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शुक्रवार, 26 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017



हमीद कानपुरी



ग़ज़ल

रोज़ोशब मत सता जिन्दगी।
अब न अहसां जता ज़िन्दगी।

लाज इसकी रखो हर तरह
रब ने की है अता ज़िन्दगी।

खेल तेरा बहुत हो चुका
कर न अब तू खता ज़िन्दगी।

कुछ समझ में नहीं आ रहा,
छायाचित्र : डॉ. बलराम अग्रवाल 
क्यों बताती धता ज़िन्दगी।

यार मेरा जहाँ आज दिन
ढूँढ़ ला वो पता ज़िन्दगी।

लक्ष्य को भेदकर के दिखा,
तीर मत कर खता ज़िन्दगी।

(रोज़ोशब-रातदिन)
  • अब्दुल हमीद इदरीसी, सदनशाह, सिविल लाइन्स, ललितपुर, उ.प्र./मोबा. 09795772415

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