आपका परिचय

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2, अंक : 9-10,  मई-जून 2013

।।कविता अनवरत।।

सामग्री :  इस अंक में सर्वश्री हरनाम शर्मा, गणेश भारद्वाज ग़नी, डॉ. सुरेश उजाला, अजय चन्द्रवंशी, सुधीर कुमार मौर्य एवं सुश्री विनोद कुमारी किरन की काव्य रचनाएं।



हरनाम शर्मा 




दो कविताएँ

1. उत्कर्ष
पर्वत का अहंकार भंग करने के लिए
मनुष्य करोड़ों वर्षों से/उन्नत शिखर की ओर
गतिमान रहा
पर्वत-मस्तक उन्नत रहा
बीच राह में
थक-हारकर मनुष्य मनुष्य ने निज मस्तक उठा
जब-जब पर्वत-शिखा का अवलोकन किया
नन्हें पक्षियों को सदैव शिखर के ऊपर
रेखा चित्र : के.रविन्द्र 
आकाश के निकट पाया है।

2. छिद्रान्वेषी
जाने किस सोच में बैठे थे हम
समय था कम
कमियाँ निकालते रहे इनकी-उनकी
वे होती न थी कम
खुद को निहारते कैसे-कब?
खुद को सुधारते कैसे-कब?
फुर्सत में न थे हम
कमियाँ निकालते रहे इनकी-उनकी
समय था कम
जैसे थे वैसे ही रह गये हम।
  • ए.जी. 1/54-सी, विकासपुरी, नई दिल्ली-110018


गणेश भारद्वाज ग़नी



खोखले विचारों के बांस

मनोबल के ऊंचे पर्वत पर बैठा
वह निहार रहा था
विचारों की गहरी नदी के उस पार
निराशा के बादलों की ओट से 
उम्मीद का खिलता सूरज
अब ढ़लने लगा था।

सांझ पास आते-आते
जैसे थम गई कहीं
दुःख की रात चुपके से
आ बैठी पास।

बरसों लड़ते रहे जो युद्ध
रेख चित्र : बी मोहन नेगी 
वे सुधारक मिट गए
पर नहीं मिटी एक लकीर अब तक।

आज होते ज़िन्दा अगर बुद्ध
तो क्या देख पाते खिचड़ी के वक्त 
अलग पंक्ति बुद्ध राम की 
जातिवाद के अन्त का सबक 
पढ़ा था पाठशाला में
आज यह उसे मज़ाक लगा
सिद्धान्तों और परम्पराओं की चादर में
एक बड़ा सुराख लगा।
खोखले विचारों के बांस भी 
क्या बन पाएंगे सिद्धान्तों की बांसुरी
और फिर फूटेंगें जीवन मूल्यों के स्वर।

अभी तो तथाकथित कवि 
कर रहे हैं खराब कविता की छवि
शब्द नकली हैं सार बनावटी
डाईनिंग टेबल पर बैठकर
भूख पर कविता सोच रहे हैं
पूजी के ढ़ेर पर मारे कुण्डली
समाजवाद का राग अलाप रहे हैं
सामने खड़ा है एक प्रश्न-
क्यों लगा टूटने जैविक चक्र
और डोलने प्रकृति का संतुलन
होने लगे जब विलुप्त-
बाघ, गिद्ध, चिड़ियां और वनस्पतियां
रेखा चित्र : सिद्धेश्वर 
समझ तो रहे हैं हम 
संतुलन और समानता के लिए
इन सबकी भूमिका
पर कौन किसे समझाए?
अब लगी सूखने इन्तजार की नदी
क्या मुख्य पंक्ति में आने के लिए
बुद्ध राम को चाहिए अब भी कोई
लूथर, लिंकन, मंडेला, मार्क्स, गांधी
या अंबेडकर
थामकर अंगुली जो
मिला दे मुख्यधारा में।

