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मंगलवार, 29 मई 2018

गतिविधियाँ

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018 



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इस अंक में गतिविधियों की क्रमिक सूची

श्री त्रिलोक महावर के कविता संग्रह ‘शब्दों से परे‘ का लोकार्पण
‘चित्रकारिता और काव्य : अंतःसंबंध’ विषय परिसंवाद संपन्न
अभी तुम इश्क़ में हो का लोकार्पण
बीसवें अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार घोषित 
बड़ा मलहरा में गुप्तेश की 8वीं पुण्यतिथि हुआ ‘कवि सम्मेलन’



श्री त्रिलोक महावर के कविता संग्रह ‘शब्दों से परे‘ का लोकार्पण



विगत दिनों बिलासपुर (छ.ग.) में श्री त्रिलोक महावर के कविता संग्रह ‘शब्दों से परे‘ का लोकार्पण समारोह तीन चरणों में संपन्न हुआ।  आयोजन के प्रथम चरण में ‘शब्दों से परे‘ का लोकार्पण, द्वितीय सत्र में प्रमुख कवियों का कविता पाठ तथा तीसरे चरण में ‘आज के समय में कविता‘ विषय के अंतर्गत एक संवाद हुआ, जिसमें जाने-माने कवियों, साहित्यकारों ने शिरकत की। लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता चर्चित कथाकार, चित्रकार एवं चिंतक शशांक ने की। मुख्य अतिथि कवि, उपन्यासकार तेजिन्दर थे तथा भालचंद्र जोशी, रामकुमार तिवारी एवं सुधीर सक्सेना अतिथि वक्ताओं के रूप में शामिल हुए। 
      समारोह के आयोजक ‘पहले पहल‘ प्रकाशन (भोपाल) तथा कथादेश (देहली) थे। समारोह में ‘पहले पहल‘ की ओर से महेन्द्र गगन तथा कथादेश की ओर से हरिनारायण बतौर मेजबान उपस्थित रहे। लोकार्पण के बाद त्रिलोक महावर ने अपनी रचना प्रक्रिया से उपस्थित श्रोताओं को अवगत कराते हुए कहा- ‘‘इस शहर में मैंने पाँव-पाँव चलकर अपनी जिंदगी की शुरूआत की है। इस शहर की अनेक यादें हैं, अनेक मित्र, अनेक जगहें हैं जो मेरी साँसों में बसे हैं। मुझसे कहा गया है कि मैं अपनी पहचान बताऊँ। बहुत पहले मैंने एक कविता पढ़ी थी- ‘परिचय भले पुरातन मेरा, किंतु व्यथा जवान हो गयी। आज उमर की पगडंडी पर श्वासों से पहचान हो गयी।’  एक लम्बा सफर मैंने तय किया। वह सब आपने देखा है। मुझसे कहा गया है कि आपके संग्रहों के शीर्षक बड़े अजीब-अजीब होते हैं। तो
बताऊँ- पहले कविता संग्रह का नाम ‘विस्मित न होना‘ क्यों लिखा? जब लिखने की शुरूआत की तो मैं उस समय पंद्रह साल का लड़का था, चुप्पा-सा, सीधा-साधा-सा था। जब यह कविता संग्रह आया तो लोगों ने कहा कि हमें बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह तुमने कैसे लिखा तो मैंने कहा कि इसीलिए तो मैंने लिखा है कि ‘विस्मित ना होना‘। बेतवा की व्यथा मैंने जब देखी तो नदी के लिए सोचने लगा। बस्तर में एक पायली चिरोंजी के बदले एक पायली नमक लिया जाता था तो ‘इतना ही नमक‘ और जब उम्र की पगडण्डी पर बहुत चल लिया तब चलते-चलते मैंने ‘हिज्जे सुधारता है चाँद‘ लिखा कि जब चाँद पूर्णमासी में आता है तो सारे तारे धीरे-धीरे गायब होते हैं। ये उसके हिज्जे सुधारने की प्रक्रिया हो सकती है। फिर यह ‘शब्दों से परे‘ शीर्षक पर पूछा गया तब मैंने कहा कि आपने कभी माँ और उसके छोटे से बच्चे के बीच आँखों-आँखों का संवाद देखा है? मैं सुनने की नहीं देखने की बात कर रहा हूँ। माँ कुछ कहती है आँखों से और बच्चा समझ लेता है। माँ मुस्कुराती है, बच्चा मुस्कुरा देता है। मेरे ख्याल से शब्दों से परे कितना अर्थ दे दिया, कितना ले लिया
गया इसका कोई हिसाब है? जब पाँचवे संग्रह में बात आ रही है तो लगता है शब्द में अभिव्यक्ति बहुत हो गयी, शब्दों के जाल में हम उलझे हुए हैं। शब्दों से परे जरा आगे की बात करें तो इस तरह यह कविता की यात्रा है। मेरा जन्म बस्तर में हुआ है। शुरूआत में 1975 में मुझे चिड़िया कविता पर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। मैंने तीरथगढ़ पर एक कविता लिखी थी। यह एक जल प्रपात है, यहीं से मैं अपनी कविताओं का पाठ प्रारंभ करता हूँ।’’ इसके बाद महावर जी ने अपने संग्रह की अनेक कविताओं का पाठ किया। ‘इतना ही नमक‘, ‘बेजान फाईल‘, ‘कदमों की आहट‘, ‘सहस्त्र बाहु‘, ‘हिज्जे सुधारता है चाद‘, ‘शाम‘ और इनके बाद दो बड़ी कविताएँ सुनाई, जिनमें एक में पुरानी स्मृतियाँ और दूसरी में चवन्नी के बंद होने पर हमने क््या-क््या खोया, इसकी व्यथा को अनेक प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया। कविताओं को श्रोताओं से बहुत ही सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली तथा तालियों की गड़गड़ाहट से भरपूर दाद भी मिली। इसके बाद संग्रह पर टिप्पणियों का दौर प्रारंभ हुआ। 
     भालचन्द्र जोशी ने पुस्तक पर चर्चा प्रारंभ करते हुए कहा कि आज के समय में सबसे मुश्किल काम है अपने भीतर के रचनाकार को बचाये रखना। और यह काम त्रिलोक महावर जी ने बखूबी किया है। उन्होंने इसे साधा है, इसके लिए साधुवाद। कवि का कौशल इसमें है कि वह शब्दों के भीतर अर्न्तनिहित दूसरे अर्थों को भी पकड़ सके, जो वह अपने भीतर छुपाये हुए है। कविता ही एकमात्र ऐसा कौशल है जो शब्दों का हाथ पकड़कर हमें सच तक ले जाये। कविता की दृष्टि कितनी विस्तारित होती है, महावर जी की कविता में देखा जा सकता है। जीवन अनुभव को किस तरह से काव्य अनुभव में बदला जा सकता है, यह हमें महावर जी की कविता में देखने को मिलता है। इन कविताओं में आदिवासी जन जीवन के अनेक शब्द, अनेक अर्थ हैं जो मेरे लिए भी नयी जानकारी है। इसके बाद कवि एवं पत्रकार सुधीर सक्सेना ने महावर जी के कविता संग्रह के आवरण पर शशांक के चित्र के उपयोग के संदर्भ में त्रिलोक महावर और शशांक जी की जुगलबंदी की प्रशंसा करते हुए कहा कि महावर जी के सभी कविता संग्रहों के आवरण शशांक जी के चित्र से बने हैं जो कि अपने आप में विरल उदाहरण हैं। सुधीर सक्सेना ने धूमिल की कविता कोट करते हुए कहा कि ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है।’ धूमिल की इस बात को ध्यान में रखकर कहें तो कहा जा सकता है कि यह तमीज़ त्रिलोक महावर में भरपूर है। इस संग्रह की पहली कविता से लेकर आखिरी कविता तक यह तमीज़ हमें हर कविता में नजर आती है। इसके लिए मैं त्रिलोक जी को बधाई देता हूँ। त्रिलोक महावर की कविताएँ जीवन के साहचर्य और यथार्थ से मुठभेड़ की कविताएँ हैं, जिनमें विविध छवियाँ, मिट्टी की गंध तथा जीवन का परिमल है। आम आदमी की जद्दोजहद में उनकी कविताएँ उनके साथ खड़ी नजर आती हैं। कवि शब्दों में लौटता है। यह लौटने की क्रिया बहुत सार्थक और सकर्मक क्रिया है। लौटना अचानक पाँव पीछे मोड़ना नहीं है बल्कि इस अराजक, हिंसा और असहिष्णु वक्त में आस्था की ओर, यकीन की ओर, आश्वस्ति की ओर लौटना है। इन अर्थों में यह संग्रह हमारे सामने एक दस्तावेज के रूप में सामने आता है। इसलिए कवि को बधाई।

    कथाकार एवं कवि रामकुमार तिवारी ने विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल के मुहावरे में कहूँ तो अपने लिखे के दरवाजे को अपने ही लिखे से बार-बार खटखटना होता है। तो यह त्रिलोक महावर का अपने लिखे के परिवेश से अपने शब्दों के परे से खटखटाना है, जिससे कि वह पूर्णतः प्रकाशित होकर सामने आ सके। इस संग्रह में बेहद महत्वपूर्ण कविताएँ हैं, विशेषकर आधुनिकता के परिदृश्य के लिए। ऐसे ही उनका स्वागत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। महावर जी की कविता में एक लय है जो अपने अंचल की तरह सहज है, मगर इस सहजता में भी क्लासिकी है। वह हमें धीरे-धीरे अपने गिरफ्त में लेती जाती है। क्योंकि यह सहजता जीवन में धँसकर पायी गयी है। पहली कविता तीरथगढ़ जिसमें दुःख और पानी एक साथ बहता है, जो कि इस अंचल के दुःख को व्यक्त करता है। कवि स्थानिकता को सार्वभौमिकता में व्यक्त करता है।
      मुख्य अतिथि तेजिन्दर ने अपना लिखित पर्चा पढ़ते हुए कहा कि त्रिलोक महावर के रचना संसार में एक बार प्रवेश कर जाने के बाद उससे मुक्त होना दुष्कर है। अपने आसपास होने वाली गतिविधि के बीच वे मनुष्य के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। उनकी कविता त्रासद स्थितियों के बीच गहरी पड़ताल करती है। उनकी सहजता उनकी सबसे बड़ी ताकत है। व्यक्ति के रूप में भी, एक नौकरशाह के रूप में भी और इन सबसे ऊपर एक कवि के रूप में भी। कम शब्दों में अपनी बात कह जाना एक जोखिम भरा काम होता है, जिसे त्रिलोक महावर बार-बार उठाते हैं। जीवन की तमाम विसंगतियों, आपदाओं में घिरे मनुष्य को उनकी कविता एक सहारा देती है। वे अपने जीवनानुभव से कभी विलग नहीं होते। वे अपनी स्मृतियों के लोक में एक अंतर्ययात्रा करते हैं और सचेत रहते हैं कि उन्हें लौटना भी है। कवि अपनी प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध है और प्रतिबद्धता उसे समाज के साथ जोड़ती है।
     कार्यक्रम के अध्यक्ष शशांक ने विस्तार से महावर के कविता संग्रह की कविताओं पर चर्चा की। अपने उद्बोधन में शशांक ने महावर की कविताओं के बहाने छत्तीसगढ़ के परिवेश की बात की, वहाँ के साहित्यकारों की बात की और बतलाया कि किस तरह त्रिलोक महावर अपने परिवेश से, अपनी परंपरा से जुड़ते हैं। उन्होंने कहा कि मैं इस कविता संग्रह के लिए त्रिलोक महावर को उनकी पत्नी और बेटी जो यहॉँ आईं हुई हैं, को भी बधाई देता हूॅँ। क्योंकि एक परिवार मिलकर ही एक कवि की एक छवि भी बनाता है। महावर जी जिस तरह की कविताएँ लिखते हैं उसमें दो तरह की कविता के हिस्से हैं। एक हिस्सा है जो छोटी कविताओं का हिस्सा है और उन छोटी कविताओं का जो गठन है उसमें वे अपने शब्दों में एक पूरे बिम्ब को एक सिक्के की तरह कसते हैं, ढालते हैं और उसमें एक ऐसी बात निकलती है जो पूरी कविता के लिए एक सृजन रचती है और उसे इस तरह लाते हैं कि वे कह सकते हैं कि ‘आज सुबह ठंड से अकड़ गयी वह लड़की अपने झोंपड़े में।‘ इस तरह कई जगह ऐसी बात है जहाँ बस्तर की उन्होंने की है। लगभग चालीस वर्ष से मैंने महावर के रचनात्मक विकास को महसूस किया है। एक कवि जिस तरह बने रहना और एक कवि होना दोनों अलग-अलग बाते हैं। इनकी काव्य कला में जब आप एक पूरा शब्द चित्र लेते हैं। उसमें एक ऐसी नयी बात होती है जहाँ हम पहले नहीं पहुँच पाते हैं। जैसे ‘चिड़िया गुन-गुना रही है जिंदगी का कोई गीत। दुनिया है एक हिस्सा उसकी चोंच में।‘ यह एक छंद है। इस छंद से आप एक चिड़िया की तरह वहाँ पहुँच जाते हैं। उनके यहाँ बिम्बों में कोई जटिलता नहीं है, छोटी-छोटी चीजों, आब्जर्वेशन से वे अपनी बात रखते हैं। जैसे ‘इस शहर में जो अब भी झुलस रहा है, केवलू की भट्टियों में चौबीस घंटे‘ फिर उसके उलटते हैं और कहते हैं ‘फिर भी नहीं पका है‘ यह जो दो शब्द हैं, जिनमें पंक्तियों के बीच का अवकाश है, वहाँ महावर आपको यह सुझाते है कि देखिये चौबीस घंटे जो पक रहा है और पकना शेष रह गया है वह पकना उसका जीवन है। उनकी जिंदगी है। उसे देखने की आवश्यकता है, पड़ती है। ‘शब्दों से परे‘ ‘आँखें तोड़ती हैं मौन‘, ऐसी छोटी-छोटी पंक्तियाँ हैं जो बहुत सहज हैं, बिम्बों में कोई जटिलता वे नहीं रखते हैं और वे इसे इस तरह आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हिन्दी साहित्य में छत्तीसगढ़ के योगदान की बात पर विचार करें तो लगता है कि आपके पास मुक्तिबोध जैसा बड़ा कवि है जो आज से पचास दशक पहले वे एक ऐसी भाषा लाते हैं जो कविता के पूरे स्ट्रक्चर को तोड़ते हैं और बिम्बों की मालाएँ एक नये तरह की भाषा आपके सामने लाते हैं। श्रीकांत वर्मा जैसे कवि हैं जिनका गुस्सा उनकी कहानियों में भी है और कविताओं में भी है। उनके यहाँ आख्यान है जहाँ मगध की वो पहचान करते हैं। तीसरे कवि हैं विनोद कुमार शुक्ल, इनकी भाषा (सीमित ही सही) उनका कथ्य नये संसार की रचना करता है। वे जितने सफल कवि हैं उतने ही सफल उपन्यासकार हैं। प्रमोद वर्मा, जो कविताएँ नये भाव-बोध की लिखते थे इसी क्रम में मनोज रूपड़ा हैं, आनंद हर्षुल हैं, तेजिन्दर का कथ्य है और सतीस जायसवाल की भाषा आदि आप देखें, जया जादवानी, रामकुमार तिवारी जैसे लोग हैं, जिन्होंने चीजों को अपने ढंग से पकड़ने की कोशिश की है। ये कम गति के जीवन में भाषा में तोड़फोड़ करके साहित्य में एक नया रूपाकार दे रहे हैं, जहाँ आप अपने ढँग से उस स्वाद को पहचान सकें जो आज के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है। और इसी हिस्से में, इसी क्रम में हमारे त्रिलोक महावर भी शामिल होते हैं। महावर-बस्तर जैसे कठिन जीवन को साधारण बिम्बों से हम तक लाते हैं। हम एक कविता संग्रह पर नहीं पूरे कविता परिदृश्य पर बात कर रहे हैं। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि इस पर बात करने यहाँ मौजूद हैं। श्रोताओं में भी ऐसे अनेक विद्वान हैं जो समझते हैं कि कौन क्या बोल रहा है इसलिए यह वक्ताओं के लिए भी एक चुनौती है। उम्मीद है कि आज एक अच्छा संवाद सुन पायेंगे।
      समारोह के दूसरे सत्र में कविता पाठ का आयोजन किया गया जिसमें सुधीर सक्सेना-दिल्ली, महेन्द्र गगन-भोपाल, रामकुमार तिवारी-बिलासपुर, डॉ. संजय अलंग एवं संजीव बख्शी-रायपुर, विजय गुप्त-अम्बिकापुर, विजय राठौर-जांजगीर तथा बिलासपुर से नथमल शर्मा, रफीक खान, शाकिर अली-जांजगीर, सतीश सिंह, भास्कर चौधरी, विश्वेश ठाकरे ने रचनाएँ पढ़ीं। कविता समारोह की अध्यक्षता कवि, उपन्यासकार तेजिन्दर ने की।
      समारोह के अगले दिन तीसरे सत्र में ‘आज के समय में कविता‘ विषय पर संवाद हुआ, जिसमें कैलाश मंडलेकर-खंडवा, रमेश अनुपम-रायपुर, महेन्द्र गगन-भोपाल, हरिनारायण-दिल्ली, विजय सिंह, नथमल शर्मा, शीतेन्द्रनाथ चौधरी, विजय गुप्त, त्रिलोक महावर, रामकुमार तिवारी, संजीव बख्षी, सतीष जायसवाल, सुधीर सक्सेना ने अपने विचार व्यक्त किये। (समाचार प्रस्तुति-महेन्द्र गगन)




महादेवी वर्मा के विशेष संदर्भ में 
‘चित्रकारिता और काव्य: अंतःसंबंध’  परिसंवाद संपन्न




कवयित्री महादेवी वर्मा का प्रत्येक चित्र अपने आप में सम्पूर्ण काव्य है। उनके चित्रों में भाव और कल्पना का अद्भुत संयोजन नजर आता है। उनके चित्र स्वयं ही मुखर होकर बोलते हैं। उनमें अनकहे बहुत कुछ दिखाई-सुनाई देता हैं। यह बात प्रख्यात हिंदी कवि एवं कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल ने साहित्य अकादमी तथा महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संयुक्त तत्त्वावधान में रामगढ़ में आयोजित ‘चित्रकारिता और काव्य: अंतःसंबंध’ (महादेवी वर्मा के विशेष संदर्भ में) विषयक एक दिवसीय परिसंवाद में बतौर मुख्य वक्ता कही। उन्होंने कहा कि महादेवी जी के चित्र भी उनकी कविताओं और गीतों की तरह प्रकृति, पूजा, साधना और समर्पण पर अवलम्बित हैं। परिसंवाद को संबोधित करते हुए बतौर मुख्य अतिथि कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डी.के. नौड़ियाल ने कहा कि यह इस क्षेत्र के लिए गर्व की बात है कि विश्वविख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा ने साहित्य सृजन के लिए रामगढ़ को चुना। महादेवी जी के ‘दीपशिखा’ नामक जिस काव्य-संग्रह में उनके बनाए चित्र संकलित हैं, उसका प्रणयन भी उन्होंने रामगढ़ स्थित अपने आवास ‘मीरा कुटीर’ में किया। महादेवी वर्मा सृजन पीठ को राष्ट्रीय स्तर के साहित्य सष्जन के प्रमुख वैचारिक केन्द्र के रूप में विकसित करने हेतु विश्वविद्यालय प्रयासरत है। सृजन पीठ से देशभर की साहित्य, संस्कृति और कला क्षेत्र की प्रमुख प्रतिभाओं को जोड़ा जाएगा और उनकी सृजनशीलता तथा रचनाकर्म से विश्वविद्यालय के शोधार्थी तथा विद्यार्थियों को परिचित कराया जाएगा। 
      केंद्रीय ललित कला अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन कला’ के संपादक डॉ. ज्योतिष जोशी ने कहा कि महादेवी जी एक सफल चित्रकार थीं। उनके चित्रों का रचना संसार उनकी काव्य भावना से अनुप्राणित था। उनकी कलम और तूलिका दोनों समान रूप से भावों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती थी। उनकी कविताओं में चित्र उभरते हैं और उनके चित्र कविता कहते हुए प्रतीत होते हैं। महादेवी के निकट संपर्क में रही साहित्यिक संस्था ‘समन्वय’ की संयोजक प्रो. यासमीन सुलताना नकवी ने कहा कि उनके काव्य-संग्रह ‘दीपशिखा’ को काव्यमय चित्र की उपमा दी जाती है अथवा चित्रमय काव्य या चित्रगीत कहा जाता है क्योंकि ‘दीपशिखा’ की प्रत्येक कविता की पृष्ठभूमि में एक चित्र अंकित है, जो काव्योत्कर्ष और चारूता बढ़ाने में सहायक है। कला और भाव दोनों दृष्टि से ‘दीपशिखा’ पूर्णत्व को स्पर्श करती हुई अपने ढंग की अकेली काव्य कृति है। कला मर्मज्ञ डॉ. राजेश कुमार व्यास ने कहा कि काव्यकला में महादेवी ने शब्दों के संयोजन से भावों को
साकार किया और चित्रकला में रंगों के संयोजन से कल्पनाओं को जीवन्त किया। उनके काव्य सौष्ठव का मूलाधार उनका चित्रविधान ही है। उन्होंने चित्रकला के सहारे ही अपने बिम्बों का संयोजन किया है। ये बिम्ब कल्पना-प्रसूत हैं, पर इनके मूल में अनेक चित्रात्मक अनुभूतियाँ दिखाई देती हैं। 
      परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि महादेवी जी के चित्रों को मूलरूप अथवा उनकी प्रतिकृतियों के प्रदर्शन के लिए सृजन पीठ में आर्ट गैलरी के निर्माण का प्रस्ताव ‘संग्रहालय अनुदान योजना’ के अंतर्गत संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार में विचाराधीन है। सृजन पीठ में महादेवी वर्मा के रचनाकर्म के विविध आयामों के प्रदर्शन के साथ उनकी सृजनशीलता से युवा पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। परिसंवाद को साहित्यकार प्रो. दिवा भट्ट, कुमाऊँ विवि. की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन, कुमाउनी भाषा विभाग के संयोजक प्रो. शेर सिंह बिष्ट तथा एस.एस.जे. परिसर, अल्मोड़ा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. जगत सिंह बिष्ट ने संबोधित किया। प्रतिभागियों का स्वागत साहित्य अकादमी के सहा. संपादक अजय कुमार शर्मा ने किया। परिसंवाद का संचालन महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत तथा चर्चित कवि डॉ. अनिल कार्की ने किया। इस अवसर पर गणमान्य अतिथियों ने प्रो. देव सिंह पोखरिया, प्रो. नीरजा टण्डन और मोहन सिंह रावत के संपादन में प्रकाशित पुस्तक ‘इलाचंद्र जोशी स्मरण’ तथा प्रो. शेर सिंह बिष्ट के कविता-संग्रह ‘युगसत्य’ का लोकार्पण किया।
      इससे पूर्व दीप प्रज्वलन और महादेवी वर्मा के चित्र पर माल्यार्पण से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। पीठ निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने अतिथियों को पुष्पगुच्छ भेंटकर तथा शॉल ओढ़ाकर उनका स्वागत किया। विश्वविद्यालय कुलगीत की रचनाकार प्रो. दिवा भट्ट ने कुलगीत प्रस्तुत किया। इस अवसर पर डॉ. दीपा काण्डपाल, कमलेश साह, मनोहर सिंह बृजवाल, डॉ. शशि पाण्डे, विक्रम सिंह, महेश कुमार वर्मा ‘अशांत’, नंदकिशोर जोशी, डॉ. तेजपाल सिंह, डॉ. ललित जोशी ‘योगी’, डॉ. आशा बिष्ट, नीरज भट्ट, डॉ. सुनीता भण्डारी, पवनेश ठकुराठी, अजेय पाण्डेय, भावना उपाध्याय, चन्द्रा देवी, संदीप कुमार तिवारी, प्रमोद सिंह रैखोला, बहादुर सिंह कुँवर आदि उपस्थित थे। (समाचार प्रस्तुति: मोहन सिंह रावत)




अभी तुम इश्क़ में हो का लोकार्पण



    ललित कलाओं के प्रशिक्षण, प्रदर्शन एवं शोध की अग्रणी संस्था स्पंदन द्वारा सुपरिचित कथाकार, उपन्यासकार, कवि पंकज सुबीर के बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह ‘‘अभी तुम इश्क़ में हो’’ पर विचार संगोष्ठी का आयोजन इ़कबाल लायब्रेरी सभागार में किया गया। 
स्पंदन की संयोजक वरिष्ठ कथाकार डॉ. उर्मिला शिरीष ने बताया कि संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ अंजनी कौल ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में डॉ बिलकीस जहां उपस्थित थीं। पुस्तक पर अतिथि वक्ता के रूप में एन. सी. ई. आर. टी. के पूर्व प्रोफ़ेसर प्रो. डॉ. मो. नोमान ख़ान तथा म.प्र. उर्दू अकादमी के पूर्व उप सचिव श्री इक़बाल मसूद ने अपना वक्तव्य प्रदान किया। इस अवसर पर ‘‘अभी तुम इश्क़ में हो’’ के पेपरबैक संस्करण का लोकार्पण भी किया गया। 
इस अवसर पर बोलते हुए पंकज सुबीर ने कहा कि भाषाओं के माध्यम से आपसी सौहार्द और परस्पर विश्वास को फिर से जीवित किए जाने कि आज के समय में सबसे बड़ी आवश्यकता है और इसके लिए काम किया जाना चाहिए। डॉक्टर अख्तर नोमान ने पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह ग़ज़लें उर्दू की रवायती शायरी और पारंपरिक ग़ज़लों की परंपरा को निभाती हुई गजलें हैं इनकी भाषा बहुत नाजुक और दिल को छूने वाली है। इक़बाल मसूद ने कहा कि पंकज सुबीर मूलतः कहानीकार हैं लेकिन उनकी ग़ज़लों में भी वही भाव प्रवणता दिखाई देती देती है जो उनकी कहानियों में होती हैं उनकी गजलें उर्दू के छंद शास्त्र की रवायतों का पूरा पालन करती हैं। यह गजलें उर्दू तथा हिंदी दोनों भाषाओं के बीच पुल का काम करती हैं।
कार्यक्रम के दूसरे चरण में एक मुशायरे का भी आयोजन किया गया जिसमें सैफ़ी सिरोंजी,हसीब सोज़, इक़बाल मसूद, अख़्तर वामिक़, ज़फ़र सहवाई, फ़ारूक़ अंजुम, परवीन कैफ़, पंकज सुबीर, दर्द सिरोंजी एवं कार्यक्रम सूत्रधार बद्र वास्ती ने अपनी ग़ज़लों का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ शायर एवं सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री बद्र वास्ती ने किया। अंत में आभार स्पंदन की संयोजक डॉ उर्मिला ने किया उन्होंने कहा ने कहा कि यह दोनों भाषाओं के बीच एक सेतु बनाने का प्रयास है तथा इस सिलसिले को आगे भी जारी रखा जाएगा। उन्होंने प्रेमचंद जयंती का कार्यक्रम इकबाल लाइब्रेरी में ही किए जाने की घोषणा भी की तथा सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इससे पूर्व सभी अतिथियों का स्वागत स्पंदन की ओर से डॉक्टर शिरीष शर्मा ने किया तथा उन्होंने सभी अतिथियों को एवं आमंत्रित शायरों को स्मृति चिन्ह प्रदान किए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्रबुद्ध साहित्यकार सभागार में उपस्थित थे। (समाचार प्रस्तुति : डॉ. उर्मिला शिरीष)



