आपका परिचय

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

अविराम विस्तारित

।। कथा प्रवाह ।।



संध्या तिवारी





मैं शर्मिन्दा हूँ

      कमल से भरे सरोवर के निकट पेट के बल अधलेटी मुद्रा में शकुन्तला दुष्यन्त का प्रेम पत्र पढ़ रही थी।
      उसने रसराज श्रृंगार के वशीभूत प्लावित हो अनजाने ही मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया, उसका बर्फ-सा ठंड़ा हाथ मुझमें सिहरन पैदा कर पाता, इससे पहले लता विटप से आच्छादित सुन्दर उपवन के रम्य वातावरण में मोती चुंगते हंस के श्वेत धवल पँख सहलाती दमयन्ती ने नल का प्रेम-पत्र वांचने के लिये, मुझे हाथ पकड़ अपने पास खींच लिया। मैंने पत्र पढ़ दमयन्ती की आँखो में झाँका, तो दूर-दूर तक राजा नल ही थे, मैं उसको कुछ कह पाती, कि संयोगिता की पुकार सुन उसके साथ उसके राजमहल के झरोखे में आ खड़ी हुई। उसने कबूतर को चुग्गा दिया और उसके गले में पड़ा पृथ्वीराज का प्रेमपत्र मेरे आगे बढ़ा दिया। उस प्रेमपत्र में चन्दवरदायी ने संयोगिता के सौन्दर्य और राजा की वीरता का ऐसा मर्मस्पर्शी वर्णन किया कि मैं संयोगिता के भाग्य से ईर्ष्या ही कर बैठी। ईर्ष्या के मुखर को मौन में दबा ही रही थी कि संयोगिता हर्षातिरेक से मेरे गले लग गयी।
      उसके गले लगते ही मेरे अन्तःवस्त्र में छिपा मेरा मोबाइल फोन वाइब्रेट कर उठा उसी की ‘काल’ होगी, मेरा रोम-रोम पुलकन से भर उठा। उससे बात करने को एकान्त ढूंढ़ ही रही थी कि वॉशरूम याद आया। हाँ वॉशरूम, बिल्कुल ठीक जगह।
      जीवन के सबसे खूबसूरत एहसास वॉशरूम में? 
...न्न्ना, दिमाग़ भन्ना गया।
लेकिन प्रेम-विवश मन कहाँ मानने वाला था ...
      वॉशरूम की दुर्गंध सहित प्रेम सुगंध घूँट ही रही थी कि बगल वाले वॉशरूम से ब्रिटिश कवयित्री ‘हॉली मैक्निश’ के अन्तःकरण के करुण उद्गार सुन सिहर उठी-

‘‘ मेरी बच्ची की शुरु शुरु की घूँटें
सराबोर हैं मल की दुर्गन्ध से
हर वक्त घबराई और असहज रहती हूँ 
इस समाज के डर से।
कि कहीं इस सभ्य समाज को न दिख जाये मेरे बदन की कौंध,
जो कि उनका मन और मान विचलन से भर उठे और ढ़ह जाये सभ्यता संस्कृति का महल,
ताश के पत्तों सा।’’

      सुनकर ऐसा लगा, धरती पर अकेली मैं ही नहीं, जो शर्मिंदा है अपने नैसर्गिक कृत्य पर ...

      तो क्या, शकुन्तला, दमयन्ती, संयोगिता सब, कवि-कल्पना या चित्रकार तूलिका का विभ्रम...?

  • 41, बेनी चौधरी, पीलीभीत-262001, उ0प्र0/मोबा. 09410464495

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