कितने ही ऐसे गुरूकुल हैं अब भी 
जहां एकलव्य हो रहे अपंग
और कितने ही द्रोणाचार्य अब भी
जो कर रहे व्यवस्था को अपंग
घृणा के बीज हो रहे अंकुरित
परम्पराओं, आस्थाओं के खाद-पानी से
कुप्रथाओं के सब्जबाग पनप रहे हैं
हृदय में कविता बनते कौन देख पाया 
क्या कभी फूल को खिलते देखा है?
  • एम.सी. भारद्वाज हाऊस, भुटी कालोनी, डाक- शमशी, जिला कुल्लू (हि.प्र.)-175126

डॉ. सुरेश उजाला



बीज

माटी में पड़ा-
ऊर्जावान बीज-
कभी गलता नहीं-
मरता नहीं।

अनुकूल-
और
पर्याप्त मात्रा में-
जल-गर्मी-वायु-
और
माटी मिलने पर-
हो जाता है- अंकुरित
छाया चित्र : शशिभूषण बडोनी 
वर्षों बाद भी।

अतएव-
राख में दबी-
एक चिंगारी-
काफी है- विचारों की
आग लगाने को- 
इतिहास बदलने को-
जनहित में।
  • 108-तकरोही, पं. दीनदयालपुरम मार्ग, इन्दिरा नगर, लखनऊ (उ.प्र.)


अजय चन्द्रवंशी





ग़ज़ल

वो रूठे तो आफताब लगे।
मेहरबां तो आफताब लगे।

किसने इसका रोटी नाम रखा,
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
वो नशा है कि शराब लगे।

अपनी वफाओं का क्या कहूँ,
जो दर्द मिले बेहिसाब लगे।

अभी मोहब्बत को समझा नहीं,
अभी बेरुखी मुझे खराब लगे।

जब से मैंने नकाब लगाया है,
हर चेहरा बेनकाब लगे।
  • राजमहल चौक, फूलवारी के सामने, कवर्धा, जिला- कबीरधाम-491995 (छ.गढ़)


सुधीर कुमार मौर्य


{युवा कवि-कथाकार श्री सुधीर कुमार मौर्य का ग़ज़ल संग्रह ‘‘आह’’ वर्ष 2011 में प्रकाशित हुआ था। उनके इस संग्रह से प्रस्तुत हैं दो ग़ज़लें।}


दो ग़ज़लें

1.
सभी तो करीब हैं जाने पहचाने उसे।
रेखाचित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
फकत1 सरोकार नहीं मेरे वीराने से उसे।

न सुनाओ किस्से उसकी बेवफाई के यारो,
कि भुलाया है मैंने लाख बहाने से उसे।

उसके ख्वाबों ने मुझे रात को सोने न दिया,
कोई तो रोके मेरी नींद उड़ाने से उसे।

सहारा जीने का बस है एक तस्वीर तेरी,
कोई हटाये न अब मेरे सिरहाने से उसे

मुझको न रास आये बात वो वाइज2 की,
कि आते हुए देखा मैंने मयखाने से उसे।

उसको रकीब3 की उल्फत पे है यकीन
मैं भी तो चाहता हूँ इक जमाने से उसे।

1केवल     2 उपदेशक    3 दुश्मन  

2.
रेखा चित्र : राजेन्द्र परदेसी 
जाके वापस रफाकत1 निभाने न आया।
वो वफाओं के नगमे सुनाने न आया।

कुशिन्दे-आलम2 के कूचे से गुजरे हम,
कोई मय्यत को मेरी उठाने न आया।

महरूम ऐसे हुए लुत्फे इश्क से हम,
कोई जी को मेरे बहलाने न आया।

अब न इश्क रही न खुमारियाँ रही,
हम नीमजदा3 को कोई जगाने न आया।

1मित्रता     2 जहां को मारने वाला    3 अर्द्धबेहोश  
  • ग्राम व  पोस्ट- गंज जलालाबाद, जिला: उन्नाव-241502, उ.प्र.


