न केवल यादगार बल्कि ऐतिहासिक भी रहेगा। 

संपर्क अर्जुन प्रसाद सिंह
जवाहर नवोदय विद्यालय,
पाटन सीकर राज0 332718
मो0-   09413070837
ईमेल- arjunprasadsinghjnv@gmail.com






‘एक और अन्तरीप’ की संवाद श्रंखला संगोष्ठी 


      सुप्रसिद्ध साहित्यिक त्रैमासिकी ‘एक और अन्तरीप’ द्वारा संवाद श्रंखला के अन्तर्गत 27 मई 12, रविवार को जयपुर स्थित देराश्री शिक्षक सदन, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में साहित्यिक पत्रकारिता पर एक दिवसीय संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें प्रदेश भर की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक, लेखक व पत्रकार ने भाग लिया। 
     डॉ. हेतु भारद्वाज (अक्सर) की अध्यक्षता में सम्पन्न प्रथम सत्र में ‘साहित्यिक पत्रकारिता की अवधारणा’ पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता व विशिष्ट अतिथि क्रमशः श्री कमर मेवाड़ी (सम्बोधन), श्री राजाराम भादू (संस्कृति मीमांशा) एवं हरिनारायण (कथादेश) थे। डॉ. हेतु भारद्वाज जी ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएँ जीवन के वास्तविक परिदृश्य को चित्रित कर रही हैं तथा साहित्यिक पत्रकारिता प्रतिरोध की संस्कृति पत्रकारिता प्रतिरोध की संस्कृति का निर्माण कर रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से विद्रूपता पर चोट करने की जो परम्परा शुरू हुई थी, वह निरन्तर बनी रहनी चाहिए। डॉ. कमर मेवाड़ी जी ने कहा कि छोटी पत्रिकाएँ साहित्यिक पत्रकारिता को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए छोटी पत्रिकाओं के महत्व को कमतर नहीं आंका जा सकता है। उन्होंने हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों का साझा मंच बनाने का भी सुझाव दिया, ताकि उनके निर्बाध प्रकाशन, मुद्रण, वितरण, विज्ञापन, प्रसारण तथा लेखकीय पारिश्रमिक जैसे मसलों पर भी कोई नीति बनायी जा सके। इस अवसर पर श्री राजाराम भादू जी ने कहा कि वतग्मान समय लघु पत्रिकाओं का स्वर्ण युग है। इन दिनों लघु पत्रिकाओं का कलेवर जितने वैविध्यपूर्ण तथा विस्तृत रूप में प्रकाशित हो रहा है, उसे देखते हुए लघु पत्रिकाओं की महत्ता और बढ़ जाती है। उन्होंने आगे कहा कि जनसंघर्ष को उभारने में ये पत्रिकाएँ महती भूमिका निभाती हैं। संगोष्ठी के इस सत्र में ईशमधु तलवार, हरीश काम चंदानी, प्रेमचंद गाँधी, डॉ. दुष्यंत आदि ने भी अपने विचार रखे।
     संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में श्री प्रेम कृष्ण शर्मा (एक और अन्तरीप) की अध्यक्षता में ‘साहित्यिक पत्रकारिता तथा मुख्यधारा पत्रकारिता के अन्तः सम्बन्धों’ पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता व विशिष्ट अतिथि क्रमशः डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, डॉ. माधव हाडा एवं भारतरत्न भार्गव थे। इस सत्र में बोलते हुए डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि मुख्यधारा पत्रकारिता का उजला पक्ष यह है कि वह समाज में बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है। साहित्यिक पत्रकारिता तथा मुख्य धारा की पत्रकारिता के मुद्दे समान होते हैं अतः दोनों को सकारात्मक ढंग से लेना चाहिए। ‘एक और अन्तरीप’ के प्रधान संपादक प्रेम कृष्ण शर्मा ने कहा कि साहित्यिक पत्रकाओं को निकालने वाले अपने श्रम व धन का त्याग करते हैं। इन पत्रिकाओं के संरक्षण हेतु सरकारी स्तर पर भी प्रयास होने चाहिए। जब दोनों तरह की पत्रकारिता के उद्देश्य समान हैं तो दोनों को प्रथक-प्रथक करके क्यों देखा जाता है? मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाडा ने कहा कि हिन्दी के लोगों को आत्मावलोचन की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। आज रचनात्मक लेखन में तथ्य का आग्रह बढ़ रहा है तो सोच में भी तथ्यात्मकता आनी चाहिए। हम लोकप्रिय को घटिया साबित करने पर तुल जाते हैं तथा हमारा बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ प्रतिरोध में खड़ा दिखाई देता है, ऐसा नहीं होना चाहिए। अच्छी बातों को लकर आत्मसातीकरण की क्रिया भी अपनानी चाहिए। इस अवसर पर श्री भारतरत्न भार्गव ने मुख्य धारा की पत्रकारिता के जीवन मूल्यों से सम्बद्व होने पर जोर दिया।
      संगोष्ठी के इस सत्र में डॉ. लक्ष्मी शर्मा, डॉ. शिवचरण कौशिक, रामकुमार सिंह, नवलकिशोर, मायामृग आदि ने भी अपने विचार रखे। ‘एक और अन्तरीप’ के संपादक डॉ. अजय अनुरागी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर ‘शब्द संचार’ पत्रिका एवं संस्था की ओर से साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रदर्शनी भी लगायी गयी। संगोष्ठी के अन्त में कवि भगवत रावत एवं गजानन वर्मा को श्रद्धांजलि दी गयी। (समाचार सौजन्य: डॉ. अजय अनुरागी, 1, न्यू कॉलोनी, झोटवाड़ा पंखा, जयपुर)

उदभ्रांत की सक्रियता और विविधता चौंकाती है: केदारनाथ सिंह

नई दिल्ली, 04 जुलाई 2012। ‘‘कवि उदभ्रांत अपनी काव्ययात्रा की विविधता और सक्रियता से लगातार चौंकाते हैं। उनकी कविताओं में जीवन से जुड़ी स्थितियों पर सीधा प्रहार होता है।’’ उक्त विचार वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित ‘कवि संधि’ कार्यक्रम में कवि उदभ्रांत के काव्य पाठ के बाद व्यक्त किए। कार्यक्रम में उदभ्रांत ने 30 से ज्यादा कविताएं पढ़ी। ‘स्वाह’ और पहल में प्रकाशित कविता ‘बकरा मंडी’ को श्रोताओं ने बेहद पसंद किया। ‘कठपुतली’, ‘केंचुआ’, ‘नट’, ‘रस्सी का खेल’, ‘प्रेत’, ‘स्वेटर बुनती स्त्री’, ‘पूर्वज’, पतंग’ आदि कविताओं में भूमण्डलीकरण, पड़ोसी देशों से हमारे संबंध पर टिप्पणियों के अतिरिक्त आम आदमी, पशु पक्षियों से जुड़े मार्मिक बिम्ब थे। 
     ‘‘मैं केवल लंबी कविताएं लिखता हूँ’’ के भ्रम को तोड़ते हुए उन्होंने कुछ छोटी कविताएँ भी सुनाईं। कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं के अनुरोध पर उन्होंने कुछ नवगीत सस्वर सुनाए। इससे पहले अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि 1948 में राजस्थान के नवलगढ़ में जन्मे उदभ्रांत जी की पहचान नवगीतकार, गज़लगो, समकालीन कविता के कवि, आलोचक के साथ-साथ प्रबन्धकाव्य रचियता के रूप में है। अभी तक उनकी साठ से ज्यादा कृतियाँ प्रकाशित हैं। आपकी पुस्तकों में त्रेता, राधामाधव, स्वयंप्रभा, ब्लैक होल, शब्द कमल खिला है आदि प्रमुख हैं। आपको हिंदी अकादमी दिल्ली के साहित्य कृति सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निराला पुरस्कार, शिव मंगल सिंह सुमन पुरस्कार के अतिरिक्त कई अन्य पुरस्कार मिल चुके हैेें।
     कार्यक्रम में प्रदीप पंत, डॉ. वीरेन्द्र सक्सेना, डॉ. मधुकर गंगाधर, डॉ. कर्ण सिंहचौहान, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, डॉ. बली सिंह, हीरालाल नागर, राजेन्द्र उपाध्याय, अनुज, प्रताप सिंह, सुशील कुसमाकर सहित कई गणमान्य लेखक, पत्रकार उपस्थित थे। (प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा मोबा. 9868228620)



पं. दामोदरदास चतुर्वेदी स्मृति सम्मान व रानी लक्ष्मीबाई बलिदान 


दिवस समारोह का आयोजन


नई दिल्ली। गत् 16 एवं 17 जून को यहां भारतीय सांस्कृतिक परिषद के सौजन्य से व सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति एवं बुन्देलखंड विकास परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दिल्ली स्थित आजाद भवन में दामोदर दास चतुर्वेदी स्मृति सम्मान एवं महारानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस समारोह का अत्यन्त सफल व प्रेरक आयोजन किया गया। दोनों दिन विभिन्न कार्यक्रमों का शुभारम्भ क्रमशः श्री दामोदर दास एवं महारानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर पुष्प अर्पण, दीप प्रज्जवलन एवं किशोर श्रीवास्तव व साथियों के भाईचारा गीत के साथ हुआ। 
         पहले दिन के साहित्यिक समारोह में जहां अनेक कवियों ने समां बांधा वहीं दूसरे दिन के समारोह का मुख्य आकर्षण रहा अंकित जैन एंड पार्टी द्वारा श्री प्रदीप जैन द्वारा लिखित गीत ‘हम बुंदेले, हम बुंदेले’ का मंचन व साहित्य कला परिषद के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत रानी झांसी पर आधारित नृत्य नाटिका। इन कार्यक्रमों ने दर्शकों का खूब मन मोहा। पहले दिन के विभिन्न कार्यक्रमों का कुशल संचालन जहाँ सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के स्थानीय प्रमुख श्री सुरेश नीरव व अरविन्द पथिक ने किया वहीं दूसरे दिन के कार्यक्रम का संचालन बुन्देलखंड विकास परिषद के पदाधिकारी श्री अवधेश चौबे ने किया। पहले दिन के समारोह के मुख्य अतिथि सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी एवं दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डा० योगानंद शास्त्री ने भाषाओं के माध्यम से देश को जोडने पर बल दिया एवं दूसरे दिन के समारोह के मुख्य अतिथि ग्रामीण विकास राज्य मंत्री श्री प्रदीप जैन एवं समाजवादी नेता रघुठाकुर, पूर्व सांसद श्री उदय प्रताप सिंह व विधायक डॉ. एस. सी. एल. गुप्ता ने अपने भाषणों में रानी झांसी की स्मृति को ताजा करते हुए राष्ट्रीय एकता का आवाह्न करके श्रोताओं का खूब दिल जीता। 
        दोनों अवसरों पर शिक्षा, प्रशासन, फिल्म, चिकित्सा, साहित्य एवं कला आदि क्षेत्रों की अनेक जानी-मानी हस्तियों को सम्मानित भी किया गया। जिनमें पहले दिन दामोदर दास स्मृति सम्मान से सर्वश्री  बी. एल. गौड, सुभाष जैन, राजकुमार सचान होरी, प्रशांत योगी, डा. प्रदीप चतुर्वेदी, प्रवीण चौहान, अशोक शर्मा, डा. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, शरददत्त, रिंद सागरी, डा. जया बंसल, कुंवर जावेद, ब्रजेंद्र त्रिपाठी, विजय आईदासानी, डा० रिचा सूद, अरूण सागर, जय कुमार रूसवा को नवाजा गया। इसी प्रकार से बुंदेलखंड विकास परिषद के प्रतिभा सम्मान से सर्वश्री डॉ. वी. के अग्रवाल, डॉ. ओ. पी. रावत, इंजि. वी. के. शर्मा, अरूण खरे, राजीव दुबे, डॉ. बी. एल. जैन, डॉ. वी. के. जैन, कामिनी बघेल एवं डॉ. अनिल जैन आदि को सम्मानित किया गया। 
          दो दिनों तक चले इस समारोह में श्री किशोर श्रीवास्तव की जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी रही। (समाचार सौजन्य: हम सब साथ साथ डेस्क, नई दिल्ली मो. 9868709348)


साहित्यिक पत्रकारिता दिवस पर संगोष्ठी


     1 जून की शाम गांधी शांति प्रतिष्ठान सभागार, नई दिल्ली में अ.भा.सा.प.संपा.संघ एवं यू.एस.एम. पत्रिका के तत्वावधान में 10वें साहित्यिक पत्रकारिता दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ‘पत्रकारिता का साहित्यिक, सांस्कृतिक स्वरूप और इसकी सामाजिक महत्ता’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में डॉ. रत्नाकर पाण्डे, डॉ. मृदुला सिन्हा, ज्ञानेन्द पाण्डेय, राजकुमार सचान ‘होरी’ तथा श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने अपने अनुभवपरक विचार प्रस्तुत किये। इस अवसर पर श्री उमाशंकर मिश्र को ‘मृगेश स्मृति सम्मान’ से सम्मानित तथा विकास मिश्र सम्पादित ‘बस, इसी एक आस में’ का लोकार्पण किया गया। संगोष्ठी का संचालन उमाशंकर मिश्र ने किया। (समाचार सौजन्य : विकास मिश्र)

कादम्बरी द्वारा सम्मान समारोह हेतु प्रविष्टियाँ आमन्त्रित

जबलपुर की साहित्यिक संस्था ‘कादम्बरी’ के वर्ष 2012 के सम्मान समारोह के अन्तर्गत विभिन्न सम्मानों हेतु साहित्यकारों/पत्रकारों से 30 सितम्बर 2012 तक प्रविष्टियां आमन्त्रित की गई हैं। इस सम्बन्ध में विस्त्रत सूचना डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ (1436/बी, सरस्वती कॉलोनी, चेरीताल वार्ड, जबलपुर-482002, मोबा. 09425899232) से की जा सकती है। (समाचार सौजन्य: आचार्य भगवत दुबे)

जगदीश किंजल्क को राष्ट्रीय संवादश्री सम्मान

    अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के चौवीसवें राष्ट्रीय अधिवेशन  भोपाल में 15 जुलाई 2012 को साहित्यकार एवं ‘दिव्यालोक‘ के संपादक श्री जगदीश किंजल्क को ‘राष्ट्रीय संवाद श्री‘ सम्मान से अलंकृत किया गया। यह सम्मान साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से सृजनात्मक प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने, पूर्ववर्ती एवं समकालीन साहित्य के प्रकाशन तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों पर राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों एवं समालोचकों के मध्य सार्थक संवाद स्थापित करने हेतु प्रदान अतिविशिष्ट एवं अविस्मरणीय योगदान हेतु प्रदान किया जाता (समाचार सौजन्य : श्रीमती राजो किंजल्क)

