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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

किताबें

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 1, अंक : 12, अगस्त  2012 

{अविराम के ब्लाग के इस अंक में  सुभाष नीरव जी के लघुकथा संग्रह  "सफर में आदमी" की समीक्षा  रख  रहे हैं। लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है  कृपया समीक्षा भेजने के साथ  पुस्तक की एक प्रति हमारे अवलोकनार्थ (डा. उमेश महादोषी, एफ-488/2, राजेन्द्र नगर, रुड़की-247667, जिला - हरिद्वार, उत्तराखण्ड के पते पर) अवश्य भेजें।}  


निरुपमा कपूर



कई पड़ावों से गुजरता आदमी


    लेखक अपने आसपास की परिस्थितियों से आँख मूँद कर नहीं रह सकता। वह अपने समय के कटु यथार्थ को रेखांकित करने का प्रयास है। सुभाष नीरव के लघुकथा संग्रह ‘सफर में आदमी‘ (नीरज बुक सेंटर, पटपड़गंज, दिल्ली-92) ऐसी ही लघुकथाओं का संग्रह है जिसमें आधुनिक युग की कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया गया है चाहे वह बाजारवाद की देन हां या अपने ही स्वार्थ में अंधे होकर माता पिता को भूलने का कटु सच लिए हां, समाज में व्याप्त अंधविश्वास अथवा लड़कियों के लिए समाज की दोहरी सोच हो, इन सभी मनोभावों को सुभाष नीरव ने अपनी लघुकथाओं में खूब जगह दी है। कुल मिलाकर समाज के हर वर्ग की मानसिकता, तनाव, कुंठा प्रर्दशित करने की भरपूर कोशिश की है जिसमें लेखक को भरपूर सफलता मिली है। 
    संग्रह की प्रथम लघुकथा ‘कमरा‘ नैतिक दायित्वों को एक किनारा करते हुए तुरंत लाभ कैसे कमाया जाए, को इंगित करती है। बहू-बेटा पहले वर्द्ध  पिता की अपेक्षा बच्चों की पढ़ाई को महत्व देते प्रतीत होतेे हैं परंतु अगले ही दिन कमरे को किराये पर चढ़ाने का प्रस्ताव उन्हें बच्चों की पढ़ाई से अधिक उपयोगी लगने लगता है। ये लघुकथा आधुनिक युग में मानव की मौकापरस्ती को भी बयाँ करती है। ‘दिहाड़ी' दर्शाती है कि हमारे देश में पुलिस की वरदी कैसे लोगों का शोषण करके अपने पेट भरने में लगी रहती है।
‘अपने क्षेत्र का दर्द' हमारे राजनीतिक आकाओं की पोल खोलता नजर आता है। मानवीय संवेदनाओं का उनके लिए कोई मूल्य नहीं। बस अपनी स्वार्थपूर्ति के हथकंडे  उनके लिए सर्वोपरि है। दहेज के लालच में भूखे भेड़ियों द्वारा जिन्दा जला दी गई बेटी के बूढ़े बाप की संवेदनाएँ मंत्री के लिए कोई मायने नहीं रखतीं, क्योंकि यह उनके संसदीय क्षेत्र का मामला नहीं था। राजनीतिक स्वार्थपूर्ति चित्रण बखूबी इस कथा में हुआ है। 
    ‘‘रंग परिवर्तन" नेताओं का दोगलापन दर्शाती है। देश की जनता को विकास के लिए धार्मिक अंधविश्वास से ऊपर उठाने की बात करने वाले नेताजी स्वयं अंधविश्वास में सिर से पांव तक डूबे हैं। अपने गुरु महाराज के कहने पर ‘‘बचो मनोहर लाल बचोकृकृकृ इस हरे रंग से बचो यह रंग तुम्हारे राशि के लिए अशुभ और अहितकारी है कृकृकृ जानते हो तुम्हारे लिए नीला रंग ही शुभ और हितकारी है।" मंत्री जी अपने लाव लश्कर को रंग बदलने में लगा देते हैं और हजारों रुपयों की फिजूलखर्ची को बढ़ावा देते हैं। ये कथा समाज में बढ़ते अंधविश्वास और इन बाबाओं की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाती है। शिक्षकों की कर्त्तव्यहीनता का अच्छा उदाहरण ‘‘अच्छा तरीका"  में पेश किया गया है। कैसे शिक्षक ट्यूशन से अतिरिक्त धन