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रविवार, 2 फ़रवरी 2014

सम्पादकीय पृष्ठ : नवम्बर-दिसम्बर 2013

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 03,   अंक  : 03-04,  नवम्बर-दिसम्बर 2013


।।मेरा पन्ना।।
          
          फिर वही जनोत्तेजनाओं की सवारी!

  • सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ! आने वाले वर्ष से देश के तमाम लोगों को बहुत सारी उम्मीदें हैं, ईश्वर उन्हें पूरा करे! यद्यपि होता यही है कि हम उम्मीदों के सहारे जीते हैं और हम पाते हैं अधिक से अधिक, उम्मीदों को जिन्दा बनाए रखने के खूबसूरत बहाने। 
  • पिछले दिनों देश और हम सबने एक अविस्मर्णीय सा परिवर्तन देखा है। इस परिवर्तन के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव अगले वर्ष और कुछ उससे आगामी कुछ वर्षों में देखने को मिलेंगे। पर विश्व इतिहास में सत्ता परिवर्तन में होने वाली क्रान्तियों की परिणति से हम सब वाकिफ हैं। क्रान्ति और सत्ता परिवर्तन- दोनों को अलग-अलग चश्मे से देखने की बजाय घोलमाल ही अधिक होता रहा है। ऐसे में, जैसे कि दावे किए जा रहे हैं, क्या यह परिवर्तन एक क्रान्ति के सत्ता परिवर्तन से इतर सत्ता के चरित्र को स्थाई रूप से बदलने का कारण बन पायेगा? इतिहास तो सामने है ही, कई तरह की चालाकियों के छिद्र भी हैं, जो संदेहों को जन्म दे रहे हैं, पर फिलहाल जो जनोत्तेजना का प्रवाह है उसमें इन सन्देहों की चर्चा को नकारात्मक ही माना जायेगा। परिवर्तन के नायकों को समय न देकर की जाने वाली ज्यादती जैसा माना जायेगा। ईश्वर करे हमारे सन्देह बेबुनियाद सिद्ध हों, लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो जन भावनाओं में विश्वास और उत्साह की गर्माहट बनाये रख पाना मुश्किल हो जायेगा, हम शायद भविष्य में एक लम्बे कालखण्ड के लिए किसी क्रान्तिकारी आन्दोलन की उम्मीद और अवसर- दोनों ही खो बैठें! हमारे इन नव-नायकों को ध्यान रखना चाहिए कि जब आप दूसरों के लिए कुछ चुनौतियां रख रहे होते हैं तो वैसी ही चुनौतियां अपने-आप के लिए भी पैदा कर रहे होते हैं। अपने-आपके लिए पैदा की गई चुनौतियों को नकार कर सिर्फ दूसरों के समक्ष चुनौतियां रखने की प्रक्रिया से जनोत्तेजना तो पैदा कर सकते हैं, स्थाई चारित्रिक बदलाव नहीं। जनोत्तेजना का भी अपना एक चरित्र होता है, वह यदि आज आपके साथ है, तो अपेक्षित चरित्र का स्थान खाली देखकर आपके प्रतिकूल जाने में भी उसे देर नहीं लगेगी। कभी-कभी तो ऐसा बहुत छोटे से कालखण्ड में ही हो जाता है। आपको ‘उद्देश्यों (साध्यों) और साधनों’ के  सिद्धान्त को स्मरण रखना चाहिए। आचारशास्त्रियों की तरह गांधी जी भी उद्देश्यों और साधनों- दोनों की पवित्रता पर जोर देते थे। वह मानते थे कि हमें अच्छे उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अच्छे रास्तों/साधनों का ही उपयोग करना चाहिए। अच्छे उद्देश्य, गलत रास्तों/साधनों से प्राप्त करने और अच्छे रास्तों/साधनों को गलत उद्देश्यों के सहयोगी बनने देने- दोनों को ही वह गलत मानते थे। मुझे लगता है कि यह सिद्धान्त लम्बे क्रान्तिधर्मा आन्दोलन का औजार तो हो सकता है, सत्ता-परिवर्तन की राजनीति का नहीं। क्योंकि सत्ताकामी व्यक्तियों का चरित्र सत्ता परिवर्तन को लम्बे कालखण्ड के लिए सत्ता परिवर्द्धन का पर्याय नहीं बनने देता है। सत्ता की परिधि में बैठे व्यक्तियों में चाहे कोई भी हो, उनकी दूसरों से अलग दिखने की तमाम कोशिशें भी अन्ततः दूसरों के जैसी ही होती हैं। मैं यह नहीं कहता कि राजनीति के शुद्धीकरण की बात ही न हो। पर कीचड़ में घुसकर उसे मथने लग जाना और उठा-उठाकर इधर-उधर फेंकने लग जाना तो शुद्धीकरण नहीं होता। 
