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रविवार, 12 नवंबर 2017

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017



डॉ. उमेश महादोषी





एक निर्विकार दुनिया का सपना
      उपन्यास जीवन व्यवहार का विशिष्ट विन्यास होता है। उसमें एक केन्द्रीय विषय होने के बावजूद जीवन व्यवहार के कई अन्य पक्षों पर भी अपना मन्तव्य रखने का लेखक के पास भरपूर अवसर होता है। औपन्यासिक रचना में पाठकों की अपेक्षाओं और अनेक व्यावहारिक आवश्यकताओं के निर्वहन के बावजूद लेखक अपने दृष्टिकोंण और कौशल को प्रस्तुत करने और उसके लिए पाठकों का समर्थन हासिल करने का प्रयास कर सकता है और करता भी है। इस दृष्टि से श्री एस. एम. रस्तोगी
‘शान्त’ ने अपने काव्योपन्यास (जो कि नई कविता की शैली में एक अनूठी रचना है) ‘सृष्टि-जनक’ में उसके केन्द्रीय विषय ‘प्रेम’ की एक अनूठी व्याखा प्रस्तुत की है। इस व्याखा में स्वाभाविकता और लेखक की अपनी दृष्टि के प्रभाव का संगम आकर्षित करता है। उपन्यास के उत्तरार्द्ध में कथानायक विवेक कथानायिका, अपनी प्रेमिका- विभा, जो असमय काल का ग्रास बनने से पूर्व एक अनौखे तरीके से उसकी पत्नी बन जाती है, जिससे विवेक बेइंतिहा प्रेम करता है, इतना प्रेम कि एक मिसाल खड़ी हो जाती है; की प्रतिमूर्ति राधा से मिलता है, जो उसी के नए कार्यालय में उसकी अधनस्थ कर्मचारी है। राधा को देखने पर वह उसे विभा समझ बैठता है। लेकिन विभा तो दुनिया से जा चुकी है! उपन्यास की केन्द्रीय भूमिका यहीं पर आकर उभरती है। राधा को देखकर विवेक की दशा क्या होती है, उससे भी अधिक राधा पर क्या गुजरती है- एक ओर आफिस में होने वाली कानाफूसी और दूसरी ओर उसका अपना घर-परिवार, इस सबके मध्य विवेक द्वारा निरंतर ‘पूजा’ यानी बिना मार्यादाओं की सीमा के उलंघन के पवित्र प्रेम का अधिकार माँगना। राधा के रूप में विभा की प्रतिमूर्ति विवेक की सुसुप्तावस्था में पड़ी काव्यात्मा को जगा देती है। विवेक राधा को निरंतर कुछ न कुछ लिखकर देता है, जिसमें उसकी अपनी बेचैनी है, याचना है और कविता भी। लेकिन राधा यथाशक्ति इस सबको हँसकर टालती है। विवेक के इष्टमित्र, जो उसके जीवन का हिस्सा हैं, भी राधा से मिलते हैं, तो उसे विभा ही मानकर व्यवहार करते है। राधा परेशान होने लगती है। लेकिन इस उत्तरार्द्ध का अंत, जोकि उपन्यास का भी संपन्न होना है, राधा के द्वारा विभा के प्रति विवेक के निस्वार्थ प्रेम, जो भले विभा की प्रतिमूर्ति होने के कारण स्वयं राधा पर आरोपित हो रहा है, को आत्मसात् करने से होता है। विवेक के हृदयस्थ प्रेम की सृष्टि के जनक को आत्मसात् करने से होता है। दुनिया की तमाम कठिनाइयों और परीक्षाओं से जूझने वाला विवेक का शरीर ब्लड कैंसर को प्रणाम कर इति का साक्ष्य हो जाता है। 
