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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

अविराम विस्तारित


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०४, दिसंबर २०११ 


।।व्यंग्य वाण।।


सामग्री : कृष्णलता यादव का व्यंग्यालेख

कृष्णलता यादव




भ्रष्टाचार
   अहा! भ्रष्टाचार मिटे तो तश्वीर बहुत सुहानी होगी, नूतन एक कहानी होगी। भ्रष्टाचार हटने की कल्पना कीजिए। कल्पना से कुछ बिगड़ने वाला नहीं। देखिए, इससे समय बचेगा, धन बचेगा। बचत का यह धन शिक्षा, स्वास्थय व जीवन स्तर बढ़ाने में खर्च होगा और पीत चेहरों पर निश्चित ही लाली आएगी। तनाव से पिंड छूटेगा। तनावजन्य रोगों से मुक्ति मिलेगी। महंगाई घटेगी। क्रयशक्ति बढ़ेगी। अधूरे सपने पूरे होंगे। भाईचारा बढ़ेगा। अमीर-गरीब की खाई पटेगी। गरीबों के दिलो-दिमाग से हीनता की ग्रन्थि मिटेगी। हर तबके के लोग मिल-बैठकर विचार-विमर्श करेंगे। कई समस्याएँ चुटकियों में सुलझेंगी। सांस्कृतिक विकास की धारा तेज होगी। नई प्रतिभाएं, नया कर दिखाएंगी जिसकी अपनी ‘धज’ होगी। काले धन की नानी मरेगी। पैसे की बर्बादी रुकेगी। दिखावे पर खर्च न के बराबर होगा। फाइलों की गति देखते ही बनेगी। समाचार परिष्कृत होंगे। रिश्वत लेने वाले, रंगे हाथों पकड़े जाने, रिश्वत देकर छूट जाने जैसी खबरें बीते जमाने की बात होकर रह जाएंगी। उसका स्थान इस तरह के समाचार लेंगे- ‘समय पर व बिना सुविधा-शुल्क दिए काम निपटने की खुशी में लोगों में उल्लास, उत्साह व जश्न का माहौल है। इतना ही नहीं, न मलाई होगी न मलाईदार पदों की मारामारी मचेगी। भ्रष्टाचार से प्राप्त कमाई की हिस्सेदारी में लगने वाली ताकत बचेगी। लोग शिकवा-राग भूल जाएंगे और तरन्नुम में गाएंगे- ‘अब न भ्रष्टाचार रहा है, सुधरा-सा व्यवहार हुआ है।’
   अब बस भी कीजिए जनाब! तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी नजर डालिए। सोचिए, भ्रष्टाचार मिटा तो भ्रष्टाचारियों का क्या होगा? वे सदमे से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए तो पाप का भागीदार कौन होगा? वहीं न जो हाथ धोकर भ्रष्टाचार के पीछे पड़े हैं। पानी पी-पीकर इसे कोसते हैं। अतीत के झरोखे से झांकिए, भ्रष्टाचार कब नहीं था? यह अलग बात है, उस काल में मीडिया का इतना दबदबा नहीं था। इसलिए बहुत से काले कारनामे उजागर होने से रह जाते थे। यदि भ्रष्टाचार नहीं होता तो अमीर-गरीब शब्द नहीं होते। लेकिन ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं। तब सीधा सा अर्थ हुआ कि भ्रष्टाचार का वृक्ष सदाबहार है, जिसे हम और आप सींचते रहे हैं। हम और आप? जी हां, बात कड़वी है मगर है सच्ची। अपना काम जल्द निपटवाने की चाह में सुविधा शुल्क रूपी जल से हम भ्रष्टाचार के पादप को पुष्ट करते आ रहे हैं।
   रही भ्रष्टाचारियों की बात- वे ठीक कहते हैं कि घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? खाएगा नहीं तो जिएगा क्या? वैसे भी, काम निकल जाने के बाद कार्यकर्ता को भूल जाना आदमी की फितरत रही है। फिर कोई फोकट में दिमांग का हुलिया क्यों बिगाड़ेगा?
   सिक्कों की खनक सुनने के आदी कान इस स्वर के लिए तरस जाएंगे और नोटों की कड़कड़ाहट महसूसने के अभ्यस्त हाथ छटपटाएंगे। अतिरिक्त आय के अभाव में बहुत से लोग डिप्रैशन में आएंगे। नींद की गोलियां गटककर रात बिताएंगे। बेचारे, अपाहिज-से जिन्दगी के झूले में झूलेंगे। न जीते बनेगा न मरते। पुरानी यादें आंखों को नम किए रखेंगी। क्या आप चाहेंगे भ्रष्टाचार के खातमें के बदले खुशहाल लोग यूँ बदहाल हों? शायद नहीं। देर-सवेर आपके अन्दर का आदमी पुकारेगा- ‘अजी, उसे जीने दीजिए, तकलीफ उठाने के लिए मैं काफी हूँ। सदियों से इन्हें सहता जो आ रहा हूँ।’
    एक बात और। भ्रष्टाचार खत्म होने से बहुत से युवा अविवाहित रह सकते हैं, क्योंकि अतिरिक्त आय के लालच में प्रायः वधू पक्ष, वर पक्ष की बहुत सी खामियों को नजरअन्दाज करता रहा है। यदि ऐसा हुआ तो समाज में असन्तुलन बढ़ेगा। असामाजिक तत्व सिर उठायेंगे। अराजकता बढ़ेगी। देश की साख गिरेगी। बात विदेशों तक पहुँचेगी। अपनी किरकिरी होगी, यानि- अपना मरण, जगत में हंसी होगी। इन सबसे बचने का एक ही तरीका है- भ्रष्टाचार को पूर्ववत् फलने-फूलने दिया जाये। काम का क्या! वह तो ले-देकर निपटता ही रहेगा।

  • 1746, सैक्टर 10-ए, गुड़गाँव-122001 (हरियाणा)

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