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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

अविराम विस्तारित


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०४, दिसंबर २०११ 


।।कथा कहानी।।
सामग्री :
 शशिभूषण बडोनी की कहानी- फीस 




।।कथा कहानी।।


शशिभूषण बड़ोनी


{अभी हाल में ही बडोनी जी का कहानी संग्रह "भैजी" प्रकाशित हुआ है. इस संग्रह में उन्होंने पहाड़ एवं दूरदराज की जीवन संबंधी समस्याओं को उकेरने की कोशिश की है, साथ ही अपना एक सकारात्मक द्रष्टिकोण  भी सामने रखा है. इसी संग्रह से प्रस्तुत है उनकी एक कहानी- फीस}

फीस

   मेरी नियुक्ति उस पर्वतीय क्षेत्र की ग्रामीण डिस्पेन्सरी में कुछ महीने पहले ही हुई थी। ग्रामीण क्षेत्र में नियुक्ति होने पर मेरे कई साथी डॉक्टरों ने ज्वाइन नहीं किया था। मेरे अन्तर्मन में काफी समय से ग्रामीण क्षेत्र में रोगियों की सेवा करने की एक इच्छा थी और पहाड़ी जनजीवन को देखने का एक आकर्षण भी, सो मैंने खुशी-खुशी ज्वॉइन कर दिया था।
रेखांकन : नरेश उदास  
    उन दिनों डिस्पेन्सरी के नज़दीकी गाँवों में उल्टी-दस्त का प्रकोप अधिक चल रहा था। इस रोग से प्रभावित रोगियों की संख्या नित्य बढ़ रही थी।
   एक दिन रात को दरवाजे पर दस्तक होने पर मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि लालटेन लिये हुए दो-तीन गाँव के लोग बारिस में खड़े थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि गाँव में उनमें से एक व्यक्ति का लड़का जोकि लगभग दस-ग्यारह साल का है उल्टी-दस्त  से पीड़ित हो गया है। वे लोग मुझसे लड़के के उपचार के लिए गाँव चलने की मिन्नतें करने लगे।
   ‘‘डाक्टर साहब, हम लोग बस आपके ही भरोसे आये हैं। हमें पता है कि आप गाँव चलने को भी मना नहीं करेंगे। मेरे बच्चे के प्राण बचा लीजिये। आपके अलावा इस वक्त हमारा कोई सहारा नहीं।‘‘ लड़के के पिता ने लगभग रुआंसी मुद्रा में कहा।
    मैंने कहा, ‘‘रोगी को यहाँ क्यों नहीं लाए?’’ तो बताने लगा, ‘‘साहब इस मूसलाधार बारिश में रास्ते में एक जगह गाड़ (छोटी नदी) भी पड़ती है। साहब घुटने के ऊपर तक पानी बहता है, पर आपको कोई परेशानी नहीं होने देंगे। साहब आप बिल्कुल फिक्र न करें।’’ उसने शायद नदी की बात से मेरा विचार न बदल जाए, सोचकर कहा।
   मैंने पहले तो उन्हें काफी समझाया कि रोगी को डिस्पेन्सरी में जो उपचार देना संभव है, वह गाँव में देना कतई मुमकिन नहीं। फिर अकस्मात मुझे कुछ दिन पहले की एक घटना का स्मरण हो आया। जब एक रोगी को इसी प्रकार गाँव से डिस्पेन्सरी लाते-लाते मौत हो गयी थी। एक क्षण तब मेरा डाक्टरी मन भी सिहर गया और शायद उसी घटना को यादकर मैं तुरंत गाँव चलने की तैयारी भी करने लगा।
   आज भी हमारे गाँव के लोग कितने दकियानूसी है। दस्त लगना शुरू होकर दो-दो दिन गुजर जाते हैं, तो भी कोई उपचार नहीं करवाते और घर में बुजुर्ग तो यहाँ तक कह देते हैं कि चलो अच्छा है पेट हल्का हो गया। पेट का मल ही तो बाहर जा रहा है। यह उन्हें पता नहीं रहता कि उसके साथ ही तन का पानी भी बाहर जा रहा होता है और आखिर में जब मरीज डिहाइड्रेशन की अन्तिम सीमाओं पर पहुँचता है, तब कहीं उन्हें डॉक्टर और अस्पताल की याद आती है। 
   मन झुंझला उठा। शायद अस्पताल तक जाने का खर्चा और डाक्टर की फीस बचाने के लिए मरीज को अस्पताल दिखाने नहीं ले जाते हैं। ये भोले-भाले निरीह दिखने वाले गाँव वाले भी कितने चालाक व खुदगर्ज होते हैं। मन में गुस्सा बढ़ता जा रहा था। पर अभ्यस्त हाथ डॉक्टरी बैग में सामान भरते जा रहे थे। मैं आखिर उनके साथ चल ही पड़ा।