हुड्डा ने किया सप्त सिन्धु का विमोचन

     हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने हरियाणा ग्रन्थ अकादमी की त्रैमासिक पत्रिका ‘सप्त सिन्धु’ के प्रवेशांक का विमोचन अपने कार्यालय करते हुए इस अंक को हरियाणा के लोक साहित्य पर केन्द्रित करने की सराहना की। इस अवसर पर वित्तायुक्त कृष्ण मोहन, अकादमी के कार्य.अध्यक्ष डॉ. के.के. खंडेलवाल, उपाध्यक्ष कमलेश भारतीय, निदेशक डॉ. मुक्ता, संपा. सलाहकार मोहन मैत्रेय, आर.के.राठी आदि उपस्थित हैं।
     उल्लेखनीय है कि हरियाणा ग्रन्थ अकादमी का गठन पिछले वर्ष सितम्बर माह में मुख्यमंत्री श्री हुड्डा के प्रयासों से किया गया था। अकादमी ने सप्त सिंधु का पुनः प्रकाशन शुरु किया है। इसकी प्रकाशन अवधि त्रैमासिक रखी गयी है। प्रवेशांक लोक साहित्य पर केन्द्रित है, जिसमें डॉ. खंडेलवाल का हरियाणवी कहावतें, कमलेश भारतीय का लोक साहित्य को नयी पीढ़ी से परिचित करवाने की चुनौती, धर्मपाल मलिक का हरियाणवी लोक साहित्य में हास्य व्यंग्य, डॉ. पूरणचंद्र शर्मा का हरियाणा का लोक नाट्य सांग तथा डॉ. सुभाषचंद्र, रामफल चहल, महासिंह पूनिया आदि रचनाकारों के आलेख प्रकाशित हैं। अकादमी शीध्र ही कथा पत्रिका को प्रकाशन भी शुरू करेगी। (समाचार सौजन्य : धर्मेन्द्र सिंह, अकादमी भवन, पंचकूला)

परिचर्चा एवं ‘घूंघट’ का लोकार्पण

     विगत 20 मई को ‘हिमाक्षरा राष्ट्रीय साहित्य परिषद, वर्धा (महाराष्ट्र) के तत्वावधान एवं डॉ. रीता सिंह की अध्यक्षता व डॉ. वर्षा पुनवटकर एवं वृन्दावन राय सरल के संचालन में दमन द्वीप के एक होटल में ’वैश्वीकरण के सन्दर्भ में साहित्यकार की भूमिका’ विषय पर परिचर्चा, श्री श्यामशरण शर्मा के गीत संग्रह ‘घूंघट’ का लोकार्पण तथा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कवि श्री वृन्दावन राय सरल एवं व्यंग्यकार श्री अमर सिंह राजपूत को ‘अष्टक्षेत्रीय गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में कई राज्यों के साहित्यकारों ने भाग लिया। हिमाक्षरा के अध्यक्ष डा. इसरार कुरेशी ‘गुनेश’ ने धन्यवाद ज्ञापित किया। (समाचार सौजन्य : वृन्दावन राय सरल, पाटेदार कालोनी, सागर, म.प्र.)

डॉ. ब्रह्मजीत गौतम को ‘डॉ. रमेशचन्द्र चौबे सम्मान’

   




    












       विगत दिनों जबलपुर की संस्था कादम्बरी द्वारा सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. ब्रह्मजीत गौतम को उनकी पुस्तक ‘जनक छन्द: एक शोधपरक अध्ययन’ के लिए डॉ. रमेश चन्द्र चौबे सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान में उन्हें शॉल, प्रमाणपत्र व रु.2100/- की नकद राशि कई प्रसिद्ध एवं अनेक स्थानीय साहित्यकारों की उपस्थिति में प्रदान की गयी। (समाचार सौजन्य : वंशस्थ गौतम)

लघुकथा लेखक कोश

     श्री सुरेश जांगिड़ उदय ने एक राष्ट्र स्तरीय वृहद लघुकथा लेखक कोश की योजना बनाई है। लघुकथा लेखकों के पूर्ण परिचय, फोटो एवं लघुकथा के सम्बन्ध में उनके कार्यों/योगदान की विस्त्रत जानकारी 30 सितम्बर 2012 तक कोश में निशुल्क प्रकाशन हेतु सुरेश जांडिल उदय, डी.सी. निवास के सामने, करनाल रोड, कैथल-136027 (हरि.) के पते पर आमंत्रित है। (समाचार सौजन्य : सुरेश जांडिल उदय, कैथल)

