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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

गतिविधियाँ

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फरवरी 2017



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वसंत राशिनकर स्मृति सम्मान समारोह श्री दासू वैद्य को 

इंदौर की प्रतिष्ठित संस्था आपले वाचनालय के संस्थापक वसंत राशिनकर की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले अ. भा. सम्मान समारोह का गरिमापूर्ण आयोजन कल आपले वाचनालय सभागृह में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार चंद्रसेन विराट एवम् मुख्य अतिथि मराठी साहित्य अकादमी के निदेशक अश्विन खरे ने कहा कि कवि, मूर्तिकार व समाजसेवी वसंत राशिनकर द्वारा समाज में रचनात्मकता के अभ्युदय के लिए स्थापित आपले वाचनालय वह संस्था है, जिसने सांस्कृतिक क्षेत्र में जो योगदान दिया है वह अतुलनीय एवं शब्दातीत है।
      सम्मान समारोह में महाराष्ट्र के चर्चित कवि दासू वैद्य को कविवर्य वसंत राशिनकर स्मृति अ.भा. सम्मान से सम्मानित किया गया। आपले वाचनालय और श्री सर्वाेत्तम के संयुक्त तत्वावधान में दिया जाने वाला वसंत काव्य साधना अ.भा. सम्मान जालना की रेखा बैजल, गोआ की सुनेत्रा कलंगुटकर, नांदेड की वसुंधरा सूत्रावे, भोपाल की अलका रिसबुड और इंदौर की जयश्री करजगी को दिया गया। तबला वादन व कविता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए मनीष खरगोणकर को अच्युत पोतदार प्रदत्त रामु भैया दाते स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।
      समारोह के उत्तरार्ध में दासू वैद्य की अध्यक्षता में प्रभावी मराठी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस काव्य यात्रा में अरुणा खरगोनकर, अर्चना शेवड़े, मनिष् खरगोनकर, सुषमा अवधूत, वैशाली पिंगले, वसुधा गाडगीळ, मेधा खीरे, चेतन फडनिस एवं राधिका इंगले ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को अभिभूत किया। दासू वैद्य और चंद्रसेन विराट ने अपनी रचनाओं से समां बांध दिया। कवि सम्मेलन का सुचारू संचालन आभा निवसरकर ने किया।
      अतिथियों का स्वागत अरविन्द डिके, किशोर पाटिल, प्रदीप मिश्र, शशिकांत ताम्बे एवं संदीप राशिनकर ने किया। कार्यक्रम का सुचारू संचालन श्रीति राशिनकर ने किया। विश्वनाथ शिरढोणकर ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में मराठी हिन्दी श्रोताओं की बड़ी उपस्थिति में सदाशिव कौतुक, राज केसरवानी, प्रभु त्रिवेदी, राजनिरमन शर्मा, देवेन्द्र रिणवा सहित अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। {समाचार सौजन्य : संदीप राशिनकर}