   शायद किशन सिंह नाम बताया था उस बीमार बालक के पिता ने। रास्ते भर किशन सिंह मुझे धन्यवाद देता-देता दोहरा होता रहा और ऊबड़-खाबड़ रास्ते में चलने के लिए मदद करता रहा। चलते-चलते अचानक रुक जाना पड़ा। बरसाती छोटी नदी पर बना अस्थाई पुल बह गया था। नदी पार करने में बड़ी परेशानी हुई। चलो ये लोग झूठ नहीं बोल रहे थे। ऐसी हालत में सचमुच ही बीमार बच्चे को डिस्पेन्सरी लाना मुश्किल ही होता।
   किशन के घर पहुँचा तो बच्चे को सीरियस डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) हो गया था। टॉर्च की रोशनी में ही बच्चे को तुरन्त सेलाइन ड्रिप बगैरह देने का इन्तजाम करना पड़ा। गाँव में बीमारी कैसे फैली, यह भले ही पता न लग पाया हो पर किशन सिंह के घर में तो वह जैसे आनी ही थी। चारों ओर अन्धेरा, अन्धेरे के बीच में दिख जाती गरीबी व गन्दगी। मुझे याद आया, कुछ दिन पूर्व ही अखबार में पढ़ा यह समाचार कि हमारे देश में एक ऐसे अभिजात्य वर्ग की संख्या निरन्तर बढ़ रही थी जो कि साठ-सत्तर हजार रुपये प्रति मीटर कीमत का सूट पहनना व एक-एक लाख की रिस्ट वाच पहनना स्टेटस सिम्बल समझता है तो तब देश की खुशहाली का समाचार लगा था यह सब।
   लेकिन अब मुझे वह समाचार कितना भयावह लग रहा था। यह मैं सोचने लगा। कितनी बड़ी खा
ई! एक वर्ग किशन सिंह जैसा, जिसको मुश्किल से दो जून की रोटी नसीब हो पाती है और एक वर्ग वह जिसके बारे में अखबार में पढ़ा था और फिर हम डाक्टर लोग भी तो किशन सिंह जैसे लोगों के घर की हालत जाने बिना उन्हें पौष्टिक आहार खाने और बच्चों को खिलाने की सलाहें देते रहते हैं। कितना भौड़ा मजाक!
   किशन सिंह के घर से निकलते-निकलते भोर हो गयी। बच्चा खतरे की सीमा से लौट आया था। किशन सिंह चलते समय कुछ रुपये मोड़कर मुझे देने को हुआ। मैंने उन रुपयों से उसे कुछ और जरूरी दवाएं बाजार से खरीदने की सलाह दी और कहा जब बच्चा ठीक हो जाये तो तब यदि चाहो तो सामने वाले अपने खेत की ताजी सब्जी थोड़ी ले आना। किशन सिंह जो एक बार मेरे फीस ना लेने पर उदास हो गया था, सब्जी की बात पर तब कुछ आश्वस्त सा नज़र आया।
   सबेरे डिस्पेन्सरी पहुँचा। डाक्टर और अन्य कर्मचारी आ पहुँचे थे। मैंने उन्हें रात के सीरियस केस के बारे में बताया। किशन के घर के हालात के बारे में बताया। अपने देश की सामाजिक विसंगतियों के बारे में रात भर उठे गुबार को उगलना ही चाहता था कि एक जूनियर साथी ने पूछा, ‘‘सर, आपने गाँव जाने की फीस पहले ही तय कर ली थी? आपको मालूम नहीं, यह गाँव वाले फोकट में ही परेशान करते रहते हैं।’’
   ‘‘फीस! भाई बच्चे का मामला था। मैंने कोई फीस-वीस की बात नहीं तय की थी और फिर उस बेचारे की दयनीय स्थिति और फिर गाँव में फैल रही बीमारी एपिडेमिक है। हमारा भी फर्ज बनता है इसे रोकने का। इससे कई जानें जा सकती हैं।‘‘ 
रेखांकन : नरेश उदास  
   ‘‘वैसे डॉक्टर साहब हमारा फर्ज है, फिर भी आप गलत कर रहे हैं।’’
   मेरा खून खौलने लगा। दिमांग की नसें चट-चटाने लगीं। मैं वहाँ से दूर हट गया। इन्तजार में खड़े मरीजों की जाँच करने लगा। तभी मेरे कानों में एक जोर से कही गई टिप्पणी आ टकराई, ‘‘अरे भई, इस डॉक्टर ने तो इस अस्पताल का एट्मोस्फेर ही बिगाड़ दिया। इस तरह गाँव जा-जाकर मुफ्त इलाज करता फिरेगा तो फिर गाँव वाले तो सभी को मुफ्त का नौकर समझेंगे कि नहीं।‘‘
    सुनकर मुझे महसूस हो रहा था कि किशन सिंह के बच्चे की जान बचाने का एक जो परम सन्तोष मन में हो रहा था, वह उस टिप्पणी को सुनकर कहीं विलीन होता चला गया था।



  • आदर्श विहार, ग्राम व पोस्ट शमशेर गढ़, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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