विनोद कुमारी किरन



बिटिया

पंखुरी गुलाब सी, कनी हीरे सी
कली कचनार सी, बसन्ती बयार सी
चाँदनी चाँद की, बरखा फुहार सी
रागिनी राग की, मधुर अहसास सी
कैसे बताऊँ तुझे क्या है तू मेरे लिए?
मुझको तो लगती है बिटिया तू प्राण सी
जिन्दगी की भागदौड़ में अनुपम उपहार सी।

छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 

समझ नहीं पाता मैं होती क्यों भ्रूण हत्या?
मानव बन जाता है जाने क्यों दानव सा?
माँ तो होती ममता की मूरत ही
फिर क्यों बन जाती हत्यारिन बेटी की
कैसे कांटों में, कचरे के ढेर में
फेंक देती है ममता की मूरत जो होती है
कैसे बताऊँ तुझे क्या है तू मेरे लिए?
मुझको तो लगती है बिटिया तू प्राण सी
ज़िन्दगी की आस सी मधुर मुस्कान सी।
  • जी-127, उदयपथ, श्यामनगर विस्तार, जयपुर, राजस्थान।

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग : वर्ष  :  2,  अंक  : 9-10,  मई-जून 2013

।।कथा प्रवाह।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ.सतीश दुबे, श्री श्यामसुन्दर अग्रवाल, सु-श्री शोभा रस्तोगी ‘शोभा’, श्री अहफ़ाज़ अहमद कुरैशी, डॉ नन्द लाल भारती व श्री किशन लाल शर्मा की लघुकथाएं।


डॉ.सतीश दुबे




{श्री सुरेश जांगिड़ उदय ने हाल ही में वरिष्ठ लघुकथाकारों की श्रेष्ठ लघुकथाओं की एक श्रंखला का संपादन-प्रकाशन आरम्भ किया है। इस श्रंखला की प्रथम कड़ी के रूप में उन्होंने वरिष्ठतम लघुकथाकार डॉ. सतीश दुबे साहब की लघुकथाओं की पुस्तक ‘‘डॉ. सतीश दुबे साहब की श्रेष्ठ लघुकथाएँ’’ पुस्तक संपादित-प्रकाशित की है, जिसमें उन्होंने दुबे साहब की 99 चयनित लघुकथाएं शामिल की हैं। प्रस्तुत हैं इसी संग्रह से दो श्रेष्ठ लघुकथाएं।}



उत्स
     लम्बे-चौड़े पाटवाली नदी की ओर गहन-गम्भीर विचार में खोकर उन्होंने इशारा किया- ‘‘नदी की ओर देख रही हो ना? पानी सूख जाने के कारण, देखो प्रवाह, गहराई, इसके जल से अठखेलियां करती हुई तरंगे सब गायब हो गई। इसके जीवन से लुप्त हो गईं। यहाँ तक कि इस शिवालय की मूर्ति-पूजा और घंटियाँ बजना भी बंद हो गईं। न आदमी, न जानवर! पशु-पक्षी सब कन्नी काट गये। समझी ना! जीवन भी यही है। पर इससे
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
सबक लेने की बजाय हम मोहपाश में बँधते जाते हैं। यह जानते हुए भी, पाट कितना भी चौड़ा हो, पानी सूख जाने पर अर्थ ही बदल जाता है.....।’’

