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शुक्रवार, 26 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017



राधेश्याम भारतीय


मानवता का पाठ पढ़ाता लघुकथा संग्रह
लघुकथा विधा पर गंभीरता से काम करने वाले लेखकों में कमल चोपड़ा का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। सद्यः प्रकाशित उनके लघुकथा संग्रह ‘अनर्थ’ में साम्प्रदायिकता जैसे एक ही विषय पर रचित 79 लघुकथाएं संग्रहीत हैं। इन लघुकथाओं का मुख्य प्रतिपाद्य यही है कि जो लोग धर्म की दुहाई देकर लोगों को आपस में लड़वाते हैं, वे वास्तव में धर्म के मर्म को नहीं जानते। वे कट्टरपंथी जिन धर्मगं्रंथों को लेकर झगड़ते हैं, उन्हें  वे पढ़ते ही नहींे। यदि वे उन्हें पढ़ लें तो कोई विवाद ही पैदा न हो। क्योंकि उनमें लिखी हर पंक्ति मानवता का संदेश देती है। धार्मिक समन्वयता का
खुला आसमान देती हैं। ताकि हम खुले मन से सोच सकें। 
      लघुकथा ‘छोनू’ में बताने का प्रयास हुआ है कि मनुष्य की कोई जाति धर्म नहीं होता। वह केवल मानव है और है उसकी मानवीयता। जिस तरह एक बच्चा सोचता है और कहता है कि ‘‘मैं छिक्ख-छुक्क नईं हूँ... मैं बीज-ऊज नहीं हूँ...मैं तो छोनू हूँ।’’ ऐसे ही सोचना चाहिए सभी को।
      लघुकथा ‘फुहार’ में बच्चे के गेंद खेलने से हुई थोड़ी-सी असुविधा पर ही हम विधर्मी को मारने-काटने पर तैयार हो जाते हैं। जबकि बात जरा-सी भी नहीं। जब हम दूसरे की बातों में न आकर अपने विवेक से काम लेते तो फिर से वही प्रेम, वही मोहब्बत कायम हो जाती है। अंत कितना सुंदर है। बच्चा शाबू कहता है, ‘‘सॉरी-सॉरी... अब जब आप सूर्य को जल चढ़ा रहे होंगे न उस वक्त मैं नहीं खेला करूंगा।’’ वहीं दूसरी ओर लाला जी ने शाबू को गोद में उठा लिया और कहा-‘‘नहीं रे, अब मैं सुबह-सुबह तेरे उठकर बॉल खेलने से पहले ही जल चढ़ा लिया करूंगा। और सारा मामला समाप्त। ऐसी लघुकथाएँ कालजयी रचना बन जाती हैं। 
      कमल चोपड़ा की अधिकतर लघुकथाएँ सकारात्मक सोच के साथ समाप्त हुई हैं। सकारात्मक सोच वह जल की फुहारे हैं जो नफरत की आग को ठंडा कर सकती हैं। लघुकथा ‘धर्म के अनुसार’ समन्वय की बेजोड़ लघुकथा जान पड़ती है। ‘उल्टा आप’ में  धर्म-अधर्म की तस्वीर बडे़ ही सहज ढंग से प्रस्तुत हुई है। जहाँ अध्यापक किसी की जान बचाने को धर्म समझता है, वहीं एक धर्म के लोग विधर्मी की जान लेने को ही धर्म समझते हैं। 
      साम्प्रदायिक दंगों की आग मनुष्य का सब कुछ छीन लेती है। और जो बच जाते हैं उनका सुख-चैन सब मिट जाता है। हम दूसरों पर वार बड़ी आसानी से कर सकते हैं। परन्तु जब हम उसी घटना चक्र से गुजरते हैं तो हमारी दशा पागलों जैसी हो जाती है। इसी की अनुभूति लघुकथा ‘चमक’ में होती है। मन्दिर-मस्जिद जिसे हम ईश्वर का घर मानकर उसकी चौखट पर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। वहीं उन्मादी व्यक्ति ईश्वर के बंदों का कत्ल करने में परहेज नहीं करते। कभी-कभी ऐसा लगता है कि भगवान है ही नहीं। यदि भगवान होता तो उसकी आँखों के सामने दरिंदगी का नंगा नाच न होता। और बेगुनाहों का खून न बहता। ‘वहीं रहते वे’ में इसी यथार्थ को कथ्य बनाया गया है।   
      लघुकथा ‘फर्क’ तर्क-वितर्क करके पाठक को विवेक से निर्णय लेने को बाध्य करती है कि किसी धर्म के लोगों को मार रहे हैं और उन्हीं का सामान प्रयोग करते हुए न कोई नफरत न कोई घिन्न! ‘कल्पना’ लघुकथा किसी राष्ट्र के लोगों की सोच पर ही प्रश्नचिह्न लगा देती है कि जब एक राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष है तो वहाँ साम्प्रदायिक दंगे कैसे हो जाते हैं। यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। ऐसे प्रश्नों को खड़ा करना ही साहित्य का उद्देश्य होता हैं। इस विषय पर पूरी मानव जाति को सोचना चाहिए।
      साम्प्रदायिक दंगों में अधिकतर बेगुनाह लोग मारे जाते हैं। और जो उस आग को हवा देने वाले होते हैं वे ना जाने कौनसी गुफा में जा छिपते हैं। उनका कोई नुकसान ही नहीं होता। लघुकथा ‘ऐसा कोई दंगा’ में एक ऐसे दंगे की माँग की जाती है जिसमें असली मुजरिमों को चुन-चुनकर मारा जाए। बस फिर कोई दंगा न हो। लघुकथा ‘हथियार’ लोगों को सचेत करती है मत खेलो इन हथियारों से। हथियार फर्क करना नहीं जानते कि कौन देवता है और कौन राक्षस, म्लेच्छ कौन, काफिर कौन। हथियारों की आँखें नहीं होती कि देख पाए ठीक-गलत। छोटा-बड़ा, बच्चा-बूढ़ा। हथियारों का धर्म से कोई लेना देना नहीं। ‘गुनाह’ लघुकथा आँखें खोल देने वाली लगी। आपका घर मुस्लिम जला दे तो गुनाह और हिन्दू जला दे तो बेगुनाह। गुनाह कोई भी करे...यहाँ करे या वहाँ...गुनाह तो गुनाह ही होगा।
      संग्रह में जिस विषय पर कमल चोपड़ा जी ने कलम चलाई है वह अत्यंत संवेदनशील है। उन्होंने बड़ी ही सूझबूझ से काम लिया है। और धर्म का जो असली सार है उसको दिखाने का प्रयास किया है। साम्प्रदायिक दंगों में लगी चोट को लोग चोट ही नहीं मानते बल्कि विजय-तिलक मानते हैं। पर लेखक इन बातों से सहमत नहीं होता, वह अंततः बोध करवा ही देता है कि वह चोट नहीं कलंक है।
      लघुकथाओं में पात्रों का मनोविश्लेषण बड़े ही सटीक ढंग से हुआ है। हमने मदिंर मस्जिद गिरजाघर इसलिए बनाए ताकि हम अपने आराध्य देवों की आराधना कर सकें। वहाँ परम शांति का अनुभव कर सकें। परन्तु  देखने में आता है वहाँ तो महाभारत की पटकथा लिखने का काम किया जाता है। 
      यह संग्रह हमें सोचने पर बाध्य करता है कि जिस धर्म का झंडा लेकर हम चल रहे हैं वह किसी को मारने की इजाजत नहीं देता। आशा है जहाँ-जहाँ ये लघुकथाएँ पढ़ी जायेगी। अपना असर अवश्य दिखायेंगी। 
अनर्थ : लघुकथा संग्रह : डॉ. कमल चोपड़ा। प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली नई दिल्ली-30। मूल्य: रु. 350/- मात्र। संस्करण: 2015।
  • नसीब विहार कालोनी, घरौंडा, करनाल, हरि./मो. 093153882236

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