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रविवार, 2 फ़रवरी 2014

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 05-06, जनवरी - फरवरी 2014 

।।किताबें।।

सामग्री : इस अंक में बहुल पाठक वर्ग द्वारा सराही गई कालजयी कहानियां :  डॉ. सतीश दुबे द्वारा डॉ. तारिक असलम तस्नीम के कहानी संग्रह ‘पत्थर हुए लोग’ / भगीरथ ने दोहरी जिम्मेदारी को निभाया है :  हितेश व्यास द्वारा भगीरथ परिहार के लघुकथा संग्रह ‘पेट सबके हैं’ / मानवीय संवेदनाओं की कहानियाँ :  डॉ. ज्योत्सना स्वर्णकार द्वारा माधव नागदा के कहानी संग्रह ‘परिणति और अन्य कहानियां’/ रास्तों पर चलती दुआएँ :  डॉ. पुरुषोत्तम दुबे द्वारा पारस दासोत के लघुकथा संग्रह ‘मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएं’ / वर्तमान समय के बहुरुपियेपन का सफल चित्रण :  संतोष सुपेकर द्वारा सुरेश शर्मा के लघुकथा संग्रह ‘अंधे बहरे लोग’ / भविष्य की संभावनाएँ तलाशती लघुकथाएँ :  राजेन्द्र नागर ‘निरंतर’ द्वारा संतोष सुपेकर के लघुकथा संग्रह ‘भ्रम के बाजार में’ की समीक्षाएं।
{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, एफ-488/2, राजेन्द्र नगर, रुड़की-247667, जिला - हरिद्वार, उत्तराखण्ड के पते पर भेजें।}



डा. सतीश दुबे




बहुल पाठक वर्ग द्वारा सराही गई कालजयी कहानियां 


     तारिक असलम ’तस्नीम’ हिंदी साहित्य जगत में चर्चित, सुप्रतिष्ठित सृजनधर्मी के रूप में जाना-पहचाना नाम है। विगत तीस-चालीस वर्षों यानि समझ की वय से साहित्य से रिश्ता जोड़ने वाले इस शख्स ने न केवल आत्मविश्वास के साथ विभिन्न विधाओं में लिखा है प्रत्युत पत्रिकाओं के प्रकाशन के जरिये साहित्य-संस्कृति को सींचने में सकून महसूस किया है। यह अंकित करने की आवश्यकता नहीं कि वे इन विभिन्न मोर्चों पर एक ईमानदार और निष्ठावान सैनिक की तरह आज भी समर्पण मुद्रा में खड़े हैं।
    तारिक के विभिन्न अवदानों की अपेक्षा फिलवक्त हालिया प्रकाशित कहानी संग्रह ’पत्थर हुए लोग’ संग्रह के बहाने उनके कहानी सृजन पर कुछ लिखने या बतियाने की कोशिश है। मेरी तरह इस रचनाकार से रचना के माध्यम से जो मित्र परिचित हैं, वे बखूबी यह जानते हैं कि तारिक का लेखन ही उनका व्यक्तित्व है या उनकी सृजनधर्मीता के विभिन्न आयाम ही उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पायदान हैं। इसे संयोग ही माना जाना चाहिए कि इस धारणा की पुष्टि इस पुस्तक में उनके आत्म कथ्य से होती है।
   लेखन किसी भी भाषा देश या विधा का हो उसकी संप्रेष्य शक्ति यथार्थ के बीज में निहित होती है। कल्पना उस परिंदे की उड़ान की मानिंद होती है जो आकाश में ऊंचाई तक महज तफरीही सुख के लिए पंख फेैलाता है। ऐसी यूरोपियन उड़ान को सृजन में नजर अंदाज करने वाले लेखक वर्ग में तारिक असलम ’तस्नीम’ अपना खास मुकाम रखते हैं। इस संग्रह में इस मुत्तलिक उनकी विस्तृत कैफियत मौजूद हेै। जरूरी है उसी से कुछ पंक्तियां उद्धरित की जाय-’’ मैंने अब तक जो भी लिखा है। किसी कल्पनाशीलता और नाटकीयता से बचने का प्रयास किया है, क्योंकि मुझे लगता है कि किसी झूठ को लाख खूबसूरती से  सजाया-संवारा जाय, उसकी हकीकत बेपर्द हो ही जाती है...मैंने अपनी जिंदगी में जो कुछ देखा और भोगा है और जिसका मैं  गवाह रहा हूं। यही हादसे और बयान मेरी कहानियों का हिस्सा हैं।’’
    2005-2011 के दरम्यान देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों के साहित्यिक परिशिष्ठ में प्रकाशित कुल चौदह कहानियंा गुलदस्ते के विभिन्न फूलों की तरह ’पत्थर हुए लोग’ में सम्मिलित हैं। इन कहानियों में अधिसंख्य ऐसी हैं जो प्रभान्विति की दृष्टि से मजे को अस्वाद नहीं इंसानियत को मजा देने वाली वस्तु समझने वाले बेगैरत जमात के शख्सों को कटघरे में खड़ा करती है। औरत के मानसिक, दैहिक शोषण तथा अस्मिता से जुड़े सवालों को जवाब हेतु समाज पटल पर प्रस्तुत करती है, मजहब की व्याख्या उसूलों के विपरीत अपने स्वार्थ के संदर्भ में करने वाले चेहरों को बेनकाब करती है। इन सबके साथ सामाजिक ढांचे और परिवार में व्याप्त विसंगतियों, रूढ़ियों, आडम्बरों या रिश्तों की यथार्थ स्थितियों को उजागर कर यह स्थापित करना चाहती हैं कि इस वृक्ष की जड़ को उसके अनुरूप आबोहवा से सींचा जाये।
    यह दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि इन कहानियों को बुनते हुए तारिक असलम के रचनाकार ने कथाबीज को पल्लिवत करते हुए लेखकीय सरोकारों का ईमानदारी से निर्वाह किया है। संग्रह की पहली कहानी ’पत्थ्र हुए लोग’ यत्र नार्यस्तु पूजान्ते को आदर्श मानने वाले देश में गांवों से महानगरों यानी हर कहीं औरत को ऐश-विलासिता की वस्तु मानकर उसके साथ होने वाली बदसलूकी को मौन देखने वाले समाज के तथाकथित रसूखदारों की भूमिका का बखान करती है।
    सिंहासन, सत्ता या समाज में अपने वर्चस्व या शक्ति के प्रदर्शन के लिए जब तक होने वाले बंद या मजहबी दंगा-फसाद के माहौल से प्रभावित होने वाले जरूरतमंद मजदूर पेशा तथा बेकसूर लूटे-पीटे जाने वाले जनसामान्य की पीड़ा ’शहर को डर है’ कहानी में बखूबी चित्रित हुई है। पात्रों की मनःस्थिति के माध्यम से कहानी जिस बन्धुत्व या समझ के सकारात्मक बिंदु पर ठहरती है, उसे आदर्श नहीं ऐसे मौकों से निबटने की जरूरत माना जाना चाहिए।
    ’सरहदें’, ’जिहाद’ तथा ’पलकों के नीचे सांप्रदायिक दंगों की हकीकत से परिचित होने का एहसास कराती कहानियंा हैं। इन कहानियों में आतंकी भी है और सिरफिरे धर्मान्ध भी हैं। इन रचनाओं को गौर से पढ़ना इसलिए जरूरी है कि इनमें कहानियों के बहाने तस्नीम ने कुरआन की आयतों के साक्ष्य में इस्लाम धर्म की सूक्ष्मता को समझने का मौका दिया है। उनकी ये तकरीर   किसी मौलवी की भूमिका का निर्वाह नहीं बल्कि अपने आसपास के परिवेश मसलन, रधुनाथ मंदिर, वैष्णो देवी या कश्मीर में होने वाले अनुभूत आतंकी माहौल से उपजी संवेदनशील रचनाकार की पीड़ा के रूप में अनेक पात्रों के माध्यम से व्यक्त हुई हैं।
   चुनावी हथकंडों या सत्ता षडयंत्र की राजनीति से प्रभावित रोजी-रोटी के लिए भटकते मजदूरों का टोला और उनकी व्यथा ’जमीन की तलाश’ कहानी में रूपायित है। इसी क्रम में ’उसके हिस्सेे की जमीन’ का जिक्र जरूरी है। इस कहानी के पात्र वे वनवासी हैं, जिनकी जिंदगी शोषण की गिरफ्त में है। बिचौलिया तथा साहूकार के शिकंजे में अपनी गर्दन देने वाले ये लोग बारम्बार टूटकर खड़े होेने की कोशिश इसलिए करते हैं कि जीना इनके लिए उत्साह नहीं मजबूरी है।
    ’बंद दरवाजे’ कहानी परिस्थितियां विशेष में दैहिक जरूरतों तथा सामाजिक दबावों के बीच औरत की मनःस्थिति को रेखांकित करती बेहतरीन कहानी है। अपने इस समय में बड़े पैकेज की खातिर पति-पत्नी के बीच बढ़ती भौगोलिक दूरियों के संदर्भ में भी इस कहानी को देखा-परखा जा सकता है। ’वह लड़की’ मन में पैठकर बार-बार वह सोचने के लिए उकसाती है कि क्या सचमुच ऐसी भी मां होती है जो मासूम लड़की को गिरवी रखने की वस्तु समझना अनैतिक या अमानवीय नहीं मानती?
    इन कहानियों के अलावा संग्रह की अन्य कहानियंा भी इसलिए पठनीय हैं कि वे अलग पात्रों और जिंदगी से रूबरू होकर कुछ विशेष कहने का मददा रखती हैं।
     तारिक असलम ’तस्नीम’ एक ऐसे कथाकार हैं जो अपने अनुभवों का चिंतन के धरातल पर गंभीरता से मंथन कर उसे सामाजिक ओैर साहित्यिक सरोकारों के कैनवास पर मौलिक शिल्प और शेैली के रंगों से रूपायित करते हैं। न केवल कहानियंा  प्रत्युत कविताएं तथा लघुकथाओं को तराशने के लिए भी वे ऐसी अन्तर्वस्तु का चयन करते हैं जो पाठक को वैचारिक स्तर पर साचने को मजबूर करती है।
    दोहरी जिंदगी के बजाय समानधर्मी व्यक्तित्व में ढले तस्नीम के रूप में हम ऐसे बेबाक व्यक्ति को अपने बीच पाते हैं जो विसंगतियों, विद्रुपताओं, आडम्बरों से समझौता नहीं उनके विरोध में आक्रोश जनित खंडन में विश्वास करता है। उनका रचनाकार हर उस जगह पैर जमाकर खड़ा है, जहंा इंसान बदलाव के नये सूरज और रोशनी की तलाश के लिए आतुर है। ’पत्थर हुए लोग’ की कहानियंा उनकी ऐसी ही अपेक्षाओं का आईना हैं। विश्वास है कि इन कहानियों को पढ़कर आप साहित्यिक सकून महसूस करेंगे।

पत्थर हुए लोग :  कहानी संग्रह :  डॉ.तारिक असलम ’तस्नीम’। प्रकाशक :  कश्ती प्रकाशन, अलीगढ़-202001। मूल्य :  रु. 120/-। संस्करण :  2013।
  • 766, सुदामा नगर , इन्दौर ,मध्य प्रदेश


हितेश व्यास      



भगीरथ ने दोहरी जिम्मेदारी को निभाया है

     जिस प्रकार शिवराम का नाम नुक्कड़ नाटक के प्रारंभ कर्त्ताओं में शुमार किया जाता है, उसी प्रकार भगीरथ परिहार लघुकथा के संस्थापकों और इस विधा के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है। वरिष्ठतम लघुकथाकारों की प्रथम पंक्ति में शामिल भगीरथ परिहार का यह संकलन दिशा प्रकाशन, दिल्ली से सन् 2000 में प्रकाशित हुआ। किसी विधा के श्रीगणेश कर्त्ताओं पर दोहरी जिम्मेदारी रहती है, उन्हें उस विधा में रचनाएं तो करनी ही होती है, उस विधा का सौंदर्य शास्त्र भी रचना पड़ता है। भगीरथ परिहार ने ये जिम्मेदारी बखूबी निभाई है ‘पेट सबके है’ की दस पृष्ठीय सुदीर्घ भूमिका ‘‘लघुकथा लेखन की सार्थकता’’ शीर्षक से आरम्भ में लिखी है, वह यूं ही नहीं है। कृति में प्रवेश से पूर्व भगीरथ परिहार के विधा संबधित अन्य योगदान पर दृष्टिपात करते है।
     भगीरथ परिहार ने 1972-73 में लघुकथा केन्द्रित प्रथम पत्रिका ‘‘अतिरिक्त का सम्पादन किया। ‘अतिरिक्त’
के अंकों में प्रकाशित रचनाएं लघुकथा की उत्कृष्ट उदाहरण हैं। चूंकि उस समय तक लघुकथा विधा रूप में प्रतिष्ठित नहीं हुई थी, सम्भवतया इसीलिए पत्रिका का नामकरण ‘अतिरिक्त’ किया गया। सन् 1974 में भगीरथ ने प्रथम लघुकथा संकलन ‘गुफाओ से मैदान की ओर’ का सम्पादन किया, जिसमें उस समय के महत्वपूर्ण लघुकथा लेखक सम्मिलित थे। इस संकलन का शीर्षक यह सभंवतया इसलिए रखा गया कि उस समय तक लघुकथा विधा गुफाओं में कैद थी, जिसे भगीरथ परिहार के समकालीन लघुकथाकार मैदान में लाये। भगीरथ ने लघुकथा के संदर्भ में कई सैद्धांतिक व व्यवहारिक समालोचना के आलेख लिखे। इतना ही नहीं, सन् 2004 में परिहार ने ‘‘राजस्थान की चर्चित लघुकथाएं व सन् 2003 में पंजाब की चर्चित लघुकथाएं पुस्तकों का सम्पादन किया, लघुकथा के चर्चित लेखकों व तत्कालीन रचनाकर्म पर टिप्पणियाँ की। मई 1975 में ब्यावर, अप्रैल 1977 में रावतभाटा, 1980 में होशंगाबाद, 1987 में जलगांव, महाराष्ट्र, 1988 में पटना, 1989 में बरेली, 2003-2004 व 2007 में अंतर्राज्य लघुकथा सम्मेलनों में सन् 2011 में राजस्थान साहित्य अकादमी की संगोष्ठी में भागीदारी की। भगीरथ परिहार ने 200 से अधिक लघुकथाओं की रचना की और लघुकथा पर कई समीक्षात्मक आलेख सृजित किये।
     प्रस्तुत संकलन में पचहत्तर लघुकथाएं है। शीर्षक लघुकथा ‘पेट सबके है’ अकाल में मजदूर के शोषण की कथा है। लूबा व देवा मजदूर है और मजबूर हैं। मजबूरी उनसे कम से कम पैसे में मजूरी करवा रही है। शोषक उनकी विवशता का लाभ उठाता है। ‘पेट सबके हैं’ शीर्षक में सादगी और अनाकर्षण है। इससे लघुकथा विधा के दो लक्षणों का पता चलता है। एक तो यह कि यह रूप आधारित विधा नहीं है, दूसरा यह कि यह कथ्य प्रधान है। ‘आग’ सम्पन्न और विपन्न की दुनियाओं की कथा है, सम्पन्न सर्दियों में विपन्न को कम्बल बांटने निकले हैं। विपन्न में चेतना युक्त कहता है, ‘‘दिन भर लूटो और रात के वक्त फर्ज निभाओ। विपन्न में से बुधिया कहता है ‘हम गरीब सही भिखमंगे तो नहीं। ‘चेतनावान नक्सली कहता है ‘‘अपनी लूट को इन्सानियत का जामा पहना रहे है’’। ’’सरदी बढ़ गयी है। आओ आग के पास बैंठेगे’’ के साथ लघुकथा का समापन होता है। ‘सोते वक्त’ वृद्ध दंपति के अकेलेपन की व्यथा कथा है। संवाद के रंजन से अलग-थलगपन को पूरते है। ‘गोली नहीं चली’ वर्गसंघर्ष की कथा है, ‘शर्त’ मानव-मुक्ति की संघर्ष-कथा है। ‘तुम्हारे लिए’ लोकतंत्री प्रदर्शन और हड़ताल से आगे बढ़कर सशस्त्र संघर्ष की तैयारी की कहानी है। ‘फूली’ रूढ़िवादी ढोंग, पाखण्ड विरोधी सकारात्मक कर्म प्रर्वतक रचना है। ’बघनखे’ अय्याश वर्ग द्धारा दैहिक शोषण की प्रतीकात्क लघुकथा है। ‘दाल-रोटी’ व्यवस्था द्धारा पालतू बनाये जाने की चालक कथा है। ‘कनविंस करने की बात’ आर्थिक लालच के लिए पति द्धारा पत्नी के दैहिक समझौते की पतन कथा है।
     ‘खामोशी’ कष्ट में भी जातिवादी दुराग्रह और विवशता जन्य पशुवत समाधान की करूण कथा है। ‘भीख’ व्यवस्थागत सडांध की अस्पताली व्यथा है जिसमें पैसे के सर्वग्रासी शिकंजे की गिरफ्त दर्शायी गई है। ‘युद्ध’ आपातकाल का बिना नाम लिए उसके प्रभाव और दुष्प्रभाव की कथा है जो युद्ध के प्रभाव-दुष्प्रभाव पर भी चस्पां होती है। ‘शिखण्डी’ व्यक्ति के समग्र पतन की क्रमिक कथा है, जिसका अंतिम वाक्य वर्ग चरित्र को उजागर करने वाला है, ‘‘उपलब्धि और अनुपलब्धि के अंतिम घेरो के बीच झूलता हुआ जीवन के हर क्षेत्र में शिखण्डी सा खड़ा है’’। ‘मजबूरी और जरूरत’ सम्बधों में आई आर्थिक स्वार्थपरता, रिश्ता निभाने की मजबूरी स्त्री को भोग्या समझने की पुरूष सोच, पुरूष की विवाहेतर विलासिता आदि बिन्दुओं को उठाने वाली लघुकथा है। ‘हक’ एक स्त्री चेतना की कथा है, संपति में पुत्री के हक की आड़ में एक दामाद अपने सास-ससुर पर दावा करना चाहता है परंतु पुत्री पति के बहकावे में नहीं आती है बल्कि पति के मंसूबों को उसी के समक्ष उजागर कर देती है। ‘कछुए’ सम्बधों के सैद्धांतिक विवेचन की सामयिक व्याख्या प्रतीकात्मक रूप से करती है। 
    ‘सूनाआकाश’ रेबारियों की व्यथा-कथा है। रोटी के लिए भटकाव और त्रासदियों का सिलसिला, ‘नाटक’ रोजगार देने के नाटक का पर्दाफाश करती है। अज्ञानी साक्षात्कारकर्ता इंटरव्यू का नाटक करते हैं, योग्यता को बाहर का रास्ता दिखाते हैं और सिफारिशी को लेते हैं। ‘सही उपयोग’ चुनाव के समय व्यवस्था का चेहरा दिखलाती है। ‘सयानी लड़की’ स्त्री के जागरूक होने की कहानी है यह प्रासंगिक रचना है, जो चेतना इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक में नजर आ रही है उसका पूर्वाभास भगीरथ परिहार को बीसवीं सदी के अंत में हो गया था। ‘शहंशाह और चिड़िया’ सत्ता के दुष्चक्र और जनता की स्वाधीनता की कथा है। ‘मकान’ में दूसरे के अहित की कीमत पर स्वहित पूर्ति की कुत्सित कामना है। ‘अपना-अपना दर्द’ में घरेलू बाईयों की वेदना है तो साथ ही सुखी व्यक्ति के दुख का चित्रण है। 
      ‘मेह बरसे तो नेह बरसे’ शीर्षक के अनुरूप मेह के महत्व को रिश्तों की सरसता से जोड़ने वाली रचना है। ‘दोजख’ में नर्क की पारम्परिक कल्पना का सहारा लेते हुए कथाकार उस व्यक्ति को दोजख की आग में झोंकता है, जो कारूणिक दृश्य का मात्र दृष्टा बना रहता है और संवेदनहीनता का परिचय देता है। ‘पिता, पति और पत्नी’ एक भारतीय स्त्री की धैर्य गाथा है, पति शराबी है, पुत्र माँ से अलग बसने का सुझाव देता है पर पत्नी पति को नियति मान लेती है। ‘ओवर टाइम’ स्वार्थपरता से उत्पन्न संवदेनहीनता को व्यक्त करती है। ‘टेक्टिकल लाइन’ में साहित्य में व्याप्त समझौतापरस्ती का चित्रण है। ‘शाही सवारी’ राजनेताओं की अगवानी में जनता के पिसने की सनातन कथा है। ‘आत्मकथ्य’ श्रमिक के त्याग और प्रतिदान में अभावों का अनंत क्रंदन है। ‘दुभवाला आदमी’ शोषक के समक्ष शोषित की समर्पण कथा है। ‘औरत’ में स्त्री का हिंसक प्रतिशोध है। ‘जनता-जनार्दन’ में विद्रोह की संभावना का दमन करके जनता का शाश्वत शोषित स्वरूप दर्शाया गया है। ‘लोमड़ी’ में राजनीति की कुटिलता है ‘शिक्षा’ में वर्तमान शिक्षा के विद्रुप से साक्षात है। ‘राहतकार्य’ व्यंग्य कथा है जिसका समापन मुख्यमंत्री के इस कथन से होता है, ‘‘हमारे विधायक होकर साढ़े सत्ताईस रूपये के कपड़े पहने रहे तो देश से गरीबी कैसे समाप्त होगी’’। ‘अवसरवादिता’ राजनैतिक अवसरवादिता केन्द्रित रचना है। ‘चियर्स’ नेताओं की कथनी-करनी के स्पष्ट अंतर को रेखांकित करती है। ‘दशहत’ आर्थिक शोषण की पंचतंत्री कथा है। ‘यस सर’ व्यवस्थागत सांठ-गांठ प्रगट करती है। ‘गंगाजल’ रूढ़िवाद के परिणाम स्वरूप कर्जदार होने की रचना है। ‘बेदखल’ अपनों की बेरूखी बताती है। ‘लोकतंत्र के पोषक’ में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री के इस्तीफे और कुछ अंतराल के बाद पुनः चुन लिये जाने की चिर प्रासंगिक बानगी है। ‘आधी रोटी की तसल्ली’ जनता की संतोषवृत्ति और समझौता परस्ती बयान करती है। ‘सभा चालू रखो’ प्रतिरोध कुचलने की कथा है। ‘दौरा’ में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की पुख्तगी है। ‘मोहभंग’ मेँ व्यवस्था से मोहभंग के बावजूद टूटन न बताकर यह संकल्प व्यक्त हुआ है। ‘‘मै कदापि फ्रीज नहीं होऊँगा’’। ‘अंतर्द्वंद्व’ प्रतिरोध की तैयारी की कहानी है। ‘रोजगार का अधिकार’ न्याय व्यवस्था की पोल खोलती है। ‘चेतना’ संघर्ष के लिए सचेत होने की प्रेरक कथा है। ’आंतक’ के मूल में सांप्रदायिकता है, कथाकार नब्ज पर अंगुली रखता है ‘‘आदमी को अंधा बनाने की कीमियागीरी इन्हीं गुरूद्धारों, मस्जिदों और मंदिरों में व्याप्त है। ‘अंधी दौड़’ मेँ आम आदमी के जीवन संघर्ष की अनन्त यात्रा को प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मिली है। ‘रोमांस के रंग’ प्रेम कथा है पर यथार्थ की धरती पर। ‘अंतहीन उंचाइयाँ’ में कथाकार मनुष्य का ध्यान प्रकृति के अमिट सौन्दर्य की ओर ले जाता है। ‘धापू घाचण सोचती है’ में आम आदमी की तुलना घाणी के बैल से की गई है, खास कर औरत जात की, ‘अधेरे द्धीप प्रकाश की खोज करके अपना अंत आशावादी करती है। ‘फैसला’ व्यवस्था की मिली भगत की कहानी है। ‘आत्महंता’ बेरोजगार युवक के आत्महंतत्व की क्रमिक कथा है। ‘हड़ताल’ भगीरथ परिहार के शैल्पिक कौशल का उदाहरण है, इसमें एक-एक शब्द एक-एक वाक्य की तरह है। शैलीप्रधान होते हुए भी कथ्य प्रधान है और मजदूर के अनन्त संघर्ष की अंतहीन कहानी कहती है। ‘टूल’ आम आदमी के मोहरा बनने की कथा है, ये तो हुई भगीरथ परिहार की लघु कथाओं पर विहंगम दृष्टि। अब हम समीक्ष्य संकलन में भूमिका रूपी आलोचना शास्त्र में प्रवेश करते हैं। जिसे भगीरथ ने ‘लघुकथा लेखन की सार्थकता शीर्षक दिया है।
     भगीरथ बताते हैं कि लघु कथा एक सर्वपठनीय एवं सहज बोधगम्य विधा है। ये रचनाएं कम समय में ज्यादा पाने का एहसास देती हैं। लघुकथा संप्रेषणीय होती है। लघुकथा जनविधा है जो जन भाषा का प्रयोग करते हुए जनता के दुख-दर्द और आकांक्षाओं को व्यक्त करती है। लघुकथा एक प्रहारक विधा है जो राजनैतिक पैंतरेबाजी, भ्रष्टाचार, अत्याचार और अनैतिकता पर प्रहार करती है। लघुकथाएं बताती है कि सामाजिक रिश्तों में कितना ठंडापन आ गया है और व्यक्ति कितना आत्मकेन्द्रित हो गया है!
      भगीरथ लघुकथा का मर्म व्यक्त करते हैं। इस विधा ने साम्प्रतिक जीवन की जटिलताओं को सरलीकृत रूप में प्रस्तुत किया। यही वह विधा है, जिसने छोटे आदमी के छोटे-छोटे संघर्षाे को वाणी दी है। अब महानायक का समय नहीं रहा, बड़ी-बड़ी त्रासदियाँ घटित नहीं होती, जीवन अपनी गति से बहता है। उसमें अनावश्यक नाटकीय उतार-चढ़ाव और अप्रत्याशित मोड़ नहीं आते। रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाएं लघुकथा में घटती हैं। इस प्रकार यह विधा बेहतर समाज निर्माण की भूमिका तैयार करती है। लघुकथा आज की विसंगतियों, विरोधाभासों और विडम्बनाओं पर सटीक चोट करती है। पतनशील मूल्यों व नितांत स्वार्थ-परता पर व्यंग्य करती है। इसके प्रभाव में बच्चे से बूढ़े, सामान्य पाठक से गंभीर चिंतक तक हैं। रवीन्द्र नाथ टैगोर, खलील जिब्रान, शेखसादी जैसे महान लेखकों ने लघुकथाएं लिखी हैं। इसमें किस्सागोई से दार्शनिक फलसफा तक समाया हुआ है। भगीरथ लिखते हैं कि कोई भी विधा तभी संपुष्ट होती है जब लेखक उसे सम्पूर्णतः अपनाते हैं और अपनी मुख्य विधा बनाते हैं। कई लेखक हैं जिंहोने मात्र इसी में लिखा है और लघुकथा ही से निज पहचान निर्मित की है। लघुकथा की तीक्ष्ण दृष्टि वहीं पहले जाती है जहाँ व्यक्ति, परिवार, समाज या व्यवस्था में संड़ांध आ रही है। इसलिए चाहकर भी शोषक-शासक इस विधा का निज हितार्थ उपयोग नहीं कर सकते, यहाँ तक कि प्रेम और रोमांस के लिए इस विधा में स्पेस नहीं है। भगीरथ कहते हैं कि लघुकथा आसान विधा नहीं है, न यह वह विधा है जो चटपटी मसालेदार सामग्री मुहय्या कराती हो।
यहाँ तक कि भगीरथ ने लघुकथा समीक्षा के मानदण्ड तय कर दिये। कथानक, कथ्य, भाषा शैली, संवाद, प्रभाव, संप्रेषण, कसावट, मूल्य-बोध इस विधा के मानक हैं। लघुकथा के लघु कलेवर में अनावश्यक प्रसंग, विवरण व विस्तार की गुंजाइश नहीं है,। सवांद चुस्त-सटीक एवं संक्षिप्त होने चाहिए। लघुकथा की भाषा जीवन्त, प्रवाहमयी सांकेतिक व व्यंजनात्मक होनी चाहिए। लघुकथा की भाषा दो टूक, व्यंग्यात्मक जनभाषा होनी होनी चाहिए। लघुकथा का कथ्य पैना, प्रहारात्मक, मार्मिक हृदयस्पर्षी, नई जमीन तोड़ने वाला, वैविध्यपूर्ण, एकान्वितियुक्त होना चाहिए। कथानक सामान्य जीवन से, सामाजिक सरोकारों से उठने वाले, छोटे काल खंड में समाहित हों, जटिल व लम्बे न हो। लघुकथा संप्रेषित होकर ही सौन्दर्यबोध जगाती है। भगीरथ निर्मम समीक्षा के पक्षधर नहीं हैं। वे कहते हैं, ‘‘समीक्षा के मानदण्ड श्रेष्ठ रचनाओं को आधार बनाकर तय किये जाते हैं न कि मानदण्ड के आधार पर श्रेष्ठ रचनाएं रची जाती है’’। आठवें दशक में क्यों अचानक यह विधा महत्वपूर्ण हो गई, परिहार लिखते हैं, ‘‘मामूली आदमी के मामूली जीवन में महत्वपूर्ण होती मामूली बातों की अभिव्यक्त्ति लघुकथा कर सकती थी। जो कथ्य की प्रमुखता पर बल देती थी। ‘‘वे कहते हैं कि कथ्य की अस्पष्टता लघुकथा को कमजोर कर देती है, इसमें प्रधान तथा गौण कथ्य समानानंतर नहीं चल सकते। भगीरथ लिखते हैं, प्रभाव में लघुकथा ‘घाव करे गंभीर’ प्रकृति की होती है। लघुकथा नीतिकथा की तरह निष्कर्ष नहीं देती। कथ्य कभी प्रछन्न भी हो सकता है। लघुकथा की सरंचना परिहार कुछ यूं परिभाषित करते है, ‘‘लघुकथा अक्सर द्धंद्ध से आरंभ होकर तेजगति से चरम की ओर चलती है तथा चरमोत्कर्ष पर अप्रत्याशित ही समाप्त हो जाती है। लघुकथा का अंत अक्सर चौंकाने वाला तथा हतप्रभ करने वाला होता है, इस तरह का अंत पाठक की जड़ता को तोड़ता है’’। लघुकथा के कथानक सामान्य जनों की आकांक्षाओं, सपनों संघर्ष और दुख को व्यक्त करते हैं। अक्सर लघुकथा जीवन की कुरूपता पर फोकस करती है, लघुकथा में अमूर्त कथानक कम मिलते है, न इसमें परिवेश के विस्तृत विवरण होते है, न चरित्र चित्रण, जनभाषा में व्यक्त होने पर  लघुकथा मुहावरें, लोकोक्तियों व व्यंग्योक्तियों से भाषा सौन्दर्य लाती है। लघुकथा का कथ्य विचारधारात्मक भी हो सकता है और संवेदनात्मक भी। 
     कथानक मौलिक यथार्थपरक व विश्वसनीय होना चाहिए। अंतियथार्थवादी, अतिरंजित, वीभत्स कथानक लघुकथा के लिए वर्जित है। इसमें उपकथाएं व अंतःकथाएं नहीं होती। लघुकथा का कथ्य व्यवस्थाजन्य विकृतियों विषमताओं और विसंगतियों पर केन्द्रित रहते हैं। लघुकथा राजनैतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार अवसरवाद व छद्म मानवीय सम्बंधों का उद्घाटन करती है। भगीरथ परिद्धार ने लघुकथा की ये शैलियाँ परिगणित की हैं- 1. विरोधाभास, 2. रूपक, 3. संवाद, 4. पैरोडी, 5. प्रतीक, 6. व्यंग्य, 7. दृष्टांत, 8. अतिरंजना, 9. एकालाप, 10. गद्यगीतात्मक, 11. फेंटेसी, 12. आत्मकथात्मक या संस्मरणात्मक, 13. अमूर्त।   
         इस प्रकार भगीरथ परिहार ने पहले भूमिका के रूप में सैद्धांतिकी उपस्थित की, तदन्तर व्यवहारिकी के रूप में अपनी पचहत्तर लघु कथाएं रखी। लघुकथा के सौन्दर्यशास्त्र और उसकी पुष्टि के लिए प्रतिनिधि पचहत्तर लघु कथाओं हेतु भगीरथ परिहार बधाई के पात्र हैं।

पेट सबके हैं :  लघुकथा संग्रह : भगीरथ परिहार। प्रकाशक :  दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035। मूल्य: रु. 80/-। संस्करण: 2000।
  • 1-मारुति कॉलोनी, पंकज होटल के पीछे, नयापुरा, कोटा-1(राजस्थान )



डॉ. ज्योत्सना स्वर्णकार

मानवीय संवेदनाओं की कहानियाँ

 कथाकार माधव नागदा के अब तक चार कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके चौथे संग्रह ‘परिणति तथा अन्य कहानियाँ’ में कुल तेरह कहानियाँ संकलित हैंद्य संग्रह की भूमिका में माधव नागदा लिखते हैं, ‘संवेदनशीलता के बूते साहित्यकार अपने परिवेश, समाज और मानवीय सरोकारों से गहराई तक जुड़ जाता हैद्य’ इसी लेखकीय संवेदना के फलस्वरूप संग्रह की सभी कहानियाँ समाज, मानवीय सरोकार और संक्रमित जीवन मूल्यों की पीड़ा को पाठकों के सम्मुख रखती है। ‘परिणति’ कहानी बहुत कुछ आज के युवाओं की कहानी हैद्य असफल प्रेम की कुण्ठा, नौकरी पाने की जद्दोजहद, परिवार के अंतर्विरोध आदि कई व्याधियों से युवा पीढ़ी ग्रसित हैद्य ‘घर में मेवाड़ी, पढ़ाई का माध्यम राष्ट्रभाषा हिंदी और नौकरी के लिए मांग धाराप्रवाह अंग्रेजी...समूचा एक्सचेंज ही खराब है’  कथा नायक पवन का यह कथन सचमुच खराब एक्सचेंज(सिस्टम) के शिकार युवाओं का ही दर्द है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ तथा ‘ज़हरकाँटा’ कहानियाँ’ आज की साम्प्रदायिक संकीर्णता और उसके भयावह परिणामों की विश्वसनीय तस्वीर उकेरती हैद्य शिल्प की दृष्टि से नवीनता लिए हुए ‘छिलके’ जातिगत भेदभाव के परत-दर-परत छिलकों को एक-एक कर उघाड़ती चली जाती हैद्य विडम्बना यह कि ये ही छिलके दलितों में भी मौजूद हैं जो भेदभाव के विरुद्ध उनके आंदोलन को कमजोर करते हैंद्य ‘मुक्तिपथ’ माधव नागदा के कहानीकार की संवेदना का विस्तार हैद्य थावरा जैसे अनबोले जीव को नायकत्व प्रदान करने का साहस कोई मंजा हुआ कहानीकार ही कर सकता हैद्य यहाँ खूंटे से बंधे, अबोले और ग़मगीन बैल की मनोकामनाओं को शब्दों का जामा पहनाकर सशक्त ढंग से अभिव्यक्त किया गया हैद्य ‘केस नम्बर पाँच सौ सोलह’ और ‘बूढ़ी आंखों के सपने’ उन बुजुर्गों की कहानियाँ हैं जो गुजरे हुए सुनहरे जमाने के भोक्ता और वर्तमान मूल्य संक्रमण से आतंकित हैंद्य अखबारों में देश के वर्तमान हालात की बेहद निराशाजनक खबरें पढ़-पढ़ कर ‘केस नम्बर पाँच सौ सोलह’ के देवीप्रसाद लगभग अर्द्धविक्षिप्त हो जाते हैं तो दूसरी कहानी के रामाबा बेटे की हर बात पर जुमला फेंकते हैं, ‘जब मैं तेरे जैसा था तो...द्य’ उन्हें नई पीढ़ी के नाकारापन को लेकर सख्त अफसोस हैद्य संग्रह की पहली कहानी ‘कपाल क्रिया’ और अंतिम कहानी ‘शवयात्रा’ नामकरण की दृष्टि से चाहे एक ही संस्कार से जुड़ी हो परंतु इनके नायक मूल्य चेतना की दृष्टि से विपरीत धरातल पर खड़े हैंद्य जहां ‘शवयात्रा’ का सरजू अपने पिता के खेतों को महजनों, सूदखोरों से बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है वहीं ‘कपालक्रिया’ का सत्यनारायण बाजारवादी मानसिकता के तहत पिता के शत्रु जमीदार से जा मिलता हैद्य  ‘उसका दर्द’, ‘अंजलि भर उजास’’ ‘साफ पानी की तलाश’ कहानियाँ भी सशक्त हैं और सोचने को मजबूर करती हैंद्य 140 पृष्ठों का यह कहानी संग्रह समाज और संस्कृति के विविध रंगों को दर्शाता हैद्य इन कहानियों में ग्रामीण परिवेश पर्याप्त विश्वसनीय ढंग से सामने आया हैद्य कहानियों की भाषा बहुवर्णी हैद्य हिंदी, उर्दू तथा मेवाड़ी का यथास्थान सार्थक प्रयोग कहानियों को पर्याप्त संप्रेषणीय बनाता हैद्य निश्चित ही लेखक ने विषय, भाव, भाषा के सटीक तालमेल द्वारा हिंदी जगत को यादगार कहानियाँ देने का प्रयास किया है।

परिणति तथा अन्य कहानियाँ :  कहानी संग्रह :  माधव नागदा। प्रकाशक  :  बोधि प्रकाशन, एफ-77, करतारपुरा इंड.एरिया, जयपुर। मूल्य :  रु. 70/-। संस्करण : 2012।
  •  प्राध्यापक(हिंदी), श्रीगोवर्द्धन हायर सेकण्डरी स्कूल, नाथद्वारा (राजसमंद)-313301(राज.)


डॉ. पुरुषोत्तम दुबे


रास्तों पर चलती दुआएँ :  किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ


हिन्दी लघुकथा के क्षेत्र में लघुकथाकार पारस दासोत के विभिन्न विषयों पर केन्द्रित चौदह एकल लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। दासोत जी का ‘सीटी वाला रबर का गुड्डा’ शीर्षक लघुकथा-संग्रह का उर्दू अनुवाद पाकिस्तान में प्रकाशित हो चुका है। ‘मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ’ पारस जी का चौदहवाँ लघुकथा संग्रह है। पारस दासोत ने प्रस्तुत लघुकथा संग्रह में ऐसा छक्का मारा है जिसकी परिगणना किन्नर जैसी अद्भुत बिरादरी से जोड़कर हिन्दी लघुकथा क्षेत्र में पृथक मिज़ाज से होगी। बरअक्स इसके दासोत जी का कहना है कि, ‘इन लघुकथाओं में मेरी दृष्टि/दिशा किन्नरों के अन्तर्मन को
टटोलने की रही है। कृति में कृतिकार ने किन्नरों के अन्तर्मन को जिन बन्धन रहित विचारों से टटोला है, वे विचार ‘सत्यम् शिवम सुन्दरम्’ की धरती पर मन्थित होकर व्यंजित हुए हैं। इसका पता संकलन में समाहित कतिपय लघुकथाओं के शीर्षकों से मिलता है। यथा‘ ‘सृजन एक कलाकृति का’, ‘एक मुलाकात ईश्वर से’, ‘तुमको नमन’, ‘ईश्वर के प्यारे पुत्र’, ‘पूज्य अमानत’, ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इत्यादि। ऐसे विशालमना शीर्षकों से शोभित हुई लघुकथाएँ पत्थर सनातन धर्म वाले पाठकों को भी अभिभूत करने में सामर्थ्य-सम्पन्न हैं। विवेच्य पुस्तक में पुस्तक के चचयिता पारस दासोत किन्नर चित्त की अभ्यन्तर स्थिति से अनुस्यूत होकर, विचारों की रसभरी-मधुमत्ति-भूमिका पर उतरकर अपनी लेखनी के पौरुष से स्वयं के चित्त को जगाते मिलते हैं और लघुकथाओं के अर्थ में एक नई ‘मानवीय-गीता’ को जन्म देते हैं। लगभग 20 वर्षों के लम्बे समय में किन्नर सम्बन्धित इसी एक विषय पर ‘ड्रेमेटिक’ अन्दाज में सोचते हुए पारस दासोत ने अपनी अनुभूतियों का कितना पसीना बहाया है, इसका माप लेखक की लघुकथाओं के ‘मीटर’ से हासिल किया जा सकता है। प्रस्तुत संकलन ‘मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ’ प्लास्टिक के खिलौनों में साँसों की आवाजाही जैसी लगती है। दो लड़की के उपरान्त एक लड़का पैदा होने का ‘नेग’ लेने पर जब किन्नर इंकार कर देते हैं, तो बेटियों के जन्म के बाद उनके प्रति उपेक्षा भाव समाज की थोथी संरचना पर ठहाका भरता प्रतीत होता है। लघुकथा ‘गलती जो माफ नहीं’ इसी आशय पर अवलम्बित है। ‘आँचल की भूख’ लघुकथा किन्नर मन के उस महासंग्राम को व्यक्त करती है, कि वह सन्तान पैदा नहीं कर पाने के अर्थ में मातृत्व-भाव से वंचित है। ‘मृत्यु के रुके कदम’ लघुकथा को बतौर ‘नमूना’ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा, जिसमें किन्नर का वह शाश्वत कर्म/धर्म उद्घाटित होता है, जिसका निर्वाह वह जीवन से लेकर मृत्यु पर्यन्त करता है। यथा- ‘‘अपने द्वार पर/किन्नर अपनी मृत्यु देखकर बोला- ‘ठहरो! मैं एक बार और नाच लूँ!’/किन्नर नाच रहा था। अचानक अपने साथी किन्नर को नाचता देखकर उसके सभी साथी, भी उसका साथ देने के लिए नाच-गाने लगे।/यह देखकर मृत्यु विस्मय स्वर में बोली-/‘कमाल है!’ ’’
    प्रस्तुत संग्रह की लघुकथाओं में प्रायोजित भाषा संवाद-जड़ित और विचार-मण्डित है। बिम्ब और प्रतीकों के नियोजन से सम्पृक्त शिल्प की मुखरता ही इन लघुकथाओं के कथ्य का विन्यास करती है। चित्रकार और मूर्तिकार जैसी अन्य योग्यताओं में महारत प्राप्त किए पारस दासोत इस संकलन की लघुकथाओं में चित्र भी बनाते हैं और मूरत भी गढ़ते हैं।

मेरी किन्नीर केन्द्रित लघुकथाएँ :  लघुकथा संग्रह :  पारस दासोत। प्रकाशक :  अक्षरधाम प्रकाशन, करनाल रोड, कैथल-136027, हरि.। मूल्य :  रु.180/-, संस्करण :  2013।
  • शशीपुष्प, 74 जे/ए स्कीम नं.71, इन्दौर-452009 (म.प्र.)



संतोष सुपेकर


वर्तमान समय के बहुरुपियेपन का सफल चित्रण
     

80 के दशक से एक प्रतिष्ठित कहानीकार होने के साथ एक सिद्धहस्त लघुकथाकार के रूप में श्री सुरेश शर्मा हिन्दी साहित्य जगत की एक जानी-मानी हस्ती हैं। समान्तर लघुकथा विशेषांक, ‘काली माटी’ और ‘बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ’ जैसे प्रभावी संकलनों का सम्पादन कर उन्होंने हिन्दी लघुकथा की विकास यात्रा को गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। एक लघुकथाकार के पास जिस तरह की कटाक्षपूर्ण शैली एवं अपने आसपास के जीवन में बिखरी पड़ी विसंगतियों को पकड़ने के लिए जिस सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह श्री सुरेश शर्मा जी के पास है। सद्यः प्रकाशित उनके लघुकथा संग्रह ‘अंधे बहरे लोग’ की भूमिका में ख्यात साहित्यकार श्री सूर्यकान्त नागर ने इन रचनाओं को घटनाओं और अनुभवों से उपजी लघुकथाएँ कहा है वहीं फ्लैप पर लघुकथा जगत के प्रथम पंक्ति के हस्ताक्षर श्री बलराम ने इन्हें जीवन मूल्यों के प्रति आस्था जगाती रचनाएँ निरूपित किया है।
     सुरेश शर्मा की लघुकथाएँ, कथ्य की हाँडी में, धैर्य की धीमी आंच पर पकाई गई रचनाएँ हैं। आकार में छोटी होते हुए भी अपनी अर्थमयता में ये हाथी के समान हैं। इन्हें पढ़ते हुए पाठक कभी सूंड पकड़ पाता है, कभी पूंछ तो कभी पांव। संग्रह की पहली एवं शीर्षक लघुकथा ‘अंधे बहरे लोग’ पर्यावरण के साथ हमारी लगातार छेड़छाड़ एवं उपेक्षा को लेकर लिखी गई रचना है, जिसकी अंतिम पंक्तियां कोड़े की फटकार सी कानों में गूंजती हैं- ‘‘वृक्ष ने देखा, कुछ लोग कुल्हाड़ी, आरी, रस्सी लिए उसकी ओर चले आ रहे हैं, वृक्ष भय से कांप उठा। जानवरों ने तो उसकी बात मान ली थी पर आदमी ने....?’’
     ‘श्रवणकुमार’ एक अत्यन्त छोटी किन्तु बेहद प्रभावी रचना है। इसमें दाने-दाने को तरसती औरत, तंग आकर बेटे से कहती है- ‘‘कब से भूख-भूख चिल्ला रहा है, मर क्यों नहीं जाता?’’ 
     सुबह होने तक मासूम बालक ने मां का कहा मान लिया।
     रचना का अंतिम वाक्य मन को भीतर तक झकझोर जाता है। लेखक ने मासूम मजबूर बालक को ‘श्रवणकुमार’ नाम देकर सोचने पर विवश कर दिया है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी गरीबी मिटा डालने के तमाम दावे सच हैं या अन्तर को भीतर तक चीर डालते इस मार्मिक क्रन्दन का वर्णन उन पर भारी है? इसी प्रकार ‘चॉकलेट’ रचना में लेखक ने आम आदमी की पहुँच से लगातार दूर होती जा रही दालों की समस्या तो उठाई ही है, साथ ही दाल न खरीद पाने की असमर्थता को बहानों में लिपटी मजबूरी के प्रभावी संवादों के साथ जीवन्त कर दिया है। ऐसी रचनाएँ जमाखोरी का तेल कानों में डाले बैठी हमारी बिगड़ी व्यवस्था के लिए एक जोरदार शंखनाद है। ‘दंश’ रचना में बछड़े एवं वैश्या की नियति का मार्मिक वर्णन है। ‘समझौता’, ‘दीयातले’ एवं ‘मॉरेल’ रचनाएँ व्यंग्य का रूप लिए हैं, जो बताती हैं कि लघुकथा में व्यंग्य अंडर करंट की तरह मौजूद रहता है और व्यंग्य लघुकथा के माध्यम से तमाम तरह की विद्रूपताओं को आसानी से कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। ‘दीयातले’ बालश्रम की समस्या को लेकर हमारी मुंदी हुई आंखों को भी निशाना बनाती हैं। ‘राजा नंगा है’ में व्यवस्था को नंगा कर लेखक ने सामाजिक/राजनैतिक क्रान्ति को नये वस्त्र पहनाने का आह्वान किया है।
    संग्रह में सुरेश शर्मा ने जीवन के लगभग हर पहलू को छूने की कोशिश की है। ‘एक्सीडेन्ट’ लघुकथा, बाजार केन्द्रित भूमण्डलीकरण एवं पूंजीवाद के छद्म विरोध के दौर में उच्च मानवीय मूल्यों के निरन्तर होते पतन की कहानी है। पिंजरा, समस्या, लकवाग्रस्त, बंद दरवाजे व ‘स्वर्ग के लिए’ कठिन वृद्ध जीवन तथा ‘प्यार की परिभाषा’ व ‘जन्मदिन’ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं, तो ‘पुरस्कार’ ईमानदार शिक्षक की दयनीय स्थिति पर आधारित रचना है। ‘पड़ोसी’ आज के क्रूर समय में विघ्नसंतोष और आपसी ईर्ष्या के चरम पर जाने को दर्शाती है तो ‘टपकती छत’ दारिद्रय के दुःख और उससे निकलने की असफल कोशिश का सफल मनोवैज्ञानिक चित्रण है। ‘प्रार्थना’ में पुलिस की लार टपकाऊ फितरत पर डंडा मारा गया है तो ‘भला आदमी’ असंवेदी भूसे के ढेर में भला आदमी रूपी गेहूँ के दाने की तलाश है।
     संग्रह का मुखपृष्ठ आकर्षक है। मुद्रण त्रुटिरहित व स्वच्छ है। आत्मकथ्य में श्री शर्मा ने लिखा है कि कुछ रचनाएँ इन्होंने जानबूझ कर नहीं ली हैं, इस क्रम में ‘एक रावण यह भी...’ तथा ‘निमंत्रण’ को भी छोड़ा जा सकता था। ‘मानसिकता’ में भी अंतिम वाक्य व्यवहारिक प्रतीत नहीं होता। बहरहाल, लघुकथा के व्यापक विमर्श, विश्लेषण और मूल्यांकन के दौर में श्री सुरेश शर्मा ने 82 लघुकथाओं के इस संग्रह में वर्तमान समय के बहुरुपियेपन को सफलतापूर्वक अनावृत किया है।

अंधे बहरे लोग :  लघुकथा संग्रह :  सुरेश शर्मा। प्रकाशक :  शिल्पायन, 10295, लेन नं.1, वैस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032।  सहयोग राशि :  150/-। संस्करण :  2013।
  • 31, सुदामा नगर, उज्जैन, म.प्र. 


राजेन्द्र नागर ‘निरंतर’


भविष्य की संभावनाएँ तलाशती लघुकथाएँ


स्वतंत्र और अनिवार्य विधा के रूप में स्थापित हो चुकी लघुकथा अब समाज के हर क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ बना चुकी है। नई पीढ़ी के रचनाकार अपने सम्पूर्ण समर्पण भाव से लघुकथा सृजन में जुटे हुए हैं। श्री संतोष सुपेकर ऐसे ही सृजनशील रचनाकारों में से हैं। उनका सद्यः प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘भ्रम के बाजार में’ पाठकों को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर जाता है। भूत, भविष्य और वर्तमान की चिंताओं से लबरेज इन लघुकथाओं के माध्यम से श्री सुपेकर बहुत कुछ कहना चाहते हैं। ‘इस सदी तक आते आते’, ‘तीसरा पत्थर समूह’, ‘टर्निंग पाईंट’, ‘हम बेटियाँ हैं न’, ‘छूटा हुआ पक्ष’ आदि इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ लघुकथाएँ कहीं जा सकती हैं, जो पाठकों को यकायक झकझोर देती हैं। कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि श्री सुपेकर की सोच अपने समय से काफी आगे की है। 153 लघुकथाएँ और 168 पृष्ठ में कुल मिलाकर लेखक ने बहुत अच्छा ताना-बाना बुना है। धर्म, अर्थव्यवस्था, सामाजिक परिवेश और चिथड़े होती राजनीति पर बहुत कड़े प्रहार बड़े ही संवेदनशील तरीके से इस पुस्तक में किए गए हैं। चाहे सरकारी कार्यालयों में बढ़ती अकर्मण्यता की बात हो, चैनलों में बढ़ती फालतू की प्रतियोगिता हो, सिक्कों-प्याज का द्वन्द्व हो, भूख से पीड़ित समाज का एक अछूता वर्ग हो, अंध विश्वास हो या मजहबी जुनून, सभी विषयों पर बड़े ही व्यवस्थित ढंग से कहने की कोशिश श्री सुपेकर ने इस संग्रह के माध्यम से की है। ‘व्हेरी गुड’, ‘उसी मां ने’, ‘इसीलिए’, ‘अर्थ ढूंढ़ती सिहरन’, ‘दिलासा’, ‘कातर’, ‘आंखों वाली सीढ़ी’, ‘बड़ी वजह’, ‘मीठा आघात’, ‘सिला’, ‘मिट्टी में गड़े सांप’ आदि ऐसी अनेकों लघुकथाएँ हैं, जिनमें सुनहरे भविष्य की संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं। इन्हें पढ़कर लेखक की संपूर्ण क्षमता का परिचय मिल जाता है। संग्रह में कुछ लघुकथाएँ पुराने ढर्रे पर लिखी गईं हैं तो कुछ मात्र लघुकथाओं की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से पुस्तक में शामिल की गई प्रतीत होती हैं। लेखक को अनावश्यक विस्तार के साथ-साथ शीर्षकों के निर्धारण में भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    अंत में यही कहूँगा कि श्री सुपेकर में अत्यन्त धनात्मकता है। पाठकों का प्रेम भी उन्हें भरपूर मिल रहा है। इस संग्रह के द्वारा अपनी प्रतिबद्धताओं को उन्होंने पूरे मनोयोग से उभारा है। घर की हो शासकीय लायब्रेरी, हर जगह इस संग्रह को यथासंभव स्थान मिलना ही चाहिए।

भ्रम के बाजार में :  लघुकथा संग्रह :  संतोष सुपेकर। प्रकाशक :  सरल काव्यांजलि, 31, सुदामानगर, उज्जैन, म.प्र.। मूल्य :  रु. 220/- मात्र। संस्करण :  2013।
  • 16, महावीर एवेन्यू पार्ट-1, मक्सी रोड, उज्जैन, म.प्र.

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