    ‘‘अब मैं अपनी बात भी कहूँ....। आपकी निगाह किनारे पर खड़े हुए वृक्षों की ओर है कि नहीं? बताइये! ये हरे-भरे वृक्ष, हवा में लहराते हुए किसका गुण गा रहे हैं? नदी की ये रेत, बड़ी-बड़ी चट्टानें, नदी के उस पानी का अस्तित्व नहीं है क्या? इनका उत्स कहाँ से है? वृक्षों के पत्तों की जड़ों में पानी कौन सा कायम है? श्रीमान जी! पानी सूख जाने से अस्तित्व नष्ट नहीं हो जाता। एक बात और, किसी बढ़ई से पूछ देखिये कि, वृक्ष का डूंड या जड़ काटना आसान है कि टहनियाँ।’’ पत्नी ने गहरे चुभकर चुटकी ली।
    वे फिर अपनी पराजय अनुभव कर रहे थे। उसने उनके चेहरे को पढ़ा तथा मुस्कुराई- ‘‘यहाँ भी क्या यह खटराग लेकर बैठ गये, लीजिये मैं आपको एक गाना सुनाती हूँ....।’’
    गाना सुनकर उन्हें लगा, नदी तरल है, सूख जाने पर भी ठंडी लहरों के झोंके देने की क्षमता उसमें है।
    उनका मूड एकदम बदल गया। 


कौए
     तीर्थ यात्रा से लौटने पर पन्द्रह-बीस दिन पश्चात घर का ताला खुला था। सब कुछ यथावत व्यवस्थित करने के बाद पत्नी अपने रुटीन के काम-काज में जुट गई, और वे बाहर कुर्सी लगाकर बैठ गए। नीम के हरहराते वृ़क्ष पर निगाह पड़ते ही ओझल दृश्य आँखों के सामने बार-बार आने लगा।
रेखा चित्र : बी.मोहन नेगी  
    नीम के इसी वृक्ष पर टाउन-शिप, फ्लैट सिस्टम की तरह चार-छः चिड़िया-परिवार ने ऊपर-नीचे, आजू-बाजू अपने घोंसले बना लिए थे। उनकी चहचहाहट, फर्र-फर्र कर उड़ना परिवारों के सानिध्य सा अहसास कराता। तिनका-तिनका चुनकर बनाए घर में मेहनतकश प्रयसों से दाना बटोरकर ज़िंदगी बसर कर रहे, इन परिवारों पर एक दिन बलशाली काले कौओं ने काँव-काँव कर बिना किसी बजह के अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर हमला बोल दिया। पीड़ा भरी चीं-चीं सुन वे बाहर निकल कर कौओं का प्रतिरोध करें उसके पूर्व कौए घोंसलों को तहस-नहस, अंडों को उठा या फोड़कर, चूजों को क्षति पहुँचा कर अपने काले-रंग और दिल का परिचय देकर भाग चुके थे। कौओं की बेरहमी को कोसते तथा अपने आत्मीयों की याद कर उनकी आँखों की कौरें भीग आईं।
    मन उचट जाने पर खड़े होकर वे पीछे की अमराई की ओर निकल गए। सब वृक्षों पर निगाह फिसलते हुए आम तथा जामुन के बीच खड़े खिरनी के वृक्ष पर उनकी निगाह अचानक टिक गई।
    उन्होंने खुशी में सराबोर होते हुए देखा, आँगन के नीम वृक्ष पर बने घोंसलों की स्टाइल में ही नन्हें पक्षियों ने काले कौओं को चुनौती भरा मौन प्रत्युत्तर देते हुए अपनी नई जिन्द्रगी शुरू कर फिर से चहचहाना प्रारम्भ कर दिया है।

  • 766, सुदामा नगर, इन्दौर-452009 (म.प्र.)



श्यामसुन्दर अग्रवाल




टूटा हुआ काँच                        
     
      महीनाभर जूठे बर्तन साफ करने के पश्चात चौदह वर्षीय सोनू ने होटल के सफेद दाढ़ी वाले मालिक से अपना पहला वेतन माँगा। मालिक ने उसे खा जाने वाली निगाह से देखा। अपनी घनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए वह कड़का, ‘‘दे देंगे, कहीं भागे तो नहीं जाते३कल गाँव से अपनी माँ को बुला लाना, हिसाब करके ले जाएगी।’’
      सुबह गया लड़का दोपहर बाद अपनी विधवा माँ को साथ ले आया।
     ‘‘अभी देता हूँ.....हिसाब करके देता हूँ।’’ कहते-कहते मालिक ने गाँव को जाने वाली आखिरी बस भी निकाल दी। विवश होकर विधवा को रात होटल में ही ठहरना पड़ा। गहरी रात के अँधेरे में बाज़ ने पंख फड़फड़ाए और निरीह चिड़िया पर झपट पड़ा। चिड़िया छटपटायी, मिन्नत की, ‘‘बाबा! मुझे
रेखा चित्र : महावीर रंवाल्टा  
छोड़ दो, तुम्हारी बेटी समान हूँ। यह क्या कर रहे हो!’’