जुटाने के लिए बच्चों को फेल करने व कम नम्बर देने की तिकड़में प्रयोग करता है - यह कथा हमारी चरमराती शिक्षा व्यवसाय को आईना दिखाती है। जब तक कोई घटना हमारे साथ नहीं घटती, तब तक हम दूसरों के साथ होने वाले अन्याय के प्रति आँखें मूंद कर बैठे रहते हैं। इसके चलते अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाला अकेला व्यक्ति कितना अकेला और अहसाय हो जाता है, इसें ‘अकेला चना’ में  बखूबी दर्शाया गया है। ‘कड़वा अपवाद' हमारी उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ मदद के असली हकदार को भी हम ढांगी मानकर आगे चलते बनते हैं। ‘‘मैंने एक झटके से उसके ऊपर ही चिथड़ा हुई धोती को खींचकर एक तरफ कर दिया। मेरे पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी। वह तो सचमुच ही ठंड से अकड़ कर मर चुका था।" यह लघुकथा दर्शाती है कि सभी रूदन अविश्वासी नहीं होते हैं बल्कि हमारी आँखें ही ढोंग और सच्चाई में अंतर नहीं कर पाती है। ‘वाकर‘ निम्नमध्यवर्गीय परिवार की उस दशा को दर्शाती है जिसमें घर की आधारभूत जरूरतें अन्य जरूरतों पर भारी पड़ जाती है -‘मैंने एक बार हाथ में पकड़े हुए सौ के नोट को देखा और फिर पास ही खेलती हुई मुन्नी की ओर... मैंने कहा, ‘मगर, वह मुन्नी का वॉकर...’,  ‘अभी रहने दो। पहले घर चलाना जरूरी है‘ आम भारतीय परिवारों की आर्थिक विडंबना को दर्शाती इस लघुकथा की अंतिम पंक्ति, सपनों के टूटने और मुन्नी के पिता की ओर चलने, फिर धम्म से नीचे बैठकर रोने लगने - का पर्याय लगती है। ‘‘फर्क‘‘ युवा वर्ग की गलत मानसिकता को दर्शाती है। ‘‘क़त्ल होता सपना" हमारे भारतीय घरों में बेटियों के सपने कैसे क़त्ल किये जाते हैं, को रेखांकित करने की कोशिश है। कभी बल से, कभी भावनाओं से छल के उनके सपनों को बलि चढ़ा दिया जाता है। 
    ‘‘एक खुशी खोखली सी"  रोज़गार और बेरोजगारी के बीच में जो थोड़ा सा अंतर है, उसे प्रर्दशित करती है। ‘इंसानी रंग' धर्म के नाम पर हम इंसान एक दूसरे से कैसे अलग हो जाते हैं, ये बताते हुए इस बात की पुष्टि करती है कि ‘इंसानियत का धर्म’ हर धर्म से बड़ा होता है। ‘‘मरना जीना"  हमारी भारतीय विवाहिताओं की अशांत असहाय अवस्था को दर्शाने के साथ-साथ उस क्षणिक आवेग को भी दिखाती है जिसमें हम जीवन को दांव पर लगाने के लिए तैयार हो जाते है। ‘‘एक और कस्बा"  बाल सुलभ मन को पतंग के लिए ‘बोटियों’ को कुर्बान करने के साथ साथ, पवित्र स्थानों पर अपवित्र वस्तुओं के मिलने से संप्रादायिक स्थिति कैसे बिगाड़ी जाती है - की ओर संकेत करती है ‘‘दुकानों के शटर फटाफट गिरने लगे थे, लोग बाग इस तरह भाग रहे थे, मानो कस्बे में कोई खूँखार दैत्य घुस आया हो‘‘ लघुकथा की अंतिम पंक्ति हमारे उस डर को दर्शाती है जो धार्मिक उन्माद के कारण दंगों में  परिवर्तित हो जाती है। 
     ‘‘धूप"  उच्च अधिकारी या बड़े पद पर होने पर हम सामान्य जीवन बिताने से कैसे दूर हो जाते हैं, का ज्ञान कराती है। ‘‘कोठे की औलाद" धर्म को अहमियत न देने पर समाज की मानसिकता किस प्रकार बदलती है, का अच्छा उदाहरण है। ‘‘कबाड़"  उम्रदराज पिता को कबाड़ की जगह देना, पिता को स्वयं कबाड़ समझने का दर्द दे देता है- रात को स्टोर में बिछी चारपाई पर लेटते हुए किशन बाबू को अपने बूढ़े शरीर से पहली बार कबाड़ सी दुर्गन्ध आ रही थी। ‘‘आदान प्रदान"  एक व्यंग्यात्मक लघुकथा है जो प्रकाशनों