लखनऊ में नवगीत महोत्सव का भव्य आयोजन
  

    लखनऊ: 25 तथा 26 नवम्बर 2017 को अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा ओमैक्स सिटी (शहीद पथ) में स्थित गुलमुहर ग्रीन स्कूल के भव्य सभागार में नवगीत महोत्सव का सफल आयोजन किया गया। नवगीत को केन्द्र में रखकर आयोजित होने वाला यह उत्सव वैचारिक संपन्नता के साथ-साथ नवगीत को मीडिया एवं कला के विभिन्न उपादानों से जोड़ने के लिये जाना जाता है। नवगीत की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीतों के विकास में संलग्न अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित श्रंखला का यह छठा कार्यक्रम था। नवगीत समारोह का शुभारम्भ सर्वश्री योगेन्द्र दत्त
शर्मा, निर्मल शुक्ल, संजीव सलिल, रमेश गौतम, अशोक कुमार, जगदीश पंकज, प्रवीण सक्सैना एवं जगदीश व्योम के कर-कमलों से दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। आरती मिश्रा एवं श्वेता मिश्रा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना के उपरान्त ‘रंग-प्रसंग’ के अंतर्गत सर्वश्री बालगोपालन, डायना महापात्रा, दुर्गाप्रसाद बंदी, दिव्या पांडेय, गिरीश बहेरा, मेघांश थापा, मुकेश साह, राहुल जैन, विनय अंबर, योगेश प्रजापति, अशोक शर्मा, अमित कल्ला एवं विजेंद्र विज द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों के साथ विभिन्न नवगीतों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया।
     प्रथम सत्र में नवगीत की पाठशाला से जुड़े नये रचनाकारों द्वारा अपने दो-दो नवगीत प्रस्तुत किये गये। नवगीत पढ़ने के बाद प्रत्येक के नवगीत पर वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा टिप्पणियाँ की गयीं, इससे नये रचनाकारों को अपनी रचनाओं को समझने और उनमें यथोचित सुधार का अवसर मिलता है। कल्पना मनोरमा
जी के नवगीतों पर सर्वश्री संजीव वर्मा सलिल एवं रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ ने टिप्पणियाँ की, त्रिलोचन कौर के नवगीतों पर सर्वश्री योगेंद्रदत्त शर्मा एवं राम गरीब ‘विकल’ ने अपनी टिप्पणियाँ की, धीरज मिश्र के नवगीतों पर सर्वश्री निर्मल शुक्ल एवं जगदीश पंकज द्वारा एवं नीरज द्विवेदी की रचनाओं पर सर्वश्री वेदप्रकाश शर्मा वेद एवं रमेश गौतम द्वारा विचार रखे गये। इस मध्य कुछ अन्य प्रश्न भी नये रचनाकारों से श्रोताओं द्वारा पूछे गये, जिनका उत्तर वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा दिया गया। प्रथम सत्र के अन्त में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से डॉ. अशोक कुमार ने गीत और नवगीत में अन्तर स्पष्ट करते हुए बताया कि नवगीत हिन्दी साहित्य की अविभाज्य विधा है और इस पर विश्वविद्यालों में व्यापक शोधकार्य हो रहा है। उन्होंने नवगीत के विकास में आने वाली बाधाओं, बाजारवाद, सरकारी उपेक्षाओं की बात करते हुए प्रकाशकों से सहयोग का अनुरोध भी किया।
      दूसरे सत्र में वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया गया, ताकि नये रचनाकार
नवगीतों के कथ्य, लय, प्रवाह, छन्द आदि को समझ सकें। नवगीत पाठ के बाद सभी को प्रश्न पूछने की पूरी छूट दी गई जिसका लाभ नवगीतकारों ने उठाया। इस सत्र में सर्वश्री निर्मल शुक्ल (लखनऊ, उ.प्र.), योगेन्द्र दत्त शर्मा (गाजियाबाद, उ.प्र.), डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा यायावर (फिरोजाबाद, उ.प्र.), शीलेन्द्र सिंह चौहान (लखनऊ, उ.प्र.), वेदप्रकाश शर्मा ‘वेद’ (गाजियाबाद, उ.प्र.), संजीव वर्मा ‘सलिल’ (मंडला, म.प्र.), मायामृग (जयपुर, राजस्थान), राजा अवस्थी (कटनी, म. प्र.), जगदीश पंकज (गाजियाबाद, उ.प्र.), रमेश गौतम (बरेली, उ.प्र.), संजय शुक्ल (गाजियाबाद, उ.प्र.), शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ (मेरठ, उ.प्र.) और राम गरीब ‘विकल’ (सीधी, म.प्र.) ने अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया। कार्यक्रम की समापन वेला में डॉ. विनोद निगम (होशंगाबाद, म.प्र.) एवं डॉ. धनञ्जय सिंह (गाजियाबाद, उ.प्र.) ने काव्य-रसिकों के आग्रह पर एक-एक नवगीत सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया।
     तीसरा सत्र नवगीतों पर आधारित संगीत संध्या का था, जिसमें लखनऊ से सम्राट राजकुमार के निर्देशन में विभिन्न कलाकारों ने नवगीतों की संगीतमयी प्रस्तुति की। तारादत्त निर्विरोध के नवगीत धूप की चिरैया को स्वर दिया आरती मिश्रा ने, कृष्णानंद कृष्ण के गीत पिछवारे पोखर में को स्वर दिया पल्लवी मिश्रा ने, माहेश्वर तिवारी के गीत मूँगिया हथेली को समवेत स्वरों में प्रस्तुत करने वाले कलाकार रहे- आरती मिश्रा, पल्लवी मिश्रा, चंद्रकांता चौधरी, सुजैन और श्वेता मिश्रा। पूर्णिमा वर्मन के गीत सॉस पनीर को स्वर दिया निहाल सिंह ने तथा विनोद श्रीवास्तव के गीत छाया में बैठ एवं माधव कौशिक के गीत चलो उजाला ढूँढें को स्वर दिया अभिनव मिश्र ने। तालवाद्य पर विशाल मिश्रा, की-बोर्ड पर स्वयं सम्राट राजकुमार और गिटार पर विनीत सिंह ने संगत की।