     ‘‘करना क्या है, लड़के ने महीना भर कांच के जो गिलास तोड़े हैं, उनकी कीमत वसूल रहा हूँ। उसकी तनख्वाह से काटता तो क्या बाकी बचता!‘‘ बाज़ ने अपनी जकड़ को और मजबूत करते हुए कहा।
     उस रात लड़के ने काँच का एक गिलास और तोड़ दिया और टूटा हुआ गिलास होटल मालिक के सीने में धँस गया।

  • 575, गली नं.5, प्रतापनगर, पो.बा. नं. 44, कोटकपूरा-151204, पंजाब    



शोभा रस्तोगी ‘शोभा’ 




पापा की बेटी 

     ‘‘आ मेरी सौन चिरैया! पापा के कंधे पे बैठ। मैं घोडा बनूँ तू मेरी सवारी।’’ नाना प्रकार पापा अपनी बिटिया को खेल खिलाते, रिझाते। बेटी हंस-हंस के दोहरी हुई जाती। 
     समय के अन्तराल से यही बिटिया डाक्टर बनी। विवाह वेला ने दस्तक दी। 
     ‘‘पापा! मेरी शादी के बाद आप अकेले हो जाओगे।’’
     ‘‘बेटी तो पराई ही होती है।’’ 
     ‘‘बेटे से अधिक लाड़ प्यार दिया मुझे। आपको छोड़ नहीं जाऊँगी।’’
     ‘‘ऐसा न कह। क्वारी रहेगी ?’’
     ‘‘किसी अनाथ पर सुशिक्षित, नौकरीपेशा से करना चाहोगे मेरा विवाह?’’
छाया चित्र : रोहित कम्बोज 

     ‘‘तुझे पसंद है तो....।’’
     ‘‘ठीक है। हम दोनों आपके साथ रहेंगे।’’
     ‘‘तू मेरी बेटी नहीं बेटा है।’’
     ‘‘बेटी को बेटी कह कर सम्मान दो न पापा! आपको बेटे की कमी खलती है?’’
     ‘‘न..न..बेटी। बेटी होना तो गौरव की बात है।’’
     ‘‘आप जैसे पापा की तो और भी....’’ हँसते हुए पापा की गलबहियां डाल दीं बेटी ने। 

  • RZ&D- 208 B,  डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर-2, पालम कालोनी, नई दिल्ली-110077


अहफ़ाज़ अहमद कुरैशी




इशारा
      
      सड़क पर थूकना आम बीमारी है। हर कोई बगैर सोचे-समझे कहीं भी थूक देता है। 
छाया चित्र : रितेश गुप्ता 
      एक बार दो दोस्त सड़क किनारे पुल पर बैठे थे। एक आदमी वहाँ से गुजरा। जाते-जाते उसने अपनी साइकिल रोकी और पिच्च से थूक दिया। फिर आगे बढ़ गया।
     दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कुछ सोचकर एक ने उसे पुकारा- ‘‘अरे भाई, सुनो!’’
     वह आदमी लौटकर आया।
     एक दोस्त- ‘‘आपका कुछ छूट गया है।’’
     उसने हैरानी से देखा, जेबें टटोलीं और कहा- ‘‘नहीं तो...।’’
     दूसरा दोस्त- ‘‘भाई साहब, आप ‘यह’ भूल गए थे। आप ही का तो है न!’’ कहते हुए उसने थूकी हुई जगह दिखाई।
     वह आदमी शर्म से पानी-पानी हो गया।

  • प्लॉट नं. 5-ए, आदर्श कॉलोनी, पुलिस लाइन टाकली के पीछे, नागपुर-440013 (महा.) 