में चल रहे लाभ के रिश्ते को रेखांकित करती है। ‘चेहरे‘ हमारी राजनीति के बदलते चेहरों को प्रतिबिबिंत करती है। ‘फिटनेस‘ रिश्वत के अभाव मंे योग्य कैसे अयोग्य बन जाते हैं- को दर्शाती है। ‘खर्चा पानी‘ एक ऐसी सोच को प्रर्दशित करती है कि शहर पढ़ने के लिए भेजा गया बच्चा पढ़-लिख कर भविष्य माँ बाप को में पूछेगा नहीं, इसीलिए स्वार्थवश वे अपने दूसरे बच्चे को शिक्षा से दूर कर देते हैं। ‘नालायक‘ बेटे के दहेज से बेटी का विवाह करने की भारतीय जुगत को दर्शाता है। ‘चोर' बड़ा चोर कैसे छोटे चोर के सामने अपने आप को ईमानदार साबित करने की कोशिश करता है - को प्रतिबिंबित करती है। 
    ‘सहयात्री‘ पुरुष के मन में उठ रहे द्वन्द-अंतर्द्वंद को दर्शाती है। अंत में जो उचित है, उसका मन उसे वही करने के लिए उकसाता हैं। ‘भला मानुष'  दमित भावनाओं  को व्यक्त करने का कहीं मौका मिल जाये तो मनुष्य उसे छोड़ते नहीं। दुर्घटनाग्रस्त लड़की को सहलाने, चूमने जैसी चेष्टाएँ युवा वर्ग की कुत्सित भावनाओं को व्यक्त करती हैं- ‘‘कभी उसके गाल थपथपाकर, कभी सिर, कन्धे, कमर, हाथ पैर दबाकर और कभी उसका मुँह माथा चूमकर कहने लगता बस अभी पहुँचे"। ‘तिड़के घड़े' वृद्ध  माता-पिता को बात बात पर कोंचने की बहू-बेटों की कोशिशें, शांत तालाब में कंकड़ फेंकने पर उठी तरंगों की भाँति ही वष्द्ध माता पिता के मनों के शान्त पानियों में हलचल मचाती हैं और उन्हें दुःखी-व्यथित कर देती हैं। ‘वाह मिट्टी‘ बच्चे को उसकी स्वाभाविक जीवन शैली से हटाकर अनुशासित रखने की जिद्द उससे उसका बचपन छीन सकती है, को व्यक्त करती है तो इसके विपरीत ‘बांझ‘ लघुकथा में  बच्चे के खराब आचरण पर आँखे बंद करे रहने वाली माँ के रूप में दर्शाने की पुरजोर कोशिश है। बाज़ार किस तरह से क्रेडिट कार्ड द्वारा आदमी को अपने जाल में मकड़ी की तरह फंसा लेता है कि इस कंटीले जाल से निकलना उसके लिए संभव नहीं हो पाता। शुरुआत में ये जाल इतना चमकीला व लुभावना होता है कि आदमी उसकी चमक में खो जाता है और इस दलदल में फंसता ही चला जाता है- इस सच्चाई को ‘मकड़ी’ में बाखूबी लेखक ने रेखांकित किया है। ‘‘इस्तेमाल‘‘ स्थापित लेखकों द्वारा नये लेखकों का शोषण को दर्शाती है। ‘अपने घर जाओ न अंकल'  बाल मन की सरलता और निर्मलता का उदाहरण पेश करती है। ‘धर्म विधर्म'  हमारी उस मानसिकता पर चोट करती है जिसमें हमें जब लाभ की आशा होती है तब हम ऐसे कार्य को भी करने के लिए तत्पर हो जाते हैं जिसकी हम कड़ी आलोचना करते हों। 
     सुभाष नीरव का संग्रह सफर में आदमी ‘आदमी' की सकरात्मक व नकारात्मक सोच के साथ उसकी कुत्सित व दमित भावनाओं  व बालमन की सरलता को व्यक्त करने वाली लघुकथाओं का संग्रह है। ज्यादातर कथायें मानसिक तौर पर उद्वेलित करके अपनी सार्थकता प्रकट करती हुई हिन्दी साहित्य में अपनी प्रंशसनीय उपस्थिति दर्ज़ कराती है। ये लघुकथायें समाज की यथार्थ स्थिति को पेश करने के साथ-साथ मस्तिष्क व हृदय में एक ज्वार उत्पन्न करती है जो लंबे समय तक विचारों को झिझोड़ती रहती है। 
     
सफर में आदमी  :   लघुकथा संग्रह : सुभाष नीरव। प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर, पटपड़गंज, दिल्ली-92।


  • 18, कैला देवी इन्क्लेव, देवरी रोड, आगरा (उत्तर प्रदेश) / ईमेल  :  nrpmkapoor325@gmail.com

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