पन्द्रहवें दिव्य पुरस्कार घोषित

     बहुचर्चित अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों की घोषणा गत 20 अप्रैल को साहित्य सदन, भोपाल में आयोजित समारोह में की गई। वेद प्रकाश कंवर (दिल्ली) को ‘सेरीना’ उपन्यास पर, डॉ. सुधा ओम ढींगरा (यूएसए) को कहानी संग्रह ‘कौन सी ज़मीन अपनी’ एवं कैलाश पचौरी (बैरसिया) को काव्य संग्रह ‘सन्नाटे की सुराही में’ पर दिव्य पुरस्कारों के साथ नौ अन्य रचनाकारों को दिव्य रजत अलंकरण प्रदान किये जायेंगे, जिनमें डॉ. नताशा अरोड़ा, कुमार शर्मा अनिल, कुँवर किशोर टण्डन, राजेन्द्र शर्मा ‘अक्षर’, डॉ. अशोक गुजराती, डॉ. एम.एल.खरे, श्रीमती आशमा कौल, संतोष सुपेकर एवं श्याम त्रिपाठी शामिल हैं। निर्णायक मण्डल में सर्वश्री मोती सिंह (अध्यक्ष), प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल, प्रो. विजय कुमार अग्रवाल, प्रो. एच.एस. त्रिपाठी, हरिकृष्ण तैलंग, प्रियदर्शी खैरा, प्रभुदयाल मिश्र, आनन्द त्रिपाठी, मयंक श्रीवास्तव, संतोष खरे, अनिल माथुर, राजेन्द्र नागदेव, कैलाश नारायण शर्मा, रमेश चन्द्र खरे एवं श्रीमती विजय लक्ष्मी विभा शामिल रहे। इसी के साथ 16वें दिव्य पुरस्कारों हेतु 30 नवम्बर 2012 तक प्रविष्टियां आमन्त्रित की गयी हैं। जानकारी हेतु श्रीमती राजो किंजल्क, 145-ए, सांईनाथ नगर, सी-सेक्टर, कोलार, भोपाल-42 (मोबा. 09977782777 ईमेल: jagdishkinjalk@gmail.com) पर सम्पर्क करें। (समाचार सौजन्य : जगदीश किंजल्क, संयोजक: दिव्य पुरस्कार)

शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान 2013 हेतु पुस्तकें आमन्त्रित

     उज्जैन की साहित्यिक संस्था ‘शब्द प्रवाह साहित्य मंच’ द्वारा आयोजित ‘शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान’ हेतु करव्य संग्रह, व्यंग्य संग्रह एवं लघुकथा संग्रह की प्रविष्टियां 31 दिसम्बर 2012 तक आमन्त्रित की गई हैं। विवरण हेतु संदीप सृजन, ए-99, व्ही.डी. मार्केट, उज्जैन-6 (मोबा. 09926061800 व 09406880599) पर सम्पर्क किया जा सकता है। (समाचार सौजन्य : संदीप सृजन)

प्रज्ञा कहानी पुरस्कार-2012 हेतु आमन्त्रण

     प्रज्ञा प्रकाशन, रायबरेली के सौजन्य से द्वितीय प्रज्ञा कहानी पुरस्कार-2012 हेतु प्रविष्टियां (मौलिक/अप्रकाशित कहानी) 31.10.2012 तक प्रज्ञा प्रकाशन, 24, जगदीशपुरम्, लखनऊ मार्ग, निकट त्रिपुला चौराहा, रायबरेली-229001 (उ.प्र.) के पते पर आमन्त्रित की गई हैं। विशेष विवरण उक्त पते या मोबाइल 09425323193 पर प्राप्त किया जा सकता है। (समाचार सौजन्य : किरण वर्मा)


प्रवीण अग्रवाल स्मृति सम्मान एवं काव्य गोष्ठी


मुज़फ्फरनगर। आज अखिल भारतीय भाषा साहित्य समागम (उत्तर प्रदेश) के तत्वाधान में एवं नैनीताल बैंक की ९० वी वर्ष गांठ के अवसर पर बैंक के सहयोग से सम्मान समारोह एवं काव्य गोष्ठी का भव्य आयोजन
किया गया।  कार्य क्रम की अध्यक्षता जाने माने  साहित्यकार डॉ. जे.पी. सविता जी ने की तथा मुख्य अतिथि रहे देवबंद से पधारे वरिष्ठ  साहित्यकार श्री महेंदर कुमार कम्बोज व अतिथि श्री अजय भटनागर, मैनेजर नैनीताल बैंक रहे। काव्य  गोष्ठी एवं सम्मान समारोह का कुशल सञ्चालन डॉ अलका वशिस्थ ने किया।
कार्य क्रम के संयोजक डॉ अ कीर्ति वर्धन ने आज के कार्यक्रम के बारे में बताते हुए कहा की साहित्य व साहित्यकार ही ऐसा है जो जाति,धर्म व क्षेत्रवाद से बढ़ कर राष्ट्र विकास के लिए काम करता है। अपने १३ वर्ष दिल्ली प्रवास के पश्चात अपने नगर मुज़फ्फरनगर में आने के बाद साहित्य परिवार को और अधिक विस्तार देने को आज की काव्य गोष्ठी का उद्देश्य बताते हुए देश के अलग-अलग नगरों से आये कवियों का परिचय कराया। जिसमे श्री अली हसन मकरैंडिया (दादरी, उ.प्र.), श्री गाफिल स्वानी (बुलंदशहर, उ.प्र.),  डॉ ज्वाला प्रसाद कौशिक (मेरठ, उ.प्र.), श्री महेंदर कम्बोज (देवबंद, उ.प्र.), श्री प्रवीण आर्य (दिल्ली),  कुमारी महिमा श्री  (दिल्ली), श्री लाल बिहारी लाल (दिल्ली), श्रीमती सोनू गुप्ता (दिल्ली),  श्री शिव प्रभाकर ओझा (फरीदाबाद, हरियाणा), डॉ. अनिल शर्मा अनिल (धामपुर), श्री बिजेंदर शर्मा (सहारनपुर, उ.प्र.), श्री प्रीतम कुमार प्रीतम (शामली) तथा स्थानीय कवियों में श्री नेम पाल प्रजापति, डॉ सुशीला शर्मा, श्री पवन कुमार पवन, श्री अमित धरम सिंह, डॉ मुकेश दर्पण, श्री अरुण अकेला, डॉ अ कीर्तिवर्धन व अन्य कवियों ने कविता पाठ किया।
बाहर से आये सभी कवियों का पुष्प माला, शाल, प्रमाण पत्र   तथा प्रतीक चिन्ह देकर 'प्रवीण  अग्रवाल स्मृति सम्मान' से अलंकृत किया गया। सभी स्थानीय कवियों को तथा विशिष्ट मेहमानों को भी प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।  मुज़फ्फरनगर के पूर्व नगर अध्यक्ष श्री कपिल देव भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। सभागार में १०० से अधिक कवियों एवं श्रोताओं की उपस्थिति ने कार्यक्रम को भव्यता प्रदान की।
कार्यक्रम का प्रारंभ माँ सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्वलन से किया गया। श्री अली हसन मकरैंडिया ने सरस्वती वंदना का पाठ किया। विभिन्न कवियों अपनी सशक्त कविताओं का शानदार कविता पाठ किया और श्रोताओं को  झूमने  पर विवश कर दिया। काव्य गोष्ठी को अंतिम परवान दादरी से आये श्री अली हसन मकरैंडिया ने दिया उन्होंने अनेक रचनाओं का पाठ किया और वेद, पुराणों के सन्दर्भ से राम और राम सेत  की महिमा बखान की। श्री कपिल देव अग्रवाल पूर्व अध्यक्ष नगर पालिका ने इस प्रकार के कार्यकर्मों के बार-बार आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया।
      श्री अजय भटनागर, मैनेजर नैनीताल बैंक ने  उपस्थित सभी लोगों का आभार व्यक्त किया। स्काय  लार्क कोलिज के प्रबधन, ग्रीन कलर लैब, हिंदुस्तान विज्ञापन एजेंसी के मालिक सुधीर जी,वाणी मुज़फ्फरनगर, समर्पण-मुज़फ्फरनगर, भारतीय साहित्यकार परिषद् दिल्ली, समाचार पत्र के संवाद दाताओं व संपादकों के साथ साथ आज के कार्यक्रम की संचालिका डॉ अलका वशिस्थ का हार्दिक आभार व्यक्त किया।  डॉ अ कीर्ति वर्धन ने नैनीताल बैंक व बहार से उनके निमंत्रण पर पधारे सभी साहित्यकारों ,स्थानीय संस्थाओं तथा समारोह में उपस्थित कवियों, श्रोताओं का धन्यवाद् किया। अंत में जलपान के साथ गोष्ठी का समापन किया गया।  (समाचार सौजन्य :  डॉ अ कीर्ति वर्धन मोबाईल ८२६५८२१८००)

देवेन्द्र कुमार मिश्रा को ‘आलराउन्ड कवि’ की उपाधि

     साहित्यकार देवेन्द्र कुमार मिश्रा को फरीदकोट की संस्था आलराऊँड अकादमी द्वारा ‘आलराउन्ड कवि’ की उपाधि से विभूषित किया गया। श्री मिश्रा को यह सम्मान उनके बहुमुखी व्यक्तित्व एवं काव्य साधना को ध्यान में रखते हुए प्रदान किया गया। (समाचार सौजन्य : अमित कुमार लाड़ी)



211. ओइम् शरण शर्मा आर्य ‘चंचल’


ओइम् शरण शर्मा आर्य ‘चंचल’










सम्प्रति : अध्यापक 
सम्पर्क : हिन्दी विभाग, राजकीय इण्टर कॉलेज, भौनखाल, अल्मोड़ा-263646 (उत्तराखण्ड)
       फोन : 09411431348




अविराम में प्रकाशन


ब्लॉग अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में तीन चतुष्पदियाँ।







नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

210. ललित फरक्या ‘पार्थ’

ललित फरक्या ‘पार्थ’


सम्प्रति :  सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया में उप-प्रबन्धक।
सम्पर्क :  4, गोविन्द नगर, दशपुर, मन्दसौर-458001 (म.प्र.)
मोबाइल :  09406657522




अविराम में प्रकाशन


ब्लॉग अंक :  जून 2012 अंक में एक काव्य रचना- पूरक।



नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

209. कृष्ण स्वरूप शर्मा ‘मैथिलेन्द्र’