डॉ नन्द लाल भारती




स्वर्णिम कलम

    गीली पलकें क्यों चिराग के पापा ?
    गीली पलकें नहीं खुशी कहो।
    इतनी ख़ुशी...?
    हां...स्वर्णिम कलम दिखाते हुए शब्दप्रेमी बोले बात कलम की ही नहीं है।
    और क्या है .....? यह भी लिखने के काम आयेगी।
    आएगी तो सही कलम के पीछे भावना और सम्मान जो है वह तो दुनिया भर के खजाने से नहीं ख़रीदा जा सकता। चिराग ने   मुंबई से भेजा है।
    जानती हूँ।
    जानकर भी हलके में ले रही हो।
छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 

    क्या.........?
    हां...बेटवा का बाप के नाम गिफ्ट वह भी स्वर्णिम कलम बड़ी बात है। इसका मर्म समझती हो।
    नहीं ....तुम रचनाकार जानो। मै तो बस इतना जानती हूँ की बेटवा बड़ा और तुम्हारी तरह बुद्धिमान हो गया है, तभी तो बाप को स्वर्णिम कलम गिफ्ट किया है ताकि तुम राष्ट्र और समाज के हित में और अच्छा लिख सको। यही सोचकर तुम्हारी पलकें गीली हो रही है।
    हां चिराग की माँ, मुझ जैसे बाप को बेटवा से कलम पाकर पलकें गीली तो होगी ही; क्योंकि लेखक के लिए कलम तो अनमोल होती है। बेटवा की पहली कमाई से तो और मूल्यवान हो जाती है। लेखक के लिए बड़ी और ख़ुशी की इससे और बड़ी बात क्या हो सकती है।
    मुबारक हो गीली पलकें चिराग के पापा।
    स्वर्णिम कलम को शब्दप्रेमी माथे चढाते हुए बोले तुम्हे भी चिराग की माँ।

  • आजाददीप, 15-एम, वीणा नगर, इन्दौर (म.प्र.)



किशन लाल शर्मा



इशारा

     ‘‘न जाने काली-कलूटी पैदा हो गई, जिससे शादी करने को कोई तैयार नहीं।’’ रंग के पीछे आज फिर लतिका को देखने आया लड़का रिश्ते से इनकार कर गया तो रोमा भड़क उठी थी।
    ‘‘माँ तू गोरी है, पापा भी गोरे थे। फिर मैं काली क्यों पैदा हुयी? इसका उत्तर तू अच्छी तरह जानती है। फिर मुझ पर क्यों गुस्सा हो रही है।’’
    लतिका की बात सुनकर रोमा भौचक्की रह गई। थोड़ी देर अवाक् सी देखती रही और फिर सिर झुका लिया। वह समझ चुकी थी कि बेटी उसके पर-पुरुष से सम्बन्धों की सच्चाई जान चुकी है।

  • 103 रामस्वरूप कॉलोनी, आगरा-282010 (उ.प्र.)

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक : 9-10,  मई-जून 2013

।।क्षणिकाएँ।।

सामग्री : सु-श्री राजवन्त राज  की क्षणिकाएँ।


राजवन्त राज



पाँच क्षणिकाएँ

1.
दरीचे में उलझकर अटक गये रेशों को
जब मैंने अपनी अंगुलियों से निकालना चाहा
दर्द से मेरा ही दुपट्टा रो पड़ा
बावजूद इसके
वहां कत्ल का कोई निशां न था।
2.
जो कोई बात
तेरे दिल से निकले
और मुझ तक पहुँचे
क्षत-विक्षत होकर
तो दोष किसका
तुमने भेजा लापरवाह होकर
या मैंने लपका बेपरवाह होकर!
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
3.
चुक गये शब्दों से
जब मैं अर्थ बीनने बैठी
कुछ यहाँ गिरे मिले
कुछ वहां पड़े मिले
4.
आधी बात कही थी तुमने
आधी बात मैंने भी कह दी
बात पूरी हो गई
5.
सख्त हथेली पे कुदरत की दो चीर हैं
इक जिन्दगी की है इक मौत की है
मैंने जिन्दगी की चीर को
कलम से गहरा रंग दिया
मौत ने हँस के कहा- तेरी स्याही फीकी है!
  • 201, सूर्यालोक व्यू अपार्टमेन्ट, विकल्प खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ-226010, उ.प्र.

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष :  2,  अंक :  9-10,  मई-जून 2013

।।हाइकु ।।


सामग्री :  इस अंक में डॉ. मिर्ज़ा हसन नासिर की हाइकु आधारित रचनाएँ।



डॉ. मिर्ज़ा हसन नासिर




{वरिष्ठ कवि डॉ. मिर्ज़ा हसन नासिर की पुस्तिका ‘हाइकु-काव्य में मेरे नवीन प्रयोग’ हाल ही में प्रकाशित हुई है। विगत दिनों काव्य के विभिन्न रूपों में हाइकु के प्रयोग होते देखे गए हैं। इन प्रयोगकर्ताओं में नासिर साहब भी शामिल रहे हैं। उनके द्वारा लिखे कुछ हाइकु दोहे, हाइकु ग़ज़ल, हाइकु रुबाइयाँ, कुछ अन्य हिन्दी छंदों में हाइकु के प्रयोग आदि जैसी रचनाएँ इस संग्रह में शामिल हैं। कुछ रचनाएँ हाइकु सदृश अन्य वार्णिक काव्य रूप भी इस पुस्तिका में शामिल हैं। इसी पुस्तिका से कुछ रचनाएँ अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।}


हाइकु-गीत

सावन आया
जलधर गरजें
नैना बरसें।

भूखे-बेकल
अगणित जन हैं
कैसे सरसें।

घर में कोई
कब तक ठहरे
ओले बरसें।

भीगा मौसम
पर तन सुलगे
कैसे हरषें।

‘नासिर’ डूबा
विरह-जलधि में
आँखें तरसें।

कुछ हाइकु-रुबाइयाँ

1.
निज देश के/मरु-मरु को हरा/वन कर दें,
चन्दन-सा ही/तरु-तरु का निरा/तन कर दें।
हम खुद को/करें सजग सदा/अब ‘नासिर’,
निज बाग़ का/कुन्दन की तरह/मन कर दें।
2.
खिलते यहाँ/अनुराग-सुमन/मधुबन में,
नव ज्ञान के/खग भरते रस/जन-जन में।
नफ़रत के/झुलसते हैं यहाँ/शूल समूल,
दर्शन की हैं/उड़ती तितलियाँ/मन-वन में।
3.
दिशि-दिशि में/नज़र घपले ही/घपले आये,
दहशत के/सघन जलधर/‘नासिर’ छाए।
महँगाई भी/अब ग़दर मचा/देती है नित,
जन-जन है/विकल हरदम/सुख क्या पाये।

हाइकु-रोला

बाग़ों में हम/सुमन, खिलाकर/गंध लुटायें
गीत मधुर/मधुकण्ठ, गज़ालें/ग़ज़लें गायें।
भ्रमर-वृन्द/नव छन्द, बयारें/साज बजायें,
आओ! ‘नासिर’/एक, नवल अब/स्वर्ग बनायें।
  • जी-02, लोरपुर रेजीडेन्सी, डॉ. बैजनाथ रोड, न्यू हैदराबाद, लख्नऊ-226007, उ.प्र.