     कार्यक्रम का विशेष आकर्षण डॉ. रुचि खरे (भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय, लखनऊ, उ.प्र.) द्वारा ‘कत्थक नृत्य’ रहा, जिसके अंत में उन्होंन संध्या सिंह के नवगीत हाथ में पतवार होगी तथा पूर्णिमा वर्मन के नवगीत फूल बेला पर प्रस्तुति दी। नवगीत पर आधारित कत्थक का यह प्रयोग बहुत लोकप्रिय रहा। कार्यक्रम के अंत में भातखंडे विश्वविद्यालय की भूतपूर्व उपकुलपति एवं कत्थक विशेषज्ञ डॉ. पूर्णिमा पांडे द्वारा नवगीतकार पूर्णिमा वर्मन के नवगीत मंदिर दियना बार पर नृत्य प्रस्तुत कर सबको आह्लादित कर दिया। नृत्य के साथ तबले पर राजीव शुक्ला, सारंगी पर पं. विनोद मिश्र एवं हारमोनियम पर मोहम्मद इलियाज खाँ ने संगत की। संगीत मोहम्मद इलियाज खाँ का था जिसे स्वर से सजाया था स्वयं मोहम्मद इलियाज खाँ के साथ निकी राय ने।
      दूसरे दिन का पहला और कार्यक्रम का चौथा सत्र अकादमिक शोधपत्रों के वाचन का था। पहला शोधपत्र- ‘नवगीतों में ग्रामीण परिवेश की खोज’ पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में शोधार्थी श्री अनिल कुमार पांडेय ने पढ़ा। दूसरा, भावना तिवारी जी द्वारा ‘नवगीतों में महिला रचनाकारों का योगदान’ पर प्रस्तुत किया गया। दोनों आलेख सरस, रोचक और ज्ञानवर्धक रहे। तीसरा शोध पत्र श्री वेदप्रकाश शर्मा ‘वेद’ द्वारा प्रस्तुत किया गया। शीर्षक था- ‘नवगीत का सौंदर्य औदात्य’। यह शोधपत्र श्री देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित था। अन्त में सीधी जनपद से पधारे श्री राम गरीब ‘विकल’ ने ‘लोक चेतना के संवाहक नवगीत’ पर उम्दा व्याख्यान प्रस्तुत किया।
      पाँचवा सत्र 2016 एवं 2017 में प्रकाशित नवगीत संग्रहों की समीक्षा पर केन्द्रित रहा। इस सत्र का उद्देश्य विगत वर्ष में प्रकाशित नवगीत संग्रहों-संकलनों का लेखा-जोखा करना तथा उपस्थित श्रोताओं में उनका परिचय प्रस्तुत करना होता है। साथ ही इसमें नवगीत संग्रहों का लोकार्पण भी होता है। इस सत्र में श्री निर्मल शुक्ल द्वारा 2016 में प्रकाशित नवगीत संग्रहों पर विहंगम दृष्टि डाली गयी, जबकि श्री संजय शुक्ल ने दो दर्जन से अधिक नवगीत संग्रहों का उल्लेख किया, जिनका प्रकाशन 2017 में हुआ था। इसके साथ ही मालिनी गौतम जी के नवगीत संग्रह ‘चिल्लर सरीखे दिन’ पर श्री अनिल कुमार पांडेय ने समीक्षा प्रस्तुत की और संध्या सिंह जी के नवगीत संग्रह ‘मौन की झंकार’ पर लखनऊ से ही डॉ. अनिल कुमार मिश्र ने सारगर्भित टिप्पणी की। शुभम श्रीवास्तव ओम के नवगीत संग्रह ‘फिर उठेगा शोर एक दिन’ पर आचार्य संजीव सलिल ने अपने विचार प्रस्तुत किया। इस सत्र में बी एल राही जी के गीत संग्रह ‘तड़पन’ का भव्य लोकार्पण किया गया। सत्र के बाद सभी का सामूहिक चित्र लिया गया।
      छठे सत्र में दो नवगीतकारों को अभिव्यक्ति विश्वम् के नवांकुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जाता है, जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। पुरस्कार में 11000/- भारतीय रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान किये जाते हैं। आयोजन में 2016 का नवांकुर पुरस्कार संध्या सिंह जी को उनकी कृति- ‘मौन की झंकार’ तथा 2017 का नवांकुर पुरस्कार शुभम श्रीवास्तव जी को उनके संग्रह- ‘फिर उठेगा शोर एक दिन’ पर प्रदान किया गया। दोनों पुरस्कार उपस्थित अतिथियों, नवगीतकारों एवं नवगीत समीक्षकों की उपस्थिति में प्रदान किये गए।
      पुरस्कार वितरण के बाद काव्य सत्र के विशिष्ट अतिथि श्री श्याम श्रीवास्तव ‘श्याम’ एवं कत्थक गुरू डॉ. पूर्णिमा पांडे रहे। श्रीवास्तव जी के नवगीत ने सभी उपस्थित रचनाकारों को आनंदित किया। इसके बाद सभी उपस्थित रचनाकारों ने अपने एक-एक नवगीत का पाठ किया। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख रचनाकार थे- लखनऊ से अनंतप्रकाश तिवारी, संध्या सिंह, आभा खरे, सीमा मधुरिमा, राजेन्द्र वर्मा, डॉ प्रदीप शुक्ल, रंजना गुप्ता, शीला पाण्डेय, राजेन्द्र शुक्ल राज, रामशंकर वर्मा, मीरजापुर से शुभम श्रीवास्तव ओम और आज़ाद आलम, नॉयडा से डॉ. जगदीश व्योम और भावना तिवारी, दिल्ली से विजेंद्र विज, मुरादाबाद से अवनीश सिंह चौहान, गाजियाबाद से योगेन्द्रदत्त शर्मा, वेदप्रकाश शर्मा वेद, जगदीश पंकज एवं संजय शुक्ल और कटनी से राजा अवस्थी, बरेली से रमेश गौतम, मेरठ से शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’, जबलपुर से संजीव वर्मा सलिल, सीधी से रामगरीब विकल, फीरोजाबाद से डॉ. राम सनेहीलाल शर्मा यायावर, शारजाह से पूर्णिमा वर्मन, होशंगाबाद से डॉ. विनोद निगम, प्रतापगढ़ से रविशंकर मिश्र, जयपुर से अमित कल्ला आदि के साथ डॉ. एस. एन. सिंह, डॉ. संदीप शुक्ला, श्वेता आदि की भी उपस्थिति रही। सभी सत्रों का शानदार संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया। अन्त में पूर्णिमा वर्मन तथा प्रवीण सक्सेना ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। {समाचार प्रस्तुति : अबनीश सिंह चौहान, अंग्रेजी विभाग, एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, दिल्ली}



