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मंगलवार, 29 मई 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018 


।। कथा प्रवाह ।।


सन्ध्या तिवारी



मर्मज्ञ सद्इच्छा
       कथा पटल पर आई कि कई एक ‘किताबी चेहरे’ लाइक और कमेन्ट के रुप में चमक उठे। वह खुश था, बहुत खुश। आज तक एक के ऊपर एक लदी सवारियों से ठसाठस भरी बस में बजने वाले गानों की तरह ही उसे सुना गया। लेकिन सोशल मीड़िया पर सक्रिय होने के कुछ ही दिनों में लोग उसे पढ़ने का इन्तज़ार करने लगे थे। यहाँ तक कि कुछ दिन यदि उसकी पोस्ट न लगे तो इनबाक्स में पूछते, ‘‘आपकी नयी पोस्ट कब आयेगी?’’ सोशल मीडिया उसके लिये किसी तिलिस्म से कम न थी लेकिन उसके ‘मंत्रकीलित मस्तिष्क’ उससे सधते न थे। 
      अपनी नयी कथा पर अन्य ‘किताबी चेहरों’ के साथ ‘विशिष्ट किताबी चेहरा’ का लाइक पा अभिभूत हो गया। विशिष्ट जी ने सोशल मीडिया पर लेखक-लेखिकाओं को सुधारने-सँवारने का बीड़ा उठा रखा था। इस नेक काज के पीछे उनका बड़ा दिल और उनकी सद्इच्छा ही काम कर रही थी, नहीं तो आज के व्यस्ततम् समय में किसके पास इतना समय रखा कि कोई किसी को सुधारे-सँवारे।
       उसके मन पर श्रद्धा पारे सी चढ़ ही रही थी कि किसी ने उसकी कथा पर लिखा, ‘‘वाह! क्या कथा लिखी है, दुःख का क्या मानवीकरण किया है। मैं तो दंग रह गया। बधाई हो।’’ उसने फौरन ‘लाइक’ बटन दबा कर उसका आभार व्यक्त किया।
       दूसरे किताबी चेहरे ने भी कथा पसन्द करते हुये लिखा, ‘‘बेहतरीन कथा, आप ऐसे ही लिखते रहें। साधुवाद!’’  
      गदगद चित्त लेखक पुनः ‘लाइक’ बटन दबाकर उसके कमेन्ट के नीचे शुक्रिया लिख ही रहा था कि विशिष्टजी की गुरुगम्भीर टिप्पणी आयी, ‘‘कथा में कमियाँ ही कमियाँ हैं, इसका ट्रीटमेन्ट सही नहीं है। यूँ तो आज के समाज में ऐसे दुःख होते नहीं और यदि आपने देखे भी हैं तो इन्हें कथा का विषय नहीं बनाना चाहिये। इसका लेखन फिर से किया जाना चाहिये।’’
      कथा लेखक अवाक्! उसने तो कथा को जिया था।
      फिर भी उसने विशिष्टजी का सम्मान करते हुये उनका आभार जताया और कथा पुनः लिखने का आश्वासन दिया, लेकिन यह बात, उस लेखक के पाठक पचा नहीं पाये और ग्रुप की वाल पर ही विशिष्टजी को लेखक से अच्छी कथा लिखने की चुनौती दे डाली। उस प्रशंसक का साथ और भी दो तीन पाठकों ने दिया। तिलमिलाये विशिष्टजी ने लेखक के इनबाक्स में लिखा, ‘‘या तो आप मुझे अपनी मित्र सूची में रख लीजिये या उन पाठकों को।’’
      लेखक फिर असमंजस में... उसने लिखा, ‘‘नहीं सर, कहाँ आप कहाँ वे! वे सब तो मात्र सामान्य पाठक हैं, मर्मज्ञ तो आप हैं, कथा पर आपकी टिप्पणी मूल्य...’’
     प्रसन्न अधीश्वरजी बोले; ‘‘फिर अभी ही आप उन पाठकों की टिप्पणी को ‘अनलाइक’ करके उनको ब्लॉक कीजिये।’’
      ‘‘ज्..ज्..जी...’’ लेखक महोदयजी की ‘मर्मज्ञ सद्इच्छा’ सुन सन्न रह गया।
      इनबॉक्स में से सर्र से निकलकर विशिष्टजी ने साहित्यिक दरिद्रता से जूझते ग्रुप को पुनः अपने मणियुक्त बलिष्ठ मस्तक पर धारण कर लिया।
  • 41, बेनी चौधरी, पीलीभीत-262001, उ0प्र0/मोबा. 09410464495

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