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रविवार, 5 नवंबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त  2017




।। व्यंग्य वाण ।।


ध्रुव तांती




शौचालय और हमारा चिंतन 


      देश में बने बहुत से ‘आलय’, जैसे- विद्यालय, देवालय, चित्रालय, चिकित्सालय की तरह ‘शौचालय’ का भी अपना महत्व है। विद्यालय, जहाँ शिक्षा दी जाती है, वहाँ ज्ञान का अर्जन किया जाता है। देवालय में जहाँ आत्मा का शुद्धीकरण होता है, वहीं देवता सहायता के लिए तत्पर भी रहते हैं। शौचालय में शारीरिक शुचिता लाने की क्रिया अपनायी जाती है। हम स्वस्थ रहते हैं। विद्यालय या देवालय जाने में चूक हो सकती है, कोई बात नहीं। मगर, शौचालय की उपस्थिति शत-प्रतिशत होनी चाहिए। इसमें गड़बड़ी होने से चिकित्सालय की शरण लेनी पड़ती है। शरीर से मलत्याग करना आवश्यक है और इससे शौच क्रिया द्वारा ही निवृत हुआ जा सकता है।
      इस तरह से हम इस निष्कर्ष पर आ टपकते हैं कि मानव-जीवन में शौचालय का महत्व चिकित्सालय से जरा भी कम नहीं। सम्प्रति अपने देश में शौचालय दो रूपों में पाया जाता है- एक, ओपन मैदान, जहाँ ‘आलय’ नाम की कोई चीज नहीं दिखती और दूसरा तो हम-आप जानते ही हैं- दीवारों से घिरा कमरानुमा। इन शौचालयों का महत्व केवल ‘शौच’ की दृष्टि से ही नहीं होता है अपितु ‘शौच’ के साथ ‘सोचने’ की महान प्रक्रिया भी इन दोनों स्थलों पर अपनायी जाती है।
      कहा जाता है कि जितना ज्ञान हमें विद्यालय में अध्ययन करने से नहीं होता है, उतना ज्ञान का अर्जन शौचालय में बैठकर सोचने से होता है। इसीलिए, बड़े-बड़े राजनेता, उत्तम प्रकृति के लोग शौचालय में अधिक से अधिक समय बिताना चाहते हैं। वे उक्त अवधि में पूरा का पूरा दैनिक पत्र पढ़कर अपने चिंतन को परिपक्व बनाते हैं। इस बीच चाहे जितनी कॉल आ जायें, ‘‘साहब ट्वालेट यानी शौचालय में हैं’’ यह मंत्र वाक्य प्रचारित होते रहता है। भले ही वे शौचालय के इर्द-गिर्द के कमरे में ही क्यों न हों। आपको आश्चर्य होगा कि बड़े-बड़े ओहदे वाले लोग भी यह सूचना पाकर कि साहब शौचालय में करीब दो घंटे से विराजमान हैं, स्वतः इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि सम्प्रति वे (साहब) देश की किसी गंभीर समस्या का हल ढूँढ़ने में तल्लीन हैं। क्योंकि शौचालय जैसा शांत, निरापद स्थल चिंतन के लिए मिलना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं। 
      हमने अनुभव किया है कि हिन्दी साहित्य में शौचालय की महत्ता पर कम ही लिखा-पढ़ा गया है। ऐसा नहीं होना चाहिए। जिस देश के नागरिक विद्यालय, चिकित्सालय या फिर देवालय के लिए धरना, प्रदर्शन, अनशन आदि चौक-चौराहे पर करते हैं; वहीं से शौचालय के लिए भी बुलंद आवाज उठनी चाहिए। हमारा तो नारा है- ‘‘अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है;/रोगी है वह देश, जहाँ शौचालय नहीं है।’’
      सरकार को हमारी सलाह पर कुछ पहल करनी चाहिए। वह निर्देश तो जारी कर ही सकती है कि इस देश के सभी नागरिक इस बात की गै्रन्टी दें कि शारीािक शुचिता के लिए हरेक घर में एक अदद शौचालय का प्रबंध कर लिया गया है। चाहे उनके रहने के लिए घर हो या न हो अथवा वे खुले आकाश या गाछ-वृक्ष के नीचे ही क्यों न सोते हों। यह कोई शर्मिन्दगी की बात नहीं है। जरूरत है कि जनता शौचालय में कुछ पल बैठकर देश हित की बात सोचे।
      हम अन्दाजा लगाते हैं कि प्रत्येक परिवार में शौचालय बन जाने से देश में भयंकर से भयंकर बीमारी का नामोनिशान मिट जायेगा। चिकित्सक अपना धंधा छोड़ साहित्य में ‘कविकर्म’ को अपनायेंगे। शरीर स्वस्थ होगा और हम जानते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग का वास होता है। इसलिए, हमें शौचालय में बैठकर सोचने का अभ्यास करना चाहिए। क्या पता, कब और किसे बुद्ध, महावीर या कबीर की तरह कोई चमत्कारिक सोच हाथ लग जाये और मानव कल्याण हो जाये। हम जानते हैं कि हमारी सारी समस्याओं का एक मात्र हल ‘शौचालय’ है। शायद यही कारण है कि जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि की खोज करने पर प्रायः पता चलता है कि ‘‘वे अभी शौचालय में हैं।’’

  • ग्राम व पोस्ट : मैना ग्राम वाया महिषी, जिला: सहरसा-852216 (बिहार)/मो. 09431463466

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