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रविवार, 12 नवंबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017




।। कथा प्रवाह ।।


विभा रश्मि






पड़ोसी धर्म  
      ‘‘गुड मॉर्निंग’’, अंतरा ने भार्गव साहब को देख छूटते ही कहा।
      अभिवादन का प्रत्युत्तर देकर भार्गव साहब रुके नहीं। अपने टहलने की स्पीड बढ़ा कर उससे आगे निकल गये। अंतरा जो पूछना चाह रही थी वो नहीं पूछ पाई।
      भ्रमण से लौटते वक्त भी उसे युगल किराएदारों के बारे में जानकारी देने वाला कोई न मिला। तभी तेजी से एक मोटर साइकिल गुज़री जिस पर वे दोनों ही बैठे थे। उनका यूँ पास-पास बैठना अंतरा को अजीब लगा, ‘‘ऐसी कैसी मित्रता?’’
      पड़ोसी होने के नाते दिन में कई बार दिख जाते। उनके प्रति अंतरा की उत्सुकता चरम पर थी। वो दोनों के बारे में तरह-तरह के कयास लगा कर मन ही मन कहानी गढ़ती रहती। कभी सोचती भाग के आए होंगे। प्रेमी जोड़ी लगती है। कभी सोचती ‘लिव इन रिलेशन’ में होंगे।
      अंतरा को दूसरे के फटे में टाँग न अड़ाने की हिदायत पहले भी पति और बेटी ने दी थी। इसलिए आज हँसते हुए बोल ही दिया। ’’पापा! लगता है मॉम को कुछ पेट संबंधी परेशानी फिर हो गई है।’’
      सब्ज़ी काटते हुए अंतरा चिढ़ गई, ‘‘क्यों क्या हुआ मुझे?’’ 
      ‘‘भार्गव के घर नये किराएदार की बड़ी ताँक-झाँक करतीं रहतीं हैं आप।’’ अंतरा हड़बड़ा गई।
      ‘‘बैठो यहाँ मेरी माँ।’’ बेटी ने माँ को पास बैठा लिया।
      ‘‘वो मेरे कॉलेज में ही पढ़ने आए हैं। उत्तराखंड की बाढ़ में पेरेंटस को खो बैठे थे। हादसे से अब तक उबरे नहीं हैं। देहरादून के हैं। बहन बड़ी है। कॉलेज में भी चर्चित हैं दोनों। अब तुम शान्ति रखना।’’ कहती हुई बेटी लेपटॉप लेकर बैठ गई, पति ऑफ़िस  की किसी मीटिंग की चर्चा में गुप्ता को निर्देश देते हुए फ़ाइल उलटने लगे।
      अंतरा की आँखों से प्याज़ काटते हुए आँसुओं की जलधार बह निकली थी...। भार्गव के किराएदार बहन-भाई की दर्द भरी दास्तान सुनकर या उनके बारे में अपनी ओछी सोच रखने पर। 


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