कृष्ण स्वरूप शर्मा ‘मैथिलेन्द्र’


दोहा परिवार की समर्पित त्रैमासिक पत्रिका ‘मेकलसुता’ के सम्पादक। शिव संकल्प साहित्य परिषद, नर्मदापुरम् के कार्यकारी अध्यक्ष।


सम्पर्क:   गीतांजलि-भवन, म.आ.ब. 8, शिवाजीनगर, उपनिवेशिका, नर्मदापुरम्-461001 (म.प्र.)
        दूरभाष :  07574-257729 एवं 203384 


अविराम में प्रकाशन


ब्लॉग अंक : जून 2012 अंक में तीन दोहे।





नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

208. अनिल द्विवेदी ‘तपन’


अनिल द्विवेदी ‘तपन’








जन्म :  01.01.1959
शिक्षा :  बी.एस-सी., एल-एल.बी., पी.जी.डी. इन क्रिमिनोलोजी।
लेखन/ प्रकाशन/योगदान :  कविता, गीत, क्षणिका, लघुकथा, बालसाहित्य आदि। पत्रकारिता व समाज सेवा में भी सक्रिय। दो बालगीत संग्रह ‘मेंढक दादा’ व ‘उड़न खटोला’ प्रकाशित कृतियां। तीसरी पुस्तक ‘विभु-भुवन के गुब्बारे’ प्रेस में। परिचय ग्रन्थ ‘जनकवि गिरिजेश’, अल्पना, लोक अदालत स्मारिका, विधि-मंजूषा, अमृता आदि का सम्पादन। अनेकों पत्र-पत्रिकाओं व तीन दर्जन से अधिक संकलनों में रचनायें प्रकाशित। अकशवाणी लखनऊ से वार्ता प्रसारित।
सम्मान :  आधा दर्जन से अधिक मानद उपाधियां व कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, आचार्य पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान आदि सहित दो दर्जन से अधिक सम्मान।
सम्प्रति : जनपद एवं सत्र न्यायालय, कन्नौज में वरिष्ठ अधिवक्ता।
सम्पर्क :  ‘दुलारे निकुंज’, 46-सिपाही ठाकुर, कन्नौज-209725 (उ.प्र.) 
       फोन :  05694-234368 / 09450690631




अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक : जनवरी-मार्च 2012 अंक में एक लघुकथा- जीवन साथी।
ब्लाग संस्करण : दिसम्बर 2011 अंक में एक लघुकथा- सॉरी मम्मी।





नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

207. गौरी शंकर वैश्य ‘विनम्र’


गौरी शंकर वैश्य ‘विनम्र’


शिक्षा :  एम.एस-सी., बी.एड.।


सम्पर्क : 117, आदिलनगर, लखनऊ-226022(उ.प्र.)
मोबाइल : 09956087585




अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  जनवरी-मार्च 2012 अंक में एक काव्य रचना- कविता।







नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

206. अमित कुमार लाडी


अमित कुमार लाडी






जन्म :  26.11.1975
लेखन/प्रकाशन/सम्पादन :  कई विधाओं में लेखन के साथ-साथ चित्रकारी में भी रुचि। पंजाबी, हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद के क्षेत्र में भी कार्यरत। हिन्दी, पंजाबी व अंग्रेजी में क्रमशः 6, 17 व 1 मौलिक एवं क्रमशः 6, 8 व 1 सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित। ‘आलराउँड’ नाम से पंजाबी, हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं में अलग-अलग तीन पत्रिकाओं का प्रकाशन-सम्पादन।
सम्प्रति :  प्रकाशक, आलराउँड पब्लिकेशन्ज।
सम्पर्क :  मुख्य सम्पादक, आलराउँड मासिक, डोडां स्ट्रीट, फ़रीदकोट-151203 (पंजाब)
        फोन :  09815775626/ ई मेल  :  amitkumarladdi@gmail.com




अविराम में प्रकाशन


ब्लाग संस्करण :  दिसम्बर 2011 व फरवरी 2012 अंकों में कविता ‘कई बार’। 







नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

205. अजय चन्द्रवंशी


अजय चन्द्रवंशी












जन्म :  18.03.1978 कवर्धा में। 
शिक्षा :  हिन्दी में स्नातकोत्तर।
लेखन/प्रकाशन/योगदान  :  कविता, ग़ज़ल एवं आलोचनात्मक लेख। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में। ‘भूख एवं प्रेम’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित कृति।
सम्प्रति :  शा. हाईस्कूल सूखाताल, कवर्धा जिला- कबीरधाम में शिक्षाकर्मी वर्ग-1 के पद पर कार्यरत।
सम्पर्क :  राजमहल चौक, फूलवारी के सामने, कवर्धा, जिला- कबीरधाम-491995 (छ.गढ़)




अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में दो ग़ज़लें।
ब्लाग संस्करण :  जनवरी 2012 अंक में एक ग़ज़ल एवं 
               जुलाई 2012 अंक में एक ग़ज़ल।





नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

204. डॉ. नौशाद ‘सुहैल’ दतियावी


डॉ. नौशाद ‘सुहैल’ दतियावी


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मूलतः ग़ज़लकार। दो सौ अधिक पत्र-पत्रिकाओं में अनेकों रचनाएं प्रकाशित। 
सम्मान :  विभिन्न संस्थाओं से ढाई दर्जन से अधिक सम्मान। 
सम्पर्क :  61/13, तलैया मुहल्ला, दतिया-475661 (म.प्र.)