  • यह सोचने की भी जरूरत है कि विगत तीन-चार दशकों में जनता की भावनाओं के साथ कई तरह से कई बार खिलवाड़ होता रहा है। जनाकांक्षाओं को पूरा करने का कोई भी संकल्प तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक जनाकांक्षाओं के प्रवाह को सही दिशा नहीं दी जायेगी। होता यही है कि राजनीतिज्ञ- चाहे पुराने हों या जनान्दोलनों से निकले नव नायकों के रूप में उद्भूत हों, जनाकांक्षाओं की दशा और दिशा का वास्तविकता पर आधारित और उनकी सामाजिक कीमत का आकलन किए बगैर उनकी लहरों पर सवार होने के अवसरों को जल्दी से जल्दी भुना लेना चाहते हैं। इस शीघ्रता में जनाकांक्षाओं को अनियंत्रित प्रवाह के साथ उसे गलत दिशा में भी मोड़ बैठते हैं। जनांकाक्षाओं को जनोत्तेजना में बदलने के शार्टकट को अपनाकर नायकत्व हथिया लेना चाहते हैं। समाज में कई नकारात्मक प्रवृत्तियां भी इसी रास्ते आती रही हैं। इस संबन्ध में हमारे नव नायकों के साथ पुराने राजनीतिज्ञों और समाज के अन्य प्रमुख स्तम्भों को भी चिन्तन करना चाहिए। दुर्भाग्य से इस तमाम प्रकरण पर मीडिया और बौद्धिक वर्ग की अपेक्षित भूमिका भी देखने को नहीं मिल रही है। ये वर्ग भी अनियंत्रित जनोत्तेजना की ही सवारी करते दिख रहे हैं पूरे आनन्द के साथ। आज जब देश और हमारी व्यवस्था को एक लम्बे ईमानदार क्रान्तिधर्मा आन्दोलन की जरूरत है, जो एक बड़े कालखण्ड के लिए सत्ता के चरित्र में बदलाव का कारण बन सके, हम एक अस्थाई सत्ता परिवर्तन का जश्न मना रहे हैं, जो न स्वयं ईमानदार है और न राजधर्म की किसी बड़ी ईमानदारी को प्रेरित करने में समर्थ! अन्ना जी के आन्दोलन से उम्मीदों की जो किरणें निकलती दिखाई दे रही थीं, उन्हें रोशनी में बदलने का काम अधूरा रह जाना बेहद निराशाजनक है!
  • मित्रो, वर्ष 2013, विशेषतः आखिरी कुछ महीने साहित्य जगत के लिए शोकपूर्ण रहे हैं। सर्वश्री राजेन्द्र यादव, विजयदान देथा, परमानन्द्र श्रीवास्तव, के.पी.सक्सेना, ओम प्रकाश बाल्मीकि, हरिकृष्ण देवसरे आदि मूर्धन्य साहित्यकार हमसे विदा हो गये। इन सभी का साहित्य में अविस्मरणीय योगदान रहा है। इसी दौरान अविराम साहित्यिकी से जुड़े रहे साहित्यकार डॉ. मनोहर शर्मा ‘माया’ के न रहने का दुःखद समाचार भी हमें प्राप्त हुआ है। डॉ. माया जी व्यक्ति के तौर पर बेहद सज्जन और विनम्र थे। समय-समय पर फोन करके हमारा उत्साह बढ़ाते रहते थे। इन सभी विभूतियों को पूरे अविराम परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि!
  • विगत 16 नवंबर का दिन व्यक्तिगत रूप से हमारे परिवार के लिए भी बेहद दुःखद रहा। इस दिन हमारी पूज्यनीय माता जी इस संसार से विदा हो गई। जिस माँ ने जीवन दिया, इसे जीते हुए दुनियां को जानने-समझने की दृष्टि दी, दुनिया के साथ आचार-व्यवहार के योग्य बनाया, .......उसके लिए इन क्षणों में क्या कहने योग्य हूँ......!

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