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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 1, अंक : 12, अगस्त 2012


।।जनक छन्द।।


सामग्री :  इस बार डॉ. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’ के जंक छंद।


डॉ. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’



{डॉ. अराज जी के जनक छन्दों को दूसरा सहस्त्रक गत वर्ष प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में पहले सहस्त्रक से आगे के 1080 जनक छन्द संग्रहीत हैं। प्रस्तुत हैं उनके इस संग्रह से दस जनक छन्द।}


दस जनक छन्द


1.
प्रियतम की सुधि आ गयी
रटती उसका नाम नित
कोयलिया बौरा गई।।
2.
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
लो पतझड़ का अन्त है
कुसुमाकर होकर जगा
जीवन नवल वसंत है।।
3.
कौन पवन-सुत-सा बने
राम लला के शत्रु का
मार मुष्टिका मुख हने।।
4.
राजा ही जब लूटता।
पक्षपात कर बाँटता
देश अन्त में टूटता।।
5.
महँगाई ही पीन है
भारतीय हर वर्ग का
उसके सम्मुख दीन है।।
6.
भर चुनाव चख चख हुई
इस चुनाव के चौक में
बात-बात अदरख हुई।।
7.
सपने हमको दे गया
नेता गिटपिट बोल कर
लूट सभी कुछ ले गया।।
8.
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
यहाँ न जीवित आग है
चूल्हा ठंडा देखकर
लौट चला चुप काग है।।
9.
मन हिंसा में लीन है
जाल फँसाता मीन है
बगुला भूखा दीन है।।
10.
रितु हो गई जवान है
बिना बैन के बोलता
नैनों में आह्वान है।

  • बी-2-बी-34, जनकपुरी, नई दिल्ली-110058

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