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष  :  2, अंक :  9-10,  मई-जून 2013

।।जनक छन्द।।

सामग्री :  डॉ. ओम्प्रकाश भाटिया 'अराज'  के पाँच जनक छंद।


डा. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’




पांच जनक छन्द

1.
सैकूलर कैसा हुआ?
फूट रहा है फूट-सा
अधिक फैल ऐसा हुआ।
2.
चोरों को घर में बसा
रहे सहायक ढूंढ़ते
तभी देश दुःख में धंसा।।
3.
प्रजा बहुत दुखियार है।
छाया चित्र : अभिशक्ति 
सब कुछ महँगा हो गया
किन्तु मूक सरकार है।
4.
रात महल में जश्न की।
किन्तु झोंपड़ी को मिली
व्याधि मात्र अन-अश्न की।।
5.
रिक्त पेट के शूल को।
तोंद कहाँ पहचानती?
क्या सोचे निज भूल को।

(जनक छन्द के ‘द्वितीय सहस्त्रक’) से
  • बी-2-बी-34, जनकपुरी, नई दिल्ली-110058

बाल अविराम

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष :  2,  अंक : 9-10 ,  मई-जून  2013

।।बाल अविराम।।

सामग्री :  बाल अविराम के इस अंक में प्रस्तुत हैं वरिष्ठ कवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएँ,  सक्षम गंभीर, राधिका शर्मा व मिली भाटिया के चित्रों के साथ।




प्रभुदयाल श्रीवास्तव




कड़क ठंड है

कितनी ज्यादा कड़क ठंड है
करते सी-सी पापा,
दादा कहते शीत लहर है
कैसे कटे बुढ़ापा।

बरफ पड़ेगी मम्मी कहतीं
ओढ़ रजाई सोओ,
किसी बात की जिद मत करना
चित्र : सक्षम गंभीर 
अब बिलकुल न रोओ।

किंतु घंटे दो घंटे में
पापा चाय मंगाते
बार-बार मम्मीजी को ही,
बिस्तर से उठवाते।

दादा कहते गरम पकोड़े
खाने का मन होता,
नाम पकोड़ों का सुनकर
किस तरह भला मैं सोता।

दादी कहती पैर दुख रहे
बेटा पैर दबाओ,
हाथ दबाकर मुन्ने राजा
ढेर आशीषें पाओ।

शायद बने पकोड़े आगे
मन में गणित लगाता,
दादी के हाथों पैरों को
हँसकर खूब दबाता। 


पाकिट खर्च बढ़ा दो मम्मी

पाकिट खर्च बढ़ा दो मम्मी
पाकिट खर्च बढ़ा दो पापा
चित्र : राधिका शर्मा 
एक रुपये में तो पापाजी
अब बाज़ार में कुछ न आता।

एक रुपये में तो मम्मीजी
चाकलेट तक न मिल पाती
इतने से थोड़े पैसे में
भुने चने मैं कैसे लाती?

ब्रेड मिल रही है पंद्रह में
और कुरकुरे दस में आते
एक रुपये की क्या कीमत है
पापाजी क्यों समझ न पाते।

पिज्जा है इतना महंगा कि
तीस रुपये में आ पाता है
एक रुपया रखकर पाकिट में
मेरा तन मन शर्माता है।

आलू चिप्स पाँच में आते
और बिस्कुट पेकिट दस में
अब तो ज्यादा चुप रह जाना
रहा नहीं मेरे बस में।

न अमरूद मिले इतने में
न ही जामुन मिल पाये
एक रुपये में प्रिय मम्मीजी
आप बता दो क्या लायें?

मुझको खाना आज जलेबी
पेंटिंग : मिली भाटिया 
मुझको खाना रसगुल्ला
इतने से पैसों में बोलो
क्या मिल पाये आज भला।

तुम्हीं बता दो अब मम्मीजी
कैसे पाकिट खर्च चले
समझा दो थोड़ा पापाको
उधर न मेरी दाल गले।

कम से कम दस करवा दें
इतने से काम चला लेंगे
एक साल तक प्रिय मम्मीजी
कष्ट आपको न देंगे।
  • 12 शिवम सुंदरम नगर छिंदवाड़ा म. प्र.