      रस्तोगी साहब ने विवेक के रूप में प्रेम, त्याग और कर्तव्य की प्रतिमूर्ति का जो चरित्र सृजित किया है, निसन्देह वह एक निर्विकार दुनिया का उनका सपना है। बहुत सारे दृश्यों, बहुत सारी कविताओं के माध्यम से इस चरित्र में अपनी रचनात्मक दृष्टि को उतारते दिखते हैं रस्तोगी जी। निराशा में डूबकर प्रेम की प्रेरणा कहीं कुम्हला न जाये, उनके प्रमुख पात्र की कलम से प्रेम समय के शरीर में प्रविष्ट होकर मुखरित होता है कुछ इस तरह- ‘‘माना कि तुम/उन उजालों के सफर से/बाहर आये हो बेदाग/और अब तुम्हें प्राप्य है/घोर अंधकार.../तुम्हें बाँटना है-/उस प्रकाश को/उसके अहसास को/पुष्प जैसे मृदुहास को/उसकी सुगन्ध को/जन जन में...’’। प्रेम का यही प्राप्य होता है, जो इस अनूठे कवि-कथाकार का अभीष्ट है। यदि ऐसा न होता तो प्रमुख सहयोगी पात्रों- आफताब, अनु, प्रफुल्ल घोष के रूप में भी जिस चारित्रिक दृढ़ता का ताना-बाना बुना है, उसकी स्थिति शायद कुछ और होती। इनके अलावा भी जितने चरित्र इस उपन्यास में सृजित किए गए हैं, वे भी एक खूबसूरत दुनिया की कल्पना की ओर ही हमें ले जाते हैं। विभा के पिता, सेठ कृष्ण बिहारी भार्गव द्वारा विभा व विवेक की शादी के प्रस्ताव को ठुकरा देना उनकी कठोरता का परिचायक हो सकता है, लेकिन उसका प्रायिश्चित और उसी विवेक को उसके यथार्थ रूप में स्वीकार करना कदाचित उपन्यास की मूल परिकल्पना के परिणाम के साथ ही खड़ा है।
     उपन्यास ‘सृष्टि-जनक’ के केन्द्र में ‘प्रेम’ की अनूठी व्याख्या के साथ जीवन व्यवहार के कई अन्य बिन्दुओं पर भी रस्तोगी की रचनात्मकता का सकारात्मक पक्ष देखने को मिलता है। विधर्मी साम्प्रदायिक उन्मादियों से घिर जाने पर विभा को बचाने के लिए जिस तरह आफताव और उसके डी.एस.पी. पिता अहमद हुसैन सामने आते हैं, वह हमारे समाज की समरसता को आगे बढ़ाने की लेखक की कामना का ही अंश है। विभा का परिवार हो, विवेक का हो या आफताव व प्रफुल्ल के परिवार हों, इन चारों का कॉलेज, वहाँ का वातावरण, प्रिंसपल की सदाशयता, विवेक के नए ऑफिस के प्रबंधक देवेश गोयल व उनके पिता और भी अनेक पात्र इस उपन्यास में आते हैं, लेकिन एकाद को छोड़कर सभी रिश्तों की जिस सुगंध को उत्सर्जित करते हैं, वह भी पाठक को उसी दिशा में ले जाती है, जहाँ उपन्यास सम्पन्न होकर लेखक की दृष्टि और कामना के साथ खड़ा होता है। विवेक द्वारा झोंपड़- बस्ती के पुनर्वास का कार्य भी इसी की कड़ी है। 
      कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम जो देखते हैं, उसमें हमारी अपेक्षाओं के प्रतिबिम्ब नहीं होते। लेकिन ऐसी ही चीजों से प्रेरित होकर हम वो सृजित करते हैं, जो समाज को हमारी अपेक्षाओं के प्रतिबिम्ब स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है। इस सन्दर्भ में, इस उपन्यास के लेखक द्वारा इसकी प्रस्तावना में लिखे इन शब्दों पर हम गौर करेंगे तो शायद ऐसा कुछ ही ध्वनित होता दिखे- ‘‘प्रस्तुत महाकाव्य के कुछ पात्रों से मेरा घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है, उनकी बिडम्बनाएँ सुनी हैं और समाज का नैतिकता या धर्म के नाम पर न स्वीकार करने वाला चेहरा भी देखा है।’’ भले व्यवहारिक दुनियाँ में खूबसूरती का अंश इतना न हो, किन्तु हमें आशावान तो होना ही चाहिए। कविता का उपयोग  सृजित उपन्यास में पाठकीय रुचि तो पैदा करता ही है, उसके साहित्यिक मूल्य को भी बढ़ा रहा है। 
सृष्टि जनक : काव्योपन्यास : एस.एम. रस्तोगी ‘शान्त’। प्रका. : अनामिका पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्री.(प्रा.), 4697/3, 21-ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली। मू.: रु. 995/- मात्र। सं.: 2016।

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