बीसवें अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार घोषित 

भोपाल । साठ महत्वपूर्ण ग्रंथो के सर्जक एवं चार सौ चित्रों के चित्रकार स्व. अम्बिका प्रसाद दिव्य की स्मृति में विगत उन्नीस वर्षाे से दिये जा रहे राष्ट्रीय ख्याति के दिव्य पुरस्कारों की घोषणा उनकी जन्म जयन्ती 16 मार्च 2018 को साईंनाथ नगर, महाबली कोलार, भोपाल स्थित साहित्य सदन में आयोजित एक सादा समारोह में श्री जगदीश किंजल्क ने की। इस वर्ष के पुरस्कारों में उपन्यास विधा में श्रीमती कुसुम खेमानी (कोलकाता) को उनके उपन्यास ‘जडिया बाई’ को दिया जायेगा। द्वितीय और तृतीय क्रम में आने वाले उपन्यास में ‘हेमू’ ( डॉक्टर तारकेश्वर उपाध्याय) व ‘मोतीहारी एवं चतुर्भुज’ (डॉक्टर अरविंद जैन भोपाल) को दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे। व्यंग्य विधा में श्री सुदर्शन सोनी (भोपाल) को उनकी कृति आरोहण के लिए दिया जायेगा। इसके साथ ही दिव्य प्रशस्ति पत्र पाने वाले व्यंग्यकार हैं कृति ‘पप्पू बन गया अफसर’ के लिए श्री आलोक सक्सेना (दिल्ली) एवं कृति ‘चौंकना मना है’ के लिये बिहारी दुबे (पन्ना)। कहानी विधा में बीकानेर की श्रीमती आशा शर्मा को उनकी कृति ‘उजले दिन मटमैली शामें’ को दिव्य पुरस्कार प्रदान किया जायेगा। दिव्य प्रशस्ति पत्र पाने वाली लेखिका हैं डॉक्टर सुमन लता श्रीवास्तव (जबलपुर ) कृति ‘कटघरे’। काव्य विधा में कविता के साथ नयी कविता एवं गजल विधा को शामिल किया गया है। नयी कविता के लिए सुश्री लक्ष्मी रूपल, जीरकपुर (पंजाब) की कृति ‘तेरा पानी मेरा पानी’ को दिव्य पुरस्कार प्रदान किया जायेगा। अहमदाबाद के घमंडी राम किशोर मेहता, कृति ‘अंधेरे का समाजवाद’, श्री गंगा शरण प्यासा (मरैना ) कृति ‘गंगा हजारिका’ श्री ब्रज श्रीवास्तव (विदिशा) को उनकी कृति ‘ऐसे दिन का इंतजार’ तथा श्री शैलेंद्र सिंह शैल कृति ‘तन्हा साया’ को प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे। बाल साहित्य के अंतर्गत भोपाल के डाक्टर परशुराम शुक्ल को उनकी कृति ‘परमचंद के कारनामे’ के लिये दिव्य पुरस्कार प्रदान किया जायेगा। इसी क्रम में प्रशस्ति पत्र गुडगांव के श्री घमंडीलाल अग्रवाल को उनकी कृति ‘नये निराले गीत’ के लिये दिया जाएगा।
      निबन्ध विधा का दिव्य पुरस्कार जबलपुर की लेखिका डॉक्टर तनूजा चौधरी को उनकी कृति ‘साठोत्तर लेखिकाओं का स्त्री-विमर्श’ के लिये दिया जाएगा एवं दिव्य प्रशस्ति पत्र चौन्ने की डॉक्टर ए. फातिमा को उनकी कृति ‘डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी के साहित्य में चित्रित ग्रामीण जीवन सभ्यता के लिए दिया जायेगा। इस वर्ष देश के विभिन्न अंचलों से दिव्य पुरस्कारों हेतु 156 पुस्तकें प्राप्त हुईं। राष्ट्रीय ख्याति के दिव्य पुरस्कारों के सम्मानीय निर्णायक विद्वान हैं- श्री रामदेव भारद्वाज (कुलपति), 2- श्री प्रभु दयाल मिश्र, 3- डॉक्टर राधा बल्लभ शर्मा, 4- श्री घनश्याम सक्सेना, 5- डॉक्टर विनय राजाराम, 6- श्री मयंक श्रीवास्तव, 7- श्रीमती विजय लक्ष्मी विभा, 8-राजेन्दर नागदेव,  9- श्री हरि जोशी, 10- श्री पी.डी खैरा, 11- श्री अरुण तिवारी, 12- श्री राधेलाल विजघावने, 13- डॉक्टर सुनीता खत्री, 14- श्री राग तैलंग, 15-श्री मती राजो किंजल्क। (समाचार प्रस्तुति : जगदीश किंजल्क)



गुप्तेश जी की 8वीं पुण्यतिथि हुआ ‘कवि सम्मेलन’





       स्व. श्री बाबू लाल गुप्त ‘गुप्तेश’ जी की 8वीं पुण्य तिथि पर म.प्र. लेखक संघ की तहसील इकाई बड़ामलहरा द्वारा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। देर रात तक श्रोताओं ने कवि सम्मेलन का आनंद लिया। अध्यक्षता नरेन्द्र असाटी जी ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में श्री सीताराम जी असाटी एवं, विषिश्ट अतिथि के रूप में नंद किशोर जी शुक्ला रहे।
      
       कवि सम्मेलन में बुन्देली श्रंगार के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. अवध किशोर जड़िया हरपालपुर, हास्य व्यंग्य के कवि राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ टीकमगढ़ ,ओज के कवि विभूशण गौतम छतरपुर, बुन्देली कवि गुलाब सिंह यादव लखौरा, गजलकार वी.के. गुप्ता लवकुशनगर, शायर अनवर खान साहिल टीकमगढ, डॉ.बहादुर सिंह परमार छतरपुर, बुन्देली कवि डॉ. देव दत्त द्विवेदी एवं
भरत अग्रवाल ‘अनुज’ बड़ामलहरा ने अपनी कविताओं से खूब रस बर्षा की। 

       इस अवसर पर लेखक संघ की बड़ा मलहरा इकाई कवियों का शाल श्रीफल से सम्मान किया। कवि सम्मेलन का संचालन मनोज तिवारी ने किया तथा सभी का आभार संयोजक एवं तहसील अध्यक्ष भरत अग्रवाल ‘अनुज’ ने माना। (समाचार प्रस्तुति : राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी‘‘)

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