अविराम में प्रकाशन 


मुद्रित अंक :  अप्रैल 2012 अंक में एक ग़ज़ल।



नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

203. महेश अग्रवाल


महेश अग्रवाल








जन्म :  04.08.1946, भोपाल में। 


शिक्षा :  वाणिज्य में स्नातक। 


लेखन/प्रकाशन/योगदान :  मूलतः कवि। दो ग़ज़ल संग्रह ‘और कब तक चुप रहें’ व ‘जो कहूँगा सच कहूँगा’ प्रकाशित कृतियाँ । ‘रंगपर्व एवं जन सम्वाद’ सम्पादित कृति। ‘ग़ज़ल सप्तक’ संकलन के सात रचनाकरों में से एक। अनेकों संकलनों एवं पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। 
सम्मान :  1998 में म.प्र. के राज्यपाल द्वारा सम्मानित। 
सम्प्रति :  भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लि. से सेवानिवृति के बाद लेखन को समर्पित।
सम्पर्क :  71, लक्ष्मी नगर, रायसेन रोड, भोपाल-462021 (म.प्र.)




अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक :  दिसम्बर 2011 अंक में एक ग़ज़ल





नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे


202. टी. सी. सावन


टी. सी. सावन






जन्म : 21.05.1979 को गांव खमुहीं, जिला चम्बा, हि.प्र. में। 
शिक्षा :  पर्यटन प्रबन्धन में स्नातकोत्तर उपाधि, पी.जी.डी.आई.टी. (कम्प्यूटर), इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स, एम.ए (अंग्रेजी) अध्ययनरत। वास्तविक नाम टेक चन्द। 
लेखन/प्रकाशन/योगदान :  कविता, क्षणिका, गीत, ग़ज़ल एवं लेख। पत्रकारिता एवं समाजसेवा में भी सक्रिय। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। ‘कन्या भ्रूण हत्या’ के विरुद्ध लेखन एवं डाक्यूमेन्ट्री आदि के माध्यम से सक्रिय। कुछ एलबमों में गीतकार व निर्देशक के तौर पर योगदान।
सम्प्रति :  बीमा अभिकर्ता के साथ माइण्ड पॉवर स्पोकन इंग्लिश इन्स्टीट्यूट के निदेशक।
सम्पर्क :  माइण्ड पॉवर स्पोकन इंग्लिश इन्स्टीट्यूट, भंजराडू,-176316, तह. चुराह, जिला- चम्बा (हि.प्र.) 
       फोन :  08988022314 / 09736708704




अविराम में प्रकाशन
मुद्रित अंक :  जनवरी-मार्च 2012 अंक में दो क्षणिकाएँ- 1. आकाक्षाएँ व 2. प्रेम।
ब्लॉग संस्करण :  अक्टूबर 2011 अंक में एक कविता- आग।
      जनवरी 2012 अंक में दो क्षणिकाएं- 1. याद व 2. अन्नाजी





नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  आबंटित  आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर दें, हम आपका परिचय हटा देंगे

201. कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’


कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’




लेखन/प्रकाशन/योगदान: मूलत  :   कविता, गीत एवं समीक्षा में लेखन।
 विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पत्रकारिता में भी सक्रिय।
सम्पर्क :  38-ए, विजयनगर, करतारपुरा, जयपुर-302006 (राज.)
       मोबाइल :  09983811506




अविराम में प्रकाशन


मुद्रित अंक : अभी नहीं।


ब्लाग संस्करण : अप्रैल-मई 2012 अंक में एक काव्य रचना- ‘हौले-हौले नभ से उतरी...’।





नोट : १. परिचय के शीर्षक के साथ दी गयी क्रम  संख्या हमारे कंप्यूटर में संयोगवश  
आबंटित आपकी फाइल संख्या है. इसका और कोई अर्थ नहीं है
२. उपरोक्त परिचय हमें भेजे गए अथवा हमारे द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर
 आधारित है. किसी भी त्रुटि के लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. त्रुटि के बारे में रचनाकार द्वारा हमें 
सूचित करने पर संशोधन कर दिया जायेगा। यदि रचनाकार अपने परिचय में कुछ अन्य 
सूचना शामिल करना चाहते हैं, तो इसी पोस्ट के साथ के टिपण्णी कॉलम में दर्ज कर सकते
 हैं। यदि किसी रचनाकार को अपने परिचय के इस प्रकाशन पर आपत्ति हो, तो हमें सूचित कर 
दें, हम आपका परिचय हटा देंगे