अपनी भूमि तलाशने की जरूरत लघुकथाकारों को आज भी : प्रो. आच्छा


      ‘जीवन से साक्षात्कार करने के लिए अपनी भूमि तलाशने की जरूरत लघुकथाकारों को आज भी है। लघुकथा रचने के लिए लोक संपृक्ति आवश्यक है। यह ध्यान रखना चाहिए कि रचना में संप्रेषणीयता के नवोन्मेष हो, अनुभूति विषय में पड़ताल की आकांक्षा हो और अपने भीतर का आलोचक हमेशा जिंदा, संजीदा हो।’’ लघुकथाकारों को उक्त विमर्श उज्जैन की सुप्रसिद्ध संस्था सरल काव्यांजलि के तत्वावधान में आयोजित लघुकथा संगोष्ठी में चेन्नई से पधारे ख्यात समीक्षक-सम्पादक प्रो. बी.एल. आच्छा ने दिया। इस अवसर पर लघुकथा की रचना प्रक्रिया तथा विधान पर ख्यात लघुकथाकार, संपादक श्री सतीश राठी (इंदौर) ने विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि लघुकथा में संप्रेषणीयता होना चाहिए, पाठक की अंतरात्मा को छूने वाली रचना ही सफल लघुकथा है। हम जितना ज्यादा पढ़ेंगे, रचना उतनी ही परिष्कृत होगी। एक लघुकथाकार खोजपूर्ण निगाह रखे, कलात्मकता को महत्व दे एवं भाषा का गठन पात्रानुरूप करे तो रचना कालजयी हो सकती है। इस अवसर पर श्री सतीश राठी के सम्पादन में प्रकाशित ‘क्षितिज’ (समकालीन लघुकथा लेखन का आठवाँ संकलन) का विमोचन हुआ साथ ही लघुकथा क्षेत्र में अविस्मरणीय अवदान के लिए प्रो. बी.एल. आच्छा तथा श्री सतीश राठी का संस्था द्वारा शॉल, स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मान भी किया गया। इसी दौरान शहर के लघुकथाकारों सर्वश्री संतोष सुपेकर, डॉ. प्रभाकर शर्मा, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’, रमेशचन्द्र शर्मा, राधेश्याम पाठक ‘उत्तम’, डॉ. पुष्पा चौरसिया, कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’ तथा श्रीमती आशा गंगा द्वारा अपनी प्रतिनिधि लघुकथाओं का पाठ भी किया गया। माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के पश्चात अतिथि स्वागत श्री एम.जी. सुपेकर तथा मिथिलेश मनावत ने किया। संचालन संतोष सुपेकर ने तथा अंत में आभार प्रदर्शन संस्था सचिव डॉ. संजय नागर ने किया। {समाचार सौजन्य : संतोष सुपेकर}


संदीप राशिनकर वाराणसी में सम्मानित







इंदौर निवासी सुप्रसिद्ध चित्रकार एवं साहित्यकार संदीप राशिनकर को वाराणसी की प्रतिष्ठित संस्था साहित्यिक संघ ने अपने छब्बीसवें वार्षिक अधिवेशन में अपने विशिष्ट सेवक साहित्यश्री सम्मान से सम्मानित किया। अग्रसेन कालेज सभागृह में आयोजित गरिमामयी कार्यक्रम में प्रसिद्ध गीतकार डॉ. माहेश्वर तिवारी की अध्यक्षता एवं हृदयश मयंक के आतिथ्य में डॉ. रामावतार पांडे ने राशिनकर को उनकी अभिनव व निरंतर रचनात्मकता के लिए सम्मानित किया। इस प्रसंग पर सर्वश्री पं. हरिराम द्विवेदी, नरेन्द्रनाथ मिश्र, पद्माकर चौबे, अनिल जैन, धर्मेन्द्र गुप्त साहिल तथा सिद्धेश्वर सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का सुचारू संचालन डॉ.जितेंद्र नाथ मिश्र ने किया। वासुदेव उबेरॉय ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। {समाचार सौजन्य : संदीप राशिनकर}


आकांक्षा यादव ‘मानसश्री’ सम्मान से सम्मानित 




      हिंदी साहित्य और लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए युवा साहित्यकार व ब्लॉगर सुश्री आकांक्षा यादव को मौन तीर्थ सेवार्थ फाउण्डेशन, उज्जैन द्वारा ‘मानसश्री सम्मान-2017’ से सम्मानित किया गया। उन्हें सम्मानस्वरुप स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, शाल और पाँच हजार एक सौ रूपये की राशि दी गई। सामाजिक और साहित्यिक विषयों के साथ-साथ नारी-सशक्तिकरण पर प्रभावी लेखन करने वाली आकांक्षा यादव की तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के साथ वे ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपनी रचनाधर्मिता को प्रस्फुटित करते हुये व्यापक पहचान बना चुकी हैं। भारत के अलावा जर्मनी, श्रीलंका और नेपाल इत्यादि देशों में भी सम्मानित हो चुकी हैं। आकांक्षा यादव राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव की पत्नी हैं, जो कि स्वयं चर्चित साहित्यकार और ब्लॉगर हैं।  
      इससे पूर्व भी उत्कृष्ट साहित्य लेखन हेतु आकांक्षा यादव को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पचास से अधिक सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है। इनमें उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा ’’अवध सम्मान’’, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डॉ. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर दम्पति’’ सम्मान, अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मेलन, काठमांडू में ’’परिकल्पना ब्लाग विभूषण’’ सम्मान, अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका में ’’परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान’’, ‘‘एस.एम.एस.‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, निराला स्मृति संस्थान, रायबरेली द्वारा ‘‘मनोहरा देवी सम्मान‘‘, साहित्य भूषण सम्मान, भाषा भारती रत्न, राष्ट्रीय भाषा रत्न सम्मान, साहित्य गौरव इत्यादि शामिल हैं। {समाचार प्रस्तुति : सुदर्शन सामरिया, संयोजक- शब्द साहित्य, जोधपुर (राजस्थान)}




’राजकुमार जैन राजन फाउण्डेशन’ का बाल साहित्य सम्मान समारोह



     ’बाल साहित्य का सृजन समय की आवश्यकता और भावी पीढ़ी के भविष्य को संवारने वाला होना चाहिए। खास बात यह है कि जिनके लिए साहित्य लिखा जा रहा है उन तक यह साहित्य पहुँचना बहुत जरुरी है। बाल साहित्य को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह कोई बचकाना सृजन नहीं है, बल्कि साहित्य के साथ भावी पीढ़ी में संस्कारों व ज्ञान का बीजारोपण है। मौजूदा समय में बाल साहित्यकारों के लिए और भी परीक्षा की घड़ी है।’ यह विचार बाल साहित्य की प्रमुख पत्रिका ’देवपुत्र’ के प्रबंध सम्पादक एवं ख्यातनाम साहित्यकार डॉ. विकास दवे ने कही। ’राजकुमार जैन राजन फाउण्डेषन’ (आकोला) द्वारा 26 नवंबर 2017, रविवार को चित्तौडगढ़ की ’ऋतुराज वाटिका’ में आयोजित 12-13 वें ’राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान समारोह’ में बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधन में डॉ. दवे ने कहा, ’आज बच्चों में साहित्य पढ़ने की परम्परा कम हो रही है जो चिंता का विषय है। आज बच्चों पर प्रतिस्पर्धा के युग में बढ़ते बोझ से जिस उम्र में बच्चों के दाँत टूटते थे उस उम्र में उनके दिल टूट रहे है। हमें साहित्य सृजन में नई पीढ़ी को क्या देना चाहिए। यह सोचना बहुत जरुरी
है। साहित्य में व्यवसायिक वृत्ति से ऊपर उठने की जरुरत है।’
      समारोह अध्यक्ष सांसद सी.पी. जोशी ने देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों का वीरता की धरा पर स्वागत करते हुए कहा कि, ’अभी चित्तौड़ दुनिया में छाया हुआ है। सिर्फ शोहरत एवं पैसे के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश नहीं करना चाहिए। पूरी दुनिया हमारी भारतीय संस्कृति की ओर भाग रही है और हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर जा रहे हैं जो चिंता का विषय है।’
उन्होंने कहा कि ’बदलाव की शक्ति साहित्यकार में होती है और अपनी इस शक्ति से बदलाव लाने की जिम्मेदारी बखुबी निभाएं।’
सत्र को बतौर विशिष्ट अतिथि सम्बोधित करते हुए चित्तौडगढ़ के इतिहास अध्येता साहित्यकार डॉ. ए.एल.जैन ने कहा कि, ’साहित्यकार राजकुमार जैन राजन ने पूरे देश में बाल साहित्य की लौ जला रखी है। बाल साहित्य की पुस्तकें निःशुल्क देश के कई राज्यों के विद्यालयों संस्थाओं में भेंट कर पठन-पाठन परम्परा को सम्बल देकर सराहनीय कार्य कर रहे हैं। आज बच्चों तक अपनी बात कैसे पहुँचाएं यह सोचना होगा।’
      विशिष्ट अतिथि साहित्यकार गोविन्द शर्मा, संगरिया ने कहा कि, ’राष्ट्रीय शब्द बाल साहित्य के साथ ही लगाना उपयुक्त है। हमें समय के साथ बाल साहित्य का नये शिल्प और संदर्भों में सृजन करना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि, ’आप किसी भी विधा में साहित्य सृजन करें, लेकिन इसमें बाल साहित्य जरुर हो। बालक पाठक होगा तो वह बड़ा होकर भी पाठक बना रहेगा।’ कोटा से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक, समीक्षक जितेन्द्र निर्मोही ने कहा कि, ’बाल साहित्य बच्चों को संस्कारित करता है। बच्चों के संर्वांगिण विकास के लिए उन्हें बाल साहित्य पढ़ने को अवश्य देना चाहिए।’
      समीक्षक, चिंतक, डॉ. कनक जैन ने कहा कि ’देश में 40 प्रतिशत आबादी बच्चों की है और इसमें से करीब 73 प्रतिशत बच्चे गाँवों में निवास करते हैं। इसलिए परिवेष व परिस्थिति को समझकर ही साहित्य सृजन करना चाहिए। आज बच्चों पर बस्ते का बोझ, आठ घण्टे पढ़ाई, होमवर्क और फिर ट्यूशन आदि का चक्कर है। साथ ही हमारी उम्मीदों का भी उन पर बोझा है। हमारा लक्ष्य, हमारे सपने उनकी आँखों में हैं। साइबर दुनिया भी बच्चों को निष्क्रिय बना रही है।’
      कार्यक्रम संयोजक राजकुमार जैन राजन ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कहा कि, ’बाल साहित्यकार ’देवदूत’ हैं जो अपने सृजन के माध्यम से बालकों में हिन्दी भाषा में अनुराग बढ़ाने के साथ ही उन्हें संस्कारों से पल्लवित करते हैं। उनकी कल्पनाओं को उड़ान देते हैं इसलिए पठन-पाठन की परम्परा को एक आंदोलन के रुप में पुनर्जिवित किया जाना चाहिए।’ अपनी बाल साहित्य संवर्द्धन योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए राजन ने कहा कि ’आज साइबर युग में बच्चों का बचपन, संस्कार छिनते जा रहे हैं। ऐसे में लोग बाल साहित्य की महत्ता को समझे, यह भी इस समारोह का हिस्सा है। आने वाली पीढ़ी को हम क्या दे रहे हैं, साहित्य सृजन बच्चों के कितना काम आ रहा है, यह महत्वपूर्ण है।’ ’साहित्य समीर दस्तक’ भोपाल एवं ’राष्ट्र समर्पण’ नीमच की सहभागिता से भी यह साहित्य त्रिवेणी कार्यक्रम हो गया है। इसके लिए उन्होंने कीर्ति श्रीवास्तव एवं संजय शर्मा का आभार व्यक्त किया।
      समारोह का षुभारम्भ अतिथियों द्वारा माँ शारदा की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पांजलि के साथ हुआ। सरस्वती वंदना नन्द किशोर निर्झर एवं स्वागत गीत डॉ. शकुंतला सरुपरिया ने प्रस्तुत किया। इससे पूर्व अतिथियों का मेवाड़ी परम्परानुसार स्वागत किया गया। सभी अतिथियों को तिलक लगाकर पुष्प भेंट किए गए।
      इस प्रथम सत्र में बाल प्रतिभा ऋभवन जोशी (आकोला) द्वारा शिव आराधना स्त्रोत की प्रस्तुति के बाद बाल साहित्य संवर्द्धन योजना के तहत प्रकाशित पवन पहाड़िया की ’समझो मम्मा’, ’ऐसी जोत जगाएं’, प्रहलादसिंह झोरड़ा ’चांद खिलौना’, ईंजी. आशा शर्मा की ’अंकल प्याज’ महावीर रंवाल्टा की ’अनोखा जन्मदिन’ एवं अब्दुल समद राही की ’चुनमुन-चुनमुन’ बाल साहित्य की पुस्तकों का लोकार्पण मंचस्थ अतिथियों द्वारा किया गया। इस दौरान डॉ. शील कौशिक, सावित्री चौधरी, खेलन प्रसाद कैवर्त, नीता अगवाल, गुलाबचन्द पटेल आदि की पुस्तकें भी लोकर्पित की गईं। सलूम्बर की बाल प्रतिभा जयेश खटीक व अभिशेक मेहता ने ख्यातनाम रचनाकारों की कविताओं का पाठ किया। राजकुमार जैन राजन ने नागौर के पवन पहाड़िया को 5500 रुपये व सतारा महाराष्ट्र के मछिन्द्र बापू भिसे को 4000 रुपये मूल्य की बाल साहित्य की पुस्तकें निःशुल्क भेंट की।
जिन किताबों को पढ़कर बच्चे खुश होते हैं, जिन्हें पढ़कर वे ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन्हीं किताबों के बाल साहित्य रचनाकारों, बाल कल्याण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों का सम्मान मंचस्थ अतिथियों द्वारा किया गया। ’डॉ. राष्ट्रबन्धु स्मृति सम्मान’ से सलूम्बर की डॉ. विमला भण्डारी एवं अल्मोड़ा के श्री उदय किरौला को,  ’डॉ. श्रीप्रसाद स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ से शाहजहांपुर के डॉ. नागेश पाण्डेय ’संजय’ (अनुपस्थित) एवं डॉ. चन्द्र सिंह बीरकाली राजस्थानी बाल साहित्य सम्मान’ से जयपुर की श्रीमती सावित्री चौधरी को सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरुप प्रत्येक को पाँच हजार एक सौ रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, अंग वस्त्र, बाल साहित्य प्रदान किये गये।
      इसी क्रम में ’डॉ. बालशौरी रेड्डी स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ रतनगढ़ के श्री ओम प्रकाश क्षत्रिय एवं पौढ़ी गढ़वाल उत्तरांचल के श्री मनोहर चमोली ’मनु’ (अनुपस्थित) को, ’श्री अंबालाल हींगड़ स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ जोधपुर के डॉ. डी.डी. ओझा एवं गांधी नगर, गुजरात के श्री गुलाबचंद पटेल को, ’श्रीमती इंदिरा देवी हींगड़ स्मृति बाल साहित्य सम्मान’  पटियाला की श्रीमती सुकीर्ति भटनागर एवं इन्दौर के श्री प्रदीप मिश्र को, ’शांति लाल हिंगड़ स्मृति राजस्थानी बाल साहित्य सम्मान’ भोपाल के श्री घनश्याम मैथिल ’अमृत’ एवं रायपुर के डॉ सत्यनारायण सत्य (राजस्थानी) को, ’श्री जगदीश दुग्गड़ स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ गुडगाँव (हरियाणा) के श्री हरीश कुमार ’अमित’ एवं बरेली के श्री अरविन्द कुमार साहू (अनुपस्थित) को, ’श्री फतेहलाल चण्डालिया स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ झालावाड़ (राज.) के श्री शिवचरण सेन ’शिवा’ (अनुपस्थित) एवं सोजत (राज.) के श्री अब्दुल समद राही (अनुपस्थित) को, ’चौधरी श्री मंगतराम कुलहरी स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ पटना (बिहार) के श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी एवं दौसा (राज.) के श्री अंजीव अंजुम को, ’श्रीमती बरजी देवी दूणा स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ जोधपुर की डॉ.जेबा रशीद एवं नैनीताल उत्तराखण्ड की श्रीमती विमला जोशी को एवं ’चौधरी खूमसिंह कड़वासरा स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ मथुरा (उ. प्र.) के श्री संतोष कुमार सिंह को सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरुप प्रत्येक को दो हजार एक सौ रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, अंग वस्त्र एवं बाल साहित्य प्रदान किया गया। अतिथियों एवं विशिष्ट प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर अभिनंदित किया गया।
      नीमच से प्रकाषित ’राष्ट्र समर्पण’ द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित ’राष्ट्र समर्पण बाल कहानी प्रतियोगिता’ में प्रथम गंजबासौदा की श्रीमती पद्मा चोंगावकर, द्वितीय गुडगांव के श्री हरीश कुमार अमित एवं उत्तरकाशी (उत्तराखंड) के श्री महाबीर रवांल्टा, तृतीय रहीं जयपुर की श्रीमती रेणु चंद्रा माथुर को नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, अंग वस्त्र व बाल साहित्य प्रदान किया गया। इस अवसर पर गोविन्द भारद्वाज (अजमेर) व सुनील गज्जानी (बीकानेर) को भी इनकी श्रेष्ठ कहानी के लिए सम्मानित किया गया। इस अभियान में संपूर्ण देश से 386 बाल कहानियाँ प्राप्त हुईं थीं। धन्यवाद एवं आभार ज्ञापन महेश मेनारिया ’कृष्ण मिलन’ व संजय शर्मा ने किया।
      भोजनोपरांत भोपाल से प्रकाशित ’साहित्य समीर दस्तक’ के सौजन्य एवं ’राजकुमार जैन राजन फाउण्डेषन’ के संयोजन में द्वितीय सत्र का शुभारंभ हुआ जिसमें सुविख्यात हिन्दी राजस्थानी साहित्यकार डॉ. जय प्रकाश पाण्डया ’ज्योतिपुंज’ मुख्य अतिथि, पूर्व विधायक व डेयरी चेयरमेन बद्रीलाल जाट अध्यक्ष एवं विशिष्ट अतिथि के रुप में वरिष्ठ साहित्यकार, इतिहासकार डॉ. विमला भण्डारी, सुखाडिया विश्वविद्यालय उदयपुर के पत्रकारिता व जनसंचार विभागााध्यक्ष डॉ. कुंजन आचार्य व भारतीय जीवन बीमा निगम के विकास अधिकारी श्री ओम प्रकाश आमेरिया, युवा चिराग आर. जैन उपस्थित रहे।
      इस अवसर पर डॉ. ज्योतिपुंज जी ने कहा कि, ’बच्चों में हमारा भविष्य है वे कल की उम्मीद बंधाते हैं। राजकुमार जैन राजन फाउण्डेशन के साथ मिलकर कीर्ति श्रीवास्तव रचनाकारों को सम्मान व प्रोत्साहन देने का जो कार्य कर रहीं हैं वह स्तुत्य है।’ अध्यक्षता करते हुए बद्रीलाल जाट जी ने जोरदार शब्दों में ऐसे साहित्यिक आयोजनों की सार्थकता प्रतिपादित करते हुए उपादेयता सिद्ध की। डॉ. कुंजन आर्चाय ने कहा कि, ’आज साइबर दुनिया के कारण भाषा व संस्कार खतरे में पड़ गए हैं। संवेदनशीलता तथा भावनात्मकता समाप्त हो रही है। ऐसे में सद्साहित्य ही रोशनी की किरण है। हमें उपहार में पुस्तकें देने की संस्कृति को बढ़ाना चाहिए।’ डॉ. विमला भण्डारी ने बाल साहित्य उन्नयन व बाल कल्याण के क्षेत्र में मेवाड़ में किए जा रहे कार्यों को बताया। उन्होंने कहा कि ’इस क्षेत्र में जो कार्य मेवाड़ की वीर प्रस्तुता भूमि से हो रहा है ऐसा देश में कहीं भी नहीं होता है। जब हम जड़ में पानी सींचेंगे यानी बालकों को पुस्तकों से जोड़ेंगे तभी हमारी आने वाली पीढ़ी संस्कारों से पल्लवित होगी।’
      इसी सत्र में ’साहित्य समीर दस्तक’ की संपादक एवं साहित्यकार कीर्ति श्रीवास्तव ने कहा कि, ’साहित्य समीर दस्तक’ के माध्यम से हिन्दी के नये प्रतिभावान रचनाकारों को प्रोत्साहन देने के भाव से यह सम्मान समारोह आयोजित किया है और ’शब्दों के इन्द्रधनुश’ साझा प्रकाशन की योजना बनी। इस आयोजन के पीछे हमारी भावना यही रही है कि हिन्दी भाषा व हिन्दी में सृजन के प्रति अनुराग बढ़े और भाषा का विकास हो।’ उन्होंने कहा कि ’हम राजकुमार जैन राजन जी के आभारी हैं जिन्होंने अपने भव्य आयोजन में हमें सहभागिता करने का अवसर प्रदान किया। भविष्य में भी ऐसे आयोजन होते रहेंगे ऐसा हमारा प्रयास रहेगा।’ इससे पूर्व मंचस्थ अतिथियों ने राजकुमार जैन राजन व कीर्ति श्रीवास्तव के संपादन में प्रकाशित उत्कृष्ट साझा काव्य संकलन ’शब्दों के इन्द्रधनुष’ का लोकार्पण किया। राष्ट्रीय कवि अब्ुदल जब्बार, डॉ. शकुंतला सरुपरिया, प्रमोद सनाढ््य, राजेश राज एवं बंशी लाल लड्डा ने अपनी काव्य रचनाओं के पाठ से श्रोताओं को आहलादित कर दिया।
      इस अवसर पर डॉ. शील कौशिक, सिरसा हरियाणा, श्री सत्यनारायण सत्य ’मधुप’, भीलवाड़ा , श्री राजेश पुरोहित, भवानीमण्डी, श्री जितेन्द्र निर्मोही, कोटा, श्री खेलन प्रसाद कैवर्त, रायगढ़, श्रीमती साधना श्रीवास्तव
एवं श्रीमती कांता राय भोपाल को ’राष्ट्रीय गौरव सम्मान’ से, श्री प्रमोद सनाढ््य, नाथद्वारा, श्रीमती आशा भाटिया, नीमच, श्री पवन पहाडिया, नागौर, श्रीमती सारिका कालरा, दिल्ली, श्री प्रहलाद सोनी, भीलवाड़ा, श्री गुलाब  पटेल, गाँधीनगर, सुश्री अनुजा बेगम, असम, श्री सुरजीत सिंह, हाथरस, श्री राजीब नसीब, अजमेर, श्री सूर्य नारायण गुप्त ’सूर्य’ देवरिया, श्रीमती रेणु खत्री, अलवर, श्रीमती नीता अग्रवाल, हुनुमानगढ़, श्रीमती पदमा पंचोली, देवास एवं सुश्री सुनीता शर्मा, गुडगाँव को ’साहित्य गौरव सम्मान’ से मंचस्थ अतिथियों द्वारा सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरुप प्रत्येक को प्रशस्ति पत्र, अंग वस्त्र एवं ’शब्दों के इन्द्रधनुष’ की प्रति भेंट की।
दोनों सत्रों का कुशल संचालन ख्यातनाम कवयित्री डॉ. शकुंतला सरूपरिया, उदयपुर ने किया। इससे पूर्व अतिथियों एवं विशिष्ट प्रतिभागियों को आयोजक मंडल की ओर से स्मृति चिन्ह प्रदान किये गए। इस आयोजन में देश भर के लगभग 160 शब्द शिल्पियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के अंत में मंचस्थ अतिथियों सहित समस्त प्रतिभागियों ने खडे होकर ’राष्ट्रगान’ प्रस्तुत किया। राजकुमार जैन राजन, कीर्ति श्रीवास्तव एवं संजय शर्मा ने ’फिर मिलेंगे’ के आगाज के साथ कार्यक्रम समापन की घोषणा की। {समाचार प्रस्तुति : महेश मेनारिया/राजकुमार जैन ‘राजन’}



‘सृजन साहित्य सम्मान’ कृष्ण कुमार यादव को 





      साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान, समर्पण भाव एवं निरंतर साधना द्वारा समाज को अविरल योगदान देने हेतु चर्चित ब्लॉगर और साहित्यकार एवं सम्प्रति राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव को 3 दिसंबर को सृजन सेवा संस्थान, श्री गंगानगर, राजस्थान द्वारा ‘सृजन साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उन्हें शाल ओढ़ाकर तथा सम्मान पत्र एवं साहित्य भेंट करके सम्मानित किया गया।
      संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार ‘आशु’ ने कहा कि प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ साहित्य सृजन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में श्री कृष्ण कुमार यादव का योगदान महत्वपूर्ण है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशित होने के साथ-साथ, अब तक आपकी 7 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। देश-दुनिया में शताधिक सम्मानों से विभूषित श्री यादव एक लंबे समय से ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से भी हिंदी साहित्य एवं विविध विधाओं में अपनी रचनाधर्मिता को प्रस्फुटित करते हुये अपनी व्यापक पहचान बना चुके हैं।
      इस अवसर पर ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में श्री यादव ने अपनी सृजन यात्रा की चर्चा करते हुए विभिन्न विधाओं में रचना पाठ भी किया। श्री यादव ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच साहित्य ऑक्सीजन का कार्य करता है। साहित्य न सिर्फ लोगों को संवेदनशील बनाता है बल्कि यह जन सरोकारों से जुड़ने का प्रबल माध्यम भी है। क्लिष्ट भाषा और रूपकों में बँधी रचनात्मकता की बजाय उन्होंने सहज भाषा पर जोर दिया, ताकि आम आदमी भी उसमें निहित सरोकारों को समझ सके। श्री यादव ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में कहा कि उनकी रचनाओं के पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। सोशल मीडिया और हिंदी साहित्य के अंतर्संबंधों पर उन्होंने कहा कि यहाँ भी हिंदी साहित्य तेजी से विस्तार पा रहा है, पर कई बार इसमें तात्कालिकता का पुट और गंभीरता का अभाव दिखता है। बिना पढ़े रचनाओं को लाइक करने और कमेंट करने की प्रवृत्ति पर भी उन्होंने सचेत किया।  
      विशिष्ट अतिथि के रूप में बीएसएफ, जोधपुर के डिप्टी कमांडेंट और दोहाकार श्री विजेंद्र शर्मा ने कहा कि साहित्य का मूल संवेदना है और कृष्ण कुमार जी की रचनाओं की विशेषता उनकी संवेदनाओं से झलकती है। कविता केवल सच नहीं होता। उसका शिल्प और शैली भी प्रभावित करते हैं। इस मामले में आपकी रचनाएं हर कसौटी पर खरी उतरती हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री अरोड़वंश समाज के पूर्व अध्यक्ष एवं समाज सेवी श्री कश्मीरी लाल जसूजा ने कहा कि कविता आदमी को सही दिशा की ओर अग्रसर करती है।
      कार्यक्रम में डा. अरुण शहैरिया ताइर, सुरेंद्र सुंदरम, कृष्ण वृहस्पति, डॉ. सन्देश त्यागी, दीनदयाल शर्मा, दुष्यंत शर्मा, ओपी वैश्य, मनी राम सेतिया, रंगकर्मी भूपेन्द्रसिंह, हरविंद्रसिंह, राकेश मोंगा, दीपक गडई सहित अनेक साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी मौजूद रहे।  
{समाचार प्रस्तुति : डॉ. सन्देश त्यागी, सचिव-सृजन सेवा संस्थान, श्री गंगानगर, राजस्थान।}

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