आपका परिचय

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 05-06, जनवरी-फरवरी 2014

।। कथा कहानी ।। 

सामग्री :  इस अंक में श्री ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ कहानी 'एक टुकड़ा आसमान'।  


ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’


एक टुकड़ा आसमान

      विश्वास कर लेती।....पर कैसे? कैसे मान लेती कि तुम..... नहीं लौटोगे? सच तो यह है कि तुम्हें बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था पर कैसे? अपने द्वारा दिए गये वचनों का शायद, तुम्हें ध्यान ही नहीं रहा होगा। तब कैसे आते तुम। इस गली में आने पर संभवतः पहचान लिए जाते और सुबह के अखबारों में ताजा खबर बन जाते। तुम कहाँ हो पराग! तुमने अपनी जो तस्वीर मुझे उस दिन दी थी, भीगी आँखों, मैं उस ओर उन्मुख हूँ।.... लेकिन तस्वीर मौन है, एक दम खामोश, बिना कम्पन, बिना सिहरन। लगता है उसके होंठ कुछ कहेंगे, कुछ सन्देश देंगे तुम्हारा, पर फूट नहीं पाते बोल उसके अधरों से। तुम्हारा भोला-भाला आकर्षक चेहरा। उसे देख कोई भी न कह सकेगा कि तुम फरेबी और झूठे हो। यह सब देख-सोच मेरे में एक पुलक भर जाती है। नई भोर में सोके उठ तुम्हारे ही अस्तित्व के विषय में सोच रही थी, पर पलक झपकते ही वह बह गया पानी-पानी होकर। छोड़ो यह सब, बताओ सच-सच कि तुम कहाँ हो? धरती, आकाश, पवन, सागर, सभी दिशाओं में कहाँ खोजूँ तुम्हें? तुम्हारा पता जो बताये उसे इनाम दूँगी जी भर, पर बताये तो सही। वैसे मैं जानती हूँ तुम्हारा पता-ठिकाना। तुम मेरे भीतर लहरा रहे समुद्र की तरंगों की गँूजती आवाज हो। इस आवाज को ध्यान से सुनो पराग! पराग तो फूलों की पांखुरियों के बीच ही रहता है। फूल खिलने से मुरझाने तक। ढेर सारी मधु मक्खियां चिपकी रहती हैं उस पर और हो जाती हैं परागमय। और जब बसंत बीत जाता है, फूल सूख जाता है, छोड़ जाती हैं मधु मक्खियाँ उसे।
     पराग! याद होगा तुम्हें, तुमन ही बचाया था मुझे उस दिन उस समारोह में। कितने सारे असामाजिक तत्वों ने घेर लिया था मुझे चारों ओर से। संगीत और नृत्य का शौक अथवा उसका व्यवसाय किसी भी दशा में निन्दनीय नहीं है। गुणी जानते हैं, कला हमारी प्यास है। कला बसती है हमारी आत्मा में। कला द्वारा जीवन-यापन करना पाप नहीं है। मैं उस बारात में नृत्य-गायन के लिए आई थी। कला के प्रदर्शन के लिए आई थी। पर कुछ शोहदों ने सारा माहौल ही बिगाड़ना चाहा और घेर लिया था मुझे चारों ओर से।
    उन प्यासे शोहदों ने ढेर सारी फब्तियाँ कसी थीं मेरे पर, अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति और परम्परायें छोड़ कर। देखने वाले देख रहे थे और सुनने वाले सुन रहे थे। पर मेरी सुरक्षा के विषय में चिंता किसी को भी नहीं थी। लेकिन एक तुम थे अकेले। सागर की तरह गरज उठे थे तुम। सावन-भादों की बिजली बनकर कड़क उठे थे तुम! दोनों हाथ फैलाकर ले लिया था घेरे में तुमने मुझे। डांटा-फटकारा था उन शोहदों को तुमने। खबरदार! जो एक इंच भी आगे बढ़े। तोड़ दूँगा हाथ, यदि किसी ने छुआ गायिका को। दहल गई थी पूरी की पूरी भीड़। काई सी फट गई वहाँ। शोहदे हट गये थे पीछे दुम दबाकर गीदड़ों की तरह। तब कहीं जाकर मेरी कला का प्रदर्शन हुआ था। सारा ही गांव मुग्ध होकर देख रहा था। मैं आपकी बड़ी अहसानमन्द थी उस समय।
    पराग! तुम्हें याद होगा, होना भी चाहिए कि शेरो-शायरी की प्रतियोगिता का आयोजन भी था वहाँ। सभी ने अपनी-अपनी योग्यता का परिचय दिया था वहाँ। कन्या-पक्ष बेहद प्रसन्न था, कारण कि वर पक्ष की ओर से तुम अकेले ही थे। वह भी उन्नीस वर्ष के किशोर। शाबाश है पराग तुमको शाबाश! मुझे क्या किसी को भी उम्मीद न थी कि किशोर पराग अपनी शेरो-शायरी से कन्या पक्ष को धुंधला कर रख देगा। सभी को अपने चमत्कार के वशीभूत कर लिया था तुमने। मेरे पास सच के सिवा कुछ और है भी तो नहीं कहने को। सच यह है कि उसी दिन से यह रामसनेही तुम्हारी हो गई थी, सिर्फ तुम्हारी!
     नई भोर उजलाई थी। सभी ओर जागरण हो गया था। यहाँ-वहाँ सभी जगह हलचल थी। मुझे रात भर नींद नहीं आई थी। बाहर-भीतर से जल रही थी। एक-दो बार विचार आया कि रात में चलूँ तुम्हारे बिस्तर पर और जी भर कर बात करूँ। पर संकोच ने मुझे जकड़ लिया। मर्यादा ने मेरे पैर बाँध दिए। मैंने सोचा.... तुमसे मेरा कुछ भी परिचय नहीं। कहीं जागरण हो गया तो! कहीं पराग ने ही तिरस्कार कर दिया तो! यह सोच-विचार मैं जलती रही जलन से। पर भोर उजलाते ही मुझसे नहीं रहा गया। अपने को संवार-सजा मैं जा टपकी थी तुम्हारे बिस्तर पर। मुझे देख तुम छुई-मुई से सकुचा गए थे। तुम्हें अपनी गौरव-गरिमा का ध्यान था। हम लोग कैसे भी रहें, कुछ भी कहें, पर संसार हमें हिकारत की नजर से देखता है। पवित्रता भी अपवित्रता समझी जाती है। तवाइफ, नृत्यांगना, गायिका, पतुरिया तथा रंडी आदि नामों से पुकारा जाता है हमें। कुछ लोग तो नाक-भौं चढ़ाते हैं हमारा नाम सुनते ही।
     सच मानो पराग कि मैं तुमसे इतनी प्रभावित थी, इतनी प्रभावित थी कि अपने आपको ही भुला बैठी थी।
रेखा चित्र : नरेश कुमार उदास 
अपने जीवन में मैंने तुम्हारे जैसा व्यक्ति नहीं देखा था। एक से एक योग्य व्यक्ति मैंने देखे, पर उन सभी का व्यक्तित्व तुम्हारे सामने नगण्य रहा, धूमिल। तभी मैंने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था तुम्हें। अपना लिया था मैंने तुमको मन ही मन। उस पल मैंने तुम्हारा सारा परिचय जाना था; परन्तु संकोच भरी शैली में। याद करो पराग, मैंने अपनी पवित्रता का सच भी तुम्हें बताया था। तुम मुस्करा रहे थे मन्द-मन्द। अपने साथियों-संगियों का तुम लिहाज कर रहे थे। सोच रहे थे शायद, किस मुसीबत में फँस गये। क्यों आ गई यह नर्तकी मेरे पास। सभी लोग देख रहे होंगे यह दृश्य। मेरा और इसका जोड़ ही क्या है? हम दोनों का समाज अलग-अलग है। दोनों के जीवन के उद्देश्य अलग-अलग हैं। तुम्हारे भीतर भले ही एक मधुर सिहरन उग रही हो, पर उसका रसपान तुम समाज के डर से कर नहीं पा रहे थे। तुम चाह कर भी मुझे नहीं चाह रहे थे। मेरा जीवन खुला हुआ था। मैंने मानव-समाज देखा था निकट से। मेरे में संकोच लेशमात्र भी नहीं था। मेरा समर्पण पूरा था। मैंने मन और हृदय से वरण कर लिया था तुम्हें। मैंने तुम्हें अपना बना लिया था। मेरे लिए तुम्हारे अन्तर में क्या भाव था? पता नहीं मुझे। पर इतना विश्वास था कि तुम मेरी कला से प्रसन्न थे शायद। मन में उभर रही गुदगुदी को तुम संकोचवश अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे।
     मैंने तुम्हारे विषय में सभी कुछ जान लिया था। पर तुमने मेरे विषय में एक भी प्रश्न नहीं किया मेरे से। हाँ, तुमको यह पता था कि यह गायिका, यह नर्तकी ठेके पर बदायूँ से बुलाई गयी है। इसका नाम है रामसनेही। इससे आगे तुमने कुछ भी जानने का प्रयास ही नहीं किया मेरे बारे में। तुमको आवश्यकता ही नहीं रही होगी ऐसी। पराग! शायद तुम नहीं जानते कि यह संसार सुन्दर कार्यों का एक घोंसला है। जिसमें जितनी क्षमता होती है, वह उतना ही यहाँ ठहरता है। तुम नहीं जानते पराग कि मलयज में कलिका का केसर क्यों उड़ता है, पावस ऋतु में एक अनजान पथिक सहसा घर की ओर क्यों मुड़ता है। मैंने तुम्हें जब से इन आँखों से देखा है, तब से मेरे मन के घन में नव सुर- धनु की रेखा चमक रही है। उसी पल से मैं अपने भीतर निर्धूम ज्वाला लिए जी रही हूँ। मैं विक्षिप्त हो गई हूँ। तुम्हारे आकर्षक व्यक्तित्व ने मेरे मन के सागर में एक कंकरी डाल दी थी, तभी से मेरे भीतर उठ रही हैं अनेक लहरें, जो अभी तक थमने का नाम नहीं ले रही हैं। अनेक प्रश्न हलचल मचा रहे थे मन में...।
     अकेले रहने पर बहुत सारे डर भीतर घर कर लेते हैं। तुमसे मिलने पर पहली बार सचमुच मुझे असीम हर्ष हुआ था। हम जहाँ बैठे थे, वहीं पीपल के पेड़ पर गौरैया ने उन दिनों घास-तिनका जोड़कर घोंसला बनाया था, नर और मादा दोनों ही टुकुर-टुकुर, नन्हीं-नन्हीं आँखों से हमें देख रहे थे कि कहीं हम उनका ठिकाना न बिगाड़ दें। जिनका कोई ठिकाना नहीं होता, वह दूसरों का ठिकाना क्यों बिगाड़ने लगे और मैं तो उस पल भी पतवारहीन एक नाव थी।
     पराग! क्या तुम जानते हो कि सूरज के ढलान पर गोरी-गोरी धूप जब अपने पंख समेट घर जाती है, तब बांसों के झुरमुट में नन्हीं चिड़ियाँ चीं-चीं, चूं-चूं क्यों गाती हैं? क्या तुम्हें अहसास नहीं कि मैंने अपने मन का सुघर झरोखा अब तक क्यों खुला रखा है? पराग! सच मानें मेरे प्राणों और मेरी सांसों में तुम्हारी गंध समायी हुई है। आभास हुआ मुझे, मेरी युगों की अभिलाषा पूरी होगी। तभी मैंने तुमसे आग्रह-अनुरोध किया और अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया था। तुम वचनबद्ध थे आने के लिए। तुम्हें याद है न! तुमने मधुर-मधुर मुस्कराते हुए धीरे-धीरे कहा था कि तुम आओगे अवश्य।
रेखा चित्र : नरेश कुमार उदास 
     पराग! मेरी डोरबेल दिन में कई बार बजती है। पर आज का दिन मेरे जीवन में कितना सुखद, कितना मधुर रहा, जब मेरी डोरबेल टन-टन कर बज उठी। तब मैंने ही खिड़की से नीचे झांककर देखा- एक पुरुष है। मुझे और मेरा घर तलाश रहा है। मैंने उसे जीना चढ़ आने को कहा। वह आया और तब मैंने उससे आने का मन्तव्य पूछा। उसने एक ही सांस में पन्द्रह वर्ष पहले की कहानी का संदर्भ उजागर कर दिया। उस कहानी के पात्र रामसनेही और पराग का नाम लिया। वह बोला बाबूजी पराग आए हैं मिलने तुमसे। यह सुन मेरी बांछें खिल गईं। लगा जैसे मैं गहरी नींद से जागी हूँ। मेरी सोच, मेरी कल्पना में बासंती बयार के हल्के-हल्के झोंके लगने लगे। पैरों में पंख उग आए। बुलाओ पराग को, मैंने उसे कहा और उसी के साथ-साथ मैं भी जीना उतर आई। उस समय मेरे दरवाजे के आस-पास तुम कहीं पर भी नहीं थे। हाँ! पराग की भीनी-भीनी गंध पवन-पंखों बैठ आ रही थी। मैं नीचे ही खड़ी रही थी। कभी इधर तो कभी उधर देखती थी आँखें फाड़-फाड़कर। कुछ पल बाद वह व्यक्ति आया। उसके पीछे-पीछे मेरे जाने-पहिचाने तुम आए। मेरा हृदय कुसुम खिल गया। आत्मा बेले के फूल सी महक उठी। हम दोनों अब घर के कमरे में थे।
     पराग! कहाँ रहे इतने दिनों तक तुम? तुम्हारी बाट जोहते-जोहते आँखें पथरा गई हैं मेरी। पन्द्रह वर्ष पहले की तुम्हारी अंगूरता अब किसी पेड़ की सूखी टहनी रह गई है। तब मेरे भीतर जीवन का ज्वालामुखी धधक रहा था, जिससे मुझे एक शक्ति मिलती थी जीने के लिए। तब मैं मीलों दूर रेत के कछारों की अन्तहीन यात्रा पर, गतिशील अपनी थकान उतारने के लिए किसी के हृदय का पड़ाव तलाश रही थी। वह पड़ाव मुझे मिला तुम्हारे हृदय में। मेरे तुम्हारे बीच के संवादों ने मुझे कुछ ढाँढ़स बंधाया। अपने बीच ढेर सारी रसभरी बातें हुई। अन्त में मेरा रस भरा निमंत्रण तुमने स्वीकारा, बदायूँ मेरे घर आने के लिए। पराग! तब से अब तक वर्ष बीतते-बीतते मेरी उम्र ढल गई है। तब तुम्हारा संग पा मैं इतनी मुग्ध थी कि अपने एकांत में भी बारम्बार तुम्हारी आहट महसूस करती रही। तुम्हारी याद के विवरण, उसकी सुखद छाया मन-मस्तिष्क पर सदैव ही रही। उस समय की वह सुखद स्थिति और पन्द्रह वर्ष के बीच की दम घोंटू दशा मेरे जीवन में तुम्हारे द्वारा ही उकेरी गई। पराग लोग मृत्यु की खाई से जिन्दगी की पहाड़ी पर पहुँचने के लिए संघर्ष करते रहते हैं, पर बिडम्बना कि मैं जिन्दगी की पहाड़ी से धीरे-धीरे स्वतः ही मृत्यु की खाई के पास आ गई हूँ। भयानक दुखों की गठरी उठाए, रेत के पुल पर चलते-चलते भी मैं आज तक जीवित रही हूँ, तो केवल तुम्हारे आने की आशा में। देख रहे हो तुम, तुम्हारी रामसनेही मौसमों की मार सहते-सहते ठूठ होकर रह गई है। पराग! धतूरे के पेड़ पर कभी गुलाब का फूल नहीं खिलता। तुम्हारी रामसनेही वह रामसनेही नहीं है आज। मैं अब चन्दन का पेड़ नहीं रही। चुक-सी गई है मेरी सुगन्ध। गुलाबी रसभरे अधर अब सूख कर काले हो गये हैं। उन पर अन्तहीन प्यास मिट सी गई है। तुम जानते हो कि मैं आज जीवन के धुयें की चारदीवारी में धुवां-धुवां होती जा रही हूँ। मुझे एक टुकड़ा आसमान चाहिए था जो मिलकर भी नहीं मिला। कितने बसंत बीत चुके पराग! तुम्हारी बाट जोहते-जोहते।
  • एम.एम.आई.जी./बी-23, रामगंगा विहार फेस-1, सोनकपुर स्टेडियम के उत्तर में, मुरादाबाद(